ब्रह्म पुराण

11 - पाताल और नरकों का वर्णन तथा हरिनाम-किर्तनकी महिमा

लोमहर्षणजी कहते हैं - मुनिवरो! इस प्रकार यह पृथ्वीका विस्तार बतलाया गया। इसकी ऊँचाई भी सत्तर हजार योजना है। पृथ्वी के भीतर सात ताल है, जिनमें से प्रत्येक की ऊँचाई दस-दस हजार योजन की है। उन सातों तलों के नाम ये हैं- अतल, वितल, नितल, सुतल, तलातल, रसातल तथा पाताल। इनकी भूमि क्रमशः काली, सफ़ेद, लाल, पिली, कँकरीली, पथरीली तथा सुवर्णमयी है। सातों ही तल बड़े-बड़े महलों से सुशोभित हैं। उनमें दानव और दैत्यों की सैकड़ों जातियाँ निवास करती हैं। विशालकाय नागों के कुटुम्ब भी उनके भीतर रहते हैं। एक समय पाताल से लौटे हुए देवर्षि नारदजी ने स्वर्गलोक की सभा में कहा था- 'पाताललोक स्वर्गलोक से भी रमणीय है। वहाँ सुन्दर प्रभायुक्त चमकीली मणियाँ हैं, जो परम आनन्द प्रदान करनेवाली हैं। वे नागों के अलंकारों एवं आभूषणों के काम आती हैं। भला, पाताल की तुलना किससे हो सकती है। वहाँ सूर्य की किरणें दिन में केवल प्रकाश फैलाती हैं, धूप नहीं। इसी प्रकार चन्द्रमा की किरणें रात में केवल उजाला करती हैं, सर्दी नहीं फैलातीं। वहाँ सर्प और दैत्य आदि भक्ष्य, भोज्य तथा सुरापान के मद से उन्मत्त होकर यह नहीं जान पाते कि कब कितना समय बीता है। वहाँ वन, नदियाँ, रमणीय सरोवर, कमलवन तथा अन्य मनोहर वस्तुएँ हैं, जो बड़े सौभाग्य से भोगने को मिलती हैं। पाताल-निवासी दानव, दैत्य तथा समर्पण सदा ही उन सबका उपभोग करते हैं। सब पातालों के नीचे भगवान् विष्णु का तमोमय विग्रह है, जिसे शेषनाग कहते हैं। दैत्य और दानव उनके गुणों का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं। सिद्ध पुरुष उन्हें अनन्त कहते हैं, देवता और देवर्षि उनकी पूजा करते हैं। वे सहस्त्रों मस्तकों से सुशोभित हैं। स्वस्तिकाकार निर्मल आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे अपने फणों की सहस्त्रों मणियों से सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित करते हैं तथा संसार का कल्याण करने के लिये सम्पूर्ण असुरों की शक्ति हर लेते हैं। उनके कानों में एक ही कुण्डल शोभा पाता है। मस्तक पर किरीट और गले में मणियों की माला धारण किये भगवान् अनन्त अग्नि की ज्वाला से प्रकाशमान श्वेत पर्वत की भाँति शोभा पाते। वे नील वस्त्र धारण करते,

