ब्रह्म महा पुराण
58 - लक्ष्मीतीर्थ और भानुतीर्थका माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते हैं - नारद! विष्णुतीर्थ के बाद लक्ष्मीतीर्थ है, जो लक्ष्मीकी वृद्धि और दरिद्रता का नाश करनेवाला है। उसका पवित्र इतिहास बतलाता हूँ, सुनो। पूर्वकाल की बात है- लक्ष्मी और दरिद्रा देवी में संवाद हुआ। वे दोनों एक-दूसरीका विरोध करती हुई संसार में आयीं। तीनों लोकों में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जहाँ ये व्याप्त न हों। दोनों ही कहने लगीं- मैं बड़ी हूँ, मैं बड़ी हूँ। लक्ष्मी ने युक्ति दी- 'देहधारियों का कुल, शील और जीवन मैं ही हूँ। मेरे बिना वे जीते हुए भी मिरतक के समान हैं।' दरिद्रा ने भी तर्क उपस्थित किया- 'मैं भी सबसे बड़ी हूँ। क्योंकि मुक्ति सदा मेरे ही अधीन है। जहाँ मैं हूँ, वहाँ काम, क्रोध, मद, लोभ और मात्सर्य-ये दोष कभी नहीं रहते। भय, उन्माद, ईर्ष्या और उदण्डताका भी अभाव रहता है।' दरिद्राकी बात सुनकर लक्ष्मीने प्रतिवाद किया- 'मुझसे अलंकृत होनेपर सभी प्राणी सम्मानित होते हैं। निर्धन मनुष्य शिव के ही तुल्य क्यों न हो, सबके द्वारा तिरस्कृत होता रहता है। 'मुझे कुछ दीजिए' यह वाक्य मुँहसे निकालते ही बुद्धि, श्री, लज्जा, शान्ति और कीर्ति- ये शरीर के पाँच देवता तुरंत निकलकर चल देते हैं। गुण और गौरव तभीतक टिके रहते हैं, जबतक मनुष्य दूसरों के सामने हाथ नहीं फैलाता। जब पुरुष याचक बन गया, तब कहाँ गुण और कहाँ गौरव। जीव तभीतक सबसे उत्तम, समस्त गुणोंका भंडार और सब लोगों का वन्दनीय रहता हिया, जबतक वह दूसरेसे याचना नहीं करता। प्राणियों के लिए निर्धनता सबसे बड़ा कष्ट और पाप है। क्योंकि निर्धन मनुष्य को न तो कोई आदर देता, न उससे बात करता और न उसका स्पर्श ही करता है।* अत: दरिद्रे! मैं ही श्रेष्ठ हूँ। तू मेरी बात कान खोलकर सुन ले।'
लक्ष्मीका यह दर्पयुक्त वचन सुनकर दरिद्रा बोले- 'लक्ष्मी! मैं बड़ी हूँ- यह बारंबार कहते तुझे लज्जा नहीं आती? तू श्रेष्ठ पुरुषोंको छोड़कर सदा पापियोंमें ही रमती रहती है। जो तेरा विश्वास करता है, उसके साथ तू वञ्चना करती है। फिर बड़ी-बड़ी डीगें कैसे हाँक रही है। तेरे मिलने [आर मनुष्य को जैअसा भारी पश्चात्ताप सहना पड़ता है, वैसा उसे सुख नहीं मिलता। मदिरा पीने से भी पुरुष को वैसा भयंकर नशा नहीं होता, जैसा तेरे समीप रहने मात्रसे विद्वानोंको भी हो जाता है। लक्ष्मी! तू सदा प्राय: पापियोंके साथ ही क्रीड़ा करती है। मैं योग्य और धर्मशील पुरुषों में सदा निवास करती हूँ। भगवान् शिव और श्रीविष्णु के भक्त, क्रितज्ञ, महात्मा, सदाचारी, शान्त, गुरुदेवा-परायण, साधु, विद्वान, शूरवीर तथा पवित्र बुद्धिवाले श्रेष्ठ पुरुषों में मेरा निवास है। अत: श्रेष्ठता तो सदा मुझमें ही है। तेजस्वी ब्राहमण, व्रतपरायण सन्यांसी तथा निर्भय मनुष्यों के साथ मैं रहा करती हूँ। किन्तु तू कहाँ रहती है- यह भी सुन ले।पापपरायण राजकर्मचारी, निष्ठुर, खल, चुगलखोर, लोभी, विकृताङ्ग, शठ, अनार्य, कृतघ्न, धर्मघाती, मित्रद्रोही, अनिष्टकारी तथा हृदयहीन मनुष्यों में ही तेरानिवास है।
