ब्रह्माजी कहते हैं - उसके बाद विश्वविख्यात जनस्थान तीर्थ है, जिसका विस्तार चार योजनका है। वह स्मरणमात्रसे मनुष्योंको मुक्ति देनेवाला है। पूर्वकाल की बात है, वैवस्वत मनुके वंशमें जनक नामसे प्रसिद्ध एक राजा हुए। उन्होंने वरुणकी पुत्री गुणार्णवाके सतह विवाह किया था। गुणार्णवा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धि करनेवाली थी। जनकमें भी ये ही गुण थे, अत: राजा को अपने गुणों के अनुरूप सुयोग्य भार्या मिली। विप्रवर याज्ञवल्क्य राजा जनकके पुरोहित थे। एक दिन राजा ने अपने पुरोहित से पूछा- 'द्विजश्रेष्ठ! बड़े-बड़े मुनियों ने यह निर्णय किया है कि भोग और मोक्ष दोनों श्रेष्ठ हैं; अन्तर इतना ही है कि भोग अन्त में विरस हो जाता है और मुक्ति नित्य एवं निर्विकार है। अत: भोगसे भी मुक्तिको ही श्रेष्ठ माना गया है। आप बताएँ, भोगसे मुक्ति की प्राप्ति कैसे होती है? सब प्रकार की आसक्तियोंका त्याग करने से जो मुक्ति प्राप्त होती है, वह तो अत्यन्त दु:खसाध्य है; अत: जिस उपायसे अत्यन्त सुखपूर्वक मुक्ति हो सके, वह बताइये।
याज्ञवल्क्य बोले - राजन्! साक्षात् भगवान् वरुण तुम्हारे गुरुजन, श्वशुर और हितकारी हैं। उन्हींके पास चलकर पूछो। वे तुम्हें हितका उपदेश देंगे।
तदनन्तर याज्ञवल्क्य और जनक दोनों राजा वरुणके पास गये और वहाँ उन्होंने मुक्तिका मार्ग पूछा।
वरुणने कहा - दो प्रकार से मुक्ति प्राप्त होती है- एक तो कर्म करने से और एक कर्म न करनेसे। वेदमें यह मार्ग निश्चित किया गया है कि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेह्स्थ है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- ये चारों पुरुषार्थ कर्म से बँधे हुए हैं। नृपश्रेष्ठ! कर्मद्वारा सब प्रकार के माध्योंकी सिद्धि होती है, इसलिये मनुष्योंको सब तरह से वैदिक कर्म का अनुष्ठान करना चाहिये। इससे वे इस लोक में भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करते हैं। अकर्मसे कर्म पवित्र है। कर्म भिन्न-भिन्न आश्रमों और वर्णों के अनुसार अनेक प्रकार के होते हैं। वर्णों और आश्रमोंमें भी चार आश्रम कर्म के द्वारा माने गये हैं। उनमें भी गृहस्थाश्रम अधिक पुण्यदायक है। उससे भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त हो सकते हैं।* यही मेरा मत है।†
यह सुनकर राजा जनक और बुद्धिमान् याज्ञवल्क्य ने वरुणका पूजन किया और पुन: यह बात पूछी- 'सुरश्रेष्ठ! आपको नमस्कार है। आप सर्वज्ञ हैं। बताइये, कौन-सा देश और तीर्थ ऐसा है जो भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है?
