ब्रह्माजी कहते हैं - उसके आगे पौलस्त्य-तीर्थ है, जो मनुष्योंको सब प्रकार की सिद्धि देनेवाला है। मैं उसके प्रभावका वर्णन करता हूँ- वह छिने हुए राज्य की प्राप्ति कराता है। विश्रवा मुनिके ज्येष्ठ पुत्र कुबेर, जो ऋद्धि-सिद्धिसे सम्पन्न और उत्तर दिशा के स्वामी हैं, पहले लङ्कार के राजा थे। उनके सौतेले भाई रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण बड़े बलवान् थे। यद्यपि वे भी विश्रवाके ही पुत्र थे, तथापि राक्षसपुत्री कैकसी के गर्भसे उत्पन्न होने के कारण राक्षस कहलाते थे। वे तीनों भाई तपस्या करने के लिए वन में गये। वहाँ उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की और मुझसे वरदान प्राप्त किया। तदनन्तर अपने मामा मारीचके तथा नाना और माता के कहनेसे रावणने कुबेरसे लङ्काकी राजधानी अपने लिए माँगी। इस बात को लेकर दोनों भाइयोंमें भारी शत्रुता हो गयी। फिर तो देवताओं और दानवोंमें भयंकर युद्ध हुआ। रावणने अपने बड़े भाई कुबेरको युद्धमें हराकर पुष्पक विमान और लङ्कापुरीपर अधिकार जमा लिया तथा तीनों लोकों में घोषणा करा दी कि जो मेरे भाई को आश्रम देगा, वह मेरे हाथ से मारा जायगा। कुबेरको कहीं आश्रम न मिला। तब वे अपने पितामह पुलस्त्यके पास गये और उन्हें प्रणाम करके बोले- 'मेरे दुष्ट भ्राता ने मुझे लङ्गासे निकाल दिया। बताइये, अब क्या करूँ? अब मेरे लिये दैव अथवा तीर्थ ही आश्रम या शरण हैं।' पौत्र की यह बात सुनकर पुलस्त्य ने कहा- 'बेटा! तुम गौतमी गङ्गा में जाकर भगवान् शंकरकी स्तुति करो। वहाँ गङ्गाके जल में रावणका प्रवेश नहीं हो सकता। अत: मेरे साथ वहीँ चलकर कल्याणमयी सिद्धि प्राप्त करो।'
कुबेरने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और पत्नी, पिता, माता तथा वृद्ध महर्षि पुलस्त्यके साथ गौतमी गङ्गा के तटपर गये। वहाँ गङ्गामें स्नान करके पवित्र हो कुबेर भोग-मोक्षके दाता देवदेवेश्वर भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे- "शम्भो! आप ही इस चराचर जगत् के स्वामी हैं, दूसरा कोई नहीं। जो लोग आपकी भी अवहेलना करके मोहवश धृष्टता करते हैं, वे शोकके ही योग्य हैं। आप अपनी आठ मूर्तियों द्वारा सम्पूर्ण जगत्का भरण-पोषण करते हैं। आपकी आज्ञा से ही सब लोग चेष्टा करते हैं, तथापि विद्वान पुरुष ही आपकी महिमाको कुछ-कुछ जान पाते हैं। अज्ञानी पुरुष आप पुरातन प्रभुको कभी नहीं जान सकता। एक दिन जगदम्बा पार्वतीने अपने शरीर के मैलसे एक पुतला बनाकर रख दिया और परिचहासमें आपसे कहा- 'देव! यह आपका शूरवीर पुत्र है।' उसपर आपकी कृपादृष्टि हुई और वह विघ्नोंका राजा गणेश बन गया। अहो, मेह्श्वरकी दृष्टिका कितना अद्भुत प्रभाव है! जब कामदेव भस्म हो गया और रति उसके लिए विलाप करने लगी, तब दयामयी माता पार्वतीने आँसू बहाते हुए आपकी ओर देखकर कहा- 'भगवान् इन बेचारोंका दाम्पत्य-सुख छिन गया।' तब आपने उसपर भी कृपा की। कामदेव मनोभव हो गया- वह रति की मनोभूमिमें प्रकट हो गया। इस प्रकार उमासहित महादेवजी की कृपासे रतिने पूर्ण सौभाग्य प्राप्त किया।"
इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् शंकर कुबेरके सामने प्रकट हुए। उन्होंने व्र माँगने के लिए कहा, किन्तु हर्षातिरेकके कारण कुबेर के मुखसे कोई बात नहीं निकली। इसी समय आकाशवाणी हुई। उसने मानो पुलस्त्य, विश्रवा और कुबेरके हार्दिक अभिप्रायको जानकार यह कल्याणमय वकाहं कहा- 'भगवन्! ये लोग धनका प्रभुत्व प्राप्त करना चाहते हैं। इनके लिए भविष्य भूत-सा बन जाय। जिस वस्तुको ये किसी के लिये देना चाहें, वह दी हुईके समान हो जाय तथा जो वस्तु ये स्वयं प्राप्त करना चाहें, वह पहले ही इनके सामने प्रस्तुत हो जाय। ये भगवान् शंकर की आराधना करके इस बात की अभिलाषा रखते हैं कि हमारे शत्रु परास्त हों, दु:ख दूर हो जाय, दिक्पालका पद प्राप्त हो, धनका प्रभुत्व मिले, अपरिमित दान-शक्ति हो। साथ ही स्त्री और पुत्र का सुख भी बना रहे।'
कुबेरने वह आकाशवाणी सुनकर त्रिशूलधारी भगवान् शंकर से कहा- 'देव! ऐसा ही हो।' 'तथास्तु' कहकर शिवने उस दैवी वाणीका अनुमोदन किया। इस प्रकार पुलस्त्य, विश्रवा और कुबेर का वरदानसे अभिनन्दन करके भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। तब से उस तीर्थके तीन नाम पड़े- पौलस्त्यतीर्थ, धनतीर्थ और वैश्रवसतीर्थ। वह समस्त कामनाओंको देनेवाला शुभ तीर्थ है। वहाँ स्नान आदि जो कुछ भी पुण्यकर्म किया जाता है, वह अधिक पुण्यदायक होता है।
पौलस्त्यतीर्थके बाद अग्नितीर्थ है। वह सब यज्ञोंका फल देनेवाला और समस्त विघ्नोंको शान्त करने वाला है। उस तीर्थ का फल सुनो। अग्निके भाई जातवेदा हैं, जो देवताओंके पास हविष्य पहुँचाया करते हैं। एक दिन की बात है- गोदावरीके तटपर ऋषियोंके यग्यमण्डपमें यग्य हो रहा था। अग्नि के प्रिय भिया जातवेदा देवताओंके हविष्यका वहन कर रहे थे। उसी समय दितिके बलवान् पुत्र मधुने प्रधान-प्रधान ऋषियों और देवताओंके देखते-देखते जातवेदाको मार डाला। उनके मरनेपर देवताओं को हविष्य मिलना बंद हो गया। इधेर अपने प्रिय भाई जातवेदाके मारे जाने से अग्निको बड़ा क्रोध हुआ। वे गौतमी गङ्गा जल में समा गये। अग्निके जल में प्रवेश करनेपर देवता और मनुष्य जीवनका त्याग करने लगे, क्योंकि अग्नि ही उनका जीवन है। अग्निदेव जहाँ जल में प्रविष्ट हुए थे, उस स्थान पर सम्पूर्णदेवता, ऋषि और पितर आये और यह सोचकर कि बिना अग्नि के हम जीवित नहीं रह सकते, उनकी स्तुति करने लगे। इतने में ही जल के भीतर उन्हें अग्निका दर्शन हुआ। उन्हें देखकर देवता बोले- 'अग्ने! आप हविष्य के द्वारा देवताओंको , काव्य (श्रद्धा)-से पितरों को तथा अन्नको पचाने और बीजको गलाने आदि के द्वारा मनुष्यों को जीवित कीजिये।'
अग्निने उत्तर दिया- 'मेरा छोटा भाई, जो इस कार्य में समर्थ था, चला गया। आप लोगोंका काम करनेमें जातवेदा की जो गति हुई है, वह मेरी भी हो सकती है। अत: मुझे आप लोगोंके कार्य-सादन में उत्साह नहीं है।' तब देवताओं और ऋषियों ने सब प्रकार से अग्निकी प्रार्थना करते हुए कहा- 'हव्यवाहन! हम लोग आपको आयु, कर्म करनेमें उत्साह और सर्वत्र व्यापक होनेकी शक्ति देते हैं। साथ ही प्रयाज और अनुयाज भी देंगे। देवताओंके आप ही श्रेष्ठ मुख होंगे। पहली आहुतियाँ आपको ही मिलेंगी। आप जो द्रव्य हमें देंगे, वही हम भोजन करेंगे।'
