ब्रह्म पुराण

61 - पुरुष्णीतीर्थ, नारसिंहतीर्थ, पेशाचनाशनतीर्थ, निम्नभेदतीर्थ और शङ्खहृदतीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं - पुरुष्णी नामक तीर्थ तीनों लोकों में विख्यात है।  उसके पापनाशक स्वरुप का वर्णन करता हूँ, सुनो। एक बार महर्षि अत्रिने ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजी की आराधना की। उन तीनों के संतुष्ट होने पर महर्षि ने कहा- 'आप लोग मेरे पुत्र हों। साथ ही मेरे एक परम सुन्दरी कन्या भी हो।' इस वरदान के अनुसार वे तीनों देवता उनके पुत्र हुए। महर्षि ने जो कन्या उत्पन्न की, उसका नाम आत्रेयी हुआ। अत्रिके तीनों पुत्र क्रमशः दत्त, सोम और दुर्वासाके नाम से प्रसिद्ध हुए। अग्निसे अङ्गिरा की उत्पत्ति हुई थी। अङ्गार से उत्पन्न होने के कारण ही उन्हें अङ्गिरा कहते हैं। महर्षि अत्रिने अङ्गिरा  से ही अपनी तेजस्वी कन्या आत्रेयी को ब्याह दिया। अङ्गिरा में अग्नि की तीर्वता का प्रभाव था। अत: वे आत्रेयीसे सदा पुरुष (कठोर) भाषण किया करते थे। आत्रेयी भी सदा पतिकी सेवा में संलग्न रहती थीं। आत्रेयी के गर्भसे महान् बलवान् और पराक्रमी आङ्गिरस नामक पुत्र हुए। अङ्गिरा आत्रेयीको प्रतिदिन कुट वचन सुनाते और आङ्गिरस नामवाले पुत्र सदा अपने पिता को शान्त किया करते थे। एक दिन आत्रेयी पति के कठोर वाक्य से उद्विग हो उठीं और दीनभाव से हाथ जोड़कर अपने  श्वशुर अग्निदेव से बोलीं- 'भगवन् हव्यवाह! मैं अत्रिकी कन्या और आपके पुत्रकी पत्नी हूँ, पुत्रों और पति की सेवा में सदा संलग्न रहती हूँ; तो भी पतिदेव मुझे कटु वचन सुनते और व्यर्थ ही रोषपूर्ण दृष्टीसे देखा करते हैं। सुरश्रेष्ठ! आप मेरे पति-देवताको समझा दें।

अग्नि बोले - कल्याणी! तुम्हारे पति अङ्गिरा ऋषि अङ्गारसे प्रकट हुए हैं। वे जिस प्रकार शान्त हो सकें, वैसी नीति बर्तनी चाहिये। तुम्हरे पति अङ्गिरा जब अग्निमें प्रवेश करें, तब तुम मेरी आज्ञासे जलरूप होकर उन्हें बहा ले जाना।

आत्रेयीने कहा - भगवन्! मैं उनकी कठोर बातें सह लूँगी, किन्तु मेरे स्वामी अग्नि में प्रवेश न करें। जो स्त्रियाँ अपने स्वामीसे प्रतिकूल चलती हैं, उनके जीवनसे क्या लाभ। मैं तो इतना ही चाहती थी कि वे शान्तिमय वचन बोलें।

अग्नि बोले - जल में, शरीर में तथा स्थावर-जङ्गमरूप जगत्में सर्वत्र मेरा निवास है। मैं तुम्हारे पतिका नित्य आश्रय हूँ, क्योंकि मैं ही उनका जनक हूँ। जो मैं हूँ, वही वे भी हैं। यह जानकार तुम्हें चिंता नहीं करनी चाहिये। एक बात और है- जलको तो तुम माता समझो और अग्नि को श्वशुर। इस बातका अपनी बुद्धिसे भलीभाँति निश्चय करके तुम विषाद न करो।

आत्रेयीने कहा - भगवन्! आप जलको माता कहते हैं और मैं आपके पुत्रकी पत्नी हूँ। जननी होकर फिर पत्नी कैसे रह सकूँगी, जलका रूप धारण करनेसे यह विरोध सामने आता है।

