ब्रह्म पुराण

8 - क्रोष्टु आदिके वंशका वर्णन तथा स्यमन्तकमणिकी कथा

लोमहर्षणजी कहते हैं - क्रोष्टु के गान्धारी और माद्री दो पत्नियाँ थीं। गान्धारी ने महाबली अनमित्र को जन्म दिया तथा माद्री के युधाजित् एवं देवमीढुष्- ये दो पुत्र हुए; इन तीनों का वंश पृथक्-पृथक् चला, जो वृष्णिकुल की वृद्धि करनेवाला था। माद्री के दो पुत्र और सुने जाते हैं- वृष्णि तथा अन्धक। वृष्णि के भी दो पुत्र थे- श्वफल्क और चित्रक। श्वफल्क बड़े धर्मात्मा थे। वे जहाँ रहते, वहाँ रोग का भय नहीं होता तथा वहाँ अवृष्टि कभी नहीं होती थी। एक बार काशीनरेश के राज्य में पुरे तीन वर्षों तक इन्द्र ने वर्षा नहीं की; तब उन्होंने श्वफल्क को बुलवाया और उनका बड़ा आदर-सत्कार किया। श्वफल्क के वहाँ पहुँचते ही इन्द्र ने वृष्टि आरम्भ कर दी। काशिराज के एक कन्या थी, जिसका नाम गान्दिनी रखा गया था। वह प्रतिदिन ब्राह्मण को एक गौ दान किया करती थी, इसीलिये उसका ऐसा नाम पड़ा था। वह श्वफल्क को पत्नी रूप में प्राप्त हुई और उसके गर्भ से अक्रूर का जन्म हुआ, जो दानी, यज्ञकर्ता, वीर, शास्त्रज्ञ, अतिथिप्रेमी तथा अधिक दक्षिण देनेवाले थे। इनके अतिरिक्त उपमद्रु, मद्रु, मेदुर, अरिमेजय, अविक्षित, आक्षेप, शत्रुघ्न, अरिमर्दन, धर्मधृक्, यतिधर्मा, धर्मोक्षा, अन्धकरू, आवाह तथा प्रतिवाह नामक पुत्र एवं वराङ्गना नामकी सुन्दरी कन्या हुई। अक्रूर के उग्रसेन कन्या सुगात्री  के गर्भ से प्रसेन और उपदेव नामक दो पुत्र हुए, जो देवताओं के समान कान्तिमान् थे।

चित्र के  पृथु, विपृथु, अश्वग्रीव, अश्वबाहु, स्वपार्श्वक, गवेषण, अरिष्टनेमि, अश्व, सुधर्मा, धर्मभृत्, सुबाहु तथा बहुबाहु नामक पुत्र एवं श्रविष्ठा और श्रवणा नाम की दो कन्याएँ हुईं। देवमीढुष् ने असिक्नी नामकी पत्नी के गर्भ सेशूर नामक पुत्र उत्पन्न किया। शूरसे रानी भोज्या के गर्भ से दस पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें सबसे पहले महाबाहु वसुदेव उत्पन्न हुए, जिन्हें आनकदुन्दुभि भी कहते हैं। उनके जन्म लेने के बाद देवलोक में दुन्दुभियाँ बजी थीं और आनकों (मृदङ्गों)- की गम्भीर ध्वनि हुई थी; इसलिये उनका नाम आनकदुन्दुभि पड़ गया था। उनके जन्म-काल में फूलों की वर्षा भी हुई थी। समस्त मानव-लोक में उनके समान रूपवान् दूसरा कोई नहीं था। नरश्रेष्ठ वसुदेव की कान्ति चन्द्रमा के समान थी। वसुदेव के बाद क्रमशः- देवभाग, देवश्रवा, अनाधृष्टि, कनवक, वत्सवान्, गञ्जम, श्याम, शमीक और गण्डूष उत्पन्न हुए। शूर के पाँच सुन्दरी कन्याएँ भी हुईं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- पृथुकीर्ति, पृथा, श्रुतदेवा, श्रुतश्रवा तथा राजाधिदेवी। ये पाँचों वीर पुत्रों की जननी हुईं। वृष्णि के छोटे पुत्र अनमित्र से शिनि का जन्म हुआ। शिनि के पुत्र सत्यक हुए। सत्यक से सात्य कि उत्पन्न हुए, जिनका दूसरा नाम युयुधान था। देवभाग के पुत्र महाभाग उध्दव हुए। गण्डूष के कोई पुत्र नहीं था, अत: विष्वक्सेन ने उन्हें अनेक पुत्र दिये। उनके नाम इस प्रकार हैं- चारुदेष्ण, सुदेष्ण तथा सर्वलक्षणसम्पन्न पञ्चाल आदि। उन सबमें छोटे थे- महाबाहु रौक्मिणेय, जो युद्ध से कभी पीछे नहीं हटते थे। कनवक के दो पुत्र हुए- तन्त्रिज और तन्त्रिपाल। गृञ्जम के भी दो पुत्र थे- वीरू और अश्वहनु। श्याम के पुत्र शमीक थे। शमीक राजा हुए। उन्होंने राजसूययज्ञ किया था, उनके पुत्र अजातशत्रु हुए।

