ब्रह्म पुराण

90 - श्राद्ध-कल्पका वर्णन

मुनियोंने पूछा- भगवन् ! अब श्राद्ध कल्पका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। तपोधन ! कब , कहाँ किन देशोंमें और किन लोगोंको किस प्रकार श्राद्ध करना चाहिये — यह बतानेकी कृपा करें।

व्यासजी बोले- मुनिवरो ! सुनो , मैं श्राद्ध-कल्पका विस्तारके साथ वर्णन करता हूँ। जब,जहाँ ,जिन प्रदेशोंमें और जिन लोगोंद्वारा जिस प्रकार श्राद्ध किया जाना चाहिये , वह सब बतलाता हूँ । अपने कुलोचित धर्मका पालन करनेवाले ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्योंको उचित है कि वे अपने - अपने वर्णके अनुरूप वेदोक्त विधिसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक श्राद्धका अनुष्ठान करे। स्त्रियों और शूद्रोंको ब्राह्मणकी आज्ञाके अनुसार मन्त्रोच्चारण के बिना ही विधिवत् श्राद्ध करना चाहिये। उनके लिये अग्निमें होम आदि वर्जित हैं। पुष्कर आदि तीर्थ , पवित्र मन्दिर ,पर्वतशिखर , पावन प्रदेश , पुण्यसलिला नदी ,नद, सरोवर, संगम ,सात समुद्रोंके तट, लिपे - पुते अपने घर , दिव्य वृक्षोंके मूल  और यज्ञ - कुण्ड – ये सभी उत्तम स्थान हैं। इन सबमें श्राद्ध करना चाहिये । अब श्राद्धके लिये वर्जित स्थान बतलाता हूँ। किरात ( किलात ),कलिङ्ग ( उड़ीसा ), कोङ्कण , कृमि , दशार्ण , कुमार्य , तङ्गण , ऋथ , सिन्धु नदीका उत्तर तट , नर्मदाका दक्षिण तट और करतोयाका पूर्व तट- इन प्रदेशोंमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये। प्रत्येक मासकी अमावास्या और पूर्णिमाको श्राद्धके योग्य काल बताया गया है । नित्यश्राद्धमें विश्वेदेवोंका पूजन नहीं होता। नैमित्तिक श्राद्ध विश्वेदेवोंके पूजनपूर्वक होता है । नित्य, नैमित्तिक और काम्य- ये तीन प्रकारके श्राद्ध माने गये हैं। इन तीनोंका प्रतिवर्ष अनुष्ठान करना - चाहिये। जातकर्म आदि संस्कारों के अवसरपर आभ्युदयिक श्राद्ध भी करना उचित है । उसमें युग्म ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करनेका विधान है । आभ्युदयिक श्राद्ध मातासे आरम्भ होता है। जब सूर्य कन्याराशिपर जाते हैं, तब कृष्णपक्षके पंद्रह दिनोंतक पार्वणकी विधिसे है। श्राद्ध करनेसे धनकी प्राप्ति होती है । द्वितीया संतान देनेवाली है । तृतीया पुत्रप्राप्तिकी अभिलाषा पूर्ण करती है ।चतुर्थी शत्रु नाश करनेवाली है।पञ्चमीको श्राद्ध करनेसे मनुष्य लक्ष्मीको प्राप्त करता है और षष्ठीको श्राद्ध करके वह पूजनीय होता है । सप्तमीको गणोंका आधिपत्य , अष्टमीको उत्तम बुद्धि , नौमीको स्त्री , दशमीको मनोरथकी पूर्णता और एकादशीको श्राद्ध करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण वेदोंको प्राप्त करता है । द्वादशीको पितरोंकी पूजा करनेवाला मानव विजय - लाभ करता है । त्रयोदशीको श्रद्धासहित श्राद्ध करनेवाला पुरुष संतान-वृद्धि,पशु ,मेधा,स्वतन्त्रता,उत्तम पुष्टि ,दीर्घायु अथवा ऐश्वर्यका भागी होता है- इसमें तनिक भी संदेह नहीं है । जिसके पितर युवावस्था में ही मृत्युको प्राप्त हुए अथवा शस्त्रद्वारा मारे गये हों , वे उन पितरोंको तृप्त करनेकी इच्छासे चतुर्दशी तिथिको श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करें जो पुरुष पवित्र होकर अमावास्याको यत्नपूर्वक श्राद्ध करता है , वह सम्पूर्ण कामनाओं तथा अक्षय स्वर्गको प्राप्त करता है ।

