यस्मात्सर्वमिदं प्रपञ्चरचितं मायाजगज्जायते
यसिंमस्तिष्ठति याति चान्तसमये कल्पानुकल्पे पुन: । यं ध्यात्वा मुनयः प्रपञ्चरचितं विन्दन्ति मोक्षं ध्रुवं
तं वन्दे पुरुषोत्तमाख्यममलं नित्यं विभुं निश्चलम् ॥
यं ध्यायन्ति बुधा: समाधिसमये शुध्दं वियत्संनिभं
नित्यानन्दमयं प्रसन्नममलं सर्वेश्वरं निर्गुणम् ।
व्यक्ताव्यक्तपरं प्रपञ्चरचितं ध्यानैकगम्यं विभुं
तं संसारविनाशहेतुमजरं वन्दे हरिं मुक्तिदम् ॥ *
*प्रत्येक कल्प और अनुकाल्प में विस्तारपूर्वक रचा हुआ यह समस्त मायामय जगत् जिसने प्रकट होता, जिनमें स्थितरहता और अंतकाल में जिनके भीतर पुन: लीन हो जाता है, जो इस दृश्य प्रपञ्च से सर्वथा पृथक् हैं, जिनका ध्यान करके मुनिजन सनातन मोक्षपद प्राप्त कर लेते हैं, उन नित्य, निर्मल, निश्चल तथा व्यापक भगवान् पुरुषोतम (जगन्नाथजी)-को मैं प्रणाम करता हूँ। जो शुद्ध, आकाश के समान निर्लेप, नित्यानन्दमय, सदा प्रसन्न, निर्मल, सबके स्वामी, निर्गुण व्यक्त और अवयक्त से परे, प्रपञ्च से रहित, एकमात्र ध्यान में ही अनुभव करने योग्य तथा व्यापक हैं, समाधिकाल में विद्वान पुरुष इसी रूप में जिनका ध्यान करते हैं, जो संसार की उत्पत्ति और विनाश के एकमात्र कारण हैं, जरा-अवस्था जिनका स्पर्श भी नहीं कर सकती तथा जो मोक्ष प्रदान करने वाले हैं, उन भगवान् श्रीहरि की में वन्दना करता हूँ।*
पूर्वकाल की बात है, परम पुण्यमय पवित्र नैमिषारण्यक्षेत्र बड़ा मनोहर जान पड़ता था। वहाँ बहुत-से मुनि एकत्रित हुए थे, भाँति-भाँति के पुष्प उस स्थान की शोभा बढ़ा रहे थे। पीपल, पारिजात, चन्दन, अगर, गुलाब तथा चम्पा आदि अन्य बहुत-से वृक्ष उसकी शोभा-वृद्धि में सहायक हो रहे थे। भाँति-भाँति के पक्षी, नाना प्रकारके मृगोंका झुंड, अनेक पवित्र जलाशय तथा बहुत-सी बावलियाँ उस वन को विभूषित कर रही थीं। ब्रह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य जाति के लोग भी वहाँ उपस्थित थे। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी-सभी जुटे हुए थे। झुंड-की-झुंड गौएँ उस वन की शोभा बाधा रही थीं। नैमिषारण्यवासी मुनियों का द्वादश वार्षिक (बारह वर्षों तक चालो रहने वाला) यज्ञ आरम्भ था। जौ, गेहूँ, चना, उड़द, मूँग और तिल आदि पवित्र अन्नों से यज्ञमण्डप सुशोभित था। वहाँ होमकुण्ड में अग्निदेव प्रज्वलित थे और आहुतियाँ डाली जा रही थीं। उस महायज्ञ में सम्मिलित हने के लिये बहुत-से मुनि और ब्रह्मण अन्य स्थानों से आये। स्थानीय महर्षियों ने उन सबका यथायोग्य सत्कार किया। ऋत्विजोंसहित वे सब लोग जब आराम से बैठ गये, तब परम बुध्दिमान् लोमहर्षण सूतजी वहाँ पधारे। उन्हें देखकर मुनिवरों को बड़ी प्रसन्नता हुई, उन सबने उनका यथावत् सत्कार किया। सूतजी भी उनके प्रति आदर का भाव प्रकट करके एक श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हुए। उस समय सब ब्राह्मण सूतजी के साथ वार्तालाप करने लगे। बातचीत के अन्त में सबने व्यास-शिष्य लोमहर्षणजी से अपना संदेह पूछा।
मुनि बोले - साधुशिरोमणे! आप पुराण, तन्त्र, छहों शास्त्र, इतिहास तथा देवताओं और दैत्यों के जन्म-कर्म एवं चरित्र-सब जानते हैं। वेद, शास्त्र, पुराण, महाभारत तथा मोक्षशास्त्र में कोई भी बात ऐसी नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो। महामते! आप सर्वज्ञ हैं, अत: हम आपसे कुछ प्रश्नों का उत्तर सुनना चाहते हैं; बताईये, यह समस्त जगत् कैसे उत्पन्न हुआ? भविष्य में इसकी क्या दशा होगी? स्थावर-जगङमरूप संसार सृष्टि से पहले कहाँ लीन था और फिर कहाँ लीन होगा?
