ब्रह्म पुराण

32 - मत्स्यमाधवकी महिमा, समुद्र में मार्जन आदिकी विधि, अष्टाक्षर-मन्त्रकी महत्ता, स्नान, तर्पण-विधि तथा भगवान् की पुजाका वर्णन

ब्रह्माजी कहते हैं - श्वेतमाधवका दर्शन करके उनके समीप ही मत्स्यमाधव का दर्शन करे। जो भगवान् पहले एकार्णवके जलमें मत्स्यरूप धारण करके वेदोंका उद्धार करनेके लिए रसातलमें स्थित थे, वे ही मत्स्यमाधव कहलाते हैं। वे भगवान् के आदि अवतार हैं। पहले पृथ्वी का चिंतन करके उसपर प्रतिष्ठित हुए भगवान् को प्रणाम करे। ऐसा करनेसे मनुष्य सब दु:खोंसे मुक्त हो जाता है और उस वैकुण्ठधाम में जाता है, जहाँ साक्षात् भगवान् श्रीहरि विराजमान रहते हैं। मुनिवरो! इस प्रकार मैंने मत्स्यमाधवके माहात्म्यका वर्णन किया।

मुनियों ने कहा - भगवन्! समुद्रमेंजो मार्जन और स्नान-दान आदि किया जाता है, उसका फल बतलाइये।

ब्रह्माजी बोले - मुनिवरो! मार्जनकी विधि सुनो। मार्कण्डेयह्रदका स्नान पूर्वाह्णकाल में उत्तम माना गया है। विशेषत: चतुर्दशीको उसमें किया हुआ स्नान सब पापों का नाश करनेवाला है। समुद्रका स्नान सब समय उत्तम होता है, विशेषत: पूर्णिमाको उसमें स्नान करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। मार्कण्डेयह्रद, अक्षयव, श्रीकृष्ण-बलराम, समुद्र तथा इन्द्रद्युम्न- ये पुरुषोत्तमक्षेत्रके पाँच तीर्थ हैं। जब ज्येष्ठ मास्की पूर्णिमाको ज्येष्ठा नक्षत्र हो तब विशेषरूप से तीर्थराज समुद्रकी यात्रा करनी चाहिए। उस समय मन, वाणी और शरीर से शुद्ध हो भगवान्में मन लगाये रहे और कहीं मन को न ले जाए। सब प्रकार के द्वंदोंसे मुक्त रहे, राग और द्वेषको दूर कर दे। कल्पवृक्षवट बहुत रमणीय स्थान है, वहाँ स्नान करके एकाग्र चित्त से तीन बार भगवान् जनार्दनकी परिक्रमा करे। उनके दर्शन से सात जन्मों के आपोन से छुटकारा मिल जाता है। प्रचुर पुण्य तथा अभीष्ट गतिकी प्राप्ति होती है। प्रत्येक युग के अनुसार वटके नाम और प्रमाण बतलाये जाते हैं। वट, वटेश्वर, कृष्ण तथअ पुराणपुरुष- ये सत्य आदि युगोंमें क्रमशःवटके नाम कहे गये हैं। सत्ययुगमें वटका विस्तार एक योजन, त्रेतामें पौन योजन, द्वापर में आधा योजन और कलियुगमें चौथाई योजन का माना गया है। पहले बताये हुए मन्त्रसे वटको नमस्कार करके वहाँ तीन सौ धनुषकी दूरीपर दक्षिण दिशाकी ओर जाय। वन भगवान् विष्णुका दर्शन होता है। उसे मनोरम स्वर्गद्वार कहते हैं। वहाँ समुद्रके जलसे आकृष्ट सर्वगुणसम्पन्न काष्ठ है, उसे प्रणाम करके पूजन करनेपर मनुष्य सम्पूर्ण रोगों तथा पापग्रह आदिकी पीड़ासे मुक्त हो जाता है।