मुनिवरो ! अब पितरोंकी प्रसन्नताके लिये जो-जो वस्तु देनी चाहिये, उसका वर्णन सुनो I जो  श्राद्धकर्ममें गुडमिश्रित अन्न, तिल, मधु अथवा मधुमिश्रित अन्न देता है , उसका वह सम्पूर्ण दान अक्षय होता है। पितर कहते हैं- ‘क्या हमारे कुलमें ऐसा कोई पुरुष होगा,जो हमें जलाञ्जलि देगा, वर्षामें और मघा नक्षत्रमें हमको मधुमिश्रित खीर अर्पण करेगा ? मनुष्योंको बहुत-से पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये। यदि उनमेंसे एक भी गया चला जाय अथवा कन्याका विवाह करे या  नील वृषका उत्सर्ग करे तो पितरोंको पूर्ण तृप्ति और उत्तम गति प्राप्त हो । ' कृत्तिका नक्षत्र में पितरोंकी पूजा करनेवाला मानव स्वर्गलोकको प्राप्त होता है । संतानकी इच्छा रखनेवाला पुरुष रोहिणीमें श्राद्ध करे । मृगशिरामें श्राद्ध करनेसे मनुष्य तेजस्वी होता है । आर्द्रामें शौर्य और पुनर्वसुमें स्त्रीकी प्राप्ति होती है ; पुष्यमें अक्षय धन, आश्लेषामें उत्तम आयु मघामें संतान और पुष्टि तथा पूर्वाफाल्गुनीमें सौभाग्यकी प्राप्ति होती है उत्तराफाल्गुनीमें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य संतानवान् और श्रेष्ठ होता है। हस्त नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे शास्त्रज्ञानमें श्रेष्ठता प्राप्त होती है । चित्रामें रूप, तेज और संतति मिलती है । स्वातीमें श्राद्ध करनेसे व्यापारमें लाभ होता है । विशाखा पुत्रकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाली है । अनुराधामें श्राद्ध करनेसे चक्रवर्ती- पदकी प्राप्ति होती है । ज्येष्ठामें श्राद्धसे प्रभुत्व प्राप्त होता है । मूलमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष उत्तम आरोग्य लाभ करता है । पूर्वाषाढ़ नक्षत्रमें यशकी प्राप्ति होती है । उत्तराषाढ़ामें श्राद्धसे शोक दूर होता है । श्रवणमें श्राद्धके अनुष्ठानसे शुभ लोक प्राप्त होते हैं। धनिष्ठामें श्राद्धसे अधिक धनका लाभ होता है। अभिजित्‌में श्राद्धसे वेदोंकी विद्वत्ता प्राप्त होती है । शतभिषामें पितरोंकी पूजा करनेसे वैद्यकके कार्यमें सिद्धि प्राप्त होती है । पूर्वाभाद्रपदामें श्राद्धसे भेड़ और बकरी तथा उत्तराभाद्रपदामें गौएँ प्राप्त होती है। रेवतीमें श्राद्धका अनुष्ठान करनेसे जस्ता आदि धातुओंकी तथा अश्विनीमें घोड़ोंकी प्राप्ति होती है। भरणी नक्षत्र में श्राद्ध करनेवाला पुरुष उत्तम आयु प्राप्त करता है । तत्त्वज्ञ पुरुष उक्त नक्षत्रों में श्राद्ध करनेपर ऐसे ही फलोंके भागी होते हैं । अतः अक्षय फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको कन्याराशिपर सूर्यके रहते उक्त नक्षत्रोंमें काम्य श्राद्धका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये । सूर्यके कन्याराशिपर स्थित रहते मनुष्य जिन-जिन कामनाओंका चिन्तन करते हुए श्राद्ध करते हैं , उन सबको प्राप्त कर लेते हैं । जब सूर्य कन्याराशिपर स्थित हों, तब नान्दीमुख पितरोंका भी श्राद्ध करना चाहिये; क्योंकि उस समय सभी पितर पिण्ड पानेकी इच्छा रखते हैं जो राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंका दुर्लभ फल प्राप्त करना चाहता हो, उसे कन्याराशिपर सूर्यके रहते जल , शाक और मूल आदिसे भी पितरोंकी पूजा अवश्य करनी चाहिये । उत्तराफाल्गुनी और हस्त नक्षत्रोंपर सूर्यदेवके स्थित रहते जो भक्तिपूर्वक पितरोंका पूजन करता है, उसका स्वर्गलोकमें निवास होता। उस समय यमराजकी आज्ञासे पितरोंकी पुरी तबतक खाली रहती है, जबतक कि सूर्य वृश्चिक राशिपर मौजूद रहते हैं। वृश्चिक बीत जानेपर भी जब कोई श्राद्ध नहीं करता, तब देवताओंसहित पितर मनुष्यको दुःसह शाप देकर खेदपूर्वक लंबी साँसें लेते हुए अपनी पुरीको लौट जाते हैं। अष्टका १, मन्वन्तरा २' तथा अन्वष्ट ३ का तिथियोंको भी श्राद्ध करना चाहिये। वह मातृवर्गसे आरम्भ होता है४ ।

