23 - दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति

 दक्ष बोले - देवदेवश्वर! आपको नमस्कार है। अन्धकासुरको मारनेवाले रूद्र! आपको प्रणाम है। देवेन्द्र! आप बलमें श्रेष्ठ और देवता तथा दानवोंद्वारा पुजित हैं।* आप सहस्त्राक्ष१, विरूपाक्ष२, और त्र्यक्ष३ कहलाते हैं। यक्षराज कुबेर के आप इष्टदेव हैं। आपके हाथ और पैर सब ओर हैं। नेत्र, मस्तक और मुख भी सब ओर हैं। आपके सब ओर कान हैं। आप संसार में सबको व्याप्त करके स्थित हैं। शङ्कुकर्ण४, महाकर्ण५, कुम्भकर्ण६, अर्णवालय७, गजेन्द्रकर्ण८. गोकर्ण९, शतकर्ण१०, शतोदर११, शतावर्त१२, शतजिह्व१३ और सनातन हैं। आपको नमस्कार है। गायत्री के उपासक आपका ही गान करते हैं। सूर्य के भक्त आपकी ही सूर्यरूप से अर्चना करते हैं। आप देवता और दानवों के राक्षस, ब्रह्मा तथा इन्द्र हैं। आप मूर्तिमान्, महामूर्ति और जल के भंडाररूप समुद्र हैं। जैसे गोशालामें गौएँ रहती हैं, उसी प्रकार आप में सम्पूर्ण देवता निवास करते हैं। आपके शरीर में मैं चन्द्रमा, अग्नि, वरुण, सूर्य, विष्णु, ब्रह्मा तथा बृहस्पति को देखता हूँ। क्रिया, कारण, कार्य, कर्ता, कारण, असत्. सदसत्, उत्पत्ति तथा प्रलय भी आप ही हैं। भाव (सृष्टिकर्ता), शर्व, रूद्र (रुलानेवाले), वरद, पशुपति, अन्धकासुरघाती, त्रिजट, त्रिशीर्ष, त्रिशूलशारी, त्र्यम्बक, त्रिनेत्र और त्रिपुरनाशक आप भगवान् शिव को नमस्कार है।

आप चण्ड (अत्यन्त क्रोधी), मुण्ड (सिर मुँड़ाये हुए), प्रचण्ड विश्वको धारण करनेवाले, दण्डी, शङकुकर्ण तथा दण्डीदण्ड दण्डधारियों को भी दण्ड देनेवाले) हैं आपको नमस्कार है। आप अर्धचण्डिकेश (अर्द्धनारीश्वर, शुष्क, विकृत, विलोहित, ध्रूम और नीलग्रीव हैं। आपको नमस्कार है। आप अप्रतिरूप हैं- आपके समान दूसरा कोई नहीं है। आपको नमस्कार है। आप विरूप (विकराल रूपवाले) होते हुए भी शिव (कल्याणमय) हैं। आप ही सूर्य और उनके स्वामी हैं। आपकी ध्वजा और पताकामें सूर्य के चिह्न हैं। आपको नमस्कार है। प्रमथगणों के स्वामी आपको नमस्कार है। आपके कंधे वृषभके कंधे के समान मांसल हैं। आपको नमस्कार है। आप हिरण्यगर्भ एवं हिरण्यकवच हैं। आपको नमस्कार है। आप हिरण्य (सुवर्ण)- की चूड़ा धारण करनेवाले और हिरण्यपति हैं। आपको नमस्कार है। आप शत्रुओं के घातक, अत्यन्त क्रोधी तथा पत्तों के समूहपर शयन करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आपकी स्तुति की गयी है, इस समय भी आपकी स्तुति की जाती है तथा आप ही स्तुतिस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। आप सर्वस्वरूप, सर्वभक्षी एवं सब भूतों के अंतरात्मा हैं। आपको नमस्कार है।*

आप ही होम और मन्त्र हैं। आपकी ध्वजापताका श्वेत रंग की है, आपको नमस्कार है। आप ही अनम्य और आप ही नमन करने के योग्य हैं। आप हर्षमग्न होकर किलकारियाँ भरनेवाले हैं आपको नमस्कार है। सोते हुए, सोये हुए, सोकर उठे हुए, खड़े हुए और दौड़ते हुए आपको नमस्कार है। कुबड़े और कुटिलरूप में आपको नमस्कार है। आप सदा ताण्डव नृत्य करनेवाले और मुख से बाजा बजानेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप बाधा निवारण करनेवाले, लुब्ध एवं गाना-बजाना करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। ज्येष्ठ और श्रेष्ठ रूप में आपको नमस्कार है। बलका मन्थन करनेवाले आपको नमस्कार है। उग्र रूपवाले आपको सदा नमस्कार है। दस भुजाओंवाले आपको नित्य प्रणाम है। हाथ में कपाल धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। श्वेत भस्म आपको अधिक प्रिय है। आप भयभीत करनेवाले, भयंकर एवं कठोर व्रत धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है।