अब वसुदेव के वीर पुत्रों का वर्णन करूँगा। वृष्णिवंश की अनेक शाखाएँ हैं। जो उसका स्मरण करता हैं, उसे कभी अनर्थ की प्राप्ति नहीं होती। वसुदेव जी के चौदह सुन्दरी पत्नियाँ थीं। पुरुवंश की कन्या रोहिणी, मदिरादि, वैशाखी, भद्रा, सुनाम्नी, सहदेवा, शान्तिदेवा, श्रीदेवी, देवरक्षिता, वृकदेवी, उपदेवी तथा देवकी- ये बारह तो राजकुमारियाँ थीं और सुतनु तथा बड़वा- यह दो दासियाँ थीं ज्येष्ठ पत्नी रोहिणी ने, जो बाह्लिक की पुत्री थी, वसुदेवजी से ज्येष्ठ पुत्र के रूप में बलरामजी को प्राप्त किया। तत्पश्चात् उनके गर्भ से शरण्य, शठ, दुर्दम, दमन, शुभ्र, पिण्डारक और उशीनर नामक पुत्र तथा चित्रा नामकी कन्या हुई। इस प्रकार रोहिणी की नौ संतानें थीं। चित्रा ही आगे चलकर सुभद्रा के नाम से विख्यात हुई। वसुदेव के देवकी के गर्भ से महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण अवतीर्ण हुए। बलराम के रेवती के गर्भ से निशठ उत्पन्न हुए, जो माता-पिता के बड़े लाड़ले थे। सुभद्रा के अर्जुन के सम्बन्ध से महारथी अभिमन्यु उत्पन्न हुआ। वसुदेवजी की परम सौभाग्यशालिनी सात पत्नियों से जो पुत्र उत्पन्न हुए, उनके नाम बतलाता हूँ; सुनो। शान्तिदेवा के भोज और विजय, सुनामा के वृकदेव और गद तथा त्रिगर्तराजकन्या वृकदेवी के महात्मा अगावह नामक पुत्र हुए।