 ग्रहण, व्यतीपात , एक राशिपर सूर्य और चन्द्रमाके संगम , जन्मनक्षत्र तथा ग्रहपीड़ाके अवसरपर पार्वण - श्राद्ध करनेका विधान है। दोनों अयनोंके आरम्भके दिन ,दोनों विषुव ५  योगोंके आनेपर तथा प्रत्येक संक्रान्तिके दिन विधिपूर्वक उत्तम श्राद्ध करना चाहिये । इन दिनों में पिण्डदानको छोड़कर शेष सभी श्राद्ध-सम्बन्धी कार्य करने चाहिये । वैशाखकी शुक्ला तृतीया और कार्तिककी शुक्ला नवमीको संक्रान्तिकी विधिसे श्राद्ध करना उचित है। भादोंकी त्रयोदशी और माघकी अमावास्याको खीरसे श्राद्ध करना चाहिये। जब कोई वेदवेत्ता एवं अग्निहोत्री श्रोत्रिय ब्राह्मण घरपर पधारे , तब उस एक ब्राह्मणके द्वारा भी विधिपूर्वक उत्तम श्राद्ध सम्पन्न करना चाहिये । जिस दिन साधुपुरुषोंद्वारा प्रशंसित श्राद्धके योग्य कोई वस्तु प्राप्त हो जाय , उस दिन द्विजोंको पार्वणकी विधिसे श्राद्ध करना चाहिये । माता और पिताकी मृत्युके दिन प्रतिवर्ष एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये। यदि पिताके भाई अथवा अपने बड़े भाईकी मृत्यु हो गयी हो और उनके कोई पुत्र नहीं हो तो उनके लिये भी निधनतिथिको प्रतिवर्ष एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना उचित है। पार्वण श्राद्ध में पहले विश्वेदेवोंका आवाहन और होता है । किंतु एकोद्दिष्टमें ऐसा नहीं होता । देवकार्यमें दो और पितृकार्यमें तीन ब्राह्मणोंको निमन्त्रित। करना चाहिये अथवा दोनों में एक-एक ब्राह्मणको ही निमन्त्रित करे । इसी प्रकार मातामहोंके श्राद्धकार्यमें भी समझना चाहिये । जो हालका मरा हो , उसके लिये सदा बाहर जलके समीप पृथ्वीपर तिल और कुशसहित  पिण्ड और जल देना चाहिये । मृत्युके तीसरे दिन प्रेतका अस्थि-चयन करना उचित है । घरमें किसीकी मृत्यु होनेपर ब्राह्मण दस दिनों में क्षत्रिय बारह दिनोंमें , वैश्य पंद्रह दिनोंमें और शूद्र एक मासमें शुद्ध होता है। * सूतक निवृत्त हो जानेपर घर में एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना बताया गया है। बारहवें दिन , एक मासपर , फिर डेढ़ मासपर तथा उसके बाद प्रतिमास एक वर्षतक श्राद्ध करना चाहिये। वर्ष बीतनेपर सपिण्डीकरण श्राद्ध करना उचित है। सपिण्डीकरण हो जानेपर उसके लिये पार्वण श्राद्धका विधान है। सपिण्डीकरणके बाद मृत व्यक्ति प्रेतभावसे मुक्त होकर पितरोंके स्वरूपको प्राप्त होते हैं। पितर दो प्रकारके हैं - अमूर्त और मूर्तिमान्। नान्दीमुख नामवाले पितर अमूर्त होते हैं और पार्वण श्राद्धके पितर मूर्तिमान् बताये गये हैं। एकोद्दिष्ट श्राद्ध ग्रहण करनेवाले पितरोंकी  ‘प्रेत' संज्ञा है । इस प्रकार पितरोंके तीन भेद स्वीकार किये गये हैं।

 मुनियोंने पूछा- द्विजश्रेष्ठ ! मरे हुए पिता आदिका सपिण्डीकरण श्राद्ध कैसे करना चाहिये ? यह हमें विधिपूर्वक बताइये।

