ब्रह्माजी कहते हैं - उपर्युक्त प्रकार से भक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाये। इसके बाद समुद्रसे प्रार्थना करे- 'सरिताओंके स्वामी तीर्थराज! आप सम्पूर्ण भूतों के प्राण और योनि हैं। आपको नमस्कार है। अच्युतप्रिय! मेरी रक्षा कीजिये।' इस प्रकार उत्तम क्षेत्र समुद्र में स्नान करके तथा तटपर अविनाशी नारायणकी विधिपूर्वक पूजा करके बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्राको प्रणाम करे। ऐसा करनेवाला पुरुष सब पापों से मुक्त हो सब प्रकार के दु:खों से छुटकारा पा जाता है और अन्त में सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर, जहाँ दिव्य गन्धर्वों की संगीतध्वनि होती रहती है, बैठकर अपननी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके श्रीविष्णुके लोक में जाता है। ग्रहण संक्रान्ति, अयनारम्भ, विषुवयोग, युगादि तिथियाँ, व्यतीपात, तिथिक्षय, आषाढ़, कार्तिक तथा माघकी पूर्णिमा और अन्य शुभ तिथियोंमें जो वहाँ ब्राह्मणोंको दान देते हैं, वे अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा हजारगुना फल पाते हैं। जो लोग वहाँ विधिपूर्वक पितरोंको पिण्डदान करते हैं, उनके पितर अक्षय तृप्ति-लाभ करते हैं। इस प्रकार मैंने समुद्रमें स्नान करनेका उत्तम फल बतलाया। वह सब पापों को दूर करेवाला, पवित्र तथा इच्छानुसार सब फलोंका दाता है। यह पुराण-रहस्य नास्तिकको नहीं बतलाना चाहिये। भूतलमें जितने तीर्थ, नदियाँ और सरोवर हैं, वे सब समुद्र में प्रवेश करते हैं। इसलिये वह सबसे श्रेष्ठ है। सरिताओंका स्वामी समुद्र समस्त तीर्थोंका राजा है। वह सब तीर्थों में श्रेष्ठ और समस्त इच्छित पदार्थको देनेवाला है। जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी प्रकार तीर्थराज समुद्र में स्नान करनेपर सब पापोंका क्षय हो जाता है। जहाँ साक्षात् भगवान् नारायणका निवासस्थान है, उस तीर्थराज समुद्रके गुणोंका वर्णन कौन कर सकता हैं। जहाँ निन्यानबे करोड़ तीर्थ रहते हैं, उसकी श्रेष्ठा के विषय में क्या कहा जा सकता है। इसलिये वहाँ स्नान, दान, होम, जप और देवपूजन आदि जो कुछ भी कर्म किया जाता है, वह अक्षय होता है। वहाँ से उस तीर्थ में जाय, जो अश्वमेध-यज्ञके अङ्गसे उत्पन्न हुआ है। उसका नाम है इन्द्रद्युम्नसरोवर। वह पवित्र एवं शुभ तीर्थ है। बुद्धिमान् पुरुष वहाँ जाकर पवित्र भाव से आचमन करे और मन-ही-मन श्रीहरिका ध्यान करके जलमें उतरे। उस समय इस मन्त्र का उच्चारण करे-
अश्वमेधाङ्गसम्भूत तीर्थ सर्वाघनाशन।
स्नानं त्वयि करोम्यद्य पापं कर नमोऽस्तु ते ॥
'अश्वमेध-यज्ञके अङ्गसे प्रकट हुए तथा सम्पूर्ण पापों के विनाशक तिरत! आज मैं तुम्हारे जल में स्नान करता हूँ। मेरे पाप हर लो। तुमको नमस्कार है।'
इस प्रकार उच्चारण करके विधिपूर्वक स्नान करे और देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा अन्यान्य लोगोंका तिल-जलसे तर्पण करके आचमन करे। फिर पितरोंको पिण्डदान दे, पुरुषोत्तम का पूजन करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। वह सात पीढ़ी ऊपर और सात पीढ़ी नीचेके पुरुषोंका उद्धार करके इच्छानुसार गतिवाले विमानके द्वारा विष्णुलोकमें जाता है। इस प्रकार पाँच तीर्थोंका सेवा करके एकादशीको उपवास करे। जो मनुष्य ज्येष्ठकी पूर्णिमाको भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करता है, वह पूर्वोक्त फलका भागी होकर परम धामको जाता है, जहाँ से पुन: उसका लौटना नहीं होता।
