ब्रह्माजी कहते हैं - मुनिवरो! इस प्रकार स्तुति करके राजा ने समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले सनातन पुरुष जगन्नाथ भगवान् वासुदेव को प्रणाम किया और चिंताग्राम हो पृथ्वीपर कुश और वस्त्र बिछाकर भगवान् का चिन्तन् करते हुए वे उसीपर सो गये। सोते समय उनके मन में यही संकल्प था कि सबकी पीड़ा दूर करनेवाले देवाधिदेव भगवान् जनार्दन कैसे मुझे प्रत्यक्ष दर्शन देंगे। सो जानेपर देवाधिदेव जगद्गुरु भगवान् वासुदेवने राजा को स्वप्नमें अपने शङ्ख; चक्र और गदा धारण करनेवाले स्वरुप का दर्शन कराया। राजा इन्द्रद्युम्न ने बड़े प्रेमसे भगवान् का दर्शन किया। वे शङ्ख और चक्र धारण किये हुए थे। उन्होंने शार्ङ्ग नामक धनुष और बाण भी धारण कर रखे थे। उनका स्वरुप प्रलयकालीन सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहा था। वे प्रज्वलित तेजके विशाल मण्डल प्रतीत होते थे। उनका श्रीअङ्ग नीले पुखराज के समान श्याम था। वे गुरुडके कंधेपर विराजमान थे और उनके आठ भुजाएँ शोभा पा रही थीं। दर्शन देकर भगवान् ने उनसे कहा-'राजन्! तुम्हें साधुवाद है। तुम्हारे इस दिव्य यज्ञ से, भक्ति और श्रद्धा से मैं बहुत संतुष्ट हूँ। महिपाल! तुम व्यर्थ क्यों सोच में पड़े हो। राजन्! यहाँ जो जगत्पूज्य सनातनी प्रतिमा है, उसकी प्राप्ति का उपाय तुम्हें बतलाता हूँ। आज की रात बीतनेपर निर्मल प्रभात में जब सूर्योदय हो, उस समय अनेक प्रकार के वृक्षों से सुशोभित समुद्र के जलप्रान्त में, जहाँ तरङ्गो से प्रेरित महान जलकी राशि दिखायी देती है, वहीँ एक बहुत बड़ा वृक्ष खड़ा है, जिसका कुछ भग तो जल में है और कुछ स्थल में है। वह समुद्र की लहरों से आहत होनेपर भी कम्पित नहीं होता। तुम हाथ में कुल्हाड़ी लकर लहरों के बीच से अकेले ही वहाँ चले जाना। तुम्हें वह वृक्ष दिखाई देगा। मेरे बताये अनुसार उसको पहचानकर नि:शङ्कभाव से उस वृक्षको काट डालना। उसे काटते समय तुम्हें कोई अद्भुत वस्तु दिखायी देगी। उसी से सोच-विचारकर तुम दिव्य प्रतिमाका निर्माण करो। मोह में डालनेवाली चिंता छोड़ दो।'
यों कहकर महाभाग श्रीहरि अदृश्य हो गये। वह स्वप्न देख्क राजाको बा विस्मय हुआ। उस रात्रि को देखते हुए वे भगवान् में मन लगा उठ बैठे और वैष्णव मन्त्र एवं विष्णुसूक्तका जप करने लगे। प्रात:काल उठे और भ्ग्वत्स्मरण करते हुए विधिपूर्वक उन्होंने समुद्र में स्नान किया। फिर ब्राहमणों को नगर और गाँव आदि दान में दे पूर्वाह्ण-कृत्य करके समुद्र के तटपर गये। वहाँ अकेले ही महाराज ने समुद्रकी महावेला में प्रवेश किया और उस तेजस्वी महावृक्षको देखा। वह बहुत ऊँचा था और उससे बड़ी-बड़ी जटाएँ लटक रही थीं। उसे देखकर राजा इन्द्रद्युम्न बहुत प्रसन्न हुए उन्होंने तीखे फरसेसे उस वृक्ष को काट गिराया और उसके दो टुकड़े करनेका विचार किया। फिर उन्होंने जब काष्ठका भली-भाँति निरिक्षण किया, तब एक अद्भुत बात दिखायी दी। विश्वकर्मा और भगवान् विष्णु दोनों ब्राह्मणका रूप धरकर वहाँ आये। उनके कण्ठ में दिव्य हार और शरीर में दिव्य अङ्गराग शोभा पा रहे थे। वे दोनों अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। राजा के पास आकर उन्होंने पूछा- 'महाराज! आप यहाँ कौन-सा कार्य करेंगे? किसलिये इस वनस्पतिको काट गिराया है?'