आपका मुख नाना प्रकार से विकृत है, जिह्वा तलवार के समान है और दाँत बड़े भयंकर हैं। पक्ष, मास और लवार्ध आदि कालके भेद आपके ही स्वरुप हैं। आपको तूँबी और वीणा बहुत ही प्रिय है। आपको नमस्कार है। आपका रूप घोर और अघोर दोनों ही है। आप घोर और अघोरतर हैं; ऐसे होते हुए भी आप शिव, शान्त तथा अत्यन्त शान्त हैं। आपको नमस्कार है। शुद्ध बुद्धिरूप आपको नमस्कार है। सबको बाँटना आप अधिक पसंद करते हैं। आप पवन, सूर्य एवं सांख्यपरायण हैं। आप एक प्रचण्ड घण्टा धारण करनेवाले और घण्टा-ध्वनिके समान बोलनेवाले हैं। आपके पास बराबर घण्टा रहा करता है। आप लाखों घण्टेवाले हैं।घण्टोंकी माला आपको अधिक प्रिय है। मैं आपको प्रणामकरता हूँ।आप प्राणोंको दण्ड देनेवाले, नित्य एवं लोहितरूप हैं। आपको नमस्कार है। आप हूं-हूं करनेवाले, रूद्र एवं भगाकारप्रिय हैं। आपको नमस्कार है। आपका कहीं पार नहीं है। आप सदा पर्वतीय वृक्षोंको अधिक पसंद करते हैं। आपको नमस्कार है। यज्ञों के अधिपतिरूप में आपको नमस्कार है। आप भूत एवं प्रस्तुत (वर्तमान)-रूप हैं। आपको नमस्कार है। आप यज्ञवाहक, जितेन्द्रिय, सत्यस्वरुप, भग, तट, तटपर होने योग्य तथा तटिनीपति (समुद्र) हैं। आपको नमस्कार है। आप अन्नदाता, अन्न्पति औत अन्नके भोगी हैं। आपको नमस्कार है। आपके सहस्त्रों मस्तक और सहस्त्रों चरण हैं। आप सहस्त्रों शूल उठाये रहनेवाले और सहस्त्रों नेत्रोंवाले हैं। आपको नमस्कार है। आपका वर्ण उदयकालीन सूर्य के समान लाल है। आप बालकरूप धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप बालसूर्यस्वरुप हैं और काल आपका खिलौना है। आपको नमस्कार है। आप शुद्ध, बुध, क्षोभण तथा क्षयरूप हैं। आपको नमस्कार है।*

आपके केश गङ्गाजी की तरङ्गो से अङ्कित रहते हैं। आप अपने मस्तक के बाल खुले रहते हैं। आप [संध्यादि] छ: कर्मों में निष्ठा रखनेवाले हैं तथा [सृष्टि आदि] तीन कर्मों का निरन्तर पालन करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप वर्णों और आश्रमों के पृथक्-पृथक् धर्म की विधिपूर्वक प्रवृत्ति करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप श्रेष्ठ, ज्येष्ठ तथा पक्षियोंके समान कलकल शब्द करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आपके नेत्र स्वेत, पीले, काले और लाल रंगवाले हैं। आप धर्म, काम, अर्थ, मोक्ष, क्रथ (संहार), क्रथन (संहारकर्ता), सांख्य, सांख्यप्रधान और योगके अधिपति हैं। आपको नमस्कार है। आप रथ-संचारयोग्य सड़कसे रथपर बैठकर चलते हैं। चौराहा आपका मार्ग है। आपको नमस्कार है। आप काला मृगचर्म ओढ़ते और सर्पका यज्ञोपवीत पहनते हैं। ईशान! आप रूद्रसमुदायरूप हैं। हरिकेश (पीले केशवाले)! आपको नमस्कार है। व्यक्ताव्यक्तस्वरुप अम्बिकनाथ! आप त्रिनेत्रधारीको नमस्कार है। काल और कामदेवके मदको इच्छानुसार चूर्ण करनेवाले तथा दुष्टों और उद्दण्डों का नाश करनेवाले महेश्वर! आपको नमस्कार है। सबके द्वारा निदिन्त और सबके संहारक सद्योजात! आपको नमस्कार है। दूसरों को उन्मत्त बनानेवाले सैकड़ों आवर्तों से युक्त शिव! आपके मस्तक के बाल गङ्गाजी के जल से भीगे रहते हैं। आपको नमस्कार है। चन्द्रार्धसंयुगावर्त और मेघवार्त नाम से पुकारे जानेवाले! आपको नमस्कार है। चन्द्रार्धसंयुगावर्त और मेघावर्त नाम से पुकारे हानेवाले! आपको नमस्कार है। आप अन्न-दान करनेवाले, अन्नदाताओं के प्रभु, अन्नभोक्ता और रक्षक हैं। आपको नामस्कार है। आप ही प्रलयकालीन अग्नि हैं। देवदेवेश्वर! आप ही जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उभ्दिज्ज-ये चार प्रकार के जीव हैं। चराचर जगत् की सृष्टि और संहार करनेवाले भी आप ही हैं।

