नारदजी ने कहा - सुरश्रेष्ठ! एक ही गङ्गाके आपने दो भेद बतलाये हैं। एक तो वह है, जो गौतम नामक ब्राह्मणके द्वारा लाया गया और दूसरा अंश भगवान् शंकरकी जटा में ही रह गया, जिसे क्षत्रिय राजा भगीरथ ले आये। अत:उसीका प्रसङ्ग मुझे सुनाइये।
ब्रह्माजी बोले - देवर्षि! वैवस्वत मनुके वंशमें राजा इक्ष्वाकुके कुल में सगर नाम के एक अत्यन्त धार्मिक राजा हो गये हैं। वे यज्ञ करते, दान देते और सदा धार्मिक आचार-विचारसे रहते थे। उनके दो पत्नियाँ थीं। वे दोनों ही पतिभक्ति-परायणा थीं, किन्तु उनमेंसे किसी को भी संतान न हुई। इसलिये राजा के मनमें बड़ी चिन्ता थी। एक दिन उन्होंने महर्षि वसिष्ठको अपने घर बुलाया और विधिपूर्वक उनकी पूजा करके पूछा- 'किस उपायसे मुझे संतान होगी?' उनकी यह बात सुनकर महर्षि वसिष्ठ ने कुछ कालतक ध्यान किया। उसके बाद राजा से कहा- 'राजन्! तुम पत्नीसहित सदा ऋषि-महर्षियोंका सेवन करते रहो।' यों कहकर महर्षि वसिष्ठ अपने आश्रमको चले गये। एक समयकी बात है- राजर्षि सगरके घरपर एक तपस्वी महात्मा पधारे। राजा ने उन महर्षिका पूजन किया। इससे संतुष्ट होकर वे बोले- 'महाभाग! वर माँगो।' यह सुनकर राजा ने पुत्र होनेके लिए प्रार्थना की। मुनि बोले- 'तुम्हारी एक पत्नीके गर्भसे एक ही पुत्र होगा, किन्तु वह वंशधर होगा; और दूसरी स्ट्राइक गर्भसे साठ हजार पुत्र उत्पन्न होंगे।' वरदान देकर जब मुनि चले गये, तब उनके कथनानुसार यथासमय रजा के हजारों पुत्र हुए। राजा सगरने उत्तम दक्षिणासे युक्त बहुतेरे अश्वमेध-यज्ञके लिए उन्होंने विधिपूर्वक दीक्षा ग्रहण की और अश्वकी रक्षाके लिए सेनासहित अपने पुत्रोंको नियुक्त किया। अश्व पृथ्वीपर भ्रमण करने लगा। इसी बीच में कहीं अवसर पाकर इन्द्रने उस अश्वको हर लिया और रक्षकोंको सौंप दिया। राजकुमार घोड़े को इधर-उधर ढूँढ़ने लगे, परन्तु कहीं भी वह उन्हें दिखायी न दिया। तब उन्होंने देवलोकमें जाकर ढूँढा, पर्वतों और सरोवरों में खोजा और कितने ही जङ्गल छान डाले; मगर कहीं भी उसका पता न लगा। इसी समय आकाशवाणी हुई- 'सगरपुत्रो! तुम्हारा घोड़ा रसातल में बँधा है और कहीं नहीं है।' यह सुनकर वे रसातलमें जानेके लिए सब ओर से पृथ्वीको खोदने लगे। क्षुधासे पीड़ित होनेपर वे सूखी मिट्टी खाते और दिन-रात भूमि खोदते रहते। इस प्रकार वे शीघ्र ही रसातलमें जा पहुँचे। सगरके बलवान् पुत्रोंको वहाँ आया सुनकर राक्षस थर्रा उठे और उनके वधका उपाय करने लगे। वे बिना युद्ध किये ही भयभीत हो उस स्थानपर आये, जहाँ महामुनि कपिल सो रहे थे। कपिलजीका क्रोध बड़ा प्रचण्ड था। राक्षसों ने वह घोड़ा ले जाकर तुरंत कपिलजी के सिरहाने की ओर बाँध दिया और स्वयं चुपचाप दूर खड़े होकर देखने लगे कि अब क्या होता है। इतने में ही सगरके पुत्र रसातल में घुसकर देखते हैं कि घोड़ा बँधा है और पास ही कोई पुरुष सो