क्रोष्टु के एक और पुत्र महायशस्वी वृजिनीवान् हुए। उनके पुत्र स्वाहि थे। स्वाहि के पुत्र राजा उषद्रु हुए, जिन्होंने प्रचुर दक्षिणावाले अनेक महायज्ञों का अनुष्ठान किया था। उषद्रुके पुत्र चित्ररथ हुए, चित्ररथ के शशबिन्दु, शशबिन्दु के पृथुश्रवा, पृथुश्रवा के अन्तर, अन्तर के सुयज्ञ तथा सुयज्ञ के उषत् हुए। उषत् का अपने धर्म के प्रति बड़ा आदर था। उषत् के पुत्र शिनेयु, शिनेयु के मरुत्, मरुत् के कम्बलबर्हिष् के रुक्मकवच, रुक्मकवच के परजित् तथा परजित् के पाँच पुत्र हुए- रुक्मेषु, पृथुरुक्म, ज्यामघ, पालित तथा हरि। पालित और हरि को पिता ने विदेह प्रान्त की रक्षा में नियुक्त कर दिया। रुक्मेषु पृथुरुक्म की सहायता से राजा हुए। इन दोनों भाइयों ने राजा ज्यामघ को घर से निकाल दिया। तब वे वन में आश्रम बनाकर रहने लगे। उस समय शान्तिपरायण राजा को ब्राह्मणों ने बहुत कुछ समझाया। तब वे धनुष लेकर रथ पर आरूढ हो दूसरे देश में गये। अकेले ही नर्मदा के तटपर जाकर उन्होंने मेकला, मृत्तिकावती तथा ऋक्षवान् पर्वत को जीतकर शुक्तिमती नगरी में निवास किया। ज्यामघ की पत्नी शैब्या थी, जो पतिव्रता होने के साथ ही बड़ी प्रबल थी। यद्यपि राजा को कोई पुत्र नहीं था, तथापि उन्होंने पत्नी के भय से दूसरी स्त्री से विवाह नहीं किया। एक बार किसी युद्ध में विजयी होने पर उन्हें एक कन्या मिली। उसे रथपर बैठी देख स्त्री ने पूछा- 'यह कौन है?' तब वे डरकर बोले- 'यह तुम्हारी पुत्रवधू है।' यह सुनकर रानी बोली- 'मेरे तो कोई पुत्र नहीं, फिर यह किसकी पत्नी होने से पुत्रवधू हुई?' यह सुनकर ज्यामघ ने कहा- 'तुम्हें जो पुत्र उत्पन्न होगा, उसके लिये यह पत्नी प्रस्तुत की गयी है।' तत्पश्चात् रानी शैब्या ने कठोर तपस्या करके एक विदर्भ नामक पुत्र उत्पन्न किया। उसका विवाह उक्त राजकन्या से हुआ। उसके गर्भ से क्रथ और कौशिक नामक पुत्र उत्पन्न हुए। वे दोनों बड़े ही शूर तथा युद्धविशारद थे। उसके बाद विदर्भ के भीम नामक पुत्र हुआ। उसके पुत्र का नाम कुन्ति हुआ। कुन्ति से धृष्टका जन्म हुआ, जो संग्राम में धृष्ट और प्रतापी था। धृष्ट के आवन्त, दशार्ह तथा विषहर नामक तीन पुत्र हुए, जो बड़े धर्मात्मा और शूरवीर थे। दशार्ह के व्योमा और व्योमा के पुत्र जीमूत बतलाये जाते हैं। जीमूत के विकृति, विकृति के भीमरथ, भीमरथ के नवरथ और नवरथ के पुत्र दशरथ हुए। दशरथ के पुत्र का नाम शकुनि था। शकुनि से करम्भ तथा करम्भ से देवरात का जन्म हुआ। देवरात के पुत्र देवक्षत्र तथा देवक्षत्र के महायशस्वी वृद्धक्षत्र हुए। वे देवकुमार के समान कान्तिमान् थे। इनके सिवा मधुरभाषी राजा मधुका भी जन्म हुआ, जो मधुवंश के प्रवर्तक थे। मधु के उनकी  पत्नी वैदर्भी से नरश्रेष्ठ पुरुदवान् की उत्पत्ति हुई। मधु की दूसरी पत्नी इक्ष्वाकुवंश की कन्या थी। उससे सर्वगुणसम्पन्न सत्त्वान् हुए, जो सात्त्वत कुलकी कीर्ति को बढ़ाने वाले थे।