विश्वेश्वर! आप ही ब्रह्मा हैं। जल में स्थित जो ब्रह्म है, उसे आपका ही स्वरुप बतलाते हैं। आप ही सबकी परम योनि हैं। चन्द्रमा और ज्योतिके भण्डार भी आप ही हैं। ब्रह्मवादी महर्षि आपको ही ऋक्, साम तथा ॐकार कहते हैं। सामगान करनेवाले ब्रह्मवेत्ता तथा श्रेष्ठ देवता 'हायि हायि हरे हायि हुवा हाव' आदि साम-ऋचाओंका निरन्तर उच्चारण करते हुए आपका ही यशोगान करते हैं। आप ही यजुर्वेद, ऋग्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेदमय हैं। ब्रह्मवेत्ता कल्प और उपनिषदादिके समूहों से आपके ही स्वरुप का अध्ययन करते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि जो-जो वर्ण और आश्रम हैं, वह सब आप ही हैं। बिजलीकी चमक, मेघकी गर्जना, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, कला, काष्ठा, निमेष, नक्षत्र और युग- सब आपके ही स्वरुप हैं। बैलों के ककुद (थूहे) और पर्वतों के शिखर भी आप ही हैं।* आप मृगों में मृगराज सिंह, सर्पों में तक्षक और शेषनाग, समुद्रों में क्षीरसागर, मन्त्रों में प्रणव, सहस्त्रों में वज्र और व्रतों में सत्य हैं। आप ही इच्छा, तराग, द्वेष, मोह, शान्ति, क्षमा, व्यवसाय (दृढ निश्चय), धैर्य, लोभ, काम, क्रोध, जय और पराजय हैं। आप गदा, बाण, धनुष, ख्टवाङ्ग और मुद्रर धारण करनेवाले हैं। आप ही छेदन, भेदन और प्रहार करनेवाले हैं। नेता और मन्ता (आदर देनेवाले) भी आप ही माने गये हैं। [मनुक्त] दस लक्षणोंवाला धर्म, अर्थ एवं काम भी आपके ही स्वरुप हैं। चन्द्रमा, समुद्र, नदी, छोटा तालाब, सरोवर, लता,बेल, घास, अन्न, पशु, मृग और पक्षी भी आप ही हैं। द्रव्य, कर्म और गुणों का आरम्भ भी आपसे ही होता है। आप ही समयपर फूल और फल देनेवाले हैं। आदि, अन्त, मध्य, गायत्री और ॐकार भी आप ही हैं।

हरा, लाल, काला, नीला, पीला, अरुण, चितकब्रा, कपिल, बभ्रु (भूरा), फाखता और श्याम आदि रंग भी आप ही हैं। आप सुवर्णरेता (अग्नि)-के नामसे विख्यात हैं। आप ही सुवर्ण माने गये हैं। सुवर्ण आपका नाम है और सुवर्ण आपको प्रिय है। आप ही इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, वायु, प्रज्वलित अग्नि, स्वर्भानु (राहु) और भानु (सूर्य) हैं। होता (हवन करनेवाले), होत्र (हवन) और प्रभु भी आप ही हैं। त्रिसौपर्ण ऋचा और यजुर्वेदका शतरुद्रिय आपका ही स्वरुप है। आप पवित्रों में पवित्र तथा मङ्गल हैं। आप ही प्राण, रजोगुण, तमोगुण तथा सत्त्वगुण हैं। प्राण, अपान, समान, उड़ान, व्यान, उन्मेष-निमेष (आँखका खोलना-मीचना), भूख, प्यास तथा जृम्भा (जँभाई) हैं। आप लोहिताङ्ग (लाल शरीरवाले), दंष्ट्री (दाढ़ोंवाले), महावक्त्र (बड़े मुखवाले), महोदर (बड़े पेटवाले), शुचिरोमा (पवित्र रोयेंवाले), हरिच्छ् मश्रु (पीली दाढ़ी-मूँछवाले), ऊर्ध्वकेश (ऊपर उठे हुए केशवाले) तथा चलाचल (स्थावर-जङ्गम) हैं। गीत, वाद्य और नृत्य आपके ही अङ्ग हैं। गाना-बजाना आपको बहुत प्रिय है। आप ही मत्स्य, उसे जीवन देनेवाले जल और उसे फँसानेवाले जाल हैं। आपको कोई जीत नहीं सकता। आप जलव्याल (पानी में रहने वाले साँप और कुटीचर (एकान्तवासी गृहस्थ) हैं। आप ही विकाल (विपरीत काल), सुकाल, दुष्काल तथा कालनाशक हैं। मृत्यु, अक्षय एवं अन्त भी आप ही हैं। आप क्षमा, माया एवं किरणों का प्रसार करनेवाले हैं।

आप संवर्त (प्रलयकाल), वर्तक (नित्य विद्यमान), संवर्तक (प्रलयकालीन) और बलाहक (मेघ) हैं। आप घण्टा धारण करने के कारण घण्टा की, घण्टकी और घण्टी कहलाते हैं। मस्तकपर चोटी धारण करते हैं। खारे पानी का समुद्र आपका ही स्वरुप है।* आप ब्रह्मा हैं। आपके मुख में कालाग्निका निवास है। दण्ड धारण करनेवाले, सिर मुँडाये रहनेवाले तथा त्रिदण्ड धारण करनेवाले यति आपके ही स्वरूप हैं। चारों युग, चारों वेद, चार प्रकार के होता और चौराहा आप ही हैं। चारों आश्रमों के नेता और चारों वर्णों की उत्पत्ति करनेवाले भी आप ही हैं। क्षर (विनाशी), अक्षर (अविनाशी), प्रिय, धूर्त, गणों द्वारा गणनीय एवं गणपति भी आप ही हैं। आप लाल रंग की माला और वस्त्र धारण करते हैं। पर्वत एवं वाणी के स्वामी हैं। पार्वतीजी के प्रियतम हैं। शिल्पकारों के स्वामी, शिल्पियों में श्रेष्ठ तथा समस्त शिलपकारों के प्रवर्तक हैं। आपने ही भगके नेत्रों का विनाश किया है। आप अत्यन्त क्रोधी हैं। पूषा के दाँत भी आपने ही तोड़े हैं। स्वाहा, स्वधा, वषट्कार और नमस्कार- सब आप ही हैं। आपको नमस्कार है। आपका व्रत गूढ़ रहता है। आप स्वयं भी गूढ़ हैं तथा गूढ़ व्रतका आचरण करनेवाले महापुरुष सदा आपकी सेवा में रहते हैं। आप ही तरने और तारनेवाले हैं। सब भूतों में आप ही संचालकरूप से स्थित हैं। धाता (धारण करनेवाले), विधाता (विधान करनेवाले), संधाता (जोड़नेवाले), निधाता (बीज डालनेवाले), धारण, धार, तप, ब्रह्म, सत्य, ब्रह्मचर्य तथा आर्जव (सरलता) आपके ही नाम हैं। आप सम्पूर्ण भूतों के आत्मा, सब भूतों को उत्पन्न करनेवाले, भूतस्वरुप, बहुत, भविष्य तथा वर्तमानके उभ्दावक, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, भूत, अग्नि और महेश्वर हैं। ब्रह्मावर्त, सुरावर्त और कामावर्त आपके नाम हैं। आपको नमस्कार है। आप कामदेव के विग्रहको दग्ध करनेवाले हैं। कर्णिकार (कनेर) पुष्पोंकी माला आपको अधिक प्रिय है। आप गौओं के नेता, गोप्रचारक (इन्द्रियों के संचालक) तथा गौओं के स्वामी नन्दीपर सवारी करनेवाले हैं।