रहा है। उन्होंने कपिलजीको ही अश्व चुराकर यज्ञ में विघ्न डालनेवाला माना और यह निश्चय किया कि इस महापापीको मारकर हमलोग अपना अश्व महाराजके निकट ले चलें। कोई बोले- 'अपना पशु बँधा है, इसे ही खोलकर ले चलें। इस सोये हुए पुरुष को मरनेसे क्या लाभ।' यह सुनकर दूसरे बोल उठे- 'हम शूरवीर राजा हैं, शासक हैं। इस पापीको उठायें और क्षत्रियोचित तेजसे इसका वध कर डालें।' फिर क्या था, वे मुनिको कटु वचन सुनते हुए लातोंसे मारने लगे।
इससे मुनिश्रेष्ठ कपिलको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने सगरपुत्रों की ओर रोषपूर्ण दृष्टिसे देखा और भस्म कर डाला। वे सब-के-सब जलकर राख हो गये। नारद! यज्ञ में दीक्षित महाराज सगरको इन सब बातों का पता न लगा। उस समय तुमने ही जाकर सगर को यह सब समाचार सुनाया। इससे राजा को बड़ी चिंता हुई। अब क्या करना चाहिये, यहे बात उनकी समझ में न आयी। राजा सगर के एक दूसरा पुत्र भी था, जिसका नाम असमञ्जा था। वह मूर्खतावश नगर के बालकोंको उठाकर पानी में फेंक देता था। तब पुरवासियों ने एकत्रित होकर राजा सगरको इस बात की सूचना दी। पुत्रका यह अन्याय जानकर महाराजको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अपने अमात्योंसे कहा- 'यह असमञ्जा बालकोंकी हत्या करनेवाला तथा क्षत्रियधर्मका त्यागी है। अत: यह इस देशका त्याग कर दे।' महाराजका यह आदेश सुनकर अमात्यों ने राजकुमारको तुरंत देशनिकला दे दिया। असमञ्जा वन में चला गया। अब राजा सगर चिंता करने लगे कि 'हमारे सब पुत्र ब्राह्मणके शापसे रसातलमें नष्ट हो गये। एक बचा था, वह भी वन में चला गया। इस समय मेरी क्या गति होगी?'
असमञ्जा के एक पुत्र था, जो अंशुमान् नामसे विख्यात हुआ। यद्यपि अंशुमान् अभि बालक था तो भी राजा ने उसे बुलाकर अपना कार्य बतलाया। अंशुमान् ने भगवान् कपिल की आराधना की और घोड़ा ले आकर राजा सगरको दे दिया। इससे वह यज्ञ पूर्ण हुआ। अंशुमान् के तेजस्वी पुत्र का नाम दिलीप था। दिलीपके पुत्र परम बुद्धिमान् भगीरथ हुए। भगीरथ ने जब अपने समस्त पितामहोंकी दुर्गतिका हाल सुना, तब उन्हें बड़ा दु:ख हुआ। उन्होंने नृपश्रेष्ठ सगर से विनयपूर्वक पूछा- 'महाराज! उन सबका उद्धार कैसे होगा?' राजा ने उत्तर दिया- 'बेटा! यह तो भगवान् कपिल ही जानते हैं।' यह सुनकर बालक भागीरथ रसातलमें गये और कपिलको नमस्कार करके अपना सब मनोरथ उन्हें कह सुनाया। कपिल मुनि बहुत देरतक ध्यान करके बोले- 'राजन्! तुम तपस्याद्वारा भगवान् शंकरकी आराधना करो और उनकी जटामें स्थित गङ्गाके जल से अपने पितरों की भस्मको आप्लावित करो। इससे तुम तो कृतार्थ होगे ही, तुम्हारे पितर भी कृतकृत्य हो जायँगे।' यह सुनकर भगीरथ ने कहा- 'बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा। मुनिश्रेष्ठ! बताइये, मैं कहा जाऊँ और कौन-सा कार्य करूँ?'