स्वर्गद्वार से समुद्रपर आकर आचमन करे तथा पवित्र भाव से भगवान् नारायण का ध्यान करके उनके अष्टाक्षर-मन्त्रसे अङ्गन्यास और करन्यास करे। मनको भुलावेमें डालनेवाले अन्य बहुत-से मन्त्रोंकी क्या आवश्यकता है, 'ॐ नमो नारायणाय'- यह अष्टाक्षर-मन्त्र ही सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। नरसे प्रकट होनेके कारण जलको नार कहते हैं। वह पूर्वकाल में भगवान् विष्णुका अयन (निवासस्थान) रहा है, इसलिये उन्हें नारायण कहते हैं। समस्त वेदों का तात्पर्य भगवान् नारायणमें ही है। सम्पूर्ण द्विज नारायणकी ही उपासनामें तत्पर रहते हैं। यज्ञों और क्रियाओंकी समाप्ति भी नारायणमें ही है। पृथ्वी नारायणपरक है। जल नारायणपरक है। अग्नि नारायणपरक है और आकाश भी नारायणपरक है। वायु और मनके आश्रय भी नारायण ही हैं। अहंकार और बुद्धि दोनों नारायणस्वरुप हैं। बहुत, वर्तमान तथा आनेवाले सभी जीव, स्थूल और सूक्ष्म-सब कुछ नारायणस्वरुप है। शब्द आदि विषय, श्रवण आदि इन्द्रियाँ, प्रकृति और पुरुष- सभी नारायणस्वरुप हैं। जल, स्थल, पाताल, स्वर्गलोक, आकाश तथा पर्वत- इन सबको व्याप्त करके भगवान् नारायण स्थित हैं। अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, ब्रह्मा आदि से लेकर तृणपर्यन्त समस्त चराचर जगत् नारायणस्वरुप है। ब्राह्मणो! मैं नारायणसे बढ़कर यहाँ कुछ नहीं देखता। यह दृश्य-अदृश्य, चर-अचर- सब उन्हींके द्वारा व्याप्त है। जल भगवान् विष्णुका घर है और विष्णु ही जल के स्वामी हैं। अत: जल में सर्वदा पापहारी नारायणका स्मरण करना चाहिये। विशेषत: स्नानके समय जल में उपस्थित हो पवित्र भाव से नारायणका ध्यान करे और हाथ तथा शरीर में नामाक्षरों का न्यास करे। ओंकार और नकारका दोनों हाथों के अँगूठेमें तथा शेष अक्षरोंका तर्जनी आदि के क्रमसे करतल और करपृष्ठोंतक न्यास करे। 'ॐ' करका बायें और 'न' करका दायें चरण में न्यास करे। कटिके बायें भाग में 'मो' का और दायें भाग में 'ना' का न्यास करे। 'रा' का नाभिदेशमें, 'य' का बायीं भुजा में, 'णा' का दाहिनी भुजा में और 'य' का मस्तकपर न्यास करे। नीचे-ऊपर, हृदय में, पार्शवभाग में, पीठकी ओर तथा अग्रभाग में श्रीनारायणका ध्यान करके विद्वान पुरुष कवचका पाठ आरम्भ करे। 'पूर्वमें गोविन्द, दक्षिणमें मधुसूदन, पश्चिमकी ओर श्रीधर, उत्तर में केशव, अग्निकोण में विष्णु, नैर्ऋत्यमें अविनाशी माधव, वायव्यमें हृषीकेश, ईशान में वामन, नीचे वाराह और ऊपर भगवान् त्रिविक्रम मेरी रक्षा करें।'