इस तरह विवाद करती हुई वे दोनों मेरे पास आयीं। मैंने उनकी बातें सुनीं और इस प्रकार कहा- 'पृथ्वी तथा आप (जल)- ये दोनों देवियाँ मुझसे ही प्रकट हुई हैं। स्त्री होने के कारण वे ही स्त्रीके विवाद को समझ सकती हैं और कोई नहीं। उनमें भी जो कमण्डलुसे प्रकट होनेवाली नदियाँ हैं, वे श्रेष्ठ हैं। उन सरिताओं में भी गौतमी देवी तो सर्वश्रेष्ठ हैं। अत: वे ही तुम्हारे विवादका निर्णय करेंगी। वे ही सबकी पीड़ाओंको हरनेवाली तथा सबके संदेहका निवारण करनेवाली हैं।' मेरे कहने से वे दोनों पृथ्वी और जल के पास गयीं और उन सबको साथ ले गौतमीदेवी के समीप पहुँचीं। भूदेवी और आपोदेवी ने गौतमी से लक्ष्मी और दरिद्राका विवाद स्पष्ट रूप से कह सुनाया। उन दोनों के विवाद को समस्त लोकपाल, पृथ्वी और जल- ये मध्यस्थकी भाँति सुन रहे थे।
उस समय गङ्गा दरिद्रासे कहा- 'ब्रह्मश्री, तप:श्री, यज्ञश्री, कीर्ति, धनश्री, यश:श्री, विद्या, प्रज्ञा, सरस्वती, भोगश्री, मुक्ति, स्मृति, लज्जा, धृति, क्षमा, सिद्धि, तुष्टि, पुष्टि, शान्ति, जल, पृथ्वी, अहंशक्ति, ओषधि, श्रुति, शुद्धि, रात्रि, द्युलोक, ज्योत्स्त्रा, आशी:, स्वस्ति, व्याप्ति, माया, उषा, शिवा आदि जो कुछ भी संसार में विद्यमान है, वह सब लक्ष्मी के द्वारा व्याप्त है। ब्राह्मण, धीर, क्षमावान्, साधु, विद्वान्, भोगपरायण तथा मोक्षपरायण पुरुषोंमें जो-जो रमणीय अथवा सुंदर है, वह सब लक्ष्मी का ही विस्तार है। अधिक सुनने से क्या लाभ- समस्त जगत् लक्ष्मीमाय ही है। जिस किसी व्यक्ति में जो कुछ भी उत्कृष्ट वस्तु दिखायी देती है, वह सब लक्ष्मीमय है। लक्ष्मी से शून्य कोई वस्तु नहीं है। दरिद्रे! क्या तू इन सुन्दरी लक्ष्मीदेवीके साथ स्पर्द्धा करती हुई लज्जित नहीं होती? जा, चली जा यहाँ से।'
तबसे गङ्गाका जल दरिद्राका शत्रु हो गया। तभीतक दरिद्रता का कष्ट उठाना पड़ता है, जबतक गङ्गाजी का सेवन न किया जाय। तबसे लक्ष्मीतीर्थ अलक्ष्मीनाशक हो गया। वहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य लक्ष्मीवान् तथा पुण्यवान् होता है। महामते! वहाँ देवताओं तथा ऋषि-मुनियों द्वारा सेवित छ: हजार तीर्थ हैं, जो सब-के-सब सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं।
तदनन्तर विख्यात भानुतीर्थ है, जो मनुष्यों को सब प्रकार की सिद्धि देनेवाला है। वहाँका वृत्तान्त महापातकोंका नाश करनेवाला है। उसे बतलाता हूँ, सुनो। शर्याति नाम से विख्यात एक परम धर्मात्मा राजा थे। उनकी स्त्रीका नाम स्थविष्ठा था। रानी इस भूतलपर अप्रियतम सुन्दरी थी। संयमी पुरुषों में श्रेष्ठ विश्वामित्रकुमार ब्रह्मर्षि मधुच्छन्दा राजा शर्याति के पुरोहित थे। एक समयकी