सत्त्वान् से सत्त्वगुणसम्पन्ना कौसल्या ने भजमान, देवावृध, अन्धक तथा वृष्णि नामक पुत्र उत्पन्न किये। इनके चार कुल यहाँ विस्तारपूर्वक बतलाये गयेहैं। भजमान के दो स्त्रियाँ थीं। एक का नाम था बाह्यकससृञ्जयी और दूसरी का उपबाह्यकसृञ्जयी। उन दोनों के गर्भ से बहुत-से पुत्र हुए। क्रिमि, क्रमण, धृष्ट, शूर तथा पुरञ्जय- ये भजमान के बाह्यकससृञ्जयी से उत्पन्न हुए पुत्र थे बाह्यकससृञ्जयी अयुताजित्, सहस्त्राजित्, शताजित् और दासक- ये भजमान द्वारा उपबाह्यकसृञ्जयी के गर्भ से उत्पन्न हुए पुत्र थे। राजा देवावृध यज्ञपरायण रहते थे। उन्होंने सर्वगुणसम्पन्न पुत्र होने के उद्देश्य से भारी तपस्या की। तपस्या में संलग्न होकर वे पर्णाशाके जलका आचमन करते थे। सदा ऐसा ही करने के कारण उस नदीने उनका प्रिय करना चाहा। कल्याणमय नरेश देवावृध के अभीष्ट की सिद्धि कैसे हो- इस चिन्ता में देरतक पड़ी रहने पर भी पर्णाशा सहसा किसी निश्चय पर न पहुँच सकी। उसे ऐसी कोई स्त्री नहीं मिली, जिसके गर्भ से वैसा सुयोग्य पुत्र उत्पन्न हो सके। तब उसने यह निश्चय किया कि मैं स्वयं ही चलकर इनकी सहधर्मिणी बनूँगी। यह विचारकर पर्णाशा ने एक परम सुन्दरी कुमारी का रूप धारण करके राजा को पतिरूप में वरण किया। राजा ने भी उसकी कामना की। तदनन्तर उन उदारबुद्धि नरेश ने उसमें एक तेजस्वी गर्भ की स्थापना की। तत्पश्चात् दसवें महीने में पर्णाशाने देवावृध के सर्वगुणसम्पन्न पुत्र बभ्रु को जन्म दिया। इस वंश के विषय में पुराणों के ज्ञाता देवावृध के गुणों का बखान करते हुए निम्नाङ्कित प्रसिद्ध गाथा का गान करते हैं। 'हम जैसे आगे देखते हैं, वैसे ही दूर और निकट भी देखते हैं। हमारी दृष्टि में बभ्रु सब मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं और देवावृध तो देवताओं के तुल्य हैं। बभ्रु और देवावृध के समपर्क में आकर एक हजार चौहत्तर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त हो चुके हैं।'

बभ्रु का वंश बहुत बड़ा था। उसमें सब-के-सब यज्ञपरायण, महादानी, बुद्धिमान्, ब्राह्मणभक्त तथा सुद्रढ़ आयुध धारण करनेवाले थे। मृत्तिकावतीपुरी में भोजवंश के क्षत्रिय रहते थे। अन्धकसे काश्य की कन्या ने चार पुत्र प्राप्त किये- कुकुर, भजमान, शशक और बलबर्हिष्। कुकुर के पुत्र वृष्टि, वृष्टि के कपोतरोमा, कपोतरोमा तित्तिरि, उसके पुनर्वसु, पुनर्वसु के अभिजित् तथा अभिजित् के आहुक एवं श्राहुक नाम दो जुडवाँ पुत्र हुए। इनके विषय में ऐसी गाथा प्रसिद्ध है- 'आहुक किशोरावस्था के समान आकृतिवाले थे। वे अस्सी कवच धारण किये हुए अपने श्वेतवर्णवाले परिवार के साथ पहले यात्रा करते थे। जो भोजवंशी आहुक के दोनों ओर चलते थे, उनमें से कोई ऐसा नहीं था, जो पुत्रवान् न हो, सौसे कम दान करता हो, हजार या सौसे कम आयुवाला हो, अशुद्ध कर्म करता हो अथवा यज्ञ न करता हो। भोजवंशी आहुक की पूर्व दिशा में इक्कीस हजार हाथी चलते थे, जिनपर सोने-चाँदी के हौदे कसे होते थे। उत्तर दिशा में भी उनकी उतनी ही संख्या होती थी। भोजवंशी प्रत्येक भूपाल की भुजा में धनुष की प्रत्यञ्चाके चिह्न होते थे। अन्धकवंशियों ने अपनी बहिन आहुकी का विवाह अवन्तीनरेश से किया था।' आहुक के काश्या गर्भ से देवक और उग्रसेन नामक दो पुत्र हुए। देवक के चार पुत्र थे- देववान्, उपदेव, संदेव तथा देवरक्षक। इनके सिवा सात कन्याएँ भी थीं, जिनका विवाह वसुदेवजी के साथ हुआ। इनके नाम इस प्रकार हैं- देवकी, शान्तिदेवा, सुदेवा, देवरक्षिता, वृकदेवी, उपदेवी और सुनान्मी। उग्रसेन के नौ पुत्र थे, जिनमें कंस बड़ा था। उससे छोटे न्यग्रोध, सुनामा, कङक, सुभूषण, राष्ट्रपाल, सुतनु, अनावृष्टि तथा पुष्टिमान् थे। इनकी पाँच बहिनें थीं- कंसा, कंसवती, सुतनु, राष्ट्रपाली तथा कङ्का। यहाँ तक कुकुरवंशी उग्रसेन और उनकी संतानों का वर्णन हुआ।