 व्यासजी बोले- ब्राह्मणो ! मैं सपिण्डीकरण श्राद्धकी विधि बतलाता हूँ , सुनो। सपिण्डीकरण श्राद्ध विश्वेदेवोंकी पूजासे रहित होता है। इसमें एक ही अर्घ्य और एक ही पवित्रकका विधान है अग्निकरण और आवाहनकी क्रिया भी इसमें नहीं होती। सपिण्डीकरणमें अपसव्य होकर अयुग्म ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। इसमें जो विशेष क्रिया है, उसका वर्णन करता हूँ; एकाग्रचित्त होकर सुनो। सपिण्डीकरणमें तिल , चन्दन और जलसे युक्त चार पात्र होते हैं । उनमेंसे तीन पितरोंके लिये रखे और एक प्रेतके लिये प्रेतके पात्रसे अर्घ्यजल लेकर ‘ ये समानाः समनसः०’  इत्यादि मन्त्रका जप करते हुए पितरोंके तीनों पात्रों में छोड़ना चाहिये। शेष कार्य अन्य श्राद्धोंकी भाँति करना चाहिये। स्त्रियोंके लिये भी इसी प्रकार एकोद्दिष्टका विधान है। यदि पुत्र न हो स्त्रियोंका सपिण्डीकरण नहीं होता। पुरुषोंको उचित है कि वे स्त्रियोंके लिये भी प्रतिवर्ष उनकी मृत्युतिथिको एकोद्दिष्ट श्राद्ध करें। पुत्रके अभावमें सपिण्ड और सपिण्डके अभावमें सहोदक इस विधिको पूर्ण करें। जिसके कोई पुत्र न हो, उसका श्राद्ध उसके दौहित्र कर सकते हैं। पुत्रिका १- विधिसे ब्याही हुई कन्याके पुत्र तो अपने नाना आदिका श्राद्ध करनेके अधिकारी हैं ही। जिनकी द्व्यामुष्यायण संज्ञा है , ऐसे पुत्र नाना और बाबा दोनोंका नैमित्तिक श्राद्धों में भी विधिपूर्वक पूजन कर सकते हैं । कोई भी न हो तो स्त्रियाँ ही अपने पतियोंका मन्त्रोच्चारण किये बिना श्राद्ध कर सकती हैं । वे भी न हों तो राजा मृतकके सजातीय मनुष्यों द्वारा दाह आदि समस्त क्रियाएँ पूर्ण कराये; क्योंकि राजा सब वर्णोंका बन्धु होता है। ब्राह्मणो ! सपिण्डीकरणके बाद पिताके जो प्रपितामह हैं , वे लेपभागभोजी पितरोंकी श्रेणी में चले जाते हैं । उन्हें पितृपिण्ड पानेका अधिकार नहीं रहता । उनसे आरम्भ करके चार पीढ़ी ऊपरके पितर, जो अबतक पुत्रके लेपभागका अन्न ग्रहण करते थे, उसके सम्बन्धसे रहित हो जाते हैं। अब उनको लेपभागका अन्न पानेका अधिकार नहीं रहता। वे सम्बन्धहीन अन्नका उपभोग करते हैं । पिता , पितामह और प्रपितामह - इन तीन पुरुषों को पिण्डका अधिकारी समझना चाहिये । इनसे भिन्न अर्थात् पितामहके पितामहसे लेकर ऊपरके जो तीन पीढ़ीके पुरुष हैं , वे लेपभागके अधिकारी इस प्रकार छः ये और सातवाँ यजमान – सब मिलकर सात पुरुषोंका घनिष्ठ सम्बन्ध होता है- ऐसा मुनियोंका कथन है । यह सम्बन्ध यजमानसे लेकर ऊपरके लेपभागभोजी पितरोंतक माना जाता हैI  इनसे ऊपरके सभी पितर पूर्वज कहलाते हैं । पूर्वजोंमेंसे जो नरकमें निवास करते हैं , जो पशु पक्षीकी योनिमें पड़े हैं तथा जो भूत आदिके रूपमें स्थित हैं , उन सबको विधिपूर्वक श्राद्ध करनेवाला यजमान तृप्त करता है । जिससे जिसकी तृप्ति होती है , वह बतलाता हूँ ; सुनो। मनुष्य पृथ्वीपर जो अन्न बिखेरते हैं , उससे पिशाचयोनिमें पड़े हुए पितरोंकी तृप्ति होती है । स्नानके वस्त्रसे जो जल पृथ्वीपर टपकता है , उससे वृक्षयोनिमें पड़े हुए पितर तृप्त होते हैं । नहानेपर अपने शरीरसे जो जलके कण पृथ्वीपर गिरते हैं , उनसे उन पितरोंकी तृप्ति होती है , जो देवभावको प्राप्त हुए हैं । पिण्डोंके उठानेपर जो जलके कण पृथ्वीपर गिरते हैं , उनसे पशु - पक्षीकी योनिमें पड़े हुए पितरोंकी तृप्ति होती है । कुलमें जो बालक दाँत निकलने के पहले दाह आदि कर्मके अनधिकारी रहकर मृत्युको प्राप्त होते हैं , वे सम्मार्जनके जलका आहार करते हैं । ब्राह्मणलोग भोजन करके जो हाथ - मुँह धोते हैं और चरणोंका प्रक्षालन करते हैं , उस जलसे अन्यान्य पितरोंकी तृप्ति होती है ब्राह्मणो ! इस प्रकार विधिपूर्वक श्राद्ध करनेवाले पुरुषोंके जो पितर दूसरी दूसरी योनियोंमें चले गये हैं ,वे भी यजमान और ब्राह्मणोंके हाथसे बिखरे हुए अन्न और जलके द्वारा पूर्ण तृप्त होते हैं । मनुष्य अन्यायोपार्जित धनसे जो श्राद्ध करते है, उससे चाण्डाल आदि योनियोंमें पड़े हुए पितरोंकी तृप्ति होती है । इस प्रकार यहाँ  श्रद्धा करनेवाले भाई - बन्धुओंके द्वारा जो अन्न जल पृथ्वीपर डाले जाते हैं , उनके द्वारा बहुत-से पितर तृप्त होते हैं । अतः मनुष्यको उचित है कि वह पितरोंके प्रति भक्ति रखते हुए शाकमात्रके द्वारा भी विधिपूर्वक श्राद्ध करे । श्राद्ध करनेवाले लोगोके कुलमें कोई दुःख नहीं भोगता।

