मुनियोंने कहा – भगवन्! आप सम्पर्णू धर्मोके ज्ञाता तथा सब शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण हैं| कृपया बताइये पिता , माता ,पुत्र ,गुरु , जातिवाले, सम्बन्धी और मित्रवर्ग - इनमेंसे कौन मरनेवाले प्राणीका विशषे सहायक होता है? लोग तो मतृकके शरीरको *काठ और मिट्टीके ढेलेकी भाँति छोड़कर चल देतेहैं, फिर परलोकमें कौन उसके साथ जाता है?
व्यासजी बोले- विप्रवरो ! प्राणी अकेला ही जन्म लेता , अकेला ही मरता , अकेला ही दुर्गम संकटोंको पार करता और अकेला ही दर्गुतिमें पड़ता है। पिता , माता , भ्राता , पुत्र ,गुरु, जातिवाले, सम्बन्धी तथा मित्रवर्ग - इनमेंसे कोई भी मरनेवालेका साथ नहीं देता । घरके लोग मृत व्यक्ति के शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेकी भाँति त्याग देते और दो घड़ी रोकर उससे मुँह मोड़कर चले जाते हैं।वे सब लोग तो त्याग देते हैं, किन्तु धर्म उसका त्याग नहीं करता। वह अकेला ही जीवके साथ जाता है, अतः धर्म ही सच्चा सहायक है| इसलिये मनुष्योंको सदा धर्मका सेवन करना चाहिये ।धर्मयुक्त प्राणी उत्तम स्वर्गगतिको प्राप्त होता है, इसी प्रकार अधर्मयुक्त मानव नरकमें पड़ता है; अतः विद्वान पुरुष पापसे प्राप्त होनेवाले धनमें अनुराग न रखे एकमात्र धर्म ही मनुष्योंका सहायक बताया गया है | बहुत-से शास्त्रोंक ज्ञाता मनुष्य भी लोभ,मोह ,घृणा अथवा भयसे मोहित होका दुसरेके लिये न करने योग्य कार्य भी कर डालता है धर्म अर्थ और काम- तीनों ही इस जीवनके फल हैं । अधर्म - त्यागपूर्वक इन तीनोंकी प्राप्ति करनी चाहिये । *
मुनियोंने कहा – भगवन्! आपका यह धर्मयुक्त वचन ,जो परम कल्याणका साधन है, हमने सुना ।अब हम यह शरीर किन तत्त्वोंका समूह है । मनुष्योंका मरा हुआ शरीर तो स्थूलसे सूक्ष्म अव्यक्तभावको प्राप्त हो जाता है , वह नेत्रोंका विषय नहीं रह जाता ; फिर धर्म कैसे उसके साथ जाता है ?
व्यासजी बोले- पृथ्वी , वायु, आकाश , जल ,मन , बुद्धि और आत्मा- ये सदा साथ रहकर धर्मपर दृष्टि रखते हैं। ये समस्त प्राणियोंके शुभाशुभ कर्मोंके निरन्तर साक्षी रहते हैं। इनके साथ धर्म जीवका अनसुरण करता है। जब शरीरसे प्राण निकल जाता है, तब त्वचा , हड्डी , मांस , वीर्य और रक्त भी उस शरीरको छोड़ देते हैं। उस समय जीव धर्मसे युक्त होनेपर ही इस लोक और परलोकमें सुख एवं अभ्युदय प्राप्त होता है।
मुनियोंने पूछा— भगवन्! आपने यह भलीभाँति समझा दिया कि धर्म किस प्रकार जीवका अनसुरण करता है।अब हम यह जानना चाहते हैं कि [ शरीरके कारणभूत ] वीर्यकी उत्पत्ति कैसे होती है।
व्यासजीने कहा – द्विजवरो ! शरीरमें स्थित जो पृथ्वी , वायु , आकाश , जल , तेज और मनके अधिष्ठाता देवता हैं , वे जब अन्न ग्रहण करते हैं और उससे मनसहित पृथ्वी आदि पाँचों भूत तृप्त होते हैं ,तब उस अन्नसे शुद्ध वीर्य बनता है । उस वीर्यमें कर्मप्रेरित जीव आकर निवास करता है।