भजमान के पुत्र विदूरथ हुए, जो रथियों में प्रधान थे। विदूरथ के शूरवीर राजाधिदेव हुए। राजाधिदेव के पुत्र बड़े पराक्रमी थे। उनके नाम इस प्रकार हैं- दत्त, अतिदत्त, शोणाश्व, शवेतवाहन, शमी, दण्डशर्मा, दन्तशत्रु तथा शत्रुजित्। इन सबकी दो बहिनें थी, जो श्रवणा और श्रविष्ठा के नाम से विख्यात हुईं। शमी के पुत्र प्रतिक्षत्र थे, प्रतिक्षत्र के पुत्र स्वयम्भोज, स्वयम्भोज से हृदीक हुए। हृदीक के बहुत-से पुत्र हुए, जो भयानक पराक्रम करनेवाले थे। उनमें कृतवर्मा सबसे ज्येष्ठ और शतधन्वा मध्यम था। शेष भाइयों के नाम इस प्रकार हैं- देवान्त, नरान्त,भिषग्, वैतरण, सुदान्त, अतिदान्त, निकाश्य और कामदम्भक। देवान्त के पुत्र विद्वान् कम्बलबर्हिष् हुए। उनके दो पुत्र थे- असमौजा तथा तामसौजा। असमौजा के कोई पुत्र नहीं हुआ; अत: उन्हें सुदंष्ट्र, सुचारू और कृष्ण- ये पुत्र गोद में प्राप्त हुए। इस प्रकार अन्धकवंशी क्षत्रियों का वर्णन किया गया।

ऊपर कह आये हैं कि क्रोष्टु के दो पत्नियाँ थीं- गान्धारी और माद्री। गान्धारी ने महाबली अनमित्र को जन्म दिया और माद्री ने युधाजित् को। अनमित्र के निघ्न हुए। निघ्न के दो पुत्र थे- प्रसेन और सत्राजित्। यह दोनों ही शत्रुसेना को परास्त करनेवाले थे। भगवान् सूर्य सत्राजित् के प्राणोपम सखा थे। एक दिन रात्रि बीतनेपर रथियों में श्रेष्ठ सत्राजित् रथपर आरूढ हो स्नान एवं सूर्योपस्थान करने के लिये जलके किनारे गये। वहाँ पहुँचकर जब वे सूर्योपस्थान करने लगे, उस समय भगवान् सूर्य तेजोमण्डल से युक्त स्पष्ट दिखायी देनेवाला रूप धारण करके उनके आगे प्रकट हो गये। तब राजा सत्राजित् ने सामने खड़े हुए सूर्यदेव से कहा- 'प्रभो! आप जिसके द्वारा सदा सम्पूर्ण लोकों को प्रकाशित करते हैं, वह मणिरत्न मुझे देने की कृपा करें।' उनके यों कहने पर भगवान् भास्कर ने उन्हें दिव्य स्यमन्तकमणि प्रदान की। सत्राजित् ने उसे गले में पहनकर अपने नगर में प्रवेश किया। उन्हें देखकर सब लोग यों कहते हुए दौड़ने लगे- 'यह देखो, सूर्य जा रहे हैं।' इस प्रकार नगर के लोगों को आश्चर्य में डालकर वे अन्त:पुर में पहुँचे। सत्राजित् ने वह उत्तम मणि अपने छोटे भाई प्रसेनजित् को दे दी, क्योंकि उसको वे बहुत प्यार करते थे। वह मणि अन्धकवंशी यादवों के घर मेंसुवर्ण उत्पन्न करती थी। वह जहाँ रहती, उसके निकटवर्ती जनपदों में मेघ समयपर वर्षा करता तथा किसीको रोग का भय नहीं रहता था। एक बार भगवान् श्रीकृष्ण ने प्रसेन के सम्मुख वह स्यमन्तक नामक मणिरत्न लेने की इच्छाप्रकट की; किन्तु उसे वे नहीं पा सके। समर्थ होनेपर भी भगवान् ने उसका बलपूर्वक अपहरण नहीं किया।