 श्राद्धका दान संयमी , अग्निहोत्री , शुद्धचरित्र , विद्वान् एवं विशेषतः श्रोत्रिय ब्राह्मणको देना चाहिये । त्रिणाचिकेत , त्रिमधु , त्रिसुपर्ण , षडङ्गवेत्ता , माता- पिताका भक्त , भानजा , सामवेदका ज्ञाता , ऋत्विक् , पुरोहित , आचार्य , उपाध्याय , मामा , श्वशुर , साला , सम्बन्धी , मण्डल ब्राह्मणका पाठ करनेवाला , पुराणोंका तत्त्वज्ञ , संकल्पहीन , संतोषी और प्रतिग्रह न लेनेवाला— ये श्राद्धमें सम्मिलित करनेयोग्य पंक्तिपावन ब्राह्मण है। ऊपर बताये हुए श्रेष्ठ द्विजोंको देवयज्ञ अथवा श्राद्धमें एक दिन पहले ही निमन्त्रण देना चाहिये । उसी समयसे ब्राह्मणों तथा श्राद्धकर्ताको भी संयमसे रहना चाहिये । जो श्राद्धमें दान देकर अथवा श्राद्धमें भोजन करके मैथुन करता है , उसके पितर एक मासतक वीर्यमें शयन करते हैं। जो स्त्रीसहवास करके श्राद्ध करता अथवा श्राद्धमें भोजन करता है , उसके पितर उसीके वीर्य और मूत्रका एक मासतक आहार करते हैं । इसलिये विद्वान् पुरुषको एक दिन पहले ही ब्राह्मणोंके पास निमन्त्रण भेजना चाहिये । यदि पहले दिन ब्राह्मण न मिल सकें तो श्राद्धके दिन भी निमन्त्रण किया जा सकता है । परन्तु स्त्री - प्रसङ्गी ब्राह्मणोंको कदापि निमन्त्रित न करे । यदि समयपर भिक्षाके लिये संयमी यति स्वयं पधारे हों तो उन्हें भी नमस्कार आदिके द्वारा प्रसन्न करके संयतचित्तसे अवश्य भोजन कराये। विद्वान् पुरुष श्राद्धमें योगियोंको भी भोजन कराये। क्योंकि पितरोंका आधार योग है, अतः योगियोंका सदा पूजन करना चाहिये। यदि हजारों ब्राह्मणोंमें एक भी योगी हो तो वह जलसे नौकाकी भाँति यजमान और श्राद्धभोजी ब्राह्मणोंको भी तार देता है। इस विषयमें ब्रह्मवादी विद्वान् पितरोंकी गायी हुई एक गाथाका गान करते हैं । पूर्वकालमें राजा पुरूरवाके पितरोंने उसका गान किया था । वह गाथा इस प्रकार है-  ‘हमारी वंश-परम्परामें कब किसीको ऐसा श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त होगा , जो योगियोंको भोजन करानेसे बचे हुए अन्नको लेकर पृथ्वीपर हमारे लिये पिण्ड देगा ? अथवा गयामें जाकर पिण्डदान करेगा? या हमारी तृप्तिके लिये सामयिक शाक, तिल, घी और खिचड़ी देगा? अथवा त्रयोदशी तिथि और मघा नक्षत्रमें विधिपूर्वक श्राद्ध करेगा और दक्षिणायनमें हमारे लिये मधु और घीसे मिली हुई खीर देगा ? '