लोमहर्षणजी ने कहा - जो निर्विकार, शुद्ध, नित्य, परमात्मा, सदा एकरूप और सर्वविजयी हैं, उन भगवान् विष्णु को नमस्कार है। जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव रूप से जगत् की उत्पत्ति, पालन तथा संहार करने वाले हैं तथा जो भक्तों को संसार-सागर से तारने वाले हैं, उन भगवान् को प्रणाम है। जो एक होकर भी अनेक रूप धारण करते हैं, स्थूल और सूक्ष्म सब जिनके ही स्वरूप हैं, जो अव्यक्त (कारण) और व्यक्त (कार्य)-रूप तथा मोक्ष के हेतु हैं, उन भगवान् विष्णु को नमस्कार है। जो जगत् की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाले हैं, जरा और मृत्यु जिनका स्पर्श नहीं करतीं, जो सबके मूल कारण हैं, उन परमात्मा विष्णु को नमस्कार है। जो इस विश्व के आधार हैं, अत्यंत सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हैं, सब प्राणियों के भीतर विराजमान हैं, क्षर और अक्षर पुरुष से उत्तम तथा अविनाशी हैं, उन भगवान् विष्णु को प्रणाम करता हूँ। जो वास्तव में अत्यंत निर्मल ज्ञानस्वरूप है, किन्तु अज्ञानवश नाना पदार्थों के रूप में प्रतीत हो रही हैं, जो विश्व की सृष्टि और पालन में समर्थ एवं उसका संहार करने वाले हैं, सर्वज्ञ हैं, जगत् के अधीश्वर हैं, जिनके जन्म और विनाश नहीं होते, जो अव्यय, आदि, अत्यंत सूक्ष्म तथा विश्वेश्वर हैं, उन श्रीहरि को तथा ब्रह्मा आदि देवताओं को मैं प्रणाम करता हूँ। तत्पश्चात् इतिहास-पुराणों के ज्ञाता, वेद-वेदगङों के पारगङत विद्वान्, सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ पराशरनन्दन भगवान् व्यासको, जो मेरे गुरुदेव हैं, प्रणाम करके मैं वेदके तुल्य माननीय पुराण का वर्णन करूँगा। पूर्वकाल में दक्ष आदि श्रेष्ठ मुनियों के पूछने पर कमल योनि भगवान ब्रह्माजी ने जो सुनायी थी, वाही पापनाशिनी कथा मैं इस समय कहूँगा। मेरी वह कथा बहुत ही विचित्र और अनेक अर्थोंवाली होगी। उसमें श्रुतियों के अर्थ का विस्तार होगा। जो इस कथा को सदा अपने हृदय में धारण करेगा अथवा निरंतर सुनेगा, वह अपनी वंश-परम्परा को कायम रखते हुए स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होगा।
जो नित्य, सदसत्स्वरूप तथा कारणभूत अव्यक्त प्रकृति है, उसी को प्रधान कहते हैं। उसी से पुरुष ने इस विश्व का निर्माण किया है। मुनिवरो! अमिततेजस्वी ब्रह्माजी को ही पुरुष समझो। वे समस्त प्राणियों की सृष्टि करने वाले तथा भगवान् नारायण के आश्रित हैं। प्रकृति से महत्त्वत्त्व, महत्त्वत्त्व से अहकङारसे सब सूक्ष्म बहुत उत्पन्न हुए। भूतों के जो भेद हैं, वे भी उन सभी सूक्ष्म भूतों से ही प्रकट हुए हैं। यह सनातन सर्ग है। तदनन्तर स्वयम्भू भगवान् नारायण ने नाना प्रकार की प्रज्ञा उत्पन्न करने की इच्छा से सबसे पहले जल की ही सृष्टि की। फिर जल में अपनी शक्ति का आधान किया। जलका दूसरा नाम 'नार' है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति भगवान् नर से हुई है। वह जल पूर्वकाल में भगवान् का अयन (निवास स्थान) हुआ, इसलिये वे नारायण कहलाते हैं। भगवान् ने जो जल में अपनी शक्ति का आधान किया, उससे एक बहुत