एक दिन प्रसेन उस मणिरत्न से विभूषित हो वन में शिकार खेलने के लिये गये। वहाँ स्यमन्तक के लिये ही एक सिंह के हाथ से मारे गये। सिंह उस मणि को मुख में दबाये भागा जा रहा था। इतने में ही महाबली ऋक्षराज जाम्बवान् उधर आ निकले। वे सिंह को मारकर मणिरत्न ले अपनी गुफा में चले गये। इधर वृष्णि और अन्धक-वंश के लोग यह संदेह करने लगे कि हो-न-हो श्रीकृष्ण ने ही मणि के लिए प्रसेन का वध किया है; क्योंकि उन्होंने एक बार वह मणि प्रसेन से माँगी थी। भगवान् श्रीकृष्ण ने यह कार्य नहीं किया था तो भी उनपर संदेह किया गया; अत: अपने कलंका मार्जन करने के लिये वे मणिको ढूँढ़ लाने की प्रतिज्ञा करके वन में गये। कुछ विश्वसनीय पुरुषों के साथ प्रसेन के चरण- चिह्नों का पता लगाते हुए वे उस स्थान पर गये, जहाँ प्रसेन शिकार खेल रहे थे। गिरिवर ऋक्षवान् तथा उत्तम पर्वत विन्ध्य पर उनका अन्वेषण करते हुए वे लोग थक गये। अन्त में श्रीकृष्ण ने एक स्थान पर घोड़े सहित मरे हुए प्रसेन की लाश देखि, किन्तु वहाँ मणि नहीं मिली। तदनन्तर थोड़ी ही दूरपर ऋक्ष के द्वारा मारे गये सिंह का शरीर दिखायी पड़ा। ऋक्ष अपने चरण-चिह्नों से पहचाना गया। उन्हीं चिह्नों के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण जाम्बवान् की गुफा के द्वार पर पहुँचे। वहाँ उन्हें बिल के भीतर से किसी धाय की कही हुई यह वाणी सुनायी दी- 'मेरे सुकुमार बच्चे! तू मात रो। सिंह ने प्रसेन को मारा और सिंह जाम्बवान् के हाथ से मारा गया। अब यह स्यमन्तकमणि तेरी ही है।'

यह आवाज सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण ने उस गुफा के द्वार पर बलरामजी के साथ अन्य यादवों को बिठा दिया और स्वयं उन्होंने गुफा के भीतर प्रवेश किया। बिल के भीतर जाम्बवान् दिखायी दिये। भगवान् वासुदेव ने लगातार इक्कीस दिनों तक उनके साथ बाहुयुद्ध किया। इसी बीच में बलदेव आदि यादव द्वारका लौट गये और सबको श्रीकृष्ण के मारे जाने की सुचना दे दी। इधर भगवान् वासुदेव ने महाबली जाम्बवान् को परास्त करके उनकी कन्या जाम्बवती को उन्हीं के अनुरोध से ग्रहण किया। साथ ही अपनी सफाई देने के लिये वह स्यमन्तकमणि भी ले ली। तत्पश्चात् ऋक्षराज कीअभ्यर्थना करके वे बिल से निकले और विनीत सेवकों के साथ द्वारका में गये। वह सब यादवों से भरी हुई सभा में श्रीकृष्ण ने वह मणि सत्राजित् को दे दी। इस प्रकार मिथ्या कलङ्क लगनेपर भगवान् श्रीकृष्ण ने स्यमन्तकमणि को ढूँढ़ निकला और उसे देकर अपने ऊपर आये हुए कलङ्क का मार्जन किया। सत्राजित् दस पत्नियाँ थीं। उनके गर्भ से उन्हें सौ पुत्र प्राप्त हुए, जिनमें तीन अधिक प्रसिद्ध थे- भंगकार, वातपति और वसुमेध। सत्राजित् के तीन कन्याएँ भी थीं, जो सब दिशाओं में विख्यात थीं- सत्यभामा, व्रतिनी तथा प्रस्वापिनी। इनमें सत्यभामा सबसे उत्तम थीं। उसका विवाह पिता ने श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। जो भगवान् श्रीकृष्ण के इस मिथ्या कलङ्क का श्रवण करता है, उसे मिथ्या कलङ्क कभी स्पर्श नहीं करते।