तीनों लोकों की रक्षा आपके ही हाथों में है। गोविन्द (गोरक्षक), गोपालक और गौओं के मार्ग भी आप ही हैं। आपका मुख पूर्ण चन्द्रके समान आह्लादक है। आप सुन्दर मुखवाले हैं। जिनका मुख सुन्दर नहीं है, जो मुख से रहित हैं, जिनके चार या अनेक मुख हैं तथा जो सदा युद्ध में सम्मुख डटे रहते हैं, वे सब भी आपके ही स्वरुप हैं। आप हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शकुनि (वाज), धनद ( धन देनेवाले), धनके स्वामी, विराट्, अधर्मका नाश करनेवाले, महादक्ष, दण्डधारी तथा युद्धके प्रेमी हैं। खड़े रहनेवाले, स्थिर, स्थाणु, निष्कम्प, अत्यन्त निश्चल, दुर्वारण (कठिनता से निवारण किये जाने योग्य), दुर्विषह (असह्य), दुस्सह और दुरतिक्रम (दुर्लङ्घ्य) हैं। आपको धारण करना या वश में लाना कठिन है। आप नित्य दुर्दम्य (कठिनतासे दमन करने योग्य), विजय एवं जय हैं। आप शश (खरगोश)- रूप हैं। चन्द्रमा आपके नेत्र हैं। आप एक ही साथ शीत और उष्ण दोनों ही धारण करते हैं। क्षुधा, तृषा, बुढ़ापा, आधि (मानसिक पीड़ा) और व्याधि भी आप ही हैं। व्याधि के नाशक और पालक भी आप ही हैं। आप सहन करने योग्य, यज्ञरुपी मृगके मारनेवाले व्याध, व्याधियों के आकर (भंडार) तथा अकर (कुछ भी न करनेवाले) हैं। आप शिखण्डी (मोरपंखधारी), पुण्डरीक (कमलरूप) तथा पुण्डरीकलोचन हैं। दण्डधृक्१, चक्रदण्ड२, तथा रौद्रभागाविनाशन३ - ये सब आपके ही नाम हैं।* आप विष, अमृत, देवपेय, दुग्ध, सोम, मधु, जल तथा सब कुछ पान करनेवाले हैं। बल और अबल सब आप ही हैं।

आप धर्ममय वृषभके शरीरपर सवार होने योग्य हैं, वृषभस्वरुप हैं। आपके नेत्र वृषभके नेत्रों समान हैं। आप वृषभ के नाम से लोक में विख्यात हैं। सम्पूर्ण लोक आपका संस्कार (पूजन और अभिषेक) करता है। शिव! चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र, ब्रह्माजी हृदय, अग्निष्टोम शरीर और धर्मकर्म श्रृङ्गार हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा प्राचीन ऋषि भी आपके माहात्म्यको यथार्थरूप से जाननेमें समर्थ नहीं हैं। भगवन्! आपकी कल्याणमयी एवं सूक्ष्म जो मूर्तियाँ है, उनका मुझे दर्शन हो। आप उन मूर्तियों के द्वारा मेरी सब ओर से रक्षा करें- ठीक वैसे ही, जैसे पिता अपने और से पुत्र की रक्षा करता है। अघन! आपको नमस्कार है। मैं रक्षा करने योग्य हूँ। आप मेरी रक्षा करें। आप भक्तों पर कृपा करनेवाले भगवान् हैं और मैं सदा ही आपमें भक्ति रखता हूँ।