कपिलजी बोले - नरश्रेष्ठ! कैलासपर्वतपर जाकर महादेवजी की स्तुति करो और अपनी शक्तिके अनुसार तपस्या करते रहो। इससे तुम्हारे अभीष्टकी सिद्धि होगी।
मुनिका यह वचन सुनकर भगीरथने उन्हें ओर्नाम किया और कैलासपर्वत की यात्रा की। वहाँ पहुँचकर पवित्र हो बालक भागीरथने तपस्याका निश्चय किया और भगवान् शंकरको सम्बोधित करके इस प्रकार कहा- 'प्रभो! में बालक हूँ, मेरी बुद्धि भी बालककी ही है और आप भी अपने मस्तकपर बाल चन्द्रमाको धारण करते हैं। में कुछ भी नहीं जनता। आप मेरे इस अनजानपनसे ही प्रसन्न होइये। अमरेश्वर! जो लोग वाणी से, मन से और क्रियासे कभी मेरा उपकार करते हैं तथा हितसाधन में संलग्न रहते हैं, उनका कल्याण करने के लिये मैं उमासहित आपको प्रणाम करता हूँ। आप देवता आदि के लिए भी पूज्य हैं। जिन पूर्वजोंने मुझे अपने सगोत्र और समानधर्माके रूप में उत्पन्न किया और पाल-पोसकर बड़ा बनाया, भगवान् शिव उनका अभीष्ट मनोरथ पूर्ण करें। में बालचन्द्रका मुकुट धारण करनेवाले भगवान् शंकर को नित्य प्रणाम करता हूँ।'
भगीरथके यों कहते ही भगवान् शिव उनके सामने प्रकट हो गये और बोले- 'महामते! तुम निर्भय होकर कोई वर माँगो। जो वस्तु देवताओंके लिये भी सुलभ नहीं है, वह भी मैं तुम्हें निश्चय ही दे दूँगा।' यह आश्वासन पाकर भागीरथने महादेवजी को प्रणाम किया और प्रसन्न होकर कहा -'देवेश्वर! आपकी जटा में जो सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गा विराजमान हैं, उन्हें ही मेरे पितरोंका उद्धार करनेके लिए दे दीजिये। इससे मुझे सब कुछ मिल जाएगा।' तब महेश्वरने हँसकर- 'बेटा! मैंने तुम्हें गङ्गा दे दी। अब तुम उनकी स्तुति करो।' महादेवजी का वचन सुनकर भागीरथने गङ्गाजी की प्राप्तिके लिए भारी तपस्या की और मनको संयममें रखकर भक्तिपूर्वक गङ्गाका स्तवन किया। बालक होनेपर भी भगीरथने अबालकोचित पुरुषार्थ करके गङ्गाजी की भी कृपा प्राप्त की। महादेवजीसे प्राप्त हुई गङ्गा को पाकर उन्होंने उनकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर कहा- देवि! महामुनि कपिलके शापसे मेरे पितर दुर्गतिमें पड़े हुए हैं। माता! आप उनका उद्धार करें।'
देवनदी गङ्गा सबका उपकार करनेवाली हैं। वे स्मरणमात्र से सब पापोंका नाश कर देती हैं। उन्होंने भगीरथ की प्रार्थना सुनकर 'तथास्तु' कहा और लोकोंका उपकार एवं पितरोंका उद्धार करनेके लिये भगीरथके कथनानुसार सब कार्य किया। राजा सगरके जो पुत्र भस्म होकर रसतम में पड़े थे, उन्हें अपने जलसे आप्लावित करके गङ्गाजी ने उनके खोदे हुए गड्ढेको भर दिया। महामुने! इस प्रकार तुम्हें क्षत्रिया गङ्गाका वृत्तान्त सुनाया। ये माहेश्वरी, वैष्णवी, ब्रह्ममी, पावनी, भागीरथी, देवनदी तथा हिमगिरिशिखराश्रया (हिमालयकी चोटीपर रहनेवाली) आदि नामों से पुकारी जाति हैं।इस प्रकार महादेवजी की जटामें स्थित गङ्गाका जल दो स्वरूपोंमें विभक्त हुआ। विन्ध्यगिरिके दक्षिणभाग में जो गङ्गा हैं, उन्हें गौतमी गोदावरी) कहते हैं और विन्ध्यगिरिके उत्तरभाग में स्थित गङ्गा भागीरथी कहलाती हैं।
Summary of chapter 37 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The famous narrative of Dakṣa's sacrifice and its destruction is narrated. Dakṣa, father of Satī (Śiva's first wife), holds a great yajña to which he deliberately does not invite Śiva. Satī, consumed by grief at this insult to her husband, immolates herself in the sacrificial fire. Śiva, overcome with fury, sends Vīrabhadra and a great host of gaṇas who destroy the sacrifice, wound and kill many Devas, and wreak cosmic havoc.