ब्रह्म महा पुराण
100 - आत्यन्तिक प्रलयका निरूपण, आध्यात्मिक आदि त्रिविध तापोंका वर्णन और भगवत्तत्त्वकी व्याख्या
व्यासजी कहते हैं— ब्राह्मणो ! आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंको जानकर ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न होनेपर विद्वान् आत्यन्तिक लयको प्राप्त होते हैं । आध्यात्मिक तापके भी दो भेद हैं- शारीरिक और मानसिक शारीरिक तापके बहुत-से भेद हैं । उनका वर्णन सुनो शिरोरोग , प्रतिश्याय (पीनस ) , ज्वर , शूल , भगंदर , गुल्म ( पेटकी गाँठ ) , अर्श ( बवासीर ) , श्वयथु ( सूजन ) , श्वास (दमा ) , छर्दि ( वमन ) आदि तथा नेत्ररोग , अतीसार ( पेचिश ) और कुष्ठ ( कोढ़ ) आदि शारीरिक कष्टोंके भेदसे दैहिक तापके अनेक भेद हो जाते हैं । अब मानस तापका वर्णन सुनो काम , क्रोध , भय , द्वेष , लोभ , मोह , विषाद ( चिन्ता ) , शोक , असूया ( दोषदृष्टि ) , अपमान , ईर्ष्या , मात्सर्य तथा पराभव आदिके भेदसे मानस तापके अनेक रूप हैं । ये सभी प्रकारके ताप आध्यात्मिक माने गये हैं । मृग , पक्षी , मनुष्य आदि तथा पिशाच , सर्प , राक्षस और बिच्छू आदिसे मनुष्योंको जो पीड़ा होती है , उसका नाम आधिभौतिक ताप है । शीत , उष्ण , वायु , वर्षा है जल और विद्युत् आदिसे होनेवाले संतापको समय आधिदैविक कहते हैं । मुनिवरो ! इनके सिवा गर्भ , जन्म , बुढ़ापे , अज्ञान , मृत्यु और नरकसे प्राप्त होनेवाले दुःखके भी सहस्रों भेद हैं । अत्यन्त मलसे भरे हुए गर्भाशयमें सुकुमार शरीरवाला जीव झिल्लीसे लिपटा हुआ रहता है । उसकी पीठ और ग्रीवाकी हड्डियाँ मुड़ी होती हैं । माताके खाये हुए अत्यन्त तापदायक और अधिक खट्टे , कड़वे , चरपरे , गर्म और खारे पदार्थोंसे कष्ट पाकर उसकी पीड़ा बहुत बढ़ जाती है । वह अपने अङ्गोंको फैलाने या सिकोड़नेमें समर्थ नहीं होता मल और मूत्रके महान् पङ्कमें उसे सोना पड़ता है , जिससे उसके सभी अङ्गोंमें पीड़ा होती है । चेतनायुक्त होनेपर भी वह खुलकर साँस नहीं ले सकता । अपने कर्मोंके बन्धनमें बँधा हुआ वह जीव सैकड़ों जन्मोंका स्मरण करता हुआ बड़े दुःखसे गर्भमें रहता है । जन्मके समय उसका मुख मल - मूत्र , रक्त और वीर्य आदिमें लिपटा रहता है । प्राजापत्य नामक वायुसे उसकी हड्डियोंके प्रत्येक जोड़में बड़ी पीड़ा होती है । प्रबल प्रसूति वायु उसके मुँहको नीचेकी ओर कर देती है और वह गर्भस्थ जीव अत्यन्त आतुर होकर बड़े क्लेशके साथ माताके उदरसे बाहर निकल पाता है । मुनिवरो ! जन्म लेनेके पश्चात् बाह्य वायुका स्पर्श होनेसे अत्यन्त मूर्च्छाको प्राप्त होकर वह बालक अपनी सुध - बुध खो बैठता है । दुर्गन्धयुक्त फोड़ेसे पृथ्वीपर गिरे हुए कीड़ेकी भाँति वह छटपटाता है । उस समय उसे ऐसी पीड़ा होती है , मानो उसके अङ्गोंमें काँटे चुभो दिये गये हों अथवा वह आरेसे चीरा जा रहा हो उसे अपने अङ्गोंको खुजलानेकी भी शक्ति नहीं रहती । वह करवट बदलनेमें भी असमर्थ होता है । स्तन-पान आदि आहार भी उसे दूसरोंकी इच्छासे ही प्राप्त होता है । वह अपवित्र बिछौनेपर पड़ा रहता है । उस समय उसे खटमल और डाँस आदि काटते हैं तो भी वह उन्हें हटानेमें समर्थ नहीं होता ।