     श्रीकृष्ण ने सत्राजित् को जो स्यमन्तकमणि दी थी, उसका अक्रूरने भोजवंशी शतधन्वा के द्वारा अपहरण करा दिया। महाबली शतधन्वा सत्राजित् को मारकर वह मणि ले आया तथा अक्रूर को दे दी। अक्रूर ने उस उत्तम रत्न को लेते हुए शतधन्वा से प्रतिज्ञा करा ली कि 'मेरा नाम न बताना'

पिता के मारे जाने पर मनस्विनी सत्यभामा दु:ख से आतुर हो उठी और रथ पर आरुढ़ हो वारणावत नगर में गयी। वहाँ अपने स्वामी श्रीकृष्ण को शतधन्वा की सारी करतूतें बतलाकर उनके पास खड़ी हो आँसू बहाने लगी। तब भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही द्वारका आ पहुँचे और अपने बड़े भाई बलरामजी से बोले- 'प्रभो! प्रसेन को तो सिंह ने मार डाला और सत्राजित् को शतधन्वाने। अब स्यमन्तकमणि मेरे अधिकार में आनेवाली है। अब में ही उसका उत्तराधिकारी हूँ; इसलिये शीघ्र ही रथपर बैठिये और महारथी शतधन्वा को मरकर मणि छीन लीजिये। महाबाहो! अब स्यमन्तक हम लोगों का ही होगा।' तदनन्तर शतधन्वा और श्रीकृष्ण में घोर युद्ध हुआ। शतधन्वा सब ओर अक्रूर के आने की बाट देखने लगा। वह और भगवान् श्रीकृष्ण दोनों ही एक-दूसरे पर कुपित हो रहे थे। जब अक्रूर ने साथ नहीं दिया, तब शतधन्वा ने भयभीत हो भाग जाने का विचार किया। उसके पास हृदया नाम की एक घोड़ी थी, जो सौ योजना चलती थी। वह उसी पर आरुढ़ हो श्रीकृष्ण से युद्ध कर रहा था। सौ योजना का मार्ग वेग से तै करने के कारण वह घोड़ी थककर शिथिल हो गयी। यह देख भगवान् श्रीकृष्ण ने बलरामजी से कहा- 'महाबाहो! आप यहीं खड़े रहें। मैंने उस घोड़ी की कमजोरी देख ली है। अब तो मैं पैदल ही जाकर मणिरत्न स्यमन्तक को छीन लाउँगा।' यह कहकर भगवान् पैदल ही शतधन्वा के पास गये और मिथिला के समीप उन्होंने उसका वध कर डाला, परन्तु उसके पास स्यमन्तक नहीं दिखायी दिया। महाबली शतधन्वा को मारकर जब श्रीकृष्ण लौटे, तब बलरामजी ने कहा- 'मणि मुझको दे दो।' भगवान् श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया- 'मणि नहीं मिली।' कुछ दिन के बाद नरश्रेष्ठ अक्रूर अन्धकवंशी वीरों के साथ द्वारका में लौट आये। भगवान् श्रीकृष्ण ने योग के द्वारा यह जान लिया कि मणि वास्तव में अक्रूर के ही पास है। तब उन्होंने सभा में बैठकर अक्रूर से कहा- 'आर्य! मणिश्रेष्ठ स्यमन्त आपके हाथ लग गया है। उसे मुझे दे दीजिये। उसकी प्रतीक्षा में बहुत समय व्यतीत हो चुका है।'

सम्पूर्ण यादवों की सभा में श्रीकृष्ण के यों कहनेपर महामति अक्रूरजी ने बिना किसी कष्ट के वह मणि दे दी। सरलता से उसकी प्राप्ति हो जाने पर भगवान् श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने वह मणि फिर अक्रूर को ही लौटा दी। भगवान् श्रीकृष्ण के हाथ से प्राप्त हुए मणिरत्न स्यमन्तक को गले में पहनकर अक्रूर सूर्य की भाँति प्रकाशित होने लगे।