फिर स्त्रियोंके रजमें मिलकर वह समयानुसार जन्म ग्रहण करता है । पुण्यात्मा प्राणी इस लोकमें जन्म लेनेपर जन्मकालसे ही पुण्यकर्मका उपभोग करता है । वह धर्मके फलका आश्रय लेता है। मनुष्य यदि जन्मसे ही धर्मका सेवन करता है तो सदा सुखका भागी होता है | यदि बीच-बीचमें कभी धर्म और कभी अधर्मका सेवन करता है तो वह सुखके बाद दुःख भी पाता है। पापयुक्त मनुष्य यमलोकमें जाकर महान् कष्ट उठानेके बाद पुनः तिर्यग्योनिमें जन्म लेता है । मोहयुक्त जीव जिस - जिस कर्मसे जिस जिस योनिमें जन्म लेता है , उसे बतलाता हूँ ; सुनो ! परायी स्त्रीके साथ सम्भोग करनेसे मनुष्य पहले तो भेड़िया होता है ; फिर क्रमशः कुत्ता , सियार , गीध ,साँप,कौआ और बगुला होता है। जो पापात्मा कामसे मोहित होकर अपनी भौजाईके साथ बलात्कार करता है , वह एक वर्षतक नर कोकिल होता है। मित्र , गुरु तथा राजाकी पत्नीके साथ समागम करनेसे कामात्मा पुरुष मरनेके बाद सूअर होता है। पाँच वर्षोंतक सूअर रहकर मरनेके बाद दस वर्षोंतक बगुला, तीन महीनोंतक चींटी और एक मासतक कीटकी योनिमें पड़ा रहता है। इन सब योनियोंमें जन्म लेनेके बाद वह पुनः कृमियोनिमें उत्पन्न होता और चौदह महीनोंतक जीवित रहता है। इस प्रकार अपने पूर्वपापोंका क्षय करनेके बाद वह फिर मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है। जो
पहले एकको कन्या देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर दूसरेको देना चाहता है ,वह भी मरनेपर कीड़ेकी योनिमें जन्म पाता है । उस योनिमें वह तेरह वर्षोंतक जीवित रहता है। फिर अधर्मका क्षय होनेपर वह मनुष्य होता है। जो देवकार्य अथवा पितृकार्य न करके देवताओं और पितरोंको संतुष्ट किये बिना ही मर जाता है , वह कौआ होता है। सौ वर्षोंतक कौएकी योनिमें रहनेके बाद वह मुर्गा होता है । तत्पश्चात् एक मासतक सर्पकी योनिमें निवास करता है । जो पिताके समान बड़े भाईका अपमान करता है,वह मृत्युके बाद क्रौञ्च योनिमें जन्म लेता है और दस वर्षोंतक जीवन धारण करता है। तत्पश्चात् मरनेपर वह मनुष्य होता है। शूद्रजातीय पुरुष ब्राह्मणीके साथ समागम करनेपर कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है। उससे मृत्यु होनेपर वह सूअर होता है। सूअरकी योनिमें जन्म लेते ही रोगसे उसकी मृत्यु हो जाती है । तदनन्तर वह मूर्ख पूर्वोक्त पापके ही फलस्वरूप कुत्तेकी योनिमें उत्पन्न होता है। उसके बाद उसे मानव शरीरकी प्राप्ति होती है। मानवयोनिमें संतान उत्पन्न करके वह मर जाता है और चूहेका जन्म पाता है। कृतघ्न मनुष्य मृत्युके बाद जब यमराजके लोकमें जाता है , उस समय क्रूर यमदूत उसे बाँधकर भयंकर दण्ड देते हैं। उस दण्डसे उसको बड़ी वेदना होती है। दण्ड , मुद्गर , शूल ,भयंकर अग्निदण्ड,असिपत्रवन ,तप्तवालुका तथा कूटशाल्मलि आदि अन्य बहुत सी घोर यातनाओंका अनुभव करके वह संसारचक्रमें आता और कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है ; पंद्रह वर्षोंतक कीड़ा रहनेके बाद मानव - गर्भमें आकर वहाँ जन्म लेनेके पहले ही मर जाता है । इस प्रकार सैकड़ों बार गर्भमें मृत्युका कष्ट भोगकर अनेक बार संसार- बन्धनमें पड़ता । तत्पश्चात् वह पशु - पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेता है I उसमें बहुत वर्षोतक कष्ट उठाकर अंतमे वह कछुआ होता है I दहीकी चोरी करनेसे मनुष्य बगुला और मेढ़क होता है I फल,मूल अथवा पुआ चुरानेसे वह चींटी होता है I जलकी चोरी करनेसे कौआ और काँसा चुरानेसे