ब्रह्म पुराण

94 - स्वर्ग और नरकमें ले जानेवाले धर्माधर्मका निरूपण

पार्वतीजीने कहा - भगवन् ! सर्वभूतेश्वर ! देव- दानव वन्दित विभो ! मुझे मनुष्योंके धर्म और अधर्मके विषयमें संदेह है । देव ! आप उसका समाधान कीजिये । देहधारी जीव सदा मन , वाणी और क्रियारूप त्रिविध बन्धनोंद्वारा बँधते हैं फिर किन साधनोंसे और किस प्रकार उनकी मुक्ति होती है ? यह बताइये । देव ! किस स्वभावसे,कैसे कर्मसे अथवा किन सदाचारों एव सद्गुणोंसे संसारके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं?

शिवजी बोले- देवि ! तुम धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाली और निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाली हो ।तुम्हारा प्रश्न सब प्राणियोंके लिये हितकारी और उनकी बुद्धिको बढ़ानेवाला है । मैं उसका उत्तर देता हूँ , सुनो । जो मनुष्य सब प्रकारके लिङ्गों ( बाह्य चिह्नों ) से रहित , सत्य धर्मके परायण तथा शान्त हैं , जिनके सभी संशय नष्ट हो गये वे अधर्म या धर्मसे नहीं बँधते । जो प्रलय और उत्पत्तिके तत्त्वज्ञ , सर्वज्ञ , सर्वदर्शी और वीतराग हैं , वे पुरुष कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं जो मन , वाणी और क्रियाद्वारा किसीकी हिंसा नहीं करते तथा किसीके प्रति आसक्त नहीं होते वे कर्म बन्धनमें नहीं पड़ते । जो प्राण संहारसे दूर रहनेवाले , सुशील , दयालु , प्रिय और अप्रियको समान समझनेवाले तथा जितेन्द्रिय हैं , वे कर्मोंसे नहीं बँधते । जो सब प्राणियोंपर दया रखते , सब जीवोंके लिये विश्वासपात्र बने रहते और हिंसापूर्ण बर्तावका त्याग कर देते हैं , मनुष्य स्वर्गलोकमें जानेवाले हैं । जो पराये धनके प्रति कभी ममता नहीं रखते और परायी स्त्रियोंसे सदा दूर रहते हैं तथा जो धर्मतः प्राप्त अर्थका उपभोग करनेवाले हैं , वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं । जो परस्त्रियोंके प्रति सदा माता , बहिन पुत्रीका सा बर्ताव करते हैं , वे मानव स्वर्गलोकमें जाते हैं । जो केवल अपनी ही स्त्रीके प्रति अनुराग रखते , ऋतुकाल आनेपर ही पत्नीके साथ समागम करते तथा विषय सुखोंके उपभोगमें कभी आसक्त नहीं होते , वे ही मनुष्य स्वर्गलोकके यात्री हैं । जो अपने सदाचारके कारण परायी स्त्रियोंकी ओरसे सदा आँखें बंद किये रहते हैं , इन्द्रियोंको अपने अधीन रखते और शीलकी सदा रक्षा करते हैं , वे मानव स्वर्गगामी होते हैं । यह देवमार्ग है मनुष्योंको सदा इसका सेवन करना चाहिये । विद्वान् पुरुषोंको सदा उसी मार्गका सेवन करना चाहिये जो वासनाद्वारा निर्मित न हो , जिसमें किसीका व्यर्थ ही अपकार न होता हो और जहाँ दान त्कर्म , तपस्या , शील , शौच तथा दयाभावका दर्शन होता हो । स्वर्गमार्गकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको इसके विपरीत मार्गका आश्रय नहीं लेना चाहिये I जो अपने अथवा दूसरेके लिये अधर्मयुक्त बात नहीं कहते और कभी झूठ नहीं बोलते , वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं । जो जीविका अथवा धर्मके लिये या स्वेच्छासे ही कभी असत्यभाषण नहीं करते , अपितु स्पष्ट , कोमल , मधुर , पापरहित स्वागतपूर्ण वचन बोलते हैं , वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जानेके अधिकारी हैं । जो कठोर , कड़वी तथा निष्ठुर बात मुँहसे नहीं निकालते , चुगली नहीं खाते , साधुतासे रहते हैं , कठोर भाषण और परद्रोह त्याग देते हैं तथा सम्पूर्ण भूतोंके प्रति सम एवं जितेन्द्रिय होते हैं , वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं । शठोंसे बात नहीं करते , विरुद्ध कर्मोंको त्याग देते , कोमल वचन बोलते , क्रोध न करके मनोहर वाणी मुँहसे निकालते और कुपित होनेपर भी शान्ति धारण करते हैं , वे मानव स्वर्गगामी होते हैं । देवि ! यह वाणीद्वारा पाला जानेवाला धर्म है । शुभ तथा सत्य गुणोंवाले विद्वान् मनुष्योंको सदा इसका सेवन करना चाहिये । कल्याणि ! मानसिक धर्मसे युक्त मनुष्य सदा स्वर्गमें जाते हैं । मैं उनका वर्णन करता हूँ , सुनो निर्जन वनमें रखे हुए पराये धनपर जब दृष्टि पड़े ,उस समय जो मनसे भी उसे लेना नहीं चाहते, वे  स्वर्गगामी होते हैं । इसी प्रकार जो परायी स्त्रियोंको एकान्तमें पाकर मनके द्वारा भी कामवश उन्हें नहीं ग्रहण करते , जो शत्रु और मित्रको सदा एक चित्तसे अपनाते , शास्त्रोंका अध्ययन करते पवित्र एवं सत्यप्रतिज्ञ होते और अपने ही धनसे संतुष्ट रहते हैं , जिनसे दूसरोंको कष्ट नहीं पहुँचता और जिनके चित्तमें सदा मैत्रीका भाव बना रहता है , जो सब प्राणियोंपर निरन्तर दयाभाव बनाये रहते हैं ,वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जानेके अधिकारी हैं । जो ज्ञानवान् , क्रियावान् , क्षमावान् , सुहृद् प्रेमी , धर्माधर्मके ज्ञाता और शुभाशुभ कर्मोंके फल - संग्रहके प्रति उदासीन रहते हैं , जो पापियोंको त्याग देते , देवताओं और द्विजोंकी सेवामें संलग्न रहते एवं गुरुजनोंके आनेपर खड़े होकर उनका स्वागत करते हैं , वे मानव स्वर्गलोकमें जाते हैं देवि ! जो लोग शुभकर्मोंके फलस्वरूप स्वर्गमार्गपर जाते हैं , उनका मैंने वर्णन किया । अब तुम और क्या सुनना चाहती हो ?