अग्नि बोले - स्त्री पहले तो पत्नी होती है। फिर स्वामीका भरण-पोषण करनेसे भार्या बनती है। पुत्र का जन्म देनेपर उसे जाया कहते हैं। इसी प्रकार अपने गुणोंके कारण वह कलत्र कहलाती है। भद्रे! तुम भी यही रूप धारण करती हो। अत: मेरी आज्ञाका पालन करो। जो एक बार पत्नीके गर्भमें आकर पुत्ररूपसे उत्पन्न हो चुका, वह वास्तवमें उसका पुत्र ही है और वह स्त्री भी जननी ही है। अत: वैदिक तत्त्वके विद्वान् कहते हैं कि पुत्र उत्पन्न हो जानेपर नारि पत्नी नहीं रह  जाती।

श्वशुरके मुख से यह वचन सुनकर आत्रेयी ने अग्निरूप में आये हुए अपने पतिको जलसे आप्लावित कर दिया। फिर वे दोनों पति-पत्नी गङ्गाजी के जलसे जा मिले। उस समय दोनोंके स्वरुप शान्त थे। जैसे लक्ष्मी के साथ श्रीविष्णु, उमा के साथ शंकर तथा रोहिणीके साथ चन्द्रमा हैं, उसी प्रकार वे दोनों शोभा पाने लगे। पतिको आप्लावित करती हुई आत्रेयी ने जलमय शरीर धारण किया था, अत: वह परूष्णी नदी के नामसे विख्यात हुई और गङ्गामें जा मिली। उसमें स्नान करनेसे सौ गोदानोंका पुण्य प्राप्त होता है। आङ्गिरस नामवाले पुत्रने गङ्गा और पुरुष्णीके संगमपर बहुत-से यज्ञ किये। वहाँ स्नान-दान आदिसे जो पुण्य होता हिया, उसका वर्णन नहीं हो सकता।

गङ्गाके उत्तर-तटपर नारसिंह नामक विख्यात तीर्थ है, जो सबकी रक्षा करनेवाला है। उसके प्रभावका वर्णन करता हूँ, सुनो। पूर्वकाल में हिरण्यशिपु नामक दैत्य हुआ था, जो बलवानों में श्रेष्ठ था। तपस्या और पराक्रमी की दृष्टि से भी वह बहुत बढ़ा हुआ था। देवता भी उसे परास्त नहीं कर पाते थे। उसका पुत्र भगवान् का भक्त हुआ। उसके साथ द्वेष करनेके कारण हिरण्यकशिपुका अन्त:करण मलिन हो गया था। उस समय भगवान् अपनी विश्वरूपताका परिचय देते हुए सभामण्डपके खंभे से नरसिंहरूप में प्रकट हुए और उस दैत्य का वध करके उन्होंने उसकी सेनाको भी मार भगाया। क्रमशः युद्ध में समस्त दैत्योंका संहार करके रसातल के शत्रुओंपर विजय पायी। उसके बाद वे स्वर्गलोकमें गये। वहाँ रहनेवाले दैत्योंको परास्त करके वे पुन: पृथ्वीपर आये। यहाँ पर्वत, समुद्र, नदी, ग्राम और वनों में नाना रूप धारण करके जो दैत्य निवास करते थे, उन सबका भगवान् नृसिंहने संहार कर डाला। आकाश, वायु तथा ज्योतिर्मय लोक में पहुँचे हुए दैत्यों को भी जीवित नहीं छोड़ा। उनके नख वज्रपातसे भी कठोर थे। गर्दन और मुखपर बड़े-बड़े बाल थे। उनकी गर्जना सुनकर दैत्यपत्नियोंके गर्भ गिर जाते थे। उन्होंने समस्त राक्षसोंको परास्त किया। भयंकर सिंहनाद, प्रयाग्निके समान दृष्टि, थप्पड़ और शरीर के शक्केसे समस्त असुरोंको चूर्ण कर डाला।