हारीत ( हरियल ) पक्षी होता है। चाँदीका बर्तन चुरानेवाला कबूतर होता है और सुवर्णमय पात्रका अपहरण करनेसे कृमियोनिमें जन्म लेना पड़ता है । रेशमका कीड़ा चुरानेसे मनुष्य वानर होता है । वस्त्रकी चोरी करनेसे तोतेकी योनिमें जन्म होता है । साड़ी चुरानेवाला मनुष्य मरनेके बाद हंस होता है । रूईका वस्त्र हड़प लेनेवाला मानव मृत्युके पश्चात् क्रौञ्च होता है । सनका वस्त्र , ऊनी वस्त्र तथा रेशमी वस्त्र चुरानेवाला मनुष्य खरगोश होता है । चूर्णकी चोरी करनेसे मनुष्य दूसरे जन्ममें मोर होता है । अङ्गराग और सुगन्धकी चोरी करनेवाला लोभी मनुष्य छछूंदर होता है । उस योनिमें पंद्रह वर्षोंतक जीवित रहनेके बाद जब पापका क्षय हो जाता है, तब वह मनुष्य योनिमें जन्म ग्रहण करता है। जो स्त्री दूधकी चोरी करती है, वह बगुली होती है। जो नीच पुरुष स्वयं सशस्त्र होकर वैरसे अथवा गया धनके लिये किसी शस्त्रहीन पुरुषकी हत्या है,वह मरनेपर गदहा होता है। गदहेकी योनिमें दो वर्षोंतक जीवित रहनेके बाद वह शस्त्रद्वारा मारा जाता है,फिर मृगकी योनिमें जन्म लेकर सदा उद्विग्न बना रहता है । मृगयोनिमें एक वर्ष बीतनेपर वह बाणका निशाना बन जाता है , फिर मछलीकी योनिमें जन्म ले वह जालमें फँसा निरूपण लिया जाता है । चार महीने बीतनेपर वह शिकारी कुत्तेके रूपमें जन्म लेता है । दस वर्षोंतक कुत्ता रहकर पाँच वर्षोंतक व्याघ्रकी योनिमें रहता है। फिर कालक्रमसे पापोंका क्षय होनेपर मनुष्य योनिमें जन्म ग्रहण करता है । जो मनुष्य खलीमिश्रित अन्नका अपहरण करता है,वह भयंकर चूहा होता है । उसका रंग नेवले जैसा भूरा होता है। वह पापात्मा प्रतिदिन मनुष्योंको डँसता रहता है। घीकी चोरी करनेवाला दुर्बुद्धि मानव कौआ और बगुला होता है। नमक चुरानेसे चिरिकाक नामक पक्षी होना पड़ता है । जो मनुष्य विश्वासपूर्वक रखी हुई धरोहरको हड़प लेता है,वह मृत्युके बाद मछलीकी योनिमें जन्म लेता है उसके पश्चात् मृत्यु होनेपर फिर मनुष्य होता है । मानव योनिमें भी उसकी आयु बहुत ही थोड़ी होती है । ब्राह्मणो ! मनुष्य पाप करके तिर्यग्योनिमें जाता है , जहाँ उसे धर्मका कुछ भी ज्ञान नहीं रहता । जो मनुष्य पाप करके व्रतोंद्वारा उसका प्रायश्चित्त करते हैं , वे सुख और दुःख दोनोंसे युक्त होते हैं । लोभ मोहसे युक्त पापाचारी मनुष्य निश्चय ही म्लेच्छयोनिमें जन्म लेते हैं । जो लोग जन्मसे ही पापका परित्याग करते हैं , वे नीरोग , रूपवान् और धनी होते हैं । स्त्रियाँ भी ऊपर बताये अनुसार कर्म करनेसे पापकी भागिनी होती हैं और पापयोनिमें पड़े हुए पूर्वोक्त पापियोंकी ही पत्नी बनती हैं । द्विजवरो ! चोरीके प्रायः सभी दोष बता दिये गये । यहाँ जो कुछ कहा गया है , वह बहुत संक्षिप्त है ; फिर कभी कथा - वार्ताका अवसर आनेपर तुमलोग इस विषयको विस्तारपूर्वक सुन सकते हो । पूर्वकालमें देवर्षियोंकी सभामें उनके प्रश्नानुसार ब्रह्माजीने जो कुछ कहा था , वह सब मैंने तुमलोगोंको बतलाया है । ये सब बातें सुनकर तुम धर्मके अनुष्ठानमें मन लगाओ ।
मुनि बोले – ब्रह्मन् ! आपने अधर्मकी गतिका निरूपण किया , अब हम धर्मकी गति सुनना चाहते हैं । किस कर्मके अनुष्ठानसे मनुष्यकी सद्गति होती है ?