पार्वतीजी बोलीं- महेश्वर ! मेरे मनमें मनुष्योंके सम्बन्धमें एक और महान् संशय है । अतः उसका भलीभाँति समाधान करें । प्रभो ! मनुष्य किस कर्मसे इस पृथ्वीपर बड़ी आयु प्राप्त करता है ? और किस कर्मसे उसकी आयु क्षीण जाती है ? आप कर्मोंके परिणामका वर्णन करे I

शिवजी बोले- देवि ! कर्मोंका फल जैसे होता है , उसका वर्णन करता हूँ; सुनो। मर्त्यलोकमें सब मनुष्य अपने - अपने कर्मोंका फल भोगते जो मनुष्य सदा हाथमें डंडा लेकर दूसरोंके प्राणोंका संहार करता , सर्वदा हथियार उठाकर प्राणियोंकी हिंसा किया करता , सब जीवोंके प्रति निर्दय बना रहता , सदा सबको उद्वेगमें डालता , कीट और पतङ्गोंको भी शरण नहीं देता और अत्यन्त निष्ठुरतापूर्ण बर्ताव करता है , वह नरकमें पड़ता है । इसके विपरीत जो धर्मात्मा होता है , उसे अपने स्वरूपके अनुरूप ही गति मिलती है । हिंसक नरकमें और अहिंसक स्वर्गमें जाता है। नरकगामी मनुष्य नरकमें पड़कर अत्यन्त दुस्सह एवं भयंकर यातना भोगता है । जो कोई कभी उस नरकसे निकलता है , यदि मनुष्य योनिमें आता है तो भी वहाँ उसकी आयु बहुत थोड़ी होती है । देवि ! जो शुभकर्म हुए जीवन व्यतीत करता है , प्राणियोंकी हिंसासे दूर रहता है , जो शस्त्र और दण्डका त्याग करके कभी किसीकी हिंसा नहीं करता, न मरवाता ,न मारता है और न मारनेवालेका अनुमोदन ही करता है , जिसका सभी प्राणियोंके प्रति स्नेह है तथा जो अपने और परायेमें समान भाव रखता है , ऐसा पुरुष सदा देवपदको प्राप्त होता है । देवि! वह अपने शुभ कर्मोंसे प्राप्त देवोचित सुख भोगोंका प्रसन्नतापूर्वक उपभोग करता है । वह यदि कभी मनुष्यलोकमें आता है तो उसकी बड़ी आयु होती है। यह बड़ी आयुवाले सदाचारी एवं पुण्यात्मा मनुष्योंका मार्ग है। जीवोंकी हिंसाका त्याग करने इसकी प्राप्ति होती है , यह ब्रह्माजीका कथन है।

 पार्वतीजीने पूछा- भगवन् ! कैसे शील और सदाचारवाला पुरुष किन कर्मों अथवा किस दानसे स्वर्गमें जाता?