जो खोटी दृष्टि रखनेवाले अनेक सहस्त्र पुरुषों को अपनी माया से आवृत करके अकेले ही समुद्र के भीतर निवास करते हैं, वे भगवान् प्रतिदिन मेरे रक्षक हों। निद्रासे रहित, प्राणों को वश में रखनेवाले, सत्त्वगुणमें स्थित, समदर्शी योगिजन योगाभ्यास करते समय जिनके ज्योतिर्मय स्वरुप का दर्शन करते हैं, उन योगात्मा को नमस्कार है। जो प्रलयकाल उपस्थित होनेपर सम्पूर्ण भूतोंको अपना ग्रास बनाकर जलके भीतर शयन करते हैं, उन भगवान् जल्शायीकी मैं शरण लेता हूँ। जो रात्रि में राहुके मुख में प्रवेश करके चन्द्रमा का अमृत पीते हैं और केतु बनकर सूर्य को भी ग्रस लेते हैं तथा जो अग्नि और सोमस्वरुप हैं, उन भगवान्की मैं शरण लेता हूँ। समस्त देहधारियों की देहों में स्थित, अँगूठेके बराबर आकारवाले जितने भी जीवात्मा हैं, वे सब आपके ही स्वरुप हैं; अत: वे सदा मेरी रक्षा करें और सदा मुझे तृप्त बनाये रखें। जो अभी उत्पन्न नहीं हुए हैं तथा जो जलके भीतर स्थित हैं, उन सब गर्भों को जिनसे स्वाहा (पुष्टि) प्राप्त होती है तथा जिनकी कृपा से उन्हें स्वधा (स्वादिष्ट रस)- का आस्वादन सुलभ होता है, जो शरीर के भीतर रहकर स्वयं नहीं रोते और प्राणियों को रुलाते हैं, जो सबको हर्ष प्रदान करते, किन्तु स्वयं हर्षका अनुभव नहीं करते, उन सबको शिवरूप में सदा-सर्वदा नमस्कार है।

जो समुद्र, नदी, दुर्गम स्थान, पर्वत, गुफ़ा, वृक्षों की जड़, गोशाला, अगम्य पथ, गहन वन, चौराहा, सड़क, सभा, गजशाला, अश्वशाला, राथशाला, प्राचीन वाटिका, पुराने घर, पाँचों भूत, दिशा, विदिशा, इन्द्र और सूर्यके मध्य, चन्द्रमा और सूर्य की किरण तथा रसातलमें जो शिवस्वरुप जीव रहते हैं और उन स्थानों से परे जिनकी स्थिति है, उन सबको सब प्रकार से नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।* भगवन्! आप सर्वस्वरुप, सर्वव्यापी देवता, सम्पूर्ण भूतों के स्वामी, सबकी उत्पत्ति के कारण तथा सम्पूर्ण भूतों के अन्तरात्मा हैं। इसीलिये आपको पृथक् निमन्त्रित नहीं किया गया। देव! भाँति-भाँति की दक्षिणावाले यज्ञों द्वारा आपका ही यजन किया जाता है। आप ही सबके कर्ता-धर्ता हैं, इसलिये आपको मैंने निमन्त्रित नहीं किया। अथवा देव! आपकी सूक्ष्म- दुर्बोध माया से मैं मोहित था। इसी कारण आपको निमन्त्रण नहीं दिया। देवेश्वर! मुझपर प्रसन्न होइये। आप ही मुझे शरण देनेवाले हैं आप ही मेरी गति और प्रतिष्ठा हैं, दूसरा कोई नहीं है। ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।*

इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके प्रजापति दक्ष चुप हो गये। तब भगवान् शिव ने कहा- 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दक्ष! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे बहुत प्रसन्न हूँ। अधिक कहने से क्या लाभ, तुम्हें मेरा सामीप्य प्राप्त होगा।' यों कहकर देवेश्वर महादेवजी महादेवजी अपनी पत्नी और पार्षदों के साथ अमित तेजस्वी दक्षकी दृष्टि से ओझल हो गये। जो मनुष्य दक्षद्वारा किये हुए इस स्तोत्रका श्रवण या कीर्तन करता है, उसका तनिक भी अमङ्गल नहीं होता। उसे दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है। जैसे सम्पूर्ण देवताओं में भगवान् शिव श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सब स्तोत्रों में यह दक्षनिर्मित स्तोत्र श्रेष्ठ है। जो लोग यश, स्वर्ग, देवताओं का ऐश्वर्य, धन, विजय और विद्या आदि की अभिलाषा रखते हैं, उन्हें यत्नपूर्वक भक्ति के साथ इस स्तोत्रद्वारा भगवान् शिव की स्तुति करनी चाहिये। रोगी, दु:खी, दीन, भय आदि से ग्रस्त अट्टहा राज-काज में नियुक्त मनुष्य इस स्तोत्रके प्रभाव से महान् भय से मुक्त हो जाता है तथा भगवान् शिव से इस लोकमें सुख पाकर उसी शरीर से गणों का स्वामी बन जाता है। यक्ष, पिशाच, नाग और विनायक उस मनुष्य के घरमें विघ्न नहीं डालते, जिसके यहाँ भगवान् शिव की स्तुति होती है। दक्षद्वारा किये हुए इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है और मरने के बाद देवताओं द्वारा पूजित होता है। इस परम गोपनीय स्तोत्रका श्रवण करके पापयोनिवाले मनुष्य तथा वैश्य, स्त्री एवं शूद्र भी रूद्रलोक प्राप्त करते हैं। जो द्विज प्रत्येक पर्व में ब्राह्मणोंको सदा इस स्तोत्र का श्रवण करता है, वह नि:संदेह भगवान् शिव के लोकमें जाता है।

* दक्ष उवाच-नमस्ते देवदेवश नमस्तेऽन्धकसूदन। देवेन्द्र त्वं बलश्रेष्ठ देवदानवपूजित ॥

१. सहस्त्रों नेत्रोंवाले, २.विकराल नेत्रोंवाले, ३. तीन नेत्रोंवाले, ४. कीलके समान नुकीले कानोंवाले, ५. बड़े-बड़े कानोंवाले, ६.घड़ेके समान कनोंवाले, ७.समुद्र जिनका निवासस्थान है वे, ८. हाथी के समान कनोंवाले, ९. गायके समान कनोंवाले, १०. सैकड़ों कानोंवाले, ११. सैकड़ों उदरवाले, १२. सैकड़ों भँवरवाले,