इस प्रकार जन्मके समय उसे अनेक दुःख उठाने पड़ते हैं । जन्मके बाद भी वह बाल्यावस्थामें आधिभौतिक आदि अनेक दुःखोंका भागी होता । अज्ञानान्धकारसे आच्छादित मूढ़ अन्तःकरणवाला मनुष्य यह नहीं जानता कि ' मैं कहाँसे आया हूँ ? कौन हूँ ? कहाँ जाऊँगा ? क्या मेरा स्वरूप है ? किस बन्धनसे बँधा हुआ हूँ ? क्या इस बन्धनका कुछ कारण भी है या यह अकारण ही प्राप्त हुआ है ? मुझे क्या करना चाहिये ? और क्या नहीं करना चाहिये ? मेरे लिये क्या कहनाऔर क्या न कहना उचित है ? मेरे लिये क्या धर्म ? और क्या अधर्म ? किसके प्रति कैसा बर्ताव करना उचित है ? क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य ? तथा कौन - सा कार्य गुणयुक्त है और कौन - सा दोषयुक्त ? इस प्रकार पशुके समान मूढ़ तथा शिश्नोदरपरायण मनुष्योंको अज्ञानजनित महान् दुःख प्राप्त होते हैं । ब्राह्मणो ! अज्ञान तामसिक भाव है , अतः अज्ञानी पुरुषोंकी तामसिक कर्मोंके अनुष्ठानमें ही प्रवृत्ति होती है । इससे शास्त्रविहित कर्मोंका लोप जाता है । महर्षियोंने शास्त्रविहित कर्मोंके लोपका फल नरक बतलाया है । अतः अज्ञानी पुरुषोंको इस लोक और परलोकमें भारी दुःख भोगना पड़ता है । वृद्धावस्थासे शरीरके जर्जर हो जानेपर पुरुषका प्रत्येक अङ्ग शिथिल हो जाता है । उसके दाँत कमजोर होकर गिर जाते हैं । शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और सब ओर नस - नाड़ियाँ दिखायी देने लगती हैं । नेत्रोंकी दूरस्थ वस्तुओंको देखनेकी शक्ति नष्ट हो जाती है । नेत्रोंकी पुतलियाँ गोलकोंमें समा जाती हैं । नासिकाके छिद्रोंमें बहुत - से रोएँ जमकर बाहर निकल आते हैं । शरीर काँपने लगता है । सब हड्डियाँ दिखायी देने लगती हैं । मेरुदण्ड झुक जाता है। जठराग्नि मन्द पड़ जानेके कारण उसका आहार कम हो जाता है । उससे काम-काज भी कम ही हो पाते हैं । घूमने-फिरने , उठने - बैठने और सोने आदिकी चेष्टा भी होकर बड़ी कठिनाईसे होती है । कानों और नेत्रोंकी शक्ति मन्द जाती है। सदा लार बहते रहनेसे मुख मलिन हो जाता है । समस्त इन्द्रियाँ काबूके है बाहर हो जाती हैं । मनुष्य मृत्युके निकट पहुँच जाता है । उसको उसी समय अनुभव किये हुए सभी पदार्थोंकी स्मृति नहीं रहती । एक बार भी कोई बात कहनेमें उसको बड़ा भारी परिश्रम होता है । वह दमे और खाँसी आदिके कष्टसे रातभर जागता रहता है । वृद्ध पुरुषको दूसरा उठाता और दूसरा ही सुलाता है । उसे अपने सेवक , पुत्र और स्त्रीके द्वारा भी अपमानित होना पड़ता है । उसका समस्त शौचाचार नष्ट हो जाता है । फिर भी आहार - विहारके लिये वह लालायित रहता है । उसके परिजन भी उसकी हँसी उड़ाते हैं । सभी बन्धु बान्धव उसकी ओरसे विरक्त रहते हैं । अपनी युवावस्थाकी चेष्टाओंको वह इस प्रकार स्मरण करता है , मानो वे दूसरे जन्ममें अनुभव की हुई बातें हों ; उनके स्मरणसे अत्यन्त संतप्त होकर वह लंबी साँसें लेता है । इस प्रकार वृद्धावस्थामें अनेक दुःखोंको भोगकर वह मृत्युके समय जिन क्लेशोंका अनुभव करता है , उनका वर्णन सुनो मृत्युकालमें मनुष्यका कण्ठ और हाथ - पैर शिथिल हो जाते हैं । उसका शरीर काँपता