 इसलिये सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धि तथा पापसे मुक्ति चाहनेवाले प्रत्येक मनुष्यको उचित है कि वह भक्तिपूर्वक पितरोंकी पूजा करे। श्राद्धमें तृप्त किये हुए पितर मनुष्योंके लिये वसु ,रुद्र,आदित्य ,नक्षत्र, ग्रह और तारोंकी प्रसन्नताका सम्पादन करते हैं। इतना ही नहीं, वे आयु , प्रजा ,धन, विद्या , स्वर्ग , मोक्ष , सुख तथा राज्य भी देते हैंI पितरोंको पूर्वाह्नकी अपेक्षा अपराह्न अधिक प्रिय है। घरपर आये हुए ब्राह्मणोंका स्वागतपूर्वक पूजन करके उन्हें पवित्रयुक्त हाथसे आचमन करानेके पश्चात् आसनोंपर बिठाये ; फिर विधिपूर्वक श्राद्ध करके उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराने के पश्चात् भक्तिपूर्वक प्रणाम करे और प्रिय वचन कहकर विदा करे। दरवाजेतक उन्हें पहुँचाने के लिये पीछे- पीछे जाय और उनकी आज्ञा लेकर लौटे। तदनन्तर नित्य - क्रिया करे और अतिथियोंको भोजन कराये I किन्हीं किन्हीं श्रेष्ठ पुरुषोंका विचार है कि यह नित्यकर्म भी पितरोंके ही उद्देश्यसे होता है। दूसरे लोगोंका कहना है कि इससे पितरोंका कोई सम्बन्ध नहीं है। शेष कार्य सदाकी भाँति करे। किन्हीं किन्हींका मत है कि पितरोंके लिये पृथक् पाक बनाकर श्राद्ध करना चाहिये। कुछ लोगोंका विचार है कि ऐसा न करके पहले बने हुए पाकसे ही अन्न लेकर सब कार्य पूर्ववत् करना चाहिये। तदनन्तर श्राद्धकर्ता मनुष्य अपने भृत्य आदिके साथ अवशिष्ट अन्न भोजन करे। धर्मज्ञ पुरुषको इसी प्रकार एकाग्रचित्त होकर पितरोंका श्राद्ध करना चाहिये और जिस प्रकार ब्राह्मणोंको संतोष हो, वैसी चेष्टा करनी चाहिये। अब मैं श्राद्धमें त्याग देने योग्य अधम ब्राह्मणोंका वर्णन करता हूँ। मित्रद्रोही, खराब नखोंवाला,नपुंसक ( कायर ) क्षयका रोगी , कोढ़ी , व्यापारी , काले दाँतोंवाला गंजा , काना , अंधा , बहरा,जड, गूँगा , पङ्ग, हिजड़ा खराब चमड़ेवाला, हीनाङ्ग , लाल आँखोंवाला कुबड़ा, बौना , विकराल ,आलसी ,मित्रके प्रति शत्रुभाव रखनेवाला, कलङ्कित कुलमें उत्पन्न पशु पालन करनेवाला , अच्छी आकृतिसे होन , परिवित्ति ( छोटे भाईके विवाहित होनेपर भी स्वयं अविवाहित रहनेवाला ) , परिवेत्ता ( बड़े भाईके ब्याहसे पहले ही विवाह कर लेनेवाला ) , परिवेदनिका ( बड़ी  बहिनके विवाहके पहले ही ब्याह करनेवाली स्त्री)- का पुत्र शूद्रजातीय स्त्रीका स्वामी और उसका पुत्र ऐसे ब्राह्मण श्राद्ध - भोजनके अधिकारी नहीं हैं । शूद्रीके पुत्रका संस्कार करानेवाला , अविवाहित जो दूसरेकी पत्नी रह चुकी हो , ऐसी स्त्रीका पति , वेतन लेकर पढ़ानेवाला , वैसे गुरुसे पढ़नेवाला , सूतकके अन्नपर जीविका-निर्वाह करनेवाला , सोमरसका विक्रय करनेवाला चोर पतित,ब्याज लेकर खानेवाला , शठ , चुगलखोर वेदोंका त्याग करनेवाला , अग्निहोत्रका त्यागी राजाका पुरोहित, सेवक , विद्याहीन , द्वेष रखनेवाला वृद्ध पुरुषोंसे शत्रुता रखनेवाला , दुर्धर्ष , क्रूर , मूढ़ , मन्दिरकी आयपर जीनेवाला , नक्षत्र बतानेवाला , बाण बनानेवाला और यज्ञके अनधिकारी पुरुषोंसे यज्ञ करानेवाला — ये तथा अन्य जितने भी निन्दित और अधम ब्राह्मण हैं , उन्हें श्राद्धमें सम्मिलित न करे ; क्योंकि वे पंक्तिको दूषित करनेवाले हैं। जहाँ दुष्ट पुरुषोंका आदर और साधु पुरुषोंकी अवहेलना होती हो , वहाँ देवताओंका दिया हुआ भयंकर दण्ड तत्काल ऊपर पड़ता है । जो शास्त्र विधिकी अवहेलना करके मूर्खको भोजन कराता है , वह दाता प्राचीन धर्मका त्याग करनेके कारण नष्ट हो जाता है। जो अपने आश्रयमें रहनेवाले ब्राह्मणका परित्याग करके दूसरेको बुलाकर भोजन कराता है, वह दाता उस ब्राह्मणके शोकोच्छ्वासकी आगमें दग्ध होकर नष्ट हो जाता है। वस्त्रके बिना कोई क्रिया , यज्ञ, वेदाध्ययन और तपस्या नहीं होती। अतः श्राद्धकालमें वस्त्रका दान विशेष रूपसे करना चाहिये ।* जो रेशमी , सूती और बिना कटा हुआ वस्त्र श्राद्धमें देता है , वह उत्तम भोगोंको प्राप्त करता है । जैसे बहुत-सी गौओंमें बछड़ा अपनी माताके पास पहुँच जाता है, उसी प्रकार श्राद्धमें ब्राह्मणोंका भोजन किया हुआ अन्न जीवके पास वह जहाँ भी रहता है , पहुँच जाता है नाम गोत्र और मन्त्र थे अन्नको वहाँ ढोकर नहीं ले जाते, अपितु मृत्युको प्राप्त हुए जीवोंतकको तृप्ति पहुँचती है-वे श्राद्धसे तृप्ति लाभ करते हैं । 'देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः। इस मन्त्रका श्राद्धके आरम्भ और अन्तमें तीन बार जप करे पिण्डदान करते समय भी एकाग्रचित्त होकर इसका जप करना चाहिये इससे पितर शीघ्र ही आ जाते हैं और राक्षस भाग हैं तथा तीनों लोकोंके पितर तृप्त होते हैं। यह मन्त्र पितरोंको तारनेवाला हैI श्राद्धमें रेशम , सन अथवा कपासका नया सूत देना चाहिये ऊन अथवा पाटका सूत्र वर्जित है। विद्वान् पुरुष जिसमें कोर न हो , ऐसा वस्त्र फटा न होनेपर भी श्राद्धमें न दे; क्योंकि उससे पितरोंको तृप्ति नहीं लिये भी होता है । पिता आदिमेंसे जो जीवित हो , उसको पिण्ड नहीं देना चाहिये , अपितु उसे विधिपूर्वक उत्तम अन्न भोजन कराना चाहिये । भोगको इच्छा रखनेवाला पुरुष श्राद्धके पश्चात् पिण्डको अग्निमें डाल दे और जिसे पुत्रकी अभिलाषा हो , वह मध्यम अर्थात् पितामहके पिण्डको मन्त्रोच्चारणपूर्वक अपनी पत्नीके हाथमें दे दे और पत्नी उसे खा ले । जो उत्तम कान्तिकी इच्छा रखनेवाला हो , वह श्राद्धके अनन्तर सब पिण्ड गौओंको खिला दे I बुद्धि , यश और कीर्ति चाहनेवाला पुरुष पिण्डोंको जलमें डाल दे I दीर्घ आयुकी अभिलाषावाला पुरुष उसे कौओंको दे दे । कुमारशालाकी इच्छा रखनेवाला वह पिण्ड मुगको दे दे । कुछ ब्राह्मण ऐसा कहते हैं कि पहले ब्राह्मणोंसे ' पिण्ड उठाओ ' ऐसी आज्ञा ले ले; उसके बाद पिण्डोंको उठाये । अतः ऋषियोंकी बतायी हुई विधिके अनुसार श्राद्धका अनुष्ठान करे; अन्यथा दोष लगता है और पितरोंको भी नहीं मिलता ।