 महादेवजी बोले- जो ब्राह्मणका सत्कार करनेवाला तथा दीन-दुःखी और कृपण आदिको भक्ष्य , भोज्य , अन्न , पान एवं वस्त्र देनेवाला है यज्ञमण्डप , धर्मशाला , पौंसला तथा पुष्करिणी बनवाता है , मन और इन्द्रियोंको वश में करके शुद्धभावसे नित्य नैमित्तिक आदि कर्म करता है, आसन, शय्या , सवारी , घर , रत्न , धन , खेतकी उपज तथा खेत आदि वस्तुओंका सदा शान्त चित्तसे करता है , देवि ! ऐसा मनुष्य देवलोकमें जन्म लेता है। वहाँ दीर्घकालतक उत्तम भोगोंका उपभोग करते हुए नन्दन आदि वनोंमें अप्सराओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक विहार करता है । देवि ! वहाँसे च्युत होनेपर वह मनुष्योंके सौभाग्यशाली कुलमें , जो - धान्यसे सम्पन्न होता है , जन्म लेता है ।वह मानव समस्त मनोवाञ्छित गुणोंसे युक्त , प्रसन्न , प्रचुर भोग- सामग्रियों से सम्पन्न एवं धनवान् होता पार्वती ! जो दानशील महाभाग प्राणी हैं , ब्रह्माजी उन्हें सर्वप्रिय बतलाया है । इनके सिवा दूसरे मनुष्य हैं , जो देनेमें कृपण होते हैं । वे मूर्ख घरमें रहते हुए भी किसीको अन्न नहीं देते। दीनों, अन्धों, कृपणों, दुःखियों , याचकों और अतिथियोंको देखकर मुँह फेर लेते हैं । उनके याचना करते रहनेपर भी अनसुनी करके पीछे लौट जाते हैं । कभी किसीको धन , वस्त्र , भोग , स्वर्ग , गौ और भाँति - भाँतिके खाद्य पदार्थ नहीं देते । जो लोभी नास्तिक और दानरहित होते हैं , वे अज्ञानी मनुष्य नरकमें पड़ते हैं । कालचक्रके परिवर्तनसे उन्हें जब कभी मनुष्य योनिमें आना पड़ता है , तब वे निर्धन- कुलमें जन्म पाते हैं । बुद्धि भी उनकी बहुत थोड़ी होती है। यहाँ वे भूख - प्यासका कष्ट सहते हैं। सब लोग उन्हें समाजसे बहिष्कृत किये रहते हैं । वे सब भोगोंसे निराश हो पापपूर्ण वृत्तिसे जीवन निर्वाह करते हैं । उनका जन्म ऐसे कुलमें होता है , जहाँ भोग - सामग्री बहुत थोड़ी होती है ; अतः वे अल्पभोगपरायण होते हैं । देवि इस प्रकार दान न करनेसे मनुष्य निर्धन होते हैं उनसे भिन्न अन्य मनुष्य दम्भी और अभिमानी होते हैं । वे मन्दबुद्धि मानव आसन देने योग्य गुरुजनके आनेपर उन्हें पीढ़ातक नहीं देते । जिन्हें स्वयं किनारे हटकर जानेके लिये मार्ग देना उचित है , उनके लिये वे अज्ञानी मार्ग नहीं देते । जो लोग अर्घ्य पाने योग्य हैं , उनका वे विधिपूर्वक पूजन नहीं करते । उन्हें पाद्य अथवा आचमनीय भी नहीं देते । अभीष्ट एवं श्रेष्ठ गुरुजनसे भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं करते । अभिमानके साथ ही बढ़े हुए लोभके वशीभूत होकर वे माननीय