व्यासजीने कहा- ब्राह्मणो ! जो मोहवश अधर्मका अनुष्ठान कर लेनेपर उसके लिये पुनः सच्चे हृदयसे पश्चात्ताप करता और मनको एकाग्र रखता है , वह पापका सेवन नहीं करता ज्यों ज्यों मनुष्यका मन पाप - कर्मकी निन्दा करता है ,त्यों-त्यों उसका शरीर उस अधर्मसे दूर होता जाता है। यदि धर्मवादी ब्राह्मणोंके सामने अपना पाप कह दिया जाय तो वह उस पापजनित अपराधसे शीघ्र मुक्त हो जाता है । मनुष्य जैसे-जैसे अपने अधर्मकी बात बारंबार प्रकट करता है, वैसे-ही-वैसे वह एकाग्रचित्त होकर अधर्मको छोड़ता जाता है।१ जैसे साँप केचुल छोड़ता है,उसी प्रकार वह पहलेके अनुभव किये हुए पापोंका त्याग करता है। एकाग्रचित्त होकर ब्राह्मणको नाना प्रकारके दान दे। जो मनको ध्यानमें लगाता है,वह उत्तम गतिको प्राप्त करता है।
ब्राह्मणो ! अब मैं दानका फल बतलाता हूँ ।सब दानों में अन्नदानको श्रेष्ठ बतलाया गया है। धर्मकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह सरलतापूर्वक सब प्रकारके अन्नोंका दान करे।अन्न ही मनुष्योंका जीवन है। उसीसे जीव - जन्तुओंकी उत्पत्ति होती है। अन्नमें ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं ,अतः अन्नको श्रेष्ठ बताया जाता है। देवता, ऋषि, पितर और मनुष्य अन्नकी ही प्रशंसा करते हैं ; क्योंकि अन्नदानसे मनुष्य स्वर्गलोकको प्राप्त जो होता है। स्वाध्यायशील ब्राह्मणोंके लिये न्यायोपार्जित उत्तम अन्नका प्रसन्नचित्तसे दान करना चाहिये । जिसके प्रसन्नचित्तसे दिये हुए अन्नको दस ब्राह्मण भोजन कर लेते हैं, वह कभी पशु - पक्षी आदिकी योनिमें नहीं पड़ता । सदा पापोंमें संलग्न रहनेवाला मनुष्य भी यदि दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन पूर्ण करा दे तो वह अधर्मसे मुक्त हो जाता है।वेदोका अध्ययन करनेवाला ब्राह्मण भिक्षासे अन्न ले आकर यदि किसी स्वाध्यायशील ब्राह्मणको दान कर दे तो वह संसारमें सुख और समृद्धिका भागी होता है। जो क्षत्रिय ब्राह्मणके धनको हानि न पहुँचाकर न्यायतः प्रजाका पालन करते हुए अन्नका उपार्जन करता है और उसे एकाग्रचित्त होकर श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दान देता है , वह धर्मात्मा है और उस पुण्यके जलसे अपने पापपङ्कको धो डालता है । अपने द्वारा उपार्जित खेतीके अन्नमेंसे छठा भाग राजाको देनेके बाद जो शेष शुद्ध भाग बच जाता है , वह अन्न यदि वैश्य ब्राह्मणको दान करे तो वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । जो शूद्र प्राणोंको संशयमें डालकर और नाना प्रकारकी कठिनाइयोंको सहकर भी अपने द्वारा उपार्जित शुद्ध अन्नको ब्राह्मणोंके निमित्त दान करता है , वह भी पापोंसे छुटकारा पा जाता है । जो कोई भी मनुष्य श्रेष्ठ वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको हर्षपूर्वक न्यायोपार्जित अन्नका दान करता है , उसका पाप छूट जाता है । संसारमें अन्न बलकी वृद्धि करनेवाला है। उसका दान करनेसे मनुष्य बलवान् बनता है। सत्पुरुषोंके मार्गपर चलनेसे सब पाप दूर हो जाते हैं। दानवेत्ता पुरुषोंने जो मार्ग बताया है और जिसपर मनीषी पुरुष चलते हैं, वही अन्नदाताओंका भी मार्ग है। उन्हींसे सनातन धर्म है। मनुष्यको सभी अवस्थाओं में न्यायोपार्जित अन्नका दान करना चाहिये । क्योंकि अन्न सर्वोत्तम गति है । अन्नदानसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होता है। इस लोकमें उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण होती हैं और मृत्युके बाद भी वह सुखका भागी होता है।