* सहस्त्राक्ष विरूपाक्ष त्र्यक्ष यक्षाधिपप्रिय। सर्वत:पाणिपादस्त्वं सर्वतोऽक्षिशिरोमुख: ॥

सर्वत: श्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि। शङ्कुकर्णो महाकर्ण: कुम्भकर्णोऽर्णवालय: ॥

गजेन्द्रकर्णो गोकर्ण: शतकर्णो नमोऽस्तु ते। शतोदर: शतावर्त: शतजिह्व: सनातन: ॥

गायन्ति त्वां गायत्रिणो अर्चयन्त्यर्कमर्किण:। देवदानवगोप्ता च ब्रह्मा च त्वं शतक्रतु: ॥

मूर्तिमांसस्त्वं महामूर्ति: समुद्र: सरसां निधि:। त्वयि सर्वा देवता हि गावो गोष्ठ इवासते ॥

तवत्त: शरीरे पश्यामि सोममग्निजलेश्वरम्। आदित्यमथ विष्णुं च ब्रह्माणं सबृहस्पतिम् ॥

क्रिया कारणकार्ये च कर्ता कारणमेव च। असच्च सदसच्चैव तथैव प्रभवाप्ययौ ॥

नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च। पशूनां पतये चैव नमोऽस्त्वन्धकघातिने ॥

त्रिजटाय त्रिशिर्षाय त्रिशूलवारधारिणे। त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिपुरघ्नाय वै नम: ॥

नमश्चण्डाय मुण्डाय विश्वचण्डधराय च। दण्डिने शङ्कुकर्णाय दण्डिदण्डाय वै नम: ॥

नमोऽर्धचण्डिकेशाय शुष्काय विकृताय च। विलोहिताय धूम्राय नीलग्रीवाय वै नम: ॥

नमोऽस्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च। सूर्याय सूर्यपतये सूर्यध्वजपताकिने ॥

नम: प्रमथनाशाय वृषस्कन्धाय वै नम:। नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यकवचाय च  ॥

हिरण्यकृतचूडाय हिरण्यपतये नम:। शत्रुघाताय चण्डाय पर्णसङ्घशयाय च ॥

नम: स्तुताय स्तुतये स्तूयमानाय वै नम:। सर्वाय सर्वभक्षाय सर्वभूतान्तरात्मने ॥

* नमो होमाय मन्त्राय शुक्लध्वजपताकिने। अनमोऽनम्याय नम्याय नम: किलकिलाय च ॥

नमस्त्वं शयमानाय शयितायोत्थिताय च। स्थिताय धावमानाय कुब्जाय कुटिलाय च ॥

नमो नर्तनशीलाय मुखवादित्रकारिणे। बाधापहाय लुब्धाय गीतवादित्रकारिणे ॥

नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय बलप्रमथनाय च। उग्राय च नमो नित्यं नमश्च दशबाहवे ॥

नम: कपालहस्ताय सितभस्मप्रियाय च। विभिषणाय भीमाय भीष्मव्रतधराय च ॥

नानाविकृतवक्त्राय खड्गजिह्वोग्रदंष्ट्रिणे। पक्षमासलवार्धाय तुम्बीवीणाप्रियाय च ॥

अघोरघोररूपाय घोराघोरतराय च। नम: शिवाय शान्ताय नम: शान्ततमाय च ॥

नमो बुद्धाय शुद्धाय संविभागप्रियाय च। पवनाय पतङ्गाय नम: सांख्यपराय च ॥

नामश्चण्डैकघण्टाय घण्टाजल्पाय घण्टिने। सहस्त्रशतघण्टाय घण्टामालाप्रियाय च ॥

प्राणदण्डाय नित्याय नमस्ते लोहिताय च। हूंहूंकाराय रुद्राय भगाकारप्रियाय च ॥

नमोऽपारवते नित्यं गिरिवृक्षाप्रियाय च। नमो यज्ञाधिपतये भूताय प्रस्तुताय च ॥

यज्ञवाहाय दान्ताय तथ्याय च भगाय च। नमस्तटाय तट्याय तटिनीपतये नम: ॥

अन्नदायान्नभुजाय नमस्त्वन्नभुजाय च। नम: सहस्त्रशीर्षाय सहस्त्रचरणाय च ॥

सहस्त्रोद्यतशूलाय सहस्त्रनयनाय च। नमो बालार्कवर्णाय बालरूपधराय च ॥

 नमो बालार्करूपाय कालक्रीड़नकाय च। नम: शुध्दाय बुध्दाय क्षोभणाय क्षयाय च ॥

* तरङ्गाङ्कितकेशाय मुक्तकेशाय वै नम:। नम: षट्कर्मनिष्ठाय त्रिकर्मनियताय च ॥

 वर्णाश्रमाणां विधिवत्पृथग्धर्मप्रवर्तिने। नम: श्रेष्ठाय ज्येष्ठाय नम: कलकलाय च ॥

श्वेतपिङ्गलनेत्राय कृष्णरक्तेक्षणाय च। धर्मकामार्थमोक्षाय क्रथाय क्रथनाय च ॥

सांख्याय सांख्यमुख्याय योगाधिपतये नम:। नमो रथ्याधिरथ्याय चतुष्पथपथाय च ॥

कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने। ईशान रूद्रसंघात हरिकेश नमोऽस्तु ते ॥

त्र्यम्बकायाम्बिकानाथ व्यक्ताव्यक्त नमोऽस्तु ते। कालकामदकामघ्न दुष्टोद्वृत्तनिषूदन ॥

