ब्रह्म पुराण

71 - भगवान् के अवतार का उपक्रम

 व्यासजी कहते हैं - मुनिवरो! अब मैं संक्षेप से श्रीहरि के अवतार का वर्णन करता हूँ, सुनो। भगवान् इस पृथ्वी का भार उतारने की इच्छा से अवतार लेते हैं। जब-जब अधर्म की वृद्धि होती है और धर्म का ह्रास होने लगता हिया, तब-तब भगवान् जनार्दन अपने स्वरुप के दो भाग करके यहाँ अवतीर्ण होते हैं। साढू पुरुषों की रक्षा, धर्मकी स्थापना, दुष्टों तथा अन्य देव-द्रोहियों का दमन और प्रजावर्ग का पालन करने के लिये वे प्रत्येक युग में अवतार धारण करते हैं। पहले की बात है- यह पृथ्वी अत्यन्त भार से पीड़ित हो मेरुपर्वत पर देवताओं के समाज में गयी और ब्रह्मा आदि सब देवताओं को प्रणाम करके खेद एवं करुणामिश्रित वाणी में अपना सब हाल सुनाने लगी- 'सुवर्णके गुरु अग्नि, गौओंके गुरु सूर्य तथा मेरे सम्पूर्ण लोकों के वन्दनीय भगवान् नारायण हैं। इस समय ये कालनेमि आदि दैत्य मर्त्यलोक में जन्म लेकर दिन-रात प्रजा को कष्ट देते रहते हैं। सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णु ने जिस काल नेमि नामक महान् असुरका वध किया था, वही अब उग्रसेनकुमार कंसके रूप में उत्पन्न हुआ है। अरिष्ट, धेनुक, केशी, प्रलम्भ, नरक, सुन्दासुर, अत्यन्त भयंकर बालिकुमार बाणासुर तथा और भी जो महापराक्रमी दुरात्मा दैत्य राजाओं के घर में उत्पन्न हुए हैं, उनकी मैं गणना नहीं कर सकती। दिव्यमूर्तिधारी देवताओं! इस समय मेरे ऊपर महाबली और गर्वीले दैत्यों की अनेक अक्षौहिणी सेनाएँ हैं। सुरेश्वर! मैं आपलोगों को बताये देती हूँ कि उन दैत्यों के भारी भार से पीड़ित होने के कारण अब मुझमें अपने को धारण करनेकी भी शक्ति नहीं रह गयी है। अत: आप लोग मेरा भार उतारिये।'

पृथ्वी का यह वचन सुनकर सम्पूर्ण देवताओं ने उसका भार उतारने के लिये ब्रह्माजी को प्रेरित किया। तब ब्रह्माजी बोले- 'देवताओं! पृथ्वी जो कुछ कहती है, वह सब ठीक है। वास्तव में मैं, महादेव जी और तुमलोग- सब भगवान् नारायण के ही स्वरुप ।हैं भगवान् की जो विभूतियाँ हैं, उन्हीने की परस्पर न्यूनता और अधिकता बाध्य-बाधकरूप से रहा करती है। इसलिये आओ, हम लोग क्षीरसागर के उत्तम तटपर चलें और वहाँ श्रीहरि की आराधना करके यह सब वृत्तान्त उनसे निवेदन करें। वे सबके आत्मा हैं, सम्पूर्ण जगत् उनका ही रूप है, वे सदा ही जगत् का कल्याण करने के लिये अपने अंश से अवतार ले धर्म की स्थापना करते हैं।'

यों कहकर ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओं के साथ क्षीरसगर के तटपर गये और एकाग्रचित्त होकर भगवान् गरुड़ध्वजकी स्तुति करने लगे।

ब्रह्माजी बोले - सहस्त्रमूर्ते! आपको बारंबार नमस्कार है। आपके सहस्त्रों बाँहें, अनेक मुख और अनेक चरण हैं। आप जगत् की सृष्टि, पालन और संहार में संलग्न रहते हैं। अप्रेमय परमेश्वर! आपको बनबार नमस्कार है। भगवन्! आप सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म, परम महान् और बड़े-बड़े गुरुओं से भी अधिक गौरवशाली हैं। आप प्रकृति, समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व), अहंकार तथा वाणी के भी प्रधान मूल हैं। अपर-प्रकृतिमय सम्पूर्ण जगत्आपका ही स्वरुप है। आप हमपर प्रसन्न होइये। देव! यह पृथ्वी आपकी शरण में आयी है। इस समय भूतल पर जो बड़े-बड़े असुर उत्पन्न हुए हैं, उनके द्वारा पीड़ित होनेसे इसके पर्वतरुपी बन्धन शिथिल पड़ गये हैं। आप सम्पूर्ण जगत् के परम आश्रय हैं। आपकी महिमा अपरम्पार है। अत: यह वसुधा अपना भार उतरवाने के लिये आपकी ही सेवा में उपस्थित हुई है। हमलोग भी यहाँ उपस्थित हुए हैं। ये इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार, वरुण, रूद्र, वसु, आदित्य, वायु, अग्नि तथा सम्पूर्ण देवता यहाँ खड़े हैं। देवेश्वर! मुझे तथा इन देवताओं को जो कुछ करना हो, उसके लिये आज्ञा दीजिये। आपके ही आदेशका पालन करते हुए हमलोग सदा सम्पूर्ण दोषों से मुक्त रहेंगे।