विशाल सुवर्णमय अण्ड प्रकट हुआ। उसी में स्वयम्भू ब्रह्माजी उत्पन्न हुए-ऐसा सुना जाता है। सुवर्ण के समान कान्तिमान् भगवान् ब्रह्मा ने एक वर्ष तक उस अण्ड में निवास करके उसके दो टुकड़े कर दिये। फिर एक टुकड़े से द्यलोक बनाया और दूसरे से भूलोक। उन दोनों के बीच में आकाश रखा। जल के ऊपर तैरती हुई पृथ्वी को स्थापित किया। फिर दसों दिशाएँ निश्चित कि। साथ ही काल, मन, वाणी, काम, क्रोध और रति की सृष्टि की। इन भावों के अनुरूप सृष्टि करने की इच्छा से ब्रह्माजी ने सात प्रजापतियों को अपने मन से उत्पन्न किया। उनके नाम इस प्रकार हैं-मरीचि, अत्रि, अग्ङिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा वसिष्ठ। पुराणों में ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं।
तत्पश्चात् ब्रह्माजी अपने रोष से रूद्र को प्रकट किया। फिर पूर्वजों के भी पूर्वज सनत्कुमारजी को उत्पन्न किया। इन्हीं सात महर्षियों से समस्त प्रज्ञा तथा ग्यारह रुद्रों का प्रादुर्भाव हुआ। उक्त सात महर्षियों के सात बड़े-बड़े दिव्य वंश हैं, देवता भी इन्हीं के अन्तर्गत हैं। उक्त सातों वंशों के लोग कर्मनिष्ठ एवं संतानवान् हैं। उन वंशों को बड़े-बड़े ऋषियों ने सुशोभित किया है। इसके बाद ब्रह्मा जी ने विद्युत्, व्रज, मेघ, रोहित, इन्द्रधनुष, पक्षी तथा मेघों की सृष्टि की। फिर यज्ञों की सिध्दि के लिये उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद प्रकट किये। तदनन्तर साध्य देवताओं की उत्पत्ति बतायी जाती है। छोटे-बड़े सभी भूत भगवान् ब्रह्मा के अग्ङों से उत्पन्न हुए हैं। इस प्रकार प्रजा की सृष्टि करते रहने पर भी जब प्रजा की वृध्दि नहीं हुई, तब प्रजापति अपने शरीर के दो भाग करके आधे से पुरुष और आधे से स्त्री हो गये। पुरुष का नाम मनु हुआ। उन्हीं के नाम पर 'मन्वन्तर' काल मन गया है। स्त्री आयोनिजा शतरूपा थी, जो मनु को पत्नी रूप में प्राप्त हुई। उसने दस हजार वर्षों तक अत्यंत दुष्कर तपस्या करके परम तेजस्वी पुरुष को पति रूप में प्राप्त किया। वे ही पुरुष स्वायम्भुव मनु कहे गये हैं ( वैराज पुरुष भी उन्हीं का नाम है)। उनका 'मन्वन्तर-काल' इकहत्तर चतुर्युगीका बताया जाता है। समान तेजस्वी पृथुका प्रादुर्भाव हुआ। वे भयानक टंकार करनेवाले आजगव नामक धनुष, दिव्य बाण तथा रक्षार्थ कवच धारण किये प्रकट हुए थे। उनके उत्पन्न होने पर समस्त प्राणी बड़े प्रसन्न हुए और सब ओर से वहाँ एकत्रित होने लगे। वेन स्वर्गगामी हुआ।
महात्मा पृथु-जैसे सत्पुत्र ने उत्पन्न होकर वेन को 'पुम्' नामक नरकसे छुड़ा दिया। उनका अभिषेक करने के लिये समुद्र और सभी नदियाँ रत्न एवं जल लेकर स्वयं ही उपस्थित हुईं। आग्ङिरस देवताओं के साथ भगवान् ब्रह्माजी तथा समस्त चराचर भूतों ने वहाँ आकर राजा पृथुका राज्याभिषेक किया। उन महाराज ने सभी प्रजा का मनोरञ्जन किया। उनके पिता ने प्रजा को बहुत दुःखी किया था, किन्तु पृथु ने उन सबको प्रसन्न कर लिया; प्रजा का मनोरञ्जन करने के कारण ही उनका नाम राजा हुआ। वे जब समुद्र की यात्रा करते, तब उसका जल स्थिर हो जाता था। पर्वत उन्हें जाने के लिये मार्ग