जौ , धान , तिल , गेहूँ , मूँग , सावाँ , सरसोंका तेल , तिनीका चावल और बैंगनी आदिसे पितरोंको तृप्त करे आम , अमड़ा , बेल , अनार , बिजौरा , पुराना आँवला , खीर , नारियल , फालसा , नारंगी , खजूर , अंगूर , नीलकैथ , परवल , चिरौंजी , बेर , जंगली बेर , इन्द्र जौ भतुआ — इन फलोंको श्राद्धमें यत्नपूर्वक लेना चाहिये । गुड़ , शक्कर खाँड़ , गायका दूध दही , घी , तिलका तेल , सेंधा तथा समुद्र और झीलसे उत्पन्न होनेवाला नमक , पवित्र सुगन्ध , चन्दन , अरगजा तथा केसर भी पितरोंको निवेदन करे । सामयिक शाक , चौलाई , बथुआ , मूली तथा जंगली साग श्राद्धमें देनेयोग्य । चम्पा , चमेली , बेला , लोध , अशोक , तुलसी , तिलक , शतपत्रा , सुगन्धित शेफालिका ,कुब्जक, तगर , बनकेवड़ा और आदि श्राद्धमें अर्पण करने योग्य हैं । कमल , कुमुद , पद्म , पुण्डरीक , इन्दीवर , कोकनद और कहार भी पितरोंको निवेदन करे । गूगल , चन्दन , श्रीवास (बैल) , अगर तथा ऋषिगुग्गुल — ये पितरोंके योग्य धूप हैं । चना और मसूर श्राद्धमें वर्जित हैं । स्त्री, ऊँटनी और भेड़के दूध , दही और घीका परित्याग करे। ताड़ , वरुमा , काँकोल , बहुपत्रा (शिवलिंगी ) , अर्जुनी - फल , नीबू , रक्तबिल्व और सालके फलका भी श्राद्धमें त्याग करे पितृकर्ममें कस्तूरी , गोरोचन , पद्मचन्दन ,कालेयक ( काली अगर ) , हींग , अजवायन और लोहबानकी गन्ध वर्जित है । पालकका साग , बड़ी इलायची , चिरायता , शलजम , गाजर , अमलोनीका साग , चूकाका साग ,चनेकी पत्तीका,साग , पहाड़ी कन्द , सोवा गन्धशूकर

(वाराहीकन्द) ,हलभृत्य ,सरसों ,प्याज , लहसुन , शकरकन्द , भैंसाकंद , जिमीकंद,सुथनी लौकी , पेहँटुल , कुम्हड़ा , मिर्च , सोंठ पीपल , बैंगन , केवाँच , बहेड़ा ,कच्चे गेहूँका अर्क सत्तू ,बासी अन्न, हींग , कचनार और सहिजन- इन सब वस्तुओंका श्राद्धमें उपयोग न करे जो अत्यन्त खट्टा , अधिक चिकना , सूक्ष्म बहुत देरका बना हुआ और नीरस हो तथा जिसमेंसे मदिराकी - सी गन्ध आती हो , ऐसे पदार्थोंको श्राद्धमें न दे । चिरायता , नीम , राई , धनिया तरबूज और अमलबेद भी श्राद्धमें वर्जित हैं अनार छोटी इलायची , नारंगी , अदरख , इमली अमड़ा और नैपाली धनियाका श्राद्धमें उपयोग करना चाहिये । खीर , सेमर , मूँग , लडू , पानक रसाल ( आम ) और गोदुग्धको भी श्राद्धमें भक्तिपूर्वक देना चाहिये । जो भी स्वादिष्ट एवं स्निग्ध खाद्य पदार्थ हों , उनका श्राद्धमें उपयोग करना चाहिये। जिनमें खटाई और कडुआपन कम हो , ऐसी ही वस्तुओंका उपयोग करना उचित है । अधिक खट्टे , अधिक नमकीन और अधिक कड़वे पदार्थ असुरोंके भोजन हैं ; अतः उनको दूरसे ही त्याग दे । मीठे , स्नेहयुक्त , थोड़े चरपरे और थोड़े खट्टे स्वादिष्ट पदार्थ देवताओंके भोजन हैं अतः उन्हींका श्राद्धमें उपयोग करे करानेवाला मनुष्य रौरव नरकमें पड़ता है । अभक्ष्य वस्तुएँ ब्राह्मणोंको कदापि न दे । बरँकी पत्तीका  साग , जंभीरी नीबू , सहिजन , कचनार , खली मसूर , गाजर , सनकी पत्तीका साग , कोदो,तालमखाना , चूकाका साग , कम्बुक , पदमकाठका फल , लौकी , ताड़ी और ताड़ वृक्षके फलका श्राद्धमें भोजन करानेसे मनुष्य नरकमें पड़ता है जो पितरोंके लिये उक्त निषिद्ध वस्तुएँ अर्पित करता है , वह उन पितरोंके साथ ही पूयवह नामक नरकमें गिरता है । यदि अनजानमें या प्रमादवश एक बार इन निषिद्ध वस्तुओंका भक्षण कर ले तो उसके दोषकी निवृत्तिके लिये प्रायश्चित्त करना आवश्यक है । सात दिनोंतक क्रमशः फल मूल , दूध , दही , तक्र , गोमूत्र और जौकी लप्सी खाकर रहे । इस प्रकार ब्राह्मणों और विशेषतः भगवान् विष्णुके भक्तोंको उचित है कि वे एक बार भी निषिद्ध आचरण कर लेनेपर इस प्रकार शरीरकी शुद्धि करें । ऊपर बतायी हुई निषिद्ध वस्तुओंका अवश्य त्याग करे । अपनी शक्तिके अनुसार श्राद्धकी सामग्री एकत्रित करके विधिपूर्वक श्राद्ध करना सबका कर्तव्य है । जो अपने वैभवके अनुसार इस प्रकार विधिपूर्वक श्राद्ध करता है , वह मानव ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्को तृप्त कर देता है।