मदसे मत्त रहते और श्वेत हार से ऐसे सुशोभित होते हैं, मानो आकाशगङ्गा के प्रताप से युक्त उत्ता, कैलास पर्वत शोभा पा रहा हो। उनके एक हाथ का अग्रभाग हलपर टिका रहता है और दूसरे हाथ में वे उत्तम मसूल धारण किये हुए है। प्रलयकाल में विषाग्नि की ज्वालाओं से युक्त संकर्षणात्मक रूद्र उन्हीं के मुखों से निकलकर तीनों लोकों का संहार करते हैं। सम्पूर्ण देवताओं से पूजित वे भगवान् शेष पातालके मूलभाग में स्थित हो अपने मस्तक पर समस्त भूमण्डल को धारण किये रहते हैं। उनके वीर्य, प्रभाव, स्वरूप तथा रूप का वर्णन देवता भी नहीं कर सकते। जिनके मस्तक पर रखी हुई समूची पृथ्वी उनके फणों की मणियों के प्रकाश से लाल रंग की फूलमाला-सी दिखायी देती है, उनके पराक्रम का वर्णन कौन कर सकता है? भगवान् अनन्त जब जँभाई लेते हैं, उस समय पर्वत, समुद्र और वनों सहित यह सारी पृथ्वी डोलने लगती है। गन्धर्व, अप्सरा, सिद्ध, किन्नर और सर्प कोई भी उनके गुणों का अन्त नहीं पाते; इसीलिये उन अविनाशी प्रभु को अनन्त कहते हैं। जिनके ऊपर नागवधुओं के हाथों से चढ़ाया हुआ हरिचन्दन बारंबार श्वास-वायु के लगने से सम्पूर्ण दिशाओं को सुवासित करता रहता है, प्राचीन ऋषि गर्ग ने जिनकी आराधना करके सम्पूर्ण ज्योतिष-शास्त्र का यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया था, उन्हीं नागश्रेष्ठ भगवान् शेष ने इस पृथ्वी को धारण कर रखा है और वे ही देवता, असुर तथा मनुष्यों के सहित समस्त लोकों का भरण-पोषण करते हैं।'