दे देते थे और उनके रथ की ध्वजा कभी भग्ङ नहीं हुई। उनके राज्य में पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा करती थी। राजा का चिन्तन करने मात्र से अन्न सिद्ध हो जाता था। सभी गौएँ कामधेनु बन गयी थीं और पत्तों के दोने-दोने में मधु भरा रहता था । उसी समय पृथु ने पैतामह (ब्रह्माजी से सम्बन्ध रखने वाला)-यज्ञ किया। उसमें सोमाभिषवके दिन सूति (सोमरस निकलने की भूमि)- से परम बुध्दिमान् सुत की उत्पत्ति हुई। उसी महायज्ञ में विद्वान् मागध का भी प्रादुर्भाव हुआ। उन दोनों को महर्षियों ने पृथु की स्तुति करने के लिये बुलाया और कहा-'तुम लोग इन महाराज की स्तुति करो। यह कार्य तुम्हारे अनुरूप है और ये महाराज भी इसके योग्य पात्र हैं।' यह सुनकर सूत और मागध ने उन महर्षियों से कहा-'हम अपने कर्मों से देवताओं तथा ऋषियों को प्रसन्न करते हैं। इन महाराज का नाम, कर्म, लक्षण और यश-कुछ भी हमें ज्ञात नहीं है, जिससे इन तेजस्वी नरेश की हम स्तुति कर सकें। तब ऋषियों ने कहा-'भविष्य में होने वाले गुणों का उल्लेख करते हुए स्तुति करो।' उन्होंने वैसा ही किया। उन्होंने जो-जो कर्म बताये, उन्हीं को महाबली पृथु ने पीछे से पूर्ण किया। तभी से लोक में सूत, मागध और वन्दजनों के द्वारा आशीर्वाद दिलाने की परिपाटी चल पड़ी। वे दोनों जब स्तुति कर चुके, तब महाराज पृथु ने अत्यन्त प्रसन्न होकर अनूप देश का राज्य सूत को और मगध का मागध को दिया। पृथु को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुई प्रजा से महर्षियों ने कहा-'ये महाराज तुम्हें जीविका प्रदान करनेवाले होंगे।' यह सुनकर सारी प्रजा महात्मा राजा पृथु की ओर दौड़ी और बोली-'आप हमारे लिये जीविका का प्रबन्ध कर दें।' जब प्रजाओं ने उन्हें इस प्रकार घेरा, तब वे उनका हित करने की इच्छा से धनुष-बाण हाथ में ले पृथ्वी की और दौड़े। पृथ्वी उनके भय से थर्रा उठी और गौका रूप धारण करके भागी। तब पृथु ने धनुष लेकर भागती हुई पृथ्वी का पीछा किया। पृथ्वी उनके भय से ब्रह्मलोक आदि अनेक लोकों में गयी, किन्तु सब जगह उसने धनुष लिये हुए पृथु को अपने आगे ही देखा। अग्नि के समान प्रज्वलित तीखे बाणों के कारण उनका तेज और भी उद्यीप्त दिखायी देता था। वे महान् योगी महात्मा देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष प्रतीत होते थे। जब और कहीं रक्षा न हो सकी, तब तीनों लोकों की पूजनीया पृथ्वी हाथ जोड़कर फिर महाराज पृथु की ही शरण में आयी और इस प्रकार बोली-'राजन्! सब लोक मेरे ही ऊपर स्थित हैं। मैं ही इस जगत् को धारण करती हूँ। यदि मेरा हो जाय तो समस्त प्रजा नष्ट हो जायगी। इस बात को अच्छी तरह समझ लेना। भूपाल! यदि तुम प्रजा का कल्याण चाहते हो तो मेरा वध न करो। मैं जो बात कहती हूँ, उसे सुनो; ठीक उपाय से आरम्भ किये हुए सब कार्य सिद्ध होते हैं। तुम उस उपाय पर ही दृष्टिपात करो, जिससे इस प्रजा को जीवित रख सकोगे। मेरी हत्या करके भी तुम प्रजा के पालन-पोषण में समर्थ न होगे। महामते! तुम क्रोध त्याग दो, मैं तुम्हारे अनुकूल हो जाऊँगी। तिर्यग्योनिमें भी स्त्री को अवध्य बताया गया है; यदि यह बात सत्य है तो तुम्हें धर्म का त्याग नहीं करना चाहिये।'