उन दोनों की बात सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने मीठी वाणी में उत्तर दिया- 'मैं यहाँ आदि-अन्तसे रहित देवाधिदेव जगदीश्वर भगवान् विष्णु की आराधना के लिये प्रतिमा बनवाया चाहता हूँ। इसके लिए स्वयं भगवान् ने ही मुझे स्वप्न में प्रेरित किया है।' राजा की यह बात सुनकर भगवान् जगन्नाथ ने हँसकर कहा- 'महाराज! आपका विचार बड़ा उत्तम हैं। इसके लिए आपको साधुवाद है। यह भयंकर संसार-सागर केले के पत्तेकी भाँति सारहीन है। यह भयंकर संसार-सागर केले के पत्ते की भाँति सारहीन है। इसमें दु:खकी ही अधिकता है। काम-क्रोध इसमें पूर्णरूप से व्याप्त हैं। इन्द्रियरुपी भँवर और कीचड़ के कारण यह दुरुस्त हैं। नाना प्रकार के सैकड़ों रोग यहाँ भँवर के समान हैं। यह संसार पानी के बुलबुलेकी भाँति क्षणभङ्गुर है। इसमें रहते हुए जो आपके मन में भगवान् विष्णुकी आराधनाका विचार उत्पन्न हुआ, यह बहुत ही उत्तम है। महाभाग! आइये, इस वृक्षकी शीतल छाया में हम दोनों के साथ बैठिये। ये मेरे साथी एक श्रेष्ठ शिल्पी हैं। यह सब प्रकार के शिल्पकर्म में साक्षात् विश्वकर्मा के समान निपुण हैं। आप किनारा छोड़कर चले आइये। यह मेरे बताये अनुसार प्रतिमा तैयार कर देंगे।'
ब्राह्मणकी बात सुनकर राजा इन्द्रद्युम्न समुद्रका तट छोड़ उनके पास चले गये और वृक्षकी शीतल छाया में बैठे। तदनन्तर ब्राह्मणरूपधारी विश्वात्मा भगवान् ने शिल्पियों में प्रधान विश्वकर्माको आज्ञा दी- 'तुम प्रतिमा बनाओ। भगवान् श्रीकृष्णका रूप परम शान्त हो। उनके नेत्र पद्मपत्र के समान विशाल होने चाहिये। वे वक्ष:स्थलपर श्रीवत्सचिह्न तथा कौस्तुभमणि और हाथों में शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण किये हुए हों। दूसरी प्रतिमाका विग्रह दुग्धके समान गौरवर्ण हो। उसमें स्वस्तिकका चिह्न होना चाहिये। वे अपने हाथों में हल धारण किये हुए हों, उनका नाम महाबली अनन्त (बलरामजी) होगा। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, विद्याधार और नाग- कोई भी उनका अन्त नहीं जानते; इसलिये वे भगवान् अनन्त कहलाते हैं। तीसरी प्रतिमा भगवान् वासुदेव की बहन सुभद्रादेवीकी होगी। उनके शरीरका रंग सुवर्णके समान गौर एवं सुन्दर शोभा से युक्त होना चाहिये। उनमें समस्त शुभ लक्षणोंका समावेश होना आवश्यक है।'
भगवान् का यह कतःन सुनकर उत्तम कर्म करनेवाले विश्वकर्मा ने तत्काल उत्तम लक्षणों से युक्त प्रतिमाएँ तैयार कर दीं।पहले उन्होंने बलभद्रजी की मूर्ति बनायी। उनका वर्ण शरत्काल के चन्द्रमा की भाँति श्वेत था। नेत्रों में कुछ-कुछ लालिमा थी। उनका शरीर विशाल और मस्तक फणाकार होने से विकत जान पड़ता था। वे नील वस्त्र धारण किये बलके अभिमान से उध्दत प्रतीत होते थे। उन्होंने एक कुण्डल धारण कर रखा था। उनके हाथों में गदा और मुसल शोभा पाते थे। उनका स्वरुप दिव्य था। द्वितीय विग्रह साक्षात् भगवान् वासुदेवका था। उनके नेत्र कमल के समान प्रफुल्लित थे। शरीर की कान्ति नील मेघ के समान श्याम थी। उनकी श्याम आभा तीसीके फूलकीसी प्रतीत होती थी। बड़े-बड़े नेत्र कमल-पत्र की उपमा धारण करते थे। शरीरपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। वक्ष:स्थलमें श्रीवत्सका चिह्न तथा हाथ में चक्र था। इस प्रकार वे सर्वपापहारी श्रीहरि बड़े दिव्य दिखायी देते थे। तीसरी प्रतिमा सुभद्रा की थी, जिनके देहकी दिव्य कान्ति सोनेकी-सी दमक रही थी। नेत्र कमलपत्र के समान