मुनियोंने पूछा - पितामह! आप माघ आदि महिनोंको छोड़कर ज्येष्ठमासकी इतनी प्रशंसा क्यों करते हैं? प्रभो! इसका कारण बतलाइये।
ब्रह्माजी बोले - मुनिवरो! सुनो। अन्य मासोंकी अपेक्षा जो ज्येष्ठमास की बारंबार प्रशंसा करता हूँ, उसका कारण संक्षेपसे बतलाता हूँ। पृथ्वीपरजो-जो तीर्थ, नदियाँ, सरोवर, पुष्पकरिणी, तड़ाग, वापी, कूप, हृदय और समुद्र हैं, वे सब ज्येष्ठ के शुक्लपक्षकी दशमीसे लेकर पूर्णिमातक एक सप्ताह प्रत्यक्षरूप से पुरुषोत्तमतीर्थ में जाकर रहते हैं। यह उनका सदाका नियम है। इसलिये वहाँ स्नान-दान, देवदर्शन आदि जो कुछ पुण्य कार्य उस समय किया जाता है, वह अक्षय होता है। द्विजवरो! ज्येष्ठमास्के शुक्लपक्षकी दशमी तिथि दस पापोंको हरती है, इसलिये उसे दशहरा कहा गया है। उस दिन जो लोग अपनी इन्द्रियोंको वश में रखते हुए श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राका दर्शन करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो विष्णुलोकमें जाते हैं। उत्तरायण और दक्षिणायनके आरम्भके दिन श्रीपुरुषोत्तम, बलराम और सुभद्राका दर्शन करनेवाला मानव वैकुण्ठ-धाममें जाता है। जो मौश्य फाल्गुनकी पूर्णिमाके दिन एकचित हो पुरुषोत्तम शहरीगोविन्दको झूलेपर विराजमान देखता है, वह उनके धाम में जाता है। विषुवयोके दिन विधिपूर्वक पञ्चतीर्थविधिका पालन करके जो श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राका दर्शन करता है, वह सब पापों से मुक्त हो विष्णुलोक में जाता है। जो वैशाख-कृष्णा तृतीयाको चन्दन-चर्चित श्रीकृष्णका दरसा करता है, वह विष्णु-धाम में जाता है। ज्येष्ठा नक्षत्रसे युक्त ज्येष्ठमासकी पूर्णिमाके दिन जो श्री पुरुषोत्तमका दर्शन करता है, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार करके श्री विष्णुलोक में जाता है।
जिस दिन राशि और नक्षत्रके योग्यसेमहाज्येष्ठी (ज्येष्ठकी पूर्णिमा) हो, उस दिन यत्नपूर्वक श्रीपुरुषोत्तमतीर्थ में पहुँचना चाहिये। महाज्येष्ठी-पर्वके दिन श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्रा दर्शन करके मनुष्य बारह यात्राओं से भी अधिक फलका भागी होता है। प्रयाग, कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य, पुष्कर, गया, हरिद्वार, कुशावर्त, गङ्गा-सागर-संगम, महानदी, वैतरणी तथा अन्य जितने तीर्थ हैं अथवा अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, पृथ्वीतलके सब तीर्थ, सब मन्दिर, सब समुद्र, सब पर्वत, सब नदी और सब सरोवरोंमें ग्रहणके समय स्नान-दानसे जो फल होता हिया, वही महाज्येष्ठीको श्रीकृष्णका दर्शन करनेमात्रसे मनुष्य पा लेता है। अत: महाज्येष्ठी को सर्वथा प्रयत्न करके पुरुषोत्तमतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। सुभद्राके साथ श्रीकृष्ण और बलरामका दर्शन करेवाला मनुष्य अपने समस्त कुलका उद्धार करके भगवान् विष्णुके धाम में जाता है।
Summary of chapter 32 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The sacred narrative of Umā's tapas is narrated. Having taken birth as the daughter of Himavat (the Himālaya) and Menā, Umā resolves to win Śiva as her husband. Despite her tender age, she undertakes fierce austerities in the forest, renouncing food, water, and shelter. Her tapas is so intense it affects all the worlds, and the gods anxiously await Śiva's acceptance.