ब्राह्मणो! पाताल के अनन्तर रौरव आदि नरक हैं, जिनमें पापियों को गिराया जाता है। उन नरकों के नाम बतलाता हूँ, सुनो। रौरव, शौकर, रोध, तान, विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, महालोभ, विमोहन, रूधिरान्ध, वसातप्त, कृमीश, कृमिभोजन, असिपत्रवन, लालाभक्ष्य, पूयवह, वह्निज्वाल, अध:शिरा, संदंश, कृष्णसूत्र, तम, अवीचि, श्वभोजन तथा अप्रतिष्ठ इत्यादि बहुत-से नरक हैं, जो अत्यन्त भयंकर हैं। ये सब यमके राज्य में हैं। शस्त्र, अग्नि और विष के द्वारा यातना देने के कारण वे सभी नरक अत्यन्त भयंकर हैं। जो मनुष्य पापकर्मों में लगे रहते हैं, वे ही उन नरकों में गिरते हैं। जो झूठी गवाही देता, पक्षपातपूर्वक बोलता तथा असत्य भाषण करता है, वह मनुष्य रौरव-नरक में पड़ता है। जो गर्भ के बच्चे की हत्या कराता, गुरु के प्राण लेता, गाय को मारता तथा दूसरों के श्वास रोककर मार डालता है, वे सभी घोर रौरव नरक में गिरते हैं। शराबी, ब्रह्महत्यारा, सुवर्ण की चोरी करनेवाला तथा इन पापियों से संसर्ग रखनेवाला मानव शौकर नरक में जाता है। जो क्षत्रिय और वैश्य की हत्या करता, गुरुपत्नी से संसर्ग रखता, बहन के साथ व्यभिचार करता तथा राजदूत के प्राण लेता है, वह तप्तकुम्भ नामक नरक में पड़ता है। जो शराब तथा सिंह को बेचता और अपने भक्त का त्याग करता है, वह तप्तलोह नामक नरक में गिरता है।  पुत्री और पुत्र-वधू के साथ समागम करनेवाला पापी महाज्वाल नामक नरक में गिराया जाता है। जो नीचे अपने गुरुजनों का अपमान करता, उन्हें गालियाँ देता, वेदों को दूषित करता, उन्हें बेचता तथा अगम्या स्त्रियों के साथ समागम करता है, वे सभी शबल नामक नरक में जाते हैं। चोर तथा मर्यादा में कलङ्क लगानेवाला मनुष्य विमोह नामक नरक में गिरता है। देवताओं, द्विजों तथा पितरों से द्वेष रखनेवाला एवं रत्न को दूषित करनेवाला मनुष्य कृमिभक्ष्य नामक नरक में पड़ता है। जो दूषित यज्ञ करता और देवताओं, पितरों एवं अतिथियों को दिये बिना ही स्वयं खा लेता है, वह लालाभक्ष्य नामक भयंकर नरक में जाता है। बाण बनानेवाला बेधक नाम के नरक में गिरता है। जो कर्णी नामक बाण तथा खड्ग आदि आयुधों का निर्माण करता है। वह अत्यन्त भयंकर विशसन नामक नरक में गिराया जाता है। जो द्विज निचे प्रतिग्रह स्वीकार करता है। यज्ञ के अनधिकारियों से यज्ञ करवाता है तथा केवल नक्षत्र बताकर जीविका चलाता है, वह अधोमुख नामक नरक में जाता है। जो अकेला ही मिठाई खाता है, वह मनुष्य कृमिपूय नामक नरक में जाता है। लाख, मांस, रस, तिल और नमक बेचनेवाला ब्राह्मण भी उसी नरक में पड़ता है। बिल्ली, मुर्गी, बकरा, कुत्ता, सूअर तथा चिड़िया पालनेवाला भी कृमिपूय में ही गिरता है। जो ब्राह्मण रङ्गमञ्च पर नाचकर जीविका चलाता, नाव चलाता, जारज मनुष्य का अन्न खाता, दूसरों को जहर देता, चुगली खाता, भैंस से जीविका चलाता, पर्व के दिन स्त्रीसम्भोग करता, दूसरों के घर में आग लगाता, मित्रों की हत्या करता, शकुन बताकर पैसे लेता, गाँवभर की पुरोहिती करता तथा सोमरस बेचता है, वह रूधिरान्ध नामक नरक में गिरता है। भाई को मारनेवाला और समूचे गाँव को नष्ट करनेवाला मनुष्य वैतरणी नदी में जाता है। जो वीर्य पान करते, मर्यादा तोड़ते, अपवित्र रहते और बाजीगरी से जीविका चलाते हिया, वे कृच्छ्र नामक नरक में गिरते हैं। जो अकारण ही जंगल कटवाता है, वह असिपत्रवन नामक नरक में जाता है। भेड़ के व्यापार से जीविका चलानेवाले और मृगों का वध करनेवाले वह्निज्वाल नामक नरक में गिराये जाते हैं। जो व्रत का लोप करनेवाले तथा अपने आश्रम से भ्रष्ट हैं, वे दोनों ही संदंश-नरक की यातना में पड़ते हैं। जो मनुष्य ब्रह्मचारी होकर दिन में सोते और स्वप्न में वीर्यपात करते हैं तथा जो लोग अपने पुत्रों द्वारा पढ़ाये जाते है, वे श्वभोजन नामक नरक में गिरते हैं। ये तथा और भी सहस्त्रों नरक हैं, जिनमें पापी मनुष्य यातना में डालकर पीड़ित किये जाते हैं। ऊपर जो पाप गिनाये गये हैं, उनके अतिरिक्त दूसरे भी सहस्त्रों प्रकार के पाप हैं, जिनका फल नरक में पड़े हुए पापी जीव भोगते हैं।