विशाल थे। उनका अङ्ग विचित्र वस्त्रसे आच्छादित था। वे हार और केयूर आदि विचित्र आभूषणों से सुशोभित थीं। गले में रत्नमय हार लटक रहा था। इस प्रकार विश्वकर्मा ने उनकी बड़ी रमणीय प्रतिमा बनायी। राजा इन्द्रद्युम्न ने यह बड़ी ही अद्भुत बात देखी। सब प्रतिमाएँ एक ही क्षण में बन गयीं। सभी दो दिव्य वस्त्रों से आच्छादित थीं। सबका भाँति-भाँति रत्नों से श्रृङ्गार किया गया था और सभी अत्यन्त मनोहर एवं समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न थीं। उन्हें देखकर राजा अत्यन्त आश्चर्यमग्न होकर बोले- 'आप दोनों ब्राह्मणके रूप में साक्षात् देवता तो नहीं पधारे हैं? आप दोनों के कर्म अद्भुत हैं। आपके व्यवहार देवताओं के-से हैं। निश्चय ही आप मनुष्य नहीं जान पड़ते। आप देवता हैं या मनुष्य? यक्ष हैं अथवा विद्याधर! आप ब्रह्मा और विष्णु तो नहीं हैं? दोनों अश्विनीकुमार तो नहीं हैं? आप मायामयरूप से स्थित हैं। अत: आपके यथार्थ स्वरुप को मैं नहीं जनता। अब आप ही दोनों की शरण में आया हूँ। मेरे सामने अपने स्वरुप को प्रकाशित कीजिये।'
श्रीभगवान् बोले - मैं, देवता, यक्ष, दैत्य, देवराज, इन्द्र, ब्रह्मा अथवा रूद्र नहीं हूँ सामने मुझे पुरषोत्तम समझो। मैं समस्त लोकों की पीड़ा दूर करनेवाला अनन्त बल-पौरुष से सम्पन्न और सम्पूर्ण भुन्तों का आराध्य हूँ। मेरा कभी अन्त नहीं होता। जिसका सब शास्त्रों में उल्लेख किया जाता है, वेदान्त-ग्रन्थोंमें वर्णन मिलता है, जिसे योगीजन ज्ञानगम्य एवं वासुदेव कहते हैं, वह परमात्मा मैं ही हूँ। स्वयं मैं ही ब्रह्मा, ,मैं ही विष्णु, मैं ही शिव, मैं ही देवराज इन्द्र तथा मैं ही जगत् का नियन्त्रण करनेवाला यम हूँ। पृथ्वी आदि पाँच भूत, त्रिविध अग्नि, जलाधिप वरुण, धरती और पर्वत भी मैं ही हूँ। संसार में जो कुछ भी वाणी से कहा जाने वाला स्थावर-जङ्गम भूत है, वह मेरा ही स्वरुप है। यह चराचर विश्व मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। नृपश्रेष्ठ! में तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। सुव्रत! मुझसे वार माँगो। तुम्हारे हृदय में जो अभीष्ट वस्तु हो, वह तुम्हें दूँगा। जो पुण्यवान् नहीं हैं, उनको स्वप्नमें भी मेरा दर्शन नहीं होता। तुम्हारी तो मुझमें दृढ़ भक्ति है, इसलिये तुमने मेरा प्रत्यक्ष दर्शन किया है।
भगवान् वासुदेवका यह वचन सुनकर राजा के शरीर में रोमाञ्च हो आया। वे इस प्रकार स्त्रोतगान करने लगे- 'लक्ष्मीकान्त! आपको नमस्कार है। श्रीपते! आपके दिव्य विग्रहपर पीत वस्त्र शोभा पाटा है। आप लक्ष्मी प्रदान करनेवाले और लक्ष्मी स्वामी हैं। श्रीनिवास! आप लक्ष्मी के दाम हैं, आपको नमस्कार है। आप आदिपुरुष, ईशान, सबके ईश्वर, सब ओर मुखवाले, निष्कल एवं सनातन परम देव हैं; आपको मेरा प्रणाम है। आप शब्द और गुणों से अतीत, भाव और अभाव से रहित, निर्लेप, निर्गुण, सूक्ष्म, सर्वज्ञ तथा सबके रक्षक हैं। आपका स्वरुप वर्षाकाल के मेघ के समान श्याम है। आप गौ तथा ब्राह्मणों के हितमें संलग्न रहते हैं। सबकी रक्षा करते हैं। सर्वत्र व्यापक और सबको उत्पन्न करनेवाले हैं। आप शङ्ख, चक्र, गदा और मूसल धारण करनेवाले देवता हैं। आपके श्रीअङ्गोकी सुषमा नील कमलदल के समान श्याम है। आप क्षीरसागर के भीतर शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले हैं। इन्द्रियोंके नियन्ता, सर्व्पाफारी श्रीहरि हैं। आपको नमस्कार करता हूँ। आओ देवदेवश्वर, वरदाता, व्यापक, सर्वलोकेश्वर, मोक्षके साधक तथा अविनाशी भगवान् विष्णु हैं; आपको पुन: मेरा प्राम है।'