पृथु ने कहा - भद्रे! जो अपने या पराये किसी एक के लिये बहुत-से प्राणियों का वध करता है, उसे अनन्त पातक ल्र्गता है; परन्तु जिस अशुभ व्यक्ति का वध करने पर बहुत-से लोग सुखी हों, उसको मारने से पातक या उपपातक कुछ नहीं लगता। अत: वसुन्धरे। मैं प्रजा का कल्याण करने के लिये तुम्हारा वध करूँगा। यदि मेरे कहने से आज संसार का कल्याण नहीं करोगी तो अपने बाण से तुम्हारा नाश कर दूँगा और अपने को ही पृथ्वी रूप में प्रकट करके स्वयं ही प्रजा को धारण करूँगा; इसलिये तुम मेरी आज्ञा मानकर समस्त प्रजा की जीवन-रक्षा करो; क्योंकि तुम सबके धारण में समर्थ हो। इस समय मेरी पुत्री बन जाओ; तभी मैं इस भयक्ङर बाण को, जो तुम्हारे वध के लिये उद्यत है, रोकूँगा।
पृथ्वी बोली - वीर! नि:संदेह मैं यह सब कुछ करुँगी। मेरे लिये कोई बछड़ा देखो, जिसके प्रति स्त्रेहयुक्त होकर मैं दूध दे सकूँ। धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भूपाल! तुम मुझे सब और बराबर कर दो, जिससे मेरा दूध सब और बह सके।
तब राजा पृथु ने अपने धनुष की नोक से लाखों पर्वतों को उखाड़ा और उन्हें एक स्थान पर एकत्रित किया। इससे पर्वत बढ़ गये। इससे पहले की सृष्टि में भूमि समतल न होने के कारण पुरों अथवा ग्रामों का कोई सीमाबद्ध विभाग नहीं हो सका था। उस समय अन्न, गोरक्षा, खेती और व्यापार भी नहीं होते थे। यह सब तो वेन-कुमार पृथु के समय से ही आरम्भ हुआ है। भूमिका जो-जो भाग समतल था, वहीँ-वहीँ पर समस्त प्रजा ने निवास करना पसंद किया। उस समय तक प्रजा का आहार केवल फल-मूल ही था और वह भी बड़ी कठिनाई से मिलता था। रजा पृथु ने स्वायम्भुव मनु को बछड़ा बनाकर अपने हाथों में ही पृथ्वी को दुहा। उन प्रतापी नरेशने पृथ्वी से सब प्रकार के अन्नों का दोहन किया। उसी अन्न से आज भी सब प्रजा जीवन धारण करती है। उस समय ऋषि, देवता, पितर, नाग, दैत्य, यक्ष, पुण्यजन, गन्धर्व, पर्वत और वृक्ष-सबने पृथ्वी को दुहा। उनके दूध, बछड़ा, पात्र और दुहनेवाला- ये सभी पृथक्-पृथक् थे। ऋषियों के चन्द्रमा बछड़ा बने, बृहस्पति ने दुहने का काम किया, तपोमय ब्रह्म उनका दूध था और वेद ही उनके पात्र थे। देवताओं ने सुवर्णमय पात्र लेकर पुष्टिकारक दूध दुहा। उनके लिये इन्द्र बछड़ा बने और भगवान् सूर्य ने दुहने का काम किया। पितरोंका चाँदी का पात्र था। प्रतापी यम बछड़ा बने, अन्तकने दूध दुहा। उनके दूध को 'स्वधा' नाम दिया गया है। नागों ने तक्षक को बछड़ा बनाया। तुम्बी का पात्र रखा। ऐरावत नाग से दुहने का काम लिया और विषरूपी दुग्ध का दोहन किया। असुरों में मधु दुहने वाला बना। उसने मायामय दूध दुहा। उस समय विरोचन बछड़ा बना था और लोहे के पात्र में दूध दुहा गया था। यक्षों का कच्चा पात्र था। कुबेर बछड़ा बने थे। रजतनाभ यक्ष दुहनेवाला था और अन्तर्धान होने की विद्या ही उनका दूध था। राक्षसेन्द्रों में सुमाली नामक राक्षस बछड़ा बना। रजतनाभ दुहनेवाला था। उसने कपालरुपी पात्र में शोणितरुपी दूध का दोहन किया। गन्धर्वों में चित्ररथने बछड़े का काम पूरा किया। कमल ही उनका पात्र था। सुरुचि दुहनेवाला था और पवित्र सुगन्ध ही उनका दूध था। पर्वतों में महागिरि मेरु ने हिमवान् को बछड़ा बनाया और स्वयं दुह्नेवाला बनकर शिलामय पात्र में रत्नों एवं ओषधियों को दूध के रूप में दूहा। वृक्षों में प्लक्ष (पाकड़) बछड़ा था। खिले हुए शाल के वृक्ष ने दुहने का काम किया। पलाश का पात्र था और जलने तथा कटने पर पुन: अङ्कुरित हो जाना ही उनका दूध था।