पुरुषोंका भी अनादर और बड़े - बूढ़ोंका तिरस्कार करते हैं । देवि ! ऐसे स्वभाववाले सभी मनुष्य नरकमें जाते हैं। यदि वे कभी उस नरकसे छुटकारा पाते तो बहुत वर्षोंतक अन्यान्य योनियोंमें भटकनेके बाद घृणित,अज्ञानी, चाण्डाल आदिके निन्दित कुलमें जन्म पाते हैं । गुरुजनों और वृद्ध पुरुषोंको संताप देनेवाले लोगोंकी यही गति होती है । जो न दम्भी है न मानी है , जो देवता और अतिथियोंका पूजक , लोकपूज्य , सबको नमस्कार करनेवाला , मधुरभाषी , सब प्रकारकी चेष्टाओंसे दूसरोंका प्रिय करनेवाला, समस्त प्राणियोंको सदा प्रिय माननेवाला , द्वेषरहित , प्रसन्नमुख , कोमलस्वभाव सबसे स्वागतपूर्वक स्नेहमय वचन बोलनेवाला ,प्राणियोंकी हिंसा न करनेवाला , श्रेष्ठ पुरुषों का विधिवत् सत्कारपूर्वक पूजन करनेवाला , मार्ग देने योग्य पुरुषोंको मार्ग देनेवाला , गुरुपूजक और अतिथिको अन्नका अग्रभाग अर्पित करनेवाला है , ऐसा पुरुष स्वर्गमें जाता है । मनुष्य अपने किये हुए कर्मोंका फल स्वयं ही भोगता है । यह साक्षात् ब्रह्माजीका बताया हुआ धर्म है , जिसका मैंने वर्णन किया है। जिसका आचरण निर्दयतापूर्ण होता है , जो सब प्राणियोंके मनमें भय उपजाता है , हाथ , पैर , रस्सी , डंडा , ढेला , खंभा अथवा अन्य साधनोंसे जीवोंको कष्ट देता है , हिंसाके लिये उद्वेग पैदा करता है , जीवोंपर आक्रमण करता और उन्हें उद्विग्न बनाता है , ऐसे स्वभाव और आचरणवाला मनुष्य नरकमें पड़ता है । वह यदि कालक्रमसे मनुष्य योनिमें जाता है तो अधम कुलमें जन्म लेता है , जहाँ उसे नाना प्रकारकी बाधाएँ और क्लेश सहन करने पड़ते हैं । वह अधम मनुष्य अपने किये हुए कर्मोंके फलस्वरूप सब लोकोंका द्वेषपात्र होता है । इसके विपरीत जो सब प्राणियोंको दयापूर्ण दृष्टिसे देखता है , सबके प्रति मैत्रीभाव रखता है , पिताके समान निर्वैर होता है, दयालु होनेके कारण प्राणियोंको न डराता है और न मारता ही है , जिसके हाथ - पैर वशमें होते हैं , जो सम्पूर्ण जीवोंका विश्वासपात्र है , रस्सी , डंडा , ढेला अथवा अस्त्र - शस्त्रोंसे किसी भी जीवको उद्वेग नहीं पहुँचाता , शुभ कर्म करता और सबपर दया रखता है , ऐसे शील और आचरणवाला मनुष्य स्वर्गमें जाता है । वहाँ देवताओंकी भाँति वह दिव्य भवनमें सानन्द निवास करता है । वह यदि पुण्यक्षयके पश्चात् मर्त्यलोकमें आता है तो क्लेशरहित निर्भय होता है । वह सुखसे जन्म लेता और अभ्युदयशील होता है । सुखका भागी तथा उद्वेगशून्य होता है। सुखकाभागी तथा उद्वेगशून्य देवि ! यह साधु पुरुषोंका मार्ग है , जहाँ किसी प्रकारकी बाधा नहीं है ।