 मुनियोंने पूछा- ब्रह्मन् ! जिसके पिता तो जीवित, किंतु पितामह और प्रपितामहको मृत्यु हो गयी हो , उसे किस प्रकार श्राद्ध करना चाहिये ' यह विस्तारपूर्वक बतलाइये।१

 व्यासजी बोले- पिता जिनके लिये श्राद्ध करते है,उनके लिये स्वयं पुत्र भी श्राद्ध कर सकता है। ऐसा करनेसे लौकिक और वैदिक धर्मकी हानि नहीं होती।२

 मुनियोंने पूछा- विप्रवर ! जिसके पिताकी मृत्यु हो गयी हो और पितामह जीवित हों , उसे किस प्रकार श्राद्ध करना चाहिये ? यह बतानेकी कृपा हैं|३

 व्यासजी बोले- पिताको तो पिण्ड दे , पितामहको प्रत्यक्ष भोजन कराये और प्रपितामहको भी पिण्ड दे दे । यही शास्त्रोंका निर्णय है । मरे हुएको पिण्ड देने और जीवितको भोजन करानेका विधान है । उस अवस्थामें सपिण्डीकरण और पार्वणश्राद्ध नहीं हो सकता।*

 जो मनुष्य श्राद्ध सम्बन्धी विधिका पालन करता है , वह आयु , धन और पुत्रोंके साथ ही वृद्धिको प्राप्त होता है- इसमें तनिक भी संदेह नहीं समय इस पितृमेधविषयक अध्यायका पाठ करता है , उसके दिये हुए अन्नको पितरलोग तीन युगोंतक खाते रहते हैं। इस प्रकार मैंने यहाँ श्राद्ध कल्पका वर्णन किया। यह पापोंका नाश और पुण्योंकी वृद्धि करनेवाला है । श्राद्धके अवसरपर मनुष्यको संयतचित्त होकर इसका श्रवण और पाठ करना चाहिये।                                                                                                                                                                                                                    

१ पौष , माघ , फाल्गुन तथा चैत्रके कृष्णपक्षको अष्टमियोंको अष्टका कहते हैं । उनमें गृह्योक अष्टका - कर्म किये जाते हैं। इसीलिये उनका नाम अष्टका है।२- प्राचीन कालका एक प्रकारका उत्सव, जो आषाढ़ शुक्ल दशमी, श्रावण कृष्ण अष्टमी और भाद्र शुक्ल तृतीयाको होता था। ३- पूर्वोक्त अष्टका तिथियोंके दूसरे दिनको चारों नवमी तिथियोंको अन्वष्टका कहते हैं। ४- इस श्राद्धको आभ्युदयिक श्राद्ध कहते हैं। इसमें पहले माता, पितामही और प्रपितामहीका आवाहन - पूजन आदि होता है। उसके बाद पिता ,पितामह , प्रपितामह और मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामहका पूजन आदि कार्य होता है। ५- जिस समय सूर्य विषुव रेखापर पहुँचते और दिन - रात बराबर होते , उसे विषुव कहते हैं । यह समय वर्ष में दो बार आता है ।

*दशाहे ब्राह्मणः शुद्धो द्वादशाहेन क्षत्रियः। वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्धपति ॥

                                                                   (२२० । ६३)

१. मनुस्मृतिके अनुसार कन्याका विवाह इस शर्तके साथ भी किया जा सकता है कि उसका पुत्र अपने नानाके श्राद्ध करनेका अधिकारी समझा जाय । विवाहकी यह विधि पुत्रिका-विधि कहलाती है । पुत्रहीन पिता ही पुत्रिका-विधिसे अपनी कन्याका विवाह कर सकता है। उससे उत्पन्न हुआ पुत्र औरस पुत्रकी ही भाँति नानाकी सम्पत्तिका उत्तराधिकारी होता है।

*वस्त्राभावे क्रिया नास्ति यज्ञा वेदास्तपांसि च। तस्माद्वासांसि देयानि श्राद्धकाले विशेषतः॥

                                                                                                         ( २२० । १३ ९ )                                    

* देवता , पितर , महायोगी , स्वाहा और स्वधाको सदा बारंबार नमस्कार है ।

१- पिता जीवति यस्याथ मृतौ द्वौ पितरौपितुः । कथं श्राद्धं हि कर्तव्यमेतद्विस्तरशो वद ॥

                                                                                                                 ( २२० । २०५ )

२- यस्मै दद्यात्पिता श्राद्धं तस्मै दद्यात्सुतः स्वयम्। एवं न हीयते धर्मो लौकिको वैदिकस्तथा॥

                                                                                                      ( २२० । २०६ )

 ३- मृतः पिता जीवति च यस्य ब्रह्मन् पितामहः। स हि श्राद्धं कथं कुर्यादेतत्त्वं वक्तुमर्हसि ॥

                                                                                                   ( २२० । २०७ )