इस प्रकार कवचका पाठ करके निम्नाङ्कित मन्त्रोंका उच्चारण करे-

त्वमग्निर्द्विपदां नाथ रेतोधा: कामदीपन: ।

प्रधान: सर्वभूतानां जीवानां प्रभुरव्यय: ॥

अमृतस्यारणिस्त्वं हि देवयोनिरपां पते ।

वृजिनं हर मे सर्वं तीर्थराज नमोऽस्तु ते ॥

'नाथ! आप अग्नि हैं, मनुष्य आदि सब जीवों के वीर्यका आधान और कामका दीपन करनेवाले हैं। सम्पूर्ण भूतों में प्रधान हैं तथा जीवों के अविनाशी प्रभु हैं। समुद्र! आप अमृतकी उत्पत्तिके स्थान तथा देवताओंकी योनि हैं। तीर्थराज! आप मेरे सब पाप हर लें। आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार विधिवत् उच्चारण करके स्नान करना चाहिये, अन्यथा वह स्नान उत्तम नहीं माना जाता। वैदिक मन्त्रों से अभिषेक और मार्जन करके जल में डुबकी लगा तीन बार अघमर्षण-मन्त्रका जप करे। जैसे अश्वमेध यज्ञ सब पापोंको दूर करनेवाला है, वैसे ही अघमर्षण-सूक्त सब पापोंका नाशक है। स्नान के पश्चात् जल से निकलकर दो निर्मल वस्त्र धारण करे। फिर प्राणायाम, आचमन एवं संध्योपासन करके ऊपर की ओर फूल और जल डालकर सूर्योपस्थान करे। उस समय अपनी दोनों भुजाएँ ऊपरकी ओर उठाये रखे। तदनन्तर गायत्री-मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे। गायत्रीके अतिरिक्त सूर्यदेवतासम्बन्धी अन्य मन्त्रों का भी एकाग्रचित्त से खड़ा होकर जप करे। फिर सूर्य की प्रदक्षिणा और उन्हें नमस्कार करके पूर्वाभिमुख बैठकर स्वाध्याय करे। उसके बाद देवता और ऋषियोंका तर्पण करके दिव्य मनुष्यों और पितरोंका भी तर्पण करे। मन्त्रवेत्ता पुरुषको चाहिये कि चित्तको एकाग्र करके तिलमिश्रित जलके द्वारा नामगोत्रोच्चारणपूर्वक पितरोंकी तृप्ति करे। पहले देवताओंका तर्पण करने के पश्चात् ही द्विज पितरो के तर्पणका अधिकारी होता है। श्राद्ध और हवन के समय एक हाथ से सब वस्तुएँ अर्पित करे, परन्तु तर्पणमें दोनों हाथों का उपयोग करना चाहिये। यही सदा की विधि है। बायें और दायें हाथ की सम्मिलित अञ्जलिसे नाम-गौत्रके साथ 'तृप्यताम्' बोलकर मौनभाव से जल दे।* अपने अङ्गोंमें स्थित तिलके द्वारा देवताओं और पितरों का तर्पण न करे। वैसे तिलोंके साथ दिया हुआ जल रूधिरके तुल्य होता है। उसे दीवाला पापका भागी होता है। मुनिवरो! यदि दाता जलमें स्थित होकर पृथ्वीपर जल दे तो वह व्यर्थ होता है, किसीके पास नहीं पहुँचता। जो मनुष्य स्थल में खड़ा होकर जलमें जल देता है, उसका दिया हुआ जल भी पितरोंको नहीं मिलता, व्यर्थ जाता है। अत: जल में कदापि पितरोंको जल न दे, बल्कि वहाँ से निकलकर पवित्र देश में जल द्वारा तर्पण करना चाहिये। न जल में, न पात्र में, न कुपित होकर और न एक हाथ से ही जल दे। जो पृथ्वीपर नहीं दिया जाता, वह जल पितरों तक नहीं पहुँचता। मैंने पितरों के लिए अक्षय स्थानके रूप में पृथ्वी ही दी है, अत: उनकी प्रीति चाहनेवाले पुरुषों को पृथ्वीपर ही जल देना चाहिये। पितर भूमिपर ही उत्पन्न हुए, भूमिपर ही रहे और भूमि में ही उनके शरीरका लय हुआ। अत: भूमिपर ही उनके लिये जल देना चाहिये। अग्नभागसहित कुशोंको बिछाकर उसपर मन्त्रों द्वारा देवताओं और पितरोंका आवाहन करना चाहिये। पूर्वाग्र कुशोंपर देवताओंका और दक्षिणाग्र कुशोंपर पितरोंका आवाहन करना उचित है।

देवताओं और अन्यान्य पितरोंका तर्पण करनेके पश्चात्मौनभावसे आचमन करके समुद्रके तटपर एक हाथ का चौकोर मण्डल बनाये। उसमें चार दरवाजे रहें। उसके भीतर कर्णिकासहित अष्टदल कमल की आकृति बनाये। इस प्रकार मण्डल बनाकर उसमें अष्टाक्षर-मन्त्रकी विधिसे अजन्मा भगवान् नारायण का पूजन करे। अब शरीर-शुद्धि की उत्तम विधि बतलाता हूँ। चक्ररेखासहित अकारका हृदयमें ध्यान करे। वह तीन शिखाओंसहित प्रज्वलित हो पापोंका दाह करता है और सब पापों का नाश करनेवाला है, ऐसी भावना करनेके बाद मस्तक में 'रा' का चिन्तन करना चाहिये। वह चन्द्रमण्डलके मध्यभाग में स्थित और शुक्लवर्ण का है तथा अमृतकी वर्षा करके पृथ्वीको आप्लावित कर रहा है, इस प्रकार चिन्तन करनेसे पाप धुल जाते और साधकका शरीर दिव्य हो जाता है। तदनन्तर अपने बायें पैरसे आरम्भ करके क्रमशः सब अङ्गों में अष्टाक्षर-मन्त्र का न्यास करे। वैष्णव-पञ्चाङ्गन्यास तथा चतुर्व्यूहन्यास भी करे। साधक को मूलमन्त्रके द्वारा कर-शुद्धि भी करनी चाहिये। इसकी विधि यों है। दोनों हाथों की आठ अँगुलियों में अँगूठों द्वारा एक-एक अक्षरका न्यास करना चाहिये। पहले बायें हाथ में, फिर दायें हाथ में। ॐ कार सहित शुक्लवर्णा पृथ्वीका बायें पैरमें न्यास करे। नकारका वर्ण श्याम और देवता शम्भु हैं। उसका न्यास दक्षिण पैर में है। मोकारको कालस्वरुप माना गया है। इसका न्यास कटि के वामभाग में होता है। नाकार सर्वबीजस्वरुप है। उसकी स्थिति कटिके दक्षिणभाग में है। राकार तेजका स्वरुप बताया गया है। उसका स्थान नाभि प्रदेश में होता है। यकारका देवता वायु है, उसका न्यास बायें कंधे में है। यकार की स्थिति सिर में है, जहाँ सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं। तात्पर्य यह कि यकारका न्यास मस्तक में करना चाहिये।