रहता है । उसे बार - बार मूर्च्छा होती है और कभी थोड़ी-सी चेतना भी आ जाती है । उस समय वह अपने सुवर्ण धान्य , पुत्र , पत्नी , सेवक और गृह आदिके लिये ममतासे अत्यन्त व्याकुल होकर सोचता है- ' हाय ! मेरे बिना इनकी कैसी दशा होगी । ' मर्म विदीर्ण करनेवाले महान् रोग भयंकर आरे तथा यमराजके घोर बाणोंकी भाँति उसके अस्थि बन्धनोंको काटे डालते हैं । उसकी आँखोंकी पुतलियाँ घूमने लगती हैं , वह बारंबार हाथ - पैर पटकता है ; उसके तालू , ओठ और कण्ठ सूखने लगते हैं । गला घुरघुराता है । उदान वायुसे पीड़ित होकर कण्ठ रुँध जाता है । उस अवस्थामें मनुष्य महान् ताप , भूख और प्याससे व्यथित हो यमदूतोंद्वारा दी हुई पीड़ा सहकर बड़े कष्टसे प्राणत्याग करता है । फिर क्लेशसे ही उसे यातनादेहकी प्राप्ति होती है । ये तथा और भी बहुत से भयंकर दुःख मृत्युके समय मनुष्योंको भोगने पड़ते हैं । विप्रवरो ! नरकमें गये हुए जीवोंको जो पापजनित दुःख भोगने पड़ते हैं , उनकी कोई गणना नहीं है । केवल नरकमें ही दुःखकी परम्परा हो , ऐसी बात नहीं है ; स्वर्गमें भी जिसके पुण्यका भोग क्षीण हो रहा है और जो पापके फलभोगसे भयभीत है , उसे शान्ति नहीं मिलती । जीव पुनः पुनः गर्भ में आता और जन्म लेता है । कभी वह गर्भमें ही नष्ट हो जाता और कभी जन्म लेनेके समय मृत्युको प्राप्त होता है । कभी जन्मते ही , कभी बाल्यावस्था में और कभी युवावस्थामें ही उसकी मृत्यु हो जाती है । विप्रगण ! मनुष्योंके लिये जो - जो वस्तु अत्यन्त प्रीतिकारक होती है , वही वही उसके लिये दुःखरूपी वृक्षका बीज बन जाती है । स्त्री , पुत्र , मित्र आि और गृह , क्षेत्र तथा धन आदिसे पुरुषोंको उतना अधिक सुख नहीं मिलता , जितना कि दुःख उठाना पड़ता है । इस प्रकार सांसारिक दुःखरूपी सूर्यके तापसे संतप्त चित्तवाले मानवोंको मोक्षरूपी वृक्षकी शीतल छायाके सिवा अन्यत्र कहाँ सुख है । अतः विद्वानोंने गर्भ , जन्म और बुढ़ापा आदि । स्थानों में होनेवाले आध्यात्मिक आदि त्रिविध दुःखसमूहोंको दूर करनेके लिये एकमात्र भगवत्प्राप्तिको ही अमोघ ओषधि बताया है । उससे बढ़कर आह्लादजनक और सुखस्वरूप दूसरी कोई ओषधि नहीं है । अतः बुद्धिमान् पुरुषोंको भगवत्प्राप्तिके लिये सदा ही यत्न करना चाहिये । द्विजवरो ! भगवत्प्राप्तिके दो साधन कहे गये हैं- ज्ञान और कर्म ज्ञान भी दो प्रकारका है— शास्त्र जन्य और विवेक जन्य । शास्त्र जन्य ज्ञान शब्दब्रह्मका और विवेक - जन्य ज्ञान परब्रह्मका स्वरूप है । अज्ञान गाढ अन्धकारके समान है । उसको नष्ट करनेके लिये शास्त्र जन्य ज्ञान दीपकके समान और विवेक जन्य ज्ञान साक्षात् सूर्यके सदृश माना गया है। मुनिवरो ! मनुजीने वेदार्थका स्मरण करके इसके विषयमें जो विचार प्रकट किया है , उसे बताता हूँ ; सुनो । ब्रह्मके दो स्वरूप जानने योग्य हैं शब्दब्रह्म और परब्रह्म । जो शब्दब्रह्ममें पारंगत है , वह परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है । अथर्ववेदकी श्रुति कहती है कि परा और अपरा- ये दो विद्याएँ जानने योग्य हैं । परा विद्यासे अक्षरब्रह्मकी प्राप्ति होती है तथा ऋग्वेदादि शास्त्र ही अपरा