जो लोग मन, वाणी और क्रिया द्वारा अपने वर्ण और आश्रम के विपरीत आचरण करते हैं, वे नरकों में पड़ते हैं। नरक में पड़े हुए जीव नीचे मुँह करके लटका दिये जाते हैं और उसी अवस्था में वे स्वर्ग में सुख भोगने वाले देवताओं को देखते हैं। इसी प्रकार देवता भी उक्त अवस्था में पड़े हुए नरक के जीवों को देखते रहते हैं। ऐसा होने से उनकी धर्म के प्रति श्रद्धा और पाप के प्रति विरक्ति बढ़ती है। स्थावर, कीट, जलचर पक्षी, पशु, मनुष्य, धर्मात्मा, देवता तथा मोक्षप्राप्त महात्मा- ये क्रमशः एक से दूसरे सहस्त्र्गुने श्रेष्ठ हैं। महर्षियों ने पापों के अनुरूप प्रायश्चित भी बतलाये हैं। स्वायम्भुव मनु आदि स्मृतिकारों ने बड़े पाप के लिये बड़े और छोटे पाप के लिये छोटे प्रायश्चित बतलाये हैं। वे सब तपस्यारूप हैं। तपस्यारूप जो समस्त प्रायश्चित्त हैं, उन सब में भगवान् श्रीकृष्ण का निरन्तर स्मरण श्रेष्ठ है। पाप कर लेने पर जिस पुरुष को उसके लिये पश्चात्ताप होता हिया, उसके लिये एक बार भगवान् श्रीहरि का स्मरण कर लेना ही सर्वोत्तम प्रायश्चित्त है। प्रात:काल, रात्रि, संध्या तथा मध्याह्न आदि में भगवान् नारायण का स्मरण करनेवाला मनुष्य तत्काल पापमुक्त हो जाता है। भगवान् विष्णु के स्मरण और कीर्तन से समस्त क्लेशराशि के क्षीण हो जाने पर मनुष्य मुक्त हो जाता है। विप्रवरो! जप, होम और अर्चन आदि के समय जिसका मन भगवान् वासुदेव में लगा होता है, वह तो मोक्ष का अधिकारी है। उसके लिये फलस्वरूप से इन्द्र आदि के पदकी प्राप्ति विघ्नमात्र है। कहाँ तो जहाँ से पुन: लौटना पड़ता है, ऐसे स्वर्गलोक में जाना और कहाँ मोक्ष के सर्वोत्तम बीज वासुदेवमन्त्र का जप! इनमें कोई तुलना ही नहीं है।* इसलिये जो पुरुष रात-दिन भगवान् विष्णु का स्मरण करता है, वह अपने समस्त पातकों का नाश हो जाने के कारण कभी नरक में नहीं पड़ता। एक ही वस्तु समय-समय पर दु:ख-सुख, ईर्ष्या और क्रोध का कारण बनती है। अत: केवल दु:खरूप वस्तु कहाँ से आयी? वही वस्तु पहले प्रसन्नता का कारण होकर फिर दुःख देनेवाली बन जाती है। फिर वही क्रोध और प्रसन्नता का भी हेतु बनती है। इसलिये कोई भी वस्तु न तो दुःखरूप है न सुखरूप। यह सुख और दुःख आदि तो मनका विकारमात्र है।* ज्ञान ही परब्रह्मका स्वरुप है और अज्ञान बन्धन का कारण है। यह सम्पूर्ण विश्व ज्ञानस्वरूप है। ज्ञान से बढ़कर कुछ भी नहीं है। ब्राह्मणो! विद्या और अविद्या को भी ज्ञानरूप ही समझो। इस प्रकार मैंने तुमसे समस्त भूमण्डल, पाताल, नरक, समुद्र, पर्वत, द्वीप, वर्ष तथा नदियों का संक्षेप से वर्णन किया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

* प्रायश्चित्तान्यशेषाणि तप:कर्मात्मकानि वै। यानि तेषामशेषाणां कृष्णानुस्मरणं परम् ॥

कृते पापेऽनुतापो वै यस्य पुंस: प्रजायते। प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं हरिसंस्मरणं परम् ॥

प्रातर्निशि तथा संध्यामध्याह्नादिषु संस्मरन्। नारायणमवाप्नोति सद्य: पापक्षयं नर: ॥

विष्णुसंस्मरणात् क्षीणसमस्तक्लेशसंचय:। मुक्तिं प्रयाति भो विप्रा विष्णोस्तस्यानुकीर्तनात् ॥

जपहोमार्चनादिषु। तस्यान्तरायो विप्रेन्द्रा देवेन्द्रत्वादिकं फलम् ॥

पुनरावृत्तिलक्षणम्। क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम् ॥

(२२ । ३७-४२)

* वस्त्वेकमेव दुःखाय सुखायेष्र्योदयाय च। कोपाय च यतस्तस्माद् वस्तु दु:खात्मकं कूत: ॥

तदेव प्रीतये भूत्वा पुनर्दु:खाय जायते। तदेव कोपाय यत: प्रसादाय च जायते ॥

तस्माद्यु:खात्मकं नास्ति न च किञ्चित्सुखात्मकम्। मनस; परिणामोऽयं सुखदु;खादिलक्षण: ॥

(२२ । ४५-४७)