वरुणने कहा - इस पृथ्वी पर भारत वर्ष और उसमें भी दण्डकवन पुण्यदायक है। इसमें किया हुआ शुभ कर्म मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष दोनों प्रदान करता है। तीर्थों में गौतमी गङ्गा श्रेष्ठ हैं। वे मुक्तिदायिनी मानी गयी हैं। वहाँ यज्ञ और दान करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होगी।
वरुणका यह उपदेश सुनकर याज्ञवल्क्य और जनक उनकी आज्ञा ले अपनी पुरीमें लौट आये, फिर गङ्गातीर्थ पर जाकर राजा जनकने अश्वमेध आदि यज्ञ किये और विप्रपर याज्ञवल्क्यने उन यज्ञों में आचार्यका कार्य किया। गौतमी गङ्गाके तटपर यज्ञ करनेसे राजा को मोक्षकी प्राप्ति हुई। तत्पश्चात् जनकवंशके बहुत-से राजा क्रमशःवहाँ आकर यज्ञ करते और गोदावरीकी कृपासे मोक्षके भागी होते रहे। तभी से यह तीर्थ जनस्थान होनेसे उसका नाम जनस्थान पड़ गया। वहाँ स्नान, दान और पितरोंका तर्पण करनेसे तथा उस तीर्थका चिन्तन करने, वहाँ जाने और भक्तिपूर्वक उसका सेवन करने से मनुष्य सब अभिलक्षित वस्तुओंको पाटा और मोक्षका भागी होता है।
अरुणा और वरुण नाम की दो परम पवित्र नदियाँ हैं। उन दोनोंका गोदावरीमें संगम हुआ है, जो बहुत ही पवित्र तीर्थ है। उसकी उत्पत्तिकी कथा सब पापोंका नाश करनेवाली है। उसे बताता हूँ, सुनो। महर्षि कश्यपके ज्येष्ठ पुत्र आदित्य (सूर्य) समस्त लोकों में विख्यात हैं। वे तीनों लोकों के नेत्र हैं। उनकी किरणें अत्यन्त दुस्सह हैं। भगवान् सूर्य के रथ में सात घोड़े जुते होते हैं। सूर्यदेव सम्पूर्ण लोकों द्वारा पूजित हैं। उनकी पत्नी का नाम उषा है। उषा विश्वकर्माकी पुत्री और त्रिभुवनकी अद्वितीय सुन्दरी है। उसे अपने स्वामीके तीव्र ताप्का सहन नहीं हो पाता था। वह सदा इसी चिंता में पड़ी रहती कि 'मुझे क्या करना चाहिये?' उषाके दो बुद्धिमान् पुत्र थे- वैवस्वत मनु और यम। एक कन्या भी थी, जो परम पवित्र यमुना नदी के रूप में विख्यात हुई। एक दिन उषा ने अपने ही समान रूपवाली अपनी छाया उत्पन्न की और उससे - 'तू मेरी-ही-जैसी होकर मेरी आज्ञासे पतिकी सेवा तथा मेरे पुत्रोंका पालन कर। मैं जबतक लौट न आऊँ, तबतक तुम्हीं पतिकी प्रेयसी बनकर रहो; यह रहस्य किसीको न बताना। मेरी संतानोंपर भी यह भेद प्रकट न होने पाए।' छायाने 'बहुत अच्छा' कहकर उषाकी आज्ञा स्वीकार कर ली और उषा घरसे निकल गयी। उसने तपस्याके लिए उत्तरकुरु नामक देशको प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर उसने घोड़ीका रूप धारण करके कठोर तपस्या आरम्भ की। जब सूर्यदेव को इसका पता लगा, तब वे भी घोड़ेका रूप धारण करके उसके पास गये। पतिव्रता उषा परपुरुषकी आशङ्का से भागकर भारतवर्षमें गौतमीके तटपर आयी। वहाँ उसका पतिके साथ समागम हुआ, जिससे अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्ति हुई। वह स्थान अश्वतीर्थ, भानुतीर्थ और पञ्चवटी आश्रमके नाम से विख्यात हुआ। तापी और यमुना दोनों सुर्यकी कन्याएँ थीं। वे गौतमी-तटपर अपने पितासे मिलनेके लिए अरुणा-तटपर अपने पितासे मिलनेके लिए अरूणा-वरुणा नामक नदियों के रूप में आयी थीं। उन दोनोंका जहाँ गङ्गामें संगम हुआ है, कह बहुत उत्तम तीर्थ है। उसमें भिन्न-भिन्न देवताओं और तीर्थोंका पृथक्-पृथक् समागम हुआ है। उक्त संगममें सत्ताईस हजार तीर्थोंका समुदाय है। वहाँ किया हुआ स्नान और दान अक्षय पुण्य देनेवाला है। नारद! उस तीर्थके स्मरण, कीर्तन और श्रवण से भी मनुष्य सा पापों से मुक्त हो धर्मवान् और सुखी होता है।
* गृहस्थ-आश्रममें भोगकी प्राप्ति तो स्वाभाविक है और मोक्षकी प्राप्ति निष्काम धर्मका अनुष्ठान करनेसे होती है।
†अकर्मण: कर्म पुण्यं कर्म चाप्याश्रमेषु च
जात्याश्रितं च राजेन्द्र तत्रापि श्रृणु धर्मवित्। आश्रमाणि च चत्वारि कर्मद्वाराणि मानद ॥
चतुर्णामाश्रमाणा च गार्हस्थ्यं पुण्यदं स्मृतम् ।
(८८ । १३-१५)
Summary of chapter 41 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The legend of King Indradyumna of Avantī is introduced. A supremely devoted king, Indradyumna yearns to behold Bhagavān Viṣṇu in his physical form. A visiting sage informs him of Puruṣottama (Jagannātha) on the eastern coast. Indradyumna abandons his kingdom and sets out on pilgrimage; the chapter describes his journey and the sacred land of Avantī from which he departs.