विद्या हैं । वह जो अव्यक्त , जरावस्थासे रहित , अचिन्त्य , अजन्मा , अविनाशी , अनिर्देश्य , अरूप , हस्त पादादिसे रहित , सर्वव्यापक , नित्य , सब भूतोंका कारण तथा स्वयं कारणरहित है , जिससे सम्पूर्ण व्याप्य वस्तु व्याप्त है , जिसे ज्ञानी पुरुष ही ज्ञानदृष्टिसे देखते हैं , वही परब्रह्म और वही परमधाम है । मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको उसीका चिन्तन करना चाहिये । वही भगवान् विष्णुका वेदवाक्योंद्वारा प्रतिपादित परम पद है । जो सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति , प्रलय , आगमन , गमन तथा विद्या | और अविद्याको जानता है , उसीको ' भगवान् ' कहना चाहिये । त्यागने योग्य त्रिविध गुण आदिको | छोड़कर समग्र ज्ञान , समग्र शक्ति , समग्र बल , समग्र ऐश्वर्य , समग्र वीर्य और समग्र तेज ही ' भगवत् ' शब्दके वाच्यार्थ हैं । इस दृष्टिसे श्रीविष्णु ही ' भगवान् ' हैं । उन परमात्मा श्रीहरिमें सम्पूर्ण भूत निवास करते हैं तथा वे भी सर्वात्मारूपसे सब भूतोंमें स्थित हैं । अतः वे ' वासुदेव ' कहे गये हैं । पूर्वकालमें महर्षियोंके पूछनेपर स्वयं प्रजापति ब्रह्माने अनन्त भगवान् वासुदेवके नामकी यह I यथार्थ व्याख्या बतलायी थी । सम्पूर्ण जगत्के धाता और विधाता भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण भूतोंमें वास करते हैं और सम्पूर्ण भूत उनमें वास करते हैं ; इसलिये उनका नाम ' वासुदेव ' है । वे परमात्मा निर्गुण , समस्त आवरणोंसे परे और सबके आ हैं । सम्पूर्ण भूतोंकी , प्रकृति तथा उसके गुण और दोषोंकी पहुँचके बाहर हैं । सम्पूर्ण भुवनोंके बीचमें जो कुछ भी स्थित है , वह सब उनके द्वारा व्या है । समस्त कल्याणमय गुण उनके स्वरूप हैं । उन्होंने अपनी मायाशक्तिके लेशमात्रसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि की है । वे अपनी इच्छासे मन अनुरूप अनेक शरीर धारण करते हैं तथा उन्हीं के द्वारा सम्पूर्ण जगत्के कल्याणका साधन होता है । वे तेज , बल और ऐश्वर्यके महान् भंडार हैं । पराक्रम और शक्ति आदि गुणोंकी एकमात्र राशि हैं तथा परसे भी परे हैं । उन परमेश्वरमें सम्पूर्ण क्लेश आदिका अभाव है । वे ईश्वर ही व्यष्टि और समष्टिरूप हैं । वे ही अव्यक्त और व्यक्तस्वरूप हैं । सबके ईश्वर , सबके द्रष्टा , सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान् | परमेश्वर नामसे प्रसिद्ध वे ही हैं । जिसके द्वारा दोषरहित , परम शुद्ध , निर्मल तथा एक रूप परमात्माका ज्ञान , साक्षात्कार अथवा प्राप्ति होती है , वही ज्ञान है जो इसके विपरीत है , उसे अज्ञान बताया गया है
Summary of chapter 98 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
Kāśīrāja, allied with Bāṇa and having insulted the Yādavas, faces Kṛṣṇa's divine wrath. Kṛṣṇa surrounds and burns Kāśī with the Jvara (fever) weapon and Sudarśana discus as an act of divine justice. The chapter underscores that even the most sacred cities are not exempt from divine retribution when their rulers align themselves with adharma.