वैष्णव-पञ्चाङ्गन्यास

'ॐ विष्णवे नम: शिर:', 'ॐ ज्वलनाय नम:

शिखा', 'ॐ विष्णवे नम: कवचम्', 'ॐ विष्णवे

नम: स्फुरणंदिशोबन्धाय', 'ॐ हुं फट् अस्त्रम्'।*

चतुर्व्यूहन्यास

'ॐ शिरसि शुक्लो वासुदेव इति', 'ॐ आं

ललाटे रक्त: संकर्षणो गुरुत्मान्वह्निस्तेज आदित्य

इति', 'ॐ आं ग्रीवायां पीत: प्रद्युम्नो वायुमेघ इति',

'ॐ आं हृदये कृष्णोऽनिरुद्ध: सर्वशक्तिसमन्वित इति।*

इस प्रकार अपने आत्माका चतुर्व्यूहरूप से चिन्तन करके कार्य आरम्भ करे।

'मेरे आगे भगवान् विष्णु और पीछे केशव हैं। दक्षिणभाग में गोविन्द और वामभाग में मधुसूदन हैं। ऊपर वैकुण्ठ और नीचे वाराह हैं। बीच की सम्पूर्ण दिशाओंमें माधव हैं। चलते, खड़े होते, जागते अथवा सोते समय भगवान् नृसिंह मेरी रक्षा करते हैं। में वासुदेवस्वरुप हूँ।' इस प्रकार विष्णुमय होकर पूजन आरम्भ करे। अपने शरीरकी भाँति भगवान् के विग्रह में भी सम्पूर्ण तत्वोंका न्यास करे। प्रणवका उच्चारण करके शरीर पर जल के छींटे दे। 'ॐ फट्' का उच्चारण सब विघ्नोंका निवारण करनेवाला और शुभ माना गया है। वहाँ सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु और आकाश-मण्डलका चिन्तन करे। कमलके मध्यभाग में विष्णुका न्यास करे। फिर हृदयमें ज्योति:स्वरूप ॐकारका चिन्तन करके कमल की कर्णिकामें ज्योति:स्वरूप सनातन विष्णुकी स्थापना करे। फिर क्रमशः प्रत्येक दल में अष्टाक्षर-मन्त्रके एक-एक अक्षरका न्यास करे। एक-एक अक्षरके द्वारा तथा समस्त मन्त्र के द्वारा भी पूजन करना अत्यन्त उत्तम माना गया है। सनातन परमात्मा विष्णु का द्वादशाक्षर-मन्त्रसे पूजन करे। इसके बाद भगवान् का पहले हृदय में ध्यान करके बाहर कर्णिकामें भी उनकी भावना करे। उनके ध्यान का स्वरुप इस प्रकार है। भगवान् की चार भुजाएँ हैं। वे महान् सत्त्वमय हैं, कोटि-कोटि सूर्यों के समान उनके श्रीअङ्गों की प्रभा है और वे महायोगस्वरुप, ज्योति:स्वरुप एवं सनातन हैं। इसके बाद मन-ही-मन भगवान्का स्मरण करते हुए मन्त्रोच्चारणपूर्वक उनका आवाहन आदि करे।