इस प्रकार सबका धारण-पोषण करनेवाली यह पावन वसुन्धरा समस्त चराचर जगत् की आधारभूता तथा उत्पत्ति स्थान है। यह सब कामनाओं को देने वाली तथा सब प्रकार के अन्नों को अङ्कुरित करने वाली है। गोरुपा पृथ्वी मेदिनीके नाम से विख्यात है। यह समुन्द्र तक पृथु के ही अधिकार में थी। मधु और कैटभके मेद से व्याप्त होने के कारण यह मेदिनी कहलाती है। फिर राजा पृथु की आज्ञा के अनुसार भूदेवी उनकी पुत्री बन गयी, इसलिये इसे पृथ्वी भी कहते हैं। पृथु ने इस पृथ्वी का विभाग और शोधन किया, जिससे यह अन्न की खान और समृध्दिशालिनी बन गयी। गाँवों और नगरों के कारण इसकी बड़ी शोभा होने लगी। वेन-कुमार महाराज पृथु का ऐसा ही प्रभाव था। इसमें संदेह नहीं कि वे समस्त प्राणियों के पूजनीय और वन्दनीय हैं। वेद-वेदाङ्गों के पारङ्गत विद्वान् ब्राहामणों को भी महाराज पृथु की ही वन्दना करनी चाहिये, क्योंकि वे सनातन ब्रह्मयोनि हैं। राज्य की इच्छा रखने वालेराजाओं के लिये भी परम प्रतापी महाराज पृथु ही वन्दनीय हैं। युद्ध में विजय की कामना करने वाले पराक्रमी योध्दाओं को भी उन्हें मस्तक झुकाना चाहिये। क्योंकि योध्दाओं में वे अग्रगण्य थे। जो सैनिक राजा पृथु का नाम लेकर संग्राम में जाता है, वह भयङ्कर संग्राम से भी सकुशल लौटता है और यशस्वी होता है। वैश्यवृत्ति करने वाले धनी वैश्यों को भी चाहिये कि वे महाराज पृथु को नमस्कार करें, क्योंकि राजा पृथु सबके वृत्तिदाता और परम यशस्वी थे। इस संसार में परमकल्याण की इच्छा रखनेवाले तथा तीनों वर्णों की सेवा में लगे रहने वाले पवित्र शूद्रों के लिये भी राजा पृथु ही वन्दनीय हैं। इस प्रकार जहाँ पृथ्वी को दुहने के लिये जो विशेष-विशेष बछड़े, दुहने वाले, दूध तथा पात्र कल्पित किये गये थे, उन सबका मैंने वर्णन किया।
Summary of chapter 1 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
In the sacred Naimiṣāraṇya forest, sages engaged in a twelve-year sacrifice invite Lomaharṣaṇa (Sūta), disciple of Vyāsa, to narrate the Purāṇa. After offering obeisance to Nārāyaṇa, Nara, and Sarasvatī, Lomaharṣaṇa glorifies Puruṣottama as the eternal, all-pervading source of creation, sustenance, and dissolution. He explains that Pradhāna (the unmanifest cause) is eternal; from it Puruṣa evolves the universe; from Mahat arises Ahaṃkāra, and from Ahaṃkāra arise the five Bhūtas (elements) that give birth to all living beings. The discourse establishes the Purāṇa's philosophical foundation and describes the primordial origin of Devas and Asuras from this cosmic process.