बात है- वीरवर राजा शर्याति अपने पुरोहितको साथ ले दिग्विजयके लिए निकले। सम्पूर्ण दिशाओं पर विजय पाकर लौटते समय राजा ने मार्ग में सेना का पड़ाव डाला। उस समय उन्होंने अपने पुरोहित को उदास देखकर पूछा- 'विप्रवर! आप खिन्न क्यों हैं? मैंने पृथ्वीको जीता और बड़े-बड़े राजाओंपर विजय पायी, यह तो महान् हर्षका अवसर है। ऐसे समय में आप दु:खी क्यों हैं? सच-सच बताइये।' तब मधुच्छन्दाने राजा को सम्बोधित करके कहा- 'राजन्! जब एक पहर दिन रहेगा, तब हमलोग यात्रा करेंगे। इसी में रात आधि बीत जायगी। उधर इस शरीर की स्वामिनी मेरी प्रियतमा काम के वशीभूत होकर मेरी राह देखती है। उसका स्मरण करके मेरा शरीर सूखा जाता है। कामजनित विकार उत्पन्न होनेपर वह कमलके समान मुखवाली सुन्दरी जीवित तो मिलेगीन?'
यह सुनकर राजा हँस पड़े और पुरोहित से बोले- 'ब्राह्मन्! आप मेरे गुरु और मित्र हैं। फिर अपने-आपको क्यों विडम्बनामें डाल रहे हैं। संसार का सुख तो क्षणभङ्गुर है। उसमें आप-जैसे महात्माओं की आस्था कैसी।' मधुच्छन्दा बोले- 'राजन्! जहाँ पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के अनुकूल रहते हैं, वहीं धर्म, अर्थ और काम की वृद्धि होती है। अत: अपनी पत्नीके प्रति यह अनुराग दूषण नहीं, भूषन ही मन्ना चाहिये।'
तदनन्तर राजा विशाल सेना के साथ अपने देश में आये। उन्होंने पत्नी के प्रेमकी परीक्षा करनेके लिये नगरसे यह संदेश भेज दिया- 'राजा शर्याति दिग्विजयके लिये गये थे। वहाँ एक राक्षस पुरोहितसहित राजाको मारकर रसातलमें चला गया।' दूत के मुखसे यह संदेश सुनकर रानी इसकी सत्यताका पता लगाने लगीं, किन्तु मधुच्छन्दाकी पत्नी ने तुरंत प्राण त्याग दिये। यह एक अद्भुत बात हो गयी। दूतोंने उसकी मृत्यु का हाल महाराज से जाकर कहा। साथ ही रानियों की चेष्टा भी बतायी। इससे राजा को बड़ा विस्मय और दु:ख हुआ; उन्होंने दूतों से कहा- 'तुमलोग जाकर ब्राह्मणी के शरीर की रक्षा करो और नगर में यह बात फैला दो कि राजा अपने पुरोहित के साथ राजधानी में आ रहे हैं।'
यों कहकर राजा चिंता से व्याकुल हो उठे। इसी समय आकाशवाणी हुई- 'राजन्! इस पृथ्वीपर गौतमी गङ्गा सब प्रकारके संकटोंकी शान्ति करनेवाली तथा पावन हैं, वे आपका सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध करेंगी।' आकाशवाणी सुनकर शर्याति गौतमीके तटपर गये। उन्होंने ब्राह्मणों को धन दिया, पितरों और द्विजोंको तृप्त किया और अपने पुरोहित को धनके साथ यह कहकर भेजा- 'आप अन्य तीर्थोंमें जाकर धन-दान करें।' राजा का यह सब कार्य पुरोहित नहीं जानते थे। उनके चले जानेपर राजाने सेनाको भी भेज दिया और स्वयं अकेले ही गङ्गातटपर रह गये। उन्होंने गङ्गा, सूर्य तथा देवताओंको सुनकर कहा- 'यदि मैंने दान, होम और प्रजा-पालन किया हो तो इस सत्यके प्रभावसे वह पतिव्रता ब्रह्माणी मेरी आयु लेकर जीवित हो जाय।' यों कहकर राजा अग्नि में प्रवेश कर गये। उसी समय पुरोहितकी पत्नी जीवित हो गयी।