इस प्रकार अनेक दैत्यों का संहार करके नरसिंहजी गौतमीके तटपर गये, जो उन्हीं के चरणकमलों से निकली हुई और मन तथा नेत्रोंको आनन्द देनेवाली थी। वहाँ दण्डकारण्यका स्वामी आम्बर्य नामक दैत्य रहता था, जो देवताओंके लिए भी दुर्जय था। उसके पास बहुत बड़ी सेना थी। भगवान् नृसिंहका उस दैत्य के साथ अत्यन्त भयंकर एवं रोमाञ्चकारि युद्ध हुआ। श्रीहरिने गोदावरीके उत्तरतटपर अपने शत्रुका संहार कर डाला। वह स्थान तीनों लोकों में नारसिंहतीर्थ के नाम से विख्यात हुआ। वहाँ किया हुआ स्नान-दान आदि पुण्यकार्य समस्त पापरुपी ग्रहोंका शमन, वृद्धावस्था और मृत्युका निवारण तथा सबकी रक्षा करनेवाला है। जैसे सम्पूर्ण देवताओं में कोई भी भगवान् विष्णुके समान नहीं है, उसी प्रकार समस्त तीर्थों में नारसिंहतीर्थ अनुपम और सर्वोत्तम है। उस तीर्थ में स्नान करके मनुष्य भगवान् नृसिंहका पूजन करे तो उसे स्वर्ग, मर्त्यलोक और पातालका भी कोई सुख दुर्लभ नहीं रहता। बिना श्रद्धा भी जिनका नाम लेनेपर समस्त पापोंका संहार हो जाता है, वे साक्षात् भगवान् नरसिंह प्राप्त होनेवाले फलका कौन वर्णन कर सकता है। जैसे नृसिंहजी से बड़ा कहीं कोई देवता नहीं है, उसी प्रकार नृसिंहतीर्थ के समान कहीं कोई तीर्थ नहीं है।

गङ्गाके उत्तर-तटपर पैशाचनाशनतीर्थ विख्यात है। नारद! वहाँ पूर्वकाल में एक ब्राह्मण पिशाच-योनिसे मुक्त हुआ था। सुर्यज्ञ के पुत्र अजीगर्ति एक विख्यात ब्राह्मण थे। एक समय अकाल पड़नेपर कुटुम्ब-पालन के भार से दु:खी एवं पीड़ित होकर उन्होंने अपने मझले पुत्र शुन:शेप को वधके लिए क्षत्रिय के हाथ बेच दिया। उसके बदलेमें अजीगर्तिको बहुत धन मिला था। शुन:शेप ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ था। ऐसे पुत्रको भी अजीगर्ति ने धनके लोभ से बेच डाला। आपत्तिमें पड़ने पर विद्वान् पुरुष भी कौन-सा पाप नहीं कर डालता। समय आने पर अजीगर्ति मृत्यु हुई और वे नरक में डाले गये। क्योंकि इस लोक में पूर्वजन्म के किये हुए पापोंका भोगके बिना क्षय नहीं होता। अनेक पाप-योनियों में पड़नेके पश्चात् अजीगर्ति भयंकर आकारवाले पिशाच हुए। उन्हें निर्जल और निर्जन वन में सूखे काठपर रहना पड़ता था। गर्मी में जहाँ दावानल फैल जाता, वही यमराज के दूत उस प्रेत को डाल देते थे। कन्या, पुत्र, पृथ्वी, अश्व तथा गौओंका विक्रय करनेवाले मनुष्य महाप्रलय-कालतक नरकसे छुटकारा नहीं पाते*। अपने किये हुए पापोंके फलस्वरूप भयंकर यमदूतों द्वारा नरक में पकाए जानेवाले वह प्रेत जोर-जोरसे रोने लगा।

एक दिन अजीगर्ति का मझला पुत्र  शुन:शेप मार्ग में कहीं जा रहा था। उसने रोते हुए पिशाच की कातर वाणी सुनी और पूछा- 'आप कौन हैं, जो अत्यन्त दु:खी होकर रोते हैं? अजीगर्ति बड़े दु:खसे कहा- 'मैं शुन:शेपका पिता हूँ। भारी पापकर्म करके भयानक प्रेतयोनि में पड़ा हूँ। पहले तो बारंबार नरकों में यातनाएँ सहता रहा और अब प्रेतयोनि को प्राप्त हुआ हूँ। जो-जो पापकर्म करनेवाले हैं, उन सबकी यही गति होती है।' यह सुनकर अजीगर्तिके पुत्र को बड़ा दु:ख हुआ। उसने कहा- 'पिताजी! में ही आपका पुत्र शुन:शेप हूँ। हाय, मेरे दोषसे आपकी यह दशा हुई! मुझे बेचने के कारण आपको इस प्रकार नरकोंमें आना पड़ा है। अब मैं आपको स्वर्गमें पहुँचाऊँगा।' ऐसी प्रतिज्ञा करके उसने गङ्गाजी का चिन्तन किया और पिता को उत्तम लोक प्राप्त करानेकी चेष्टा में संलग्न हो वहाँसे चल दिया। उसने सोचा- 'जो सम्पूर्ण दुःखरुपी अग्नि से संतप्त हैं और मोहके महासागरमें डूब रहे हैं, उन देहधारियोंके लिए गङ्गाजी को छोड़कर तीनों लोकों में  दूसरा कोई सहारा नहीं है। ऐसा निश्चय करके पिताका दुर्गतिसे उद्धार करनेकी कामना लेकर शुन:शेप पवित्र भावसे गौतमीके तटपर गया और वहाँ स्नान करके भगवान् विष्णु और शिव का स्मरण करते हुए उसने प्रेतरुपी दु:खी पिताको जल दिया। जलाञ्जली देते ही अजीगर्ति पवित्र होकर परम पुण्यमय दिव्य शरीर धारण कर  लिया और विमानपर बैठकर देवसमुदायसे सेवित वैकुण्ठधामको प्रस्थान किया। गङ्गा, भगवान् विष्णु, शिव और ब्रह्माजीके प्रभावसे अजीगर्ति हजारों सूर्योंके समान तेजस्वी रूप धारण करके वैकुण्ठधाम में रहने लगे। तबसे यह स्थान पैशाचनाशनतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसके स्मरणमात्रसे मनुष्यों के बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं। नारद! इस प्रकार मैंने तुमसे इस तीर्थका महात्म्य सुनाया। यहाँ और भी तीन सौ तीर्थ हैं, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं।