सर्वगर्हित सर्वघ्न सद्योजात नमोऽस्तु ते। उन्मादनशतावर्त गङ्गातोयार्द्रमूर्धज ॥

चंद्रार्धसंयुगावर्त मेघवर्त नमोऽस्तु ते। नमोऽन्नदानकर्त्रे च अन्नदप्रभवे नम: ॥

अन्नभोक्त्रे च गोप्त्रे च त्वमेव प्रलयानल। जरायुजाण्डजाश्चैव स्वेदजोभ्दिज्ज एव च ॥

त्वमेव देवदेवेश भूतग्रामश्चतुर्विध:। चराचरस्य स्त्रष्टा त्वं प्रतिहर्ता त्वमेव च ॥

त्वमेव ब्रह्मा विश्वेश अप्सु ब्रह्म वदन्ति ते। सर्वस्य परमा योनि: सुधांशो ज्योतिषां निधि: ॥

ऋक्सामानि तथोङ्कारमाहुस्त्वां ब्रह्मवादिन:। हायि हायि हरे हायि हुवा हावेति वासकृत् ॥

गायन्ति त्वां सुरश्रेष्ठा: सामगा ब्रह्मवादिन:। यजुर्मय ऋङ्मयश्च सामाथर्वयुतस्तथा ॥

पठ्य से ब्रह्मविभ्डिबास्त्वं कल्पोपनिषदां गणै:। ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्रा वर्णाश्रमाश्च ये ॥

त्वमेवाश्रमसंघाश्च विद्युत्स्तनितमेव च। संवत्सरस्त्वमृतवो मासा मासार्धमेव च ॥

कला काष्ठा निमेषाश्च नक्षत्राणि युगानि च। वृषाणां ककुदं त्वं हि गिरीणां शिखराणि च ॥

* सिंहो मृगाणां च पतिस्तक्षकोऽनन्तभोगिनाम्। क्षीरोदो ह्युधीनां च मन्त्राणां प्रणवस्तथा ॥

वज्रं प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमेव च। त्वमेवेच्छा च द्वेषश्च रागो मोह: शम: क्षमा ॥

व्यवसायो धृतिर्लोभ: कामक्रोधौ जयाजयौ। त्वं गदी त्वं शरी चापी खट्वाङ्गी मुद्ररी तथा ॥

छेत्ता भेत्ता प्रहर्ता च नेता मन्तासि नो मत:। दशलक्षणसंयुक्तो धर्मोऽर्थ: काम एव च ॥

इन्दु: समुद्र: सरित: पल्ल्वलानि सरंसि च। लतावल्यस्तृणौषध्य: पशवो मृगपक्षिण: ॥

द्रव्यकर्मगुणारम्भ: कालपुष्पफलप्रद:। आदिश्चान्तश्च मध्यश्च गायत्र्योङ्कार एव च ॥

हरितो लोहित: कृष्णो नील: पीतस्तथारुण:। कद्रुश्च कपिलो बभ्र: कपोतो मेचकस्तथा ॥

सुवर्णरेता विख्यात: सुवर्णश्चाप्यथो मत:। सुवर्णनामा च तथा सुवर्णप्रिय एव च ॥

त्वमिन्द्रश्च यमश्चै वरुणो धनदोऽनिल:। उत्फुल्लश्चित्रभानुश्च स्वर्भानुर्भानुरेव च ॥

होत्रं होता च होम्यं च हुतं चैव तथा प्रभु:। त्रिसौपर्णस्तथा ब्रह्मन् यजुषां शतरूद्रियम् ॥

पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम्। प्राणश्च त्वं रजश्च त्वं तम: सत्त्वयुतस्तथा ॥

प्राणोऽपान: समानश्च उदानो व्यान एव च। उन्मेषश्च निमेषश्च क्षुत्तृड् जृम्भा तथैव च ॥

लोहिताङ्गश्च दंष्ट्री च महावक्त्रो महोदर:। शुचिरोमा हरिच्छ्मश्रुरूर्ध्वकेशश्चलाचल: ॥

गीतवादित्रनृत्याङ्गो गीतवादनकप्रिय:। मत्स्यो जालो जलोऽजय्यो जलव्याल: कुटीचर: ॥

विकालश्च सुकालश्च दुष्काल: कालनाशन:। मृत्युश्चैवाक्षयोऽन्तश्च क्षमा माया करोत्कर: ॥

संवर्तो वर्तकश्चैव संवर्तकबलाहकौ। घण्टाकी घण्टाकी घण्टी चुडालो लवणोदधि: ॥

१. दण्डधारी, २. चक्रद्वारा दण्ड देनवाले, ३. रूद्रके भाग का नाश न होने देनेवाले

* ब्रह्मा कालाग्निवक्त्रश्च दण्डो मुण्डस्त्रिदण्डधृक्। चतुर्युगश्चतुर्वेदश्चतुर्होत्रश्चतुष्पथ: ॥

चतुराश्रम्यनेता च चातुर्वण्र्यकरश्च ह। क्षराक्षर: प्रियो धूर्तो गणैर्गण्यो गणाधिप: ॥

रक्तमाल्याम्बरधरो गिरीशो गिरिजाप्रिय:। शिल्पीश: शिल्पिन: श्रेष्ठ: सर्वशिल्पिप्रवर्तक: ॥

भगनेत्रान्तकश्चण्ड: पूष्णो दन्तविनाशन:। स्वाहा स्वधा वषट्कारो नमस्कार नमोऽस्तु ते ॥