इस प्रकार भगवान् का स्तवन करके राजा ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और धरतीपर मस्तक टेककर कहा- 'नाथ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो में यह उत्तम वर मांगता हूँ- देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, महानाग ऋषि, नाना शास्त्रोंके प्रवीण विद्वान्, सन्यांसी, यूगी, वेदतत्त्वका विचार करनेवाले तथा अन्यान्य मोक्षमार्ग के ज्ञाता मनीषी पुरुष जिस निर्गुण, निर्मल एवं शान्त परम पदका ध्यान करते हैं, उस परम दुर्लभ पदको मैं आपके प्रसाद से प्राप्त करना चाहता हूँ।'
श्रीभगवान् बोले - राजन्! तुम्हारा कल्याण हो, सब कुछ तुम्हारी इच्छा के अनुसार होगा। मेरे प्रसाद से तुम्हें अभिलक्षित वस्तु की प्राप्ति होगी। नृपश्रेष्ठ! तुम दस हजार नौ सौ वर्षों तक अपने अखण्ड साम्राज्यका उपभोग करो। इसके बाद उस दिव्य पदको प्राप्त होओगे, जो देवता और असुरों के लिये भी दुर्लभ है, जिसे पाकर सब मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। जो शान्त, गूढ़, अव्यक्त, अव्यय, परसे भी पर, सूक्ष्म, निर्लेप, निष्कल, ध्रुव, चिंता और शोकसे मुक्त तथा कार्य और कारण से वर्जित ज्ञेय नामक परम पद है, उसका तुम्हें साक्षात्कार कराऊँगा। उस परमानन्दमय पदको पाकर तुम परम पद- मोक्षको प्राप्त हो जाओगे! राजेन्द्र! इस पृथ्वीपर जबतक बादल पानी बरसाते रहेंगे, जबतक आकाश, चन्द्रमा, सूर्य और तारे दीखते रहेंगे, जबतक सात समुद्र तथा मेरु आदि पर्वत मौजूद रहेंगे तथा जबतक द्युलोकमें देवताओंकी सत्ता बनी रहेगी, तबतकइस भूतलपर सर्वत्र तुम्हारी अक्षय कीर्ति छायी रहेगी। तुम्हारे यज्ञाङ्गसे प्रकट होनेवाला तालाब इन्द्रद्युम्नसरोवरक नामसे प्रसिद्ध तीर्थ होगा, जिसमें एक बार स्नान करके भी मनुष्य इन्द्रलोक प्राप्त कर सकते हैं। जो इस सरोवर के सुंदर तटपर पिण्डदान करेगा, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके इन्द्रलोकको जायगा और वहाँ विमान पर बैठकर अप्सराओंसे पूजित हो गन्धर्वों के गीत सुनता हुआ चौदह इन्द्रियों की आयुपर्यंन्त निवास करेगा। सरोवरके दक्षिण भाग में नैर्ऋत्य कोणकी ओर जो बरगदका वृक्ष खड़ा है, उसके समीप केवड़ेके वनसे आच्छादित एक मण्डप है, जो नाना प्रकार के वृक्षों से व्याप्त है। आषाढ़ के शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको महानक्षत्र में हमारी इन प्रतिमाओंको ले आकर लोग सात दिनों तक मण्डप में स्थापित रखेंगे। उस समय बड़ा उत्सव होगा। सोने के दण्ड लगे हुए चँवर तथा रत्नभूषित व्यंजनोंद्वारा सब लोग हमें हवा करेंगे। इस प्रकार मङ्गलपाठपूर्वक हमारी स्थापना होगी। ब्रह्मचारी, संन्यासी, स्नानतक, वानप्रस्थ, गृहस्थ, सिद्ध तथा अन्य ब्राहमण नाना प्रकार के पदोंवाले स्तोत्रों तथा ऋक्, यजु एवं सामदेव की ध्वनि से बलराम और श्रीकृष्णकी स्तुति करेंगे। उस समय जो मनुष्य भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन, दर्शन अथवा नमन करेगा, वह श्रीहरि के शोभामय धाम में विराजेगा।