निम्नभेद नमक तीर्थ सब पापों का नाश करनेवाला है। वह गङ्गाके उत्तर-तटपर है। उसकी प्रसिद्धि तीनों लोकों में है। उसके स्मरणमात्रसे सम्पूर्ण पापोंका क्षय हो जाता है। वहीँ वेदद्वीप है। उसके दर्शनसे मनुष्य वेदों का विद्वान् होता है। एक समयकी वाट है- परम धर्मात्मा राजा पुरूरवाने उर्वशी नमक अप्सराकी कामना की। मादक नेत्रोंवाली कामिनीको देखकर कौन पुरुष मोह में नहीं पड़ता। उर्वशी राजाके स्थानपर गयी। उसने राजा से यह शर्त की कि में जबतक आपको नग्न न देखूँ, तभी तक आपके पास रह सकती हूँ। उसके रहनेकी यह अवधि स्वीकार करके राजा ने उस रमणीया अप्सराको ग्रहण किया। एक दिन जब वह पलंगपर सोयी हुई थी, राजा पुरुरवा उठे। उसी समय उन्हें नग्न द्केह्कर उर्वशी वहाँ से चली गयी। उसके जाने से राजा को बड़ा दु:ख हुआ। उनका अग्निहोत्र और भोजन छूट गया। वे न किसीकी बात सुनते थे और न किसी की ओर देखते थे। मृतककी-सी अवस्थामें पड़े रहते थे। उस समय पुरोहितने युक्तियुक्त वचनों द्वारा उन्हें समझाया- 'राजन्! तुम तो बुद्धिमान् हो; क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि इन स्त्रियों का हृदय भेडियों की तरह कठोर होता है। तुम शोक न करो। महाराज! इस संसार में कौन ऐसा पुरुष है, जो कामिनियों से ठगा न गया हो। वञ्चना, क्रूरता, चञ्चलता और दुश्चरित्रता- ये जिन स्त्रियोंके स्वाभाविक दुर्गुण हैं, वे सुखदायिनी कैसे हो सकती हैं? काल ने किसको नहीं मारा। याचक होनेपर किसको गौरव प्राप्त हुआ। धन-संपत्तिसे किसका मन भ्रान्त नहीं हुआ और युवती स्त्रियोंने किसको धोखा नहीं दिया।* राजन्! जिनका हृदय मदसे उन्मत्त रहता है, वे युवतियां स्वप्न और माया के समान मिथ्या हैं। वे किसको सुख दे सकती हैं। यह जानकर तुम निश्चिन्त हो जाओ। महामते! भगवान् शंकर, विष्णु तथा गोदावरी नदीको छोड़कर तीनों लोकों में दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो दु:खियों को शरण दे सके।'