२ इस प्रकार पुण्यवान् मनुष्य पापोंसे मुक्त होता है। अतः अन्यायरहित अन्नका दान करना चाहिये। गृहस्थ सदा प्राणाग्निहोत्रपूर्वक अन्न-भोजन करता है, वह अन्नदानसे प्रत्येक दिनको सफल बनाता है। जो मनुष्य वेद,न्याय,धर्म और इतिहासके ज्ञाता सौ विद्वानोंको प्रतिदिन भोजन कराता है, वह घोर नरकमें नहीं पड़ता और संसार-बन्धनमें भी नहीं बँधता, अपितु सम्पूर्ण कामनाओंसे तृप्त हो मृत्युके बाद सुखका भागी होता है। इस प्रकार पुण्यकर्मसे युक्त मनुष्य निश्चिन्त होकर आनन्दका भागी होता है। उसे रूप, कीर्ति और धनकी प्राप्ति होती है । ब्राह्मणो ! इस प्रकार मैंने तुम्हें अन्नदानका महान् फल बतलाया। यह सभी धर्मों और दानोंका मूल है।
* एक : प्रसूयते विप्रा एक एव हि नश्यति । एकस्तरति दुर्गाणि गच्छत्येकस्तु दुर्गतिम् ॥
असहायःपिता माता तथा भ्राता सुतो गुरुः । ज्ञातिसम्बन्धिवर्गच मित्रवर्गस्तथैव च ॥
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोटसम जनाः । मुहूर्तमिव रोदित्वा ततो यान्ति पराङ्मुखाः॥
तैस्तच्छरीरमुत्सृष्टं धर्म एकोऽनुगच्छति । तस्माद्धर्मः सहायक्ष सेवितव्यः सदा नृभिः॥
प्राणी धर्मसमायुक्तो गच्छेत्स्वर्गगतिं पराम् । तथैवाधर्मसंयुक्तो नरकं चोपपद्यते॥
तस्मात्पापागतैरथैर्नानुरज्येत पण्डितः । धर्म एको मनुष्याणां सहायः परिकीर्तितः॥
लोभान्मोहादनुक्रोशाद्भयाद्वाय बहुश्रुतः। नरः करोत्यकार्याणि परार्थे लोभमोहितः॥
धर्मक्षार्थच कामच त्रितयं जीवतः फलम् । एतत्त्रयमवातव्यमधर्मपरिवर्जितम् ॥
( २१७।४–११ )
१. मोहादधर्म यः कृत्वा पुनः समनुतप्यते । मनः समाधिसंयुक्तो न स सेवेत दुष्कृतम् ॥ यथा यथा मनस्तस्य दुष्कृतं कर्म गर्हते तथा तथा शरीरं तु तेनाधर्मेण मुच्यते ॥
यदि विप्राः कथयते विप्राणां धर्मवादिनाम् । ततोऽधर्मकृतात्क्षिप्रमपराधात्प्रमुच्यते
यथा यथा नरः सम्यगधर्ममनुभाषते। समाहितेन मनसा विमुञ्चति तथा तथा ॥
( २१८ । ४–७ )
२. अन्नस्य हि प्रदानेन नरो याति परां गतिम् ॥ सर्वकामसमायुक्तः प्रेत्य चाप्यश्नुते सुखम् ।
( २१८।२६ २७ )
Summary of chapter 87 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
Jarāsaṃdha, the mighty king of Magadha and father-in-law of Kaṃsa, repeatedly attacks Mathurā with vast armies. Kṛṣṇa and Balarāma repel eighteen such invasions. Simultaneously, the western king Kālayavana besieges Mathurā from another direction. To protect the Yādavas from this two-front assault, Kṛṣṇa decides to relocate his people to the new city of Dvārakā on the western ocean.