राजगुरु मधुच्छन्दा को जब यह बात मालूम हुई कि 'राजा अग्निमें प्रवेश कर गये, मेरी पतिव्रता पत्नी मरकर फिर जी उठी और उसीके लिए महाराज ने अपने जीवनका परित्याग किया है,' तब उनका ध्यान अपने कर्तव्यकी ओर गया। उन्होंने सोचा- 'मैं भी अग्नि में प्रवेश करके अपने प्रिय मित्र के पास जाऊँ अथवा यहीं रहकर तपस्या करूँ?' अन्त में वे इस निश्चयपर पहुँचे कि' मेरा कर्तव्य तथा पुण्यकार्य यही है कि पहले राजा को जीवित करूँ, उसके बाद प्रियाके पास जाऊँ।' यह विचारकर उन्होंने सूर्यदेव का स्तवन किया, क्योंकि उनके सिवा दूसरा कोई सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला नहीं है।
मधुच्छन्दा बोले - मुक्तिस्वरूप, अमित तेजस्वी भगवान् सूर्यको नमस्कार है। ओंकारके अर्थभूत छन्दोमय देवको नमस्कार है। जो विरूप, सुरूप, त्रिगुण, त्रिमूर्ति, सृष्टि, पालन और संहार के हेतु तथा सबके प्रभु हैं, उन भगवान् सूर्यको नमस्कार है।
इस स्त्रोत्रसे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्य ने कहा- 'कोई वर माँगो।' मधुच्छन्दा बोले- 'देवेश्वर! राजा का जीवनदान दीजिए। प्रिय वचन बोलनेवाली मेरी पत्नीको भी जीवित रखिये और मुझे तथा राजा के लिए भी उत्तम पुत्र प्रदान कीजिये।' जगदीश्वर भगवान् सूर्य ने रत्नमय आभूषणों से विभूषित राजा शर्यातिको जीवित करके दे दिया, ब्राहमणकी पत्नीको भी जिलाया तथा और भी श्रेष्ठ एवं कल्याणमय वर प्रदान किये। तदनन्तर राजा प्रसन्न हो पुरोहित के साथप्रियजनोंसे घिरे हुए सुखपूर्वक अपने देशको गये। उस स्थानपर तीन हजार गुणवान् तीर्थों का निवास है। मुने! उसी समयसे उस स्थान का नाम भानुतीर्थ, मृतसंजीवनतीर्थ, शर्यातितीर्थ और माधुच्छन्दसतीर्थ हो गया। वह स्मरणमात्र से पापोंको दूर भगाता है। उन तीर्थों में किया हुआ स्नान और दान सम्पूर्ण यज्ञोंका फल देनेवाला है।
* देहीति वचनद्वारा देहस्था: पञ्च देवता:। सद्यो निर्गत्य गच्छन्ति धीश्रीह्रीशान्तिकीर्तय: ॥
तावद् गुणा गुरुत्वं च यावन्नार्थयतेपरम्। अर्थी चेत् पुरुषो जात: क्व च गौरवम् ॥
तावत्सर्वोत्त्मो जन्तुस्तावत्सर्वगुणालय:। नमस्य: सर्वलोकानां यावन्नार्थयते परम् ॥
कष्टमेतन्महत्पापं निर्धनत्वं शारीरिणाम्। न मानयति नो वक्ति न स्पृशत्यधनं जन: ॥
(१३७।१०-१३)
Summary of chapter 57 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
The proper ritual procedure for taking a sacred bath (snāna) in the ocean at the Puruṣottama kṣetra is described — the prescribed mantra recitations, the times and conditions for the sacred bath, the accompanying rites, and the spiritual attitude required. A bath in the ocean here is declared to surpass the merit of a thousand horse sacrifices and to purify the devotee of all accumulated sin.