गूढ़व्रतश्च गूढ़श्च गूढ़व्रतनिषेवित:। तरणस्तारणश्चैव सर्वभूतेषु तारण: ॥

धाता विधाता संधाता निधाता धारणो धर:। तपो ब्रह्म च सत्यं च ब्रह्मचर्यं तथाऽऽर्जवम् ॥

भूतात्मा भूतकृद्भूतो बहुतभव्यभवोभ्दव:। भुर्भूव: स्वरितश्चैव भूतो ह्यग्निर्महेश्वर: ॥

ब्रह्मावर्त: सुरावर्त: कामावर्त नमोऽस्तु ते। कामबिम्बविनिर्हन्ता कर्णिकारस्त्रजप्रिय: ॥

गोनेता गोप्रचारश्च गोवृषेश्वर वाहन:। त्रैलोक्यगोप्ता गोविन्दो गोप्ता गोमार्ग एव च ॥

अखण्डचन्द्राभिमुख: सुमुखो दुर्मुखोऽमुख:। चतुर्मुखो बहुमुखो रणेष्वभिमुख: सदा ॥

हिरण्यगर्भ: शकुनिर्धनदोऽर्थपतिर्विराट्। अधर्महा महादक्षो दण्डधारो रणप्रिय: ॥

तिष्ठन् स्थिरश्च स्थाणुश्च निष्कम्पश्च सुनिश्चल। दुर्वारणो दुर्विषहो दु:सहो दुरतिक्रम: ॥

दुर्धरो दुर्वशो नित्यो दुर्दर्पो विजयो जय:। शश: शशाङकनयन: शीतोष्ण: क्षुत्तुषा जरा ॥

आधयो व्याधयश्चैव व्याधिहा व्याधिपश्च य:। सह्यो यज्ञमृगव्याधो व्याधीनामाकरोऽकर: ॥

शिखण्डी पुण्डरीकश्च पुण्डरीकावलोकन:। दण्डधृक् चक्रदण्डश्च रौद्रभागाविनाशन: ॥

* विषपोऽमृतपश्चैव सुराप: क्षीरसोमप:। मधुपश्चापपश्चैव सर्वपश्च बलाबल: ॥

वृषाङ्गवाह्यो वृषभस्तथा वृषभलोचन:। वृषभश्चैव विख्यातो लोकानां लोकसंस्कृत: ॥

चन्द्रादित्यौ चक्षुषी ते हृदयं च पितामह:। अग्निष्टोमस्तथा देहो धर्मकर्मप्रसाधित: ॥

न ब्रह्मा न च गोविन्द: पुराणऋषयो न च। माहात्म्यं वेदितुं शक्ता याथातथ्येन ते शिव ॥

शिव या मूर्तय: सूक्ष्मास्ते मह्यं यान्तु दर्शनम्। ताभिर्मां सर्वतो रक्ष पिता पुत्रमिवौरसम् ॥

रक्ष मां रक्षणीयोऽहं तवानघ नमोऽस्तु ते। भक्तानुकम्पी भगवान् भक्तश्चाहं सदा त्वयि ॥

य: सहस्त्राण्यनेकानि पुंसामावृत्य दुर्दृशाम्। तिष्ठत्येक: समुद्रान्ते स मे गोप्तास्तु नित्यश: ॥

यं विनिद्रा जितश्वासा: सत्त्वस्था: समदर्शिन:। ज्योति: पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नम:॥

सम्भक्ष्य सर्वभूतानि युगान्ते समुपस्थिते। य: शेते जलमध्यस्थस्तं प्रपद्येऽम्बुशायिनम् ॥

प्रविश्य वदनं राहोर्य: सोमं पिबते निशि। ग्रसत्यर्कं च स्वर्भानुर्भूत्वा सोमाग्निरेव च ॥

अङ्गुष्ठमात्रा: पुरुषा देहस्था: सर्वदेहिनाम्। रक्षन्तु ते च मां नित्यं नित्यं चाप्याययन्तु माम् ॥

येनाप्युत्पादिता गर्भा अपो भागगताश्च ये। तेषां स्वाहा स्वधा चैव आप्नुवन्ति स्वदन्ति च ॥

ये न रोदन्ति देहस्था: प्राणिनो रोदयन्ति च। हर्षयन्ति न हृष्यन्ति नमस्तेभ्यस्तु नित्यशः ॥

ये समुद्रे नदीदुर्गे पर्वतेषु गुहासु च। वृक्षमूलेषू गोष्ठेषु कान्तारगहनेषु च ॥

चतुष्पथेषु रथ्यासु चत्वरेषु सभासु च। हस्त्यश्वरथषालासु जीर्णोद्यानालयेषु च ॥

ये तु पञ्चसु भूतेषु दिशासु विदिशासु च। इन्द्रार्कयोर्मध्यगता ये च चन्द्रार्करश्मिषु ॥

रसातलगता ये च ये च तस्मात्परं गता:। नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो सर्वश: ॥

* सर्वस्त् सर्वगोवं देव: सर्वभूतपतिर्भव:। सर्वभूतान्तरात्मा च तेन त्वं न निमन्त्रित: ॥

त्वमेव चेज्यसे देव यज्ञैर्विविधदक्षिणै:। त्वमेव करता सर्वस्य तेन त्वं न निमन्त्रित: ॥

अथवा मायया देव मोहित: सूक्ष्मया तव। तस्मात्तु कारणाद्वापि त्वं मया न निमन्त्रित: ॥

प्रसीद मम देवेश त्वमेव शरणं मम। त्वं गतिस्त्वं प्रतिष्ठा च न चन्योऽस्तीति मे मति: ॥

(४० । ३-१००)