पार्वतीजीने पूछा- भगवन् ! कुछ मनुष्य ऊहापोहमें कुशल दिखायी देते हैं ; अतः कृपया बताइये – किस कर्मसे मनुष्य बुद्धिमान् होते हैं तथा जो लोग जन्मसे ही अन्धे , रोगी तथ नपुंसक देखे जाते हैं , उनके वैसे होनेमें क्या कारण है बतानेकी कृपा करें ।

महादेवजी बोले- जो लोग वेदवेत्ता , सिद्ध तथा धर्मज्ञ ब्राह्मणोंसे प्रतिदिन शुभाशुभ कर्म पूछते - हैं और अशुभका त्याग करके शुभ कर्मका सेवन करते हैं , वे इस लोकमें सुखसे रहते और अन्तमें स्वर्गगामी होते हैं । ऐसे लोग जब फिर कभी मनुष्य योनिमें आते हैं , तब बुद्धिमान् होते जिसका वेदाध्ययन यज्ञानुष्ठानमें सहायक होता वह कल्याणका भागी होता है । जो परायी स्त्रियोंपर कुदृष्टि डालते हैं , वे उस दुष्ट स्वभावके कारण जन्मान्ध होते हैं । जो दूषित मनसे परायी स्त्रीको नंगी देखते हैं , वे पापी मनुष्य इस लोकमें रोगसे पीड़ित होते हैं । जो मूर्ख और दुराचारी मानव पशु आदिके साथ मैथुन करते हैं , वे मानव नपुंसक होते हैं । जो पशुओंको बाँधे रखते और गुरुपत्नी गमन करते हैं , वे मनुष्य भी नपुंसक होते हैं ।

 पार्वतीजीने पूछा- देवश्रेष्ठ ! कौन - सा कर्म । अनिन्द्य है ? क्या करनेसे मनुष्य कल्याणका भागी होता है ?

 महादेवजी बोले- जो कल्याणमय मार्गकी इच्छा रखता हुआ सदा ब्राह्मणोंसे उसकी जिज्ञासा करता है , जो धर्मका अन्वेषण और गुणोंकी अभिलाषा करता है , वह स्वर्गमें जाता है । देवि यदि कभी वह फिर मनुष्य योनिमें आता है तो मेधावी और धारणाशक्तिसे युक्त होता है । यह सत्पुरुषोंका धर्म सबका कल्याण करनेवाला है अतः इसीपर चलना चाहिये । यह मैंने मनुष्यों के हित के लिए बतलाया हैI

 पार्वतीजीने पूछा- भगवन् ! कुछ लोग व्रत और तपसे भ्रष्ट एवं राक्षसके समान देखे जाते हैं और कुछ मनुष्य यज्ञपरायण दृष्टिगोचर होते हैं; यह किस कर्मविपाकका फल है ?

महादेवजीने कहा – देवि ! लोकधर्मके प्रतिपादक शास्त्र और प्राचीन मर्यादाको प्रमाण मानकर जो उसका अनुसरण करते हैं , वे दृढ़संकल्प एवं यज्ञतत्पर देखे जाते हैं । परंतु जो मोहके वशीभूत हो अधर्मको ही धर्म बताते हैं , वे व्रत और मर्यादाका लोप करनेवाले मानव ब्रह्मराक्षस होते हैं । उन्हींमेंसे जो लोग काल-क्रमसे यहाँ फिर मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं , वे होम और वषट्कारसे शून्य एवं मनुष्योंमें अधम होते हैं । देवि ! मैंने तुम्हारे संदेहका निवारण करनेके लिये यह मनुष्योंके शुभाशुभ कर्मका निरूपण किया है ।