इस प्रकार राजा को वरदान दे विश्वकर्मासहित भगवान् विष्णु वहाँ से अंतर्धान हो गये। राजाके हर्ष की सीमा न रही। उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया। उन्होंने भगवान् के दर्शन से अपने को कृतकृत्य माना। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण, बलराम और वरदायिनी सुभद्राको मणिकाञ्चनजटित विमानाकार रथों में बिठाकर वे बुद्धिमान् नरेश अमात्य और मन्त्रियोंसहित मङ्गलपाठ तथा बाजे-गाजे के साथ ले आये और उन्हें परम मनोहर पवित्र स्थानों में पधराया। फिर शुभ तिथि, शुभ समय, शुभ नक्षत्र और शुभ मुहूर्तमें ब्रह्मणों के द्वारा उनकी प्रतिष्ठा करायी। उत्तम प्रासाद मियन वेदोक्त विधिपूर्वक प्रतिष्ठा करके उन सब विग्रहोंको स्थापित किया; फिर भाँति-भाँति के सुगन्धित पुष्पोंसे विधिवत् पूजा करके सुवर्ण, मणि, मोटी और नाना प्रकार के सुन्दर वस्त्र अर्पण किये। विविध प्रकार के दिव्य रत्न, आसन, ग्राम, नगर, राज्य तथा पुर आदि भी दान किये। इस तरह अनेक प्रकार का दान करके राजा ने समुचित रीति से राज्य किया और भाँति-भाँति के यज्ञ करके अनेक बार दान दिये। फिर कृतकृत्य होकर राजा ने समस्त परिग्रहोंकत्याग कर दिया और अत्यन्त उत्कृष्ट स्थान- भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लिया।
मुनियों ने पूछा - सुरश्रेष्ठ! किस समय पुरुषोत्तमतीर्थकी यात्रा करनी उचित है और प्रभो! किस विधि से पञ्चतीर्थोंका सेवन करना चाहिये। स्नानदानूप एक-एक तीर्थका और देव-दर्शनका जो पृथक्-पृथक् फल हो, वह सब बताइये।
ब्रह्माजी बोले - जो कुरुक्षेत्र में अपनी इन्द्रियों और क्रोधको जीतकर बिना खाये-पिये सत्तर हजार वर्षों तक एक पैरसे खड़ा होकर तपस्या करता है तथा जो ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशीको उपवासपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तम का दर्शनकरता है, वह पहलेकी अपेक्षा अधिक फलका भागी होता है। अत: मुनिवरो! स्वर्गलोक की इच्छा रखनेवाले ब्राह्मण आदि को चाहिये कि वे ज्येष्ठ मास में प्रयत्न करके इन्द्रिय-संयमपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करें। श्रेष्ठ मनुष्यको उचित है कि ज्येष्ठ मासमें शुक्ल पक्ष की द्वादशीको विधिपूर्वक पञ्चतीर्थोंका सेवन करके श्रीपुरुषोत्तम का दर्शन करे। जो ज्येष्ठ की द्वादशी को अविनाशी देवता भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करते हैं, व विष्णुलोक में पहुँचकर कभी वहाँ से नीचे नहीं गिरते। अत: ज्येष्ठ में प्रयत्नपूर्वक वहाँ की यात्रा करनी चाहिये और वहाँ पञ्चतीर्थ-सेवनपूर्वक पुरुषोत्तम का दर्शन करना चाहिये। जो अत्यन्त दूर होनेपर भी प्रतिदिन भक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमका कीर्तन करता है, वह शुद्धचित्त हो भगवान् विष्णु के धाम में जाता है। जो श्रद्धापूर्वक एकाग्रचित्त हो श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ यात्रा करता है, वह सब पापों से मुक्त हो भगवान् विष्णु के लोकमें जाता है। जो दूर से भगवान् पुरुषोत्तम के प्रासाद-शिखरपर स्थित नीलचक्र का दर्शन करके उसे भक्तिपूर्वक प्रणाम करता है, वह मनुष्य सहसा पाप से मुक्त हो जाता है।
Summary of chapter 27 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The incomparable fruits of sincere devotion to Sūrya are expounded through narrative examples and direct teaching. The faithful worship of Sūrya with flowers, water, hymns, and dedicated observances is shown to confer health, wealth, sons, fame, and ultimately mokṣa. The proper attitude, ritual procedures, and inner orientation required of a true devotee of the Sun are presented.