ब्रह्माजी के इस प्रकार स्तुति करनेपर परमेश्वर भगवान् श्रीविष्णुने अपने श्वेत और कृष्ण- दो केश उखाड़े और देवताओं से कहा- 'मेरे ये दोनों केश ही भूतल अवतार ले पृथ्वीके भार और क्लेशका नाश करेंगे। सम्पूर्ण देवता भी अपने-अपने अंश से पृथ्वी पर अवतीर्ण हो पहले से उत्पन्न हुए उन्मत्त दैत्यों के साथ युद्ध करें। इसमें संदेह नहीं कि नाना प्रकार के अस्त्र-शास्त्रों से चूर्ण होकर सम्पूर्ण दैत्य नष्ट हो जाएँगे। वसुदेव की पत्नी जो देव्किदेव हैं, उनके आठवें गर्भ से मेरा यह श्याम केश प्रकट होगा। भूतलपर अवतीर्ण हो ये कालनेमिके अंश से उत्पन्न हुए कंसका वध करेगा।' यों कहकर भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये। अदृश्य हो जानेपर उन परमात्मा को प्रणाम करके सम्पूर्ण देवता मेरुपर्वत के शिखर पर चले गये और वहाँ से पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए।

एक दिन महर्षि नारद ने कंस से जाकरकहा- 'देवकी के आठवें गर्भसे भगवान विष्णु उत्पन्न होंगे, जो तुम्हारा वध करेंगे।' यह सुनकर कंसको बड़ा क्रोध हुए और उसने देवकी तथा वसुदेव को कारागृह में बंधी बना लिया। वसुदेव ने यह प्रतिज्ञा की थी कि 'देवकी के गर्भ से जो-जो पुत्र उत्पन्न होगा, उसे मैं स्वयं लाकर दे दिया करूँगा।' इसके अनुसार उन्होंने अपना प्रत्येक पुत्र कंसको अर्पित कर दिया। सुना गया है प्रथम उत्पन्न हुए छ: गर्भ हिरण्यकशिपके पुत्र थे, जिन्हें भगवान् विष्णु की प्रेरणा से योगनिद्रा ने क्रमशः देवकी के उदर में स्थापित कर दिया था। योगनिद्रा भगवान् विष्णुकी महामाया हिया, जिसने अविद्यारूप से सम्पूर्ण जगत्को मोहित कर रखा है। उससे श्रीहरि ने कहा- 'निद्रे! तु मेरी आज्ञा से जा और पातालवासी छ: गर्भों को एक-एक करके देवकी के गर्भ में पहुँचा दे। ये सब कंसके हाथ से मारे जाएँगे। तत्पश्चात् मेरा शेष नामक अंश अपने अंशांशसे देवकी के उदरमें सातवें गर्भ के रूप में प्रकट होगा। वसुदेवजी की दूसरी भार्या रोहिणी आजकल गोकुल में रहती हैं। तू प्रसवकाल में वह गर्व रोहिणी के ही उदर में डाल देना। उसके विषय में लोग यही कहेंगे कि 'देवकीका सातवाँ गर्भ भोजराज कंसके डरसे गिर गया।' गर्भ का संकर्षण होनेसे रोहिणी का वह वीर पुत्र लोक में 'संकर्षण' नाम से विख्यात होगा। उसके शरीर का वर्ण श्वेतगिरिके शिखर की भाँति गौर होगा। तदनन्तर मैं देवकी के उदर में प्रवेश करूँगा। उस समय तुझे भी यशोदा के गर्भ में अविलम्ब प्रवेश करना होगा। वर्षा-ऋतु में श्रावणमासके* कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को आधी रात के समय मेरा प्रादुर्भाव होगा और तू नवमी तिथि में यशोदा के गर्भ से जन्म लेगी। उस समय वसुदेव मेरी शक्ति से प्रेरित होकर मुझे तो यशोदाकी शय्यापर पहुँचा देंगे औरतुझे देवकीके पास लायेंगे। फिर कंस तुझे लेकर पत्थरकी शिला पर पछाड़ेगा, किन्तु तू उसके हाथ से निकलकर आकाश में ठहर जाएगी। यों करनेपर इन्द्र मेरे गौरवका स्मरणकरके तुझे सौ-सौ बार प्रणाम करेंगे और विनीत्भाव से अपनी बहिन बना लेंगे। फिर तू शुम्भ-निशुम्भ आदि सहस्त्रों दैत्यों का वध करके अनेक स्थान बनाकर सारी पृथ्वी की शोभा बढ़ाएगी। भूति, संनति, कीर्ति, कान्ति, पृथ्वी, धृति, लज्जा, पुष्टि, उषा तथा अन्य जो भी स्त्री-नामधरी वस्तु है, वह सब तू ही है। जो प्रात:काल और अपराह्ण में तेरे सामने मस्तक झुकायेंगे और तुझे आर्या, दुर्गा, वेदगर्भा, अम्बिका, भद्रा, भद्रकाली, क्षेम्या तथा क्षेमंकरी आदि कहकर तेरी स्तुति करेंगे, उनके समस्त मनोरथ मेरे प्रसाद से सिद्ध हो जाएँगे। जो लोग भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थ से तेरी पूजा करेंगे, उन मनुष्यों पर प्रसन्न होकर तू उनकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण करेगी। वे सब लोग सदा मेरी कृपा से निश्चय ही कल्याण के भागी होंगे; अत: देवि! जो कार्य मैंने तुझे बताया है, उसे पूर्ण करने के लिये जा।'

* यहाँ श्रावणका अर्थ भाद्रपद समझना चाहिये।  जहाँ अमावस्याके बाद शुक्लपक्षसे मासका आरम्भ माना जाता है, वहाँ की मास-गणना को दृष्टि में रखकर श्रावण मास कहा गया है। जहाँ कृष्णपक्ष से मासका आरम्भ होता है, वहाँ वह तिथि भाद्रपद मास में ही होगी।