इस आश्वासनसे अग्निदेव प्रसन्न हुए। उन्हें इस लोक और परलोक में व्यापक रहनेकी शक्ति प्राप्त हुई। वे सर्वत्र निर्भय हो गये। जातवेदा, बृहभ्दानु, सप्तार्चि, नीललोहित, जलगर्भ, शमीगर्भ और यग्यगर्भ- इन नामों से उन्हींका बोध होने लगा। देवताओंने अग्निको जलसे निकाला और जातवेदा तथा अग्नि दोनोंके पदपर उनका अभिषेक किया। कार्य सिद्ध होनेपर देवता भी अपने-अपने स्थानको चले गये। तभी से वह स्थान 'वह्नितीर्थ' कहलाता है। वहाँ सात सौ उत्तम तीर्थों का निवास है। जो जितात्मा पुरुष उन तीर्थों में स्नान और दान करता है, उसे अश्वमेध- यज्ञका पूरा फल प्राप्त होता है।वहीँ देवतीर्थ, अग्नितीर्थ और जातवेद्स्तीर्थ भी हैं। अग्निद्वार स्थापित अनेक वर्णोंके शिवलिङ्ग का भी वहाँ दर्शन होता है। उसके सर्षण से सब यज्ञों का फल प्राप्त होता है।
उसके बाद 'ऋणमोचन' नामक तीर्थ है। जिसके महत्त्वको वेदवेत्ता पुरुष जानते हैं। नारद! मैं उसके स्वरुपको बतलाता हूँ, मन लगाकर सुनो। कक्षीवान्का ज्येष्ठ पुत्र पृथुश्रवा था। वह वैराग्यके कारण न तो विवाह करता था और न अग्निहोत्र ही। कक्षीवान् का कनिष्ठ पुत्र भी विवाहके योग्य हो गया था तो भी उसने परिवित्ति* होने के भयसे विवाह और अग्निहोत्र नहीं किये। तब पितरों ने कक्षीवान् के दोनों पुत्रोंसे पृथक्-पृथक् कहा- 'तुम देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋणसे मुक्त होनेके लिए विवाह करो।' ज्येष्ठ पुत्रने कहा, 'नहीं, कैसा ऋण और कौन उससे मुक्त होता है।' छोटे पुत्रने उत्तर दिया, 'बड़े भाई के अविवाहित रहते मेरा विवाह करना उचित नहीं है। अन्यथा परिवित्ति होनेका भय है।' तब पितरों ने उन दोनों से कहा- 'तुम लोग गौतमी गङ्गा में जाकर स्नान करो। गौतमीका स्नान सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। गौतमी गङ्गा तीनों लोकों को पवित्र करनेवाला हैं। उनके जल में श्रद्धापूर्वक स्नान और तर्पण करो। गौतमीका दर्शन, वन्दन और ध्यान करनेसे वे समस्त कामनाएँ पूर्ण करती हैं। वहाँ स्नान करनेके लिए कोई देश, काल और जाति आदिका नियम नहीं है। गौतमी में स्नान करने से बड़े भाई प्र कोई ऋण नहीं रहता छोटा भाई परिवित्ति नहीं होता।'
पितरों के आदेशसे कक्षीवान् ज्येष्ठ पुत्र पृथुश्रवा गौतमीमें स्नान और तर्पण करके तीनों ऋणोंसे मुक्त हो गया। तबसे वह तीर्थ 'ऋणमोचन' कहलाता है। वहाँ स्नान और दान करनेसे ऋणवान् मनुष्य श्रौत-स्मार्त तथा अन्य ऋणोंसे भी मुक्त होकर सुखी होता है।
* बड़े भाई की अविवाहित अवस्थामें विवाह कर लेनेवाला छोटा भाई परिवित्ति कहलाता है। गृहस्थ-आश्रममें भोगकी प्राप्ति तो स्वाभाविक है और मोक्षकी प्राप्ति निष्काम धर्मका इसे शास्त्रोंमें दोष माना गया है।
Summary of chapter 44 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The sacred geography of the Puruṣottama kṣetra is described — the Nīlāgiri, the forests of Puri, the sacred pools and tanks, the presiding deities in each quarter, the protective gaṇas, and the boundaries of the kṣetra. Each feature of this holy land is shown to be charged with divine presence, and the merit of circumambulating or residing within it is extolled.