पुरोहितका यह कथन सुनकर राजा ने यत्नपूर्वक अपने दु:खको दूर किया। वे गोदावरीके मध्यभाग में (जहाँ रेत थी) रहकर भगवान् शिव, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य, गङ्गा तथा अन्यान्य देवताओं की आराधना करने लगे। जो विपत्ति में पड़नेपर तीर्थों और देवताओंका सेवन नहीं करता, वह काल वश में पड़ा हुआ जीव किस दशा को प्राप्त होगा। राजा पुरूरवा एकमात्र भगवान् के शरण हो उत्सुकतापूर्वक गौतमीका सेवन करने लगे। संसार की ओरसे उनका मन हट गया और भगवान् के भजनमें उनकी बड़ी श्रद्धा हो गयी। उन्होंने ऋत्विजोंको साथ लेकर बहुत दक्षिणावाले अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया। तबसे वह स्थान वेदद्वीप और यज्ञद्वीप कहलाने लगा। वहाँ सदा ही पूर्णिमाकी रात में उर्वशी आया करती है। जो मनुष्य उस द्वीपकी प्रदक्षिणा करता हिया, उसके द्वारा समुद्रसहित पृथ्वीकी परिक्रमा हो जाती है। जो पुण्यात्मा वहाँ वेदों और यज्ञों का स्मरण करता है, उसे वेदोंके स्वाध्याय और यज्ञोंके अनुष्ठानका फल मिलता है। उसको ऐलतीर्थ जानना चाहिये। वही पुरूरवस्-तीर्थ है। उसे ही वसिष्ठतीर्थ  और निम्नभेदतीर्थ भी कहते हैं। राजा पुरूरवा के किसी भी कार्य में कुछ भी निम्नता (न्यूनता) नहीं होती थी। एक ही कार्य उनसे निम्नश्रेणीका हुआ, यह कि वे सर्वथा उर्वशी में आसक्त हो गये थे; परन्तु गौतमी गङ्गा और महर्षि वसिष्ठ ने उनके इस निम्नत्वका भी भेदन कर दिया, इसलिये वह तीर्थ निम्नभेद के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों प्रकार के अभीष्ट की सिद्धि देनेवाला है। जो निम्नभेदतीर्थ में स्नान करके इन देवताओंका दर्शन करता है, उसके इस लोक और परलोक में कुछ भी निम्न नहीं होता। वह सब प्रकार से उन्नतिको प्राप्त हो स्वर्गमें इन्द्रकी भाँति सुख भोगता है।

उसके आगे शङ्खहृद नामक तीर्थ है। वहाँ शङ्ख और गदा धारण करनेवाले भगवान् निवास करते हैं। उस तिढ़त में स्नान करके मनुष्य भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है। वहाँ का इतिहास बतलाता हूँ, जो भोग और मोक्ष देनेवाला है। पूर्वकाल में सत्ययुगके आरम्भ में ब्राह्मणके भीतर अनेक रूपधारी राक्षस उत्पन्न हुआ, जो सामवेदका गान करनेवाले थे। वे बालोन्मत्त राक्षस हाथ में आयुध धारण किये मुझे खा जाने के निमित्त आये। उस समय मैंने अपनी रक्षाके लिए जगद्गुरु भगवान् विष्णुको पुकारा। उन्होंने अपने चक्रसे राक्षसोंका संहार करके पातालको निष्कण्टक और स्वर्गको शत्रुशून्य बना दिया। फिर उन्होंने अत्यन्त हर्ष में भरकर शङ्ख बजाय, जिससे समस्त राक्षस नष्ट हो गये। श्रीविष्णुके शङ्खके प्रभावसे जिस स्थान पर यह घटना हुई, वह शङ्खतीर्थ कहलाया, जो मनुष्यों के लिए सब प्रकार से कल्याणकारक, समस्त अभीष्ट वस्तुओंका दाता, स्मरणमात्र से मङ्गलदायक, आयु और आरोग्यका जनक तथा लक्ष्मी और पुत्रकी वृद्धि करनेवाला है। उसके महात्म्यके स्मरण अथवा पाठमात्रसे मनुष्य समस्त अभिलक्षित वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है।

            * कन्यापुत्रमहीवाजिगवां विक्रयकरिण:। नरकान्न निवर्तन्ते यावदाभूतसंप्लवम् ॥

(१५०।१)

* को नाम लोके राजेन्द्र कामिनीभिर्न वञ्चित:। वञ्चकत्वं नृशंसत्वं कुशीलता ॥

इति स्वाभाविकं यासां ता: कथं सुखहेतव:। कालेन को न निहत: कोऽर्थी गौरवमागत: ॥

श्रिया न भ्रामित: को योषिद्भि: को न खण्डित:।

(१५१।१३-१५)