आवाहन-मन्त्र

मीनरूपो वराहश्व नरसिंहोऽथ वामन: ।

आयातु देवो वरदो मम नारायणोऽग्रत: ॥

ॐ नमो नारायणाय नम: ।

'मीन, वराह, नरसिंह एवं वामन-अवतारधारी वरदायक देवता भगवान् नारायण मेरे सम्मुख पधारें। सच्चिदानन्दस्वरुप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।'

आसन-मन्त्र

कर्णिकायां सुपीठेऽत्र पद्यकल्पितमासनम् ।

सर्वसत्त्वहितार्थाय तिष्ठ त्वं मधुसूदन ॥

ॐ नमो नारायणाय नम: ।

'यहाँ कमलकी कर्णिकामें सुन्दर पीठपर कमलका आसन बिछा हुआ है। मधुसूदन! सब प्राणियोंका हित करनेके लिए आप इसपर विराजमान हों। सच्चिदानन्दस्वरुप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।'

अर्घ्य-मन्त्र

ॐ त्रैलोक्यपतीनां पतये देवदेवाय हृषीकेशाय

विष्णवे नम: । ॐ नमो नारायणाय नम: ।

'त्रिभुवनपतियोंके भी पति, देवताओंके भी देवता, इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।'

पाद्य-मन्त्र

ॐ पाद्यं पद्योर्देव पद्यनाभ सनातन ।

विष्णो कमलपत्राक्ष गृहाण मधुसूदन ॥

ॐ नमो नारायणाय नम: ।

'देव पद्मनाभ! सनातन विष्णो!! कमलनयन मधुसूदन!!! आपके चरणोंमें यह पाद्य (पाँव पखारने के लिए जल) समर्पित है, आप इसे स्वीकार करें। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।'

मधुपर्क-मन्त्र

मधुपर्कं महादेव ब्रह्माद्यै: कल्पितं तव ।

मया निवेदितं भक्त्या गृहाण पुरुषोत्तम ॥

ॐ नमो नारायणाय नम: ।

'महादेव! पुरुषोत्तम! ब्रह्मा आदि देवताओं ने आपके लिए जिसकी व्यवस्था की थी, वही मधुपर्क मैं भक्तिपूर्वक आपको निवेदन करता हूँ, कृपया स्वीकार कीजिये। सच्चिदानन्दस्वरुप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।'

आचमनीय-मन्त्र

मन्दाकिन्या: सितं वारि सर्वपापहरं शिवम् ।

गृहाणाचमनियं त्वं मया भक्त्या निवेदितम् ॥

ॐ नमो नारायणाय नम:

'भगवन्! मैंने गङ्गाजीका स्वच्छ जल, जो सब पापोंको दूर करनेवाला तथा कल्याणमय है, आचमनके लिये भक्तिपूर्वक आपको अर्पित किया है; कृपया ग्रहण कीजिये। सच्चिदानन्दस्वरुप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

स्नान-मन्त्र

त्वमाप: पृथिवी चैव ज्योतिस्त्वं वायुरेव च ।

लोकेश वृत्तिमात्रेण वारिणा स्त्रापयाम्यहम् ॥

ॐ नमो नारायणाय नम: ।

'लोकेश्वर! आप ही जल, पृथ्वी तथा अग्नि और वायुरूप हैं । मैं जीवनरूप जलके द्वारा आपको स्नान कराता हूँ। सच्चिदानन्दस्वरुप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

वस्त्र-मन्त्र

देवतत्त्वसमायुक्त यज्ञवर्णसमन्वित ।

स्वर्णवर्णप्रभे देव वाससी तव केशव ॥

ॐ नमो नारायणाय नम: ।

'देवतत्त्वसमायुक्त, यज्ञवर्णसमन्वित केशव! मैं सुनहरे रंगके दो वस्त्र आपकी सेवा में समर्पित करता हूँ। सच्चिदाननन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

विलेपन-मन्त्र

शरीरं तेन जानामि चेष्ठां चैव न केशव ।

मया निवेदित्तो गन्ध: प्रतिगृह्या विलिप्यताम् ॥

ॐ नमो नारायणाय नम: ।

'केशव! मुझे आपके शरीर और चेष्टाका ज्ञान नहीं है; मैंने जो यह गन्ध (ओलो-चंदन आदि) निवेदन किया है, इसे लेकर अपने अङ्गमें लगा लें। सच्चिदानन्दस्वरुप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।'

यज्ञोपवीत-मन्त्र

ऋग्युज:साममन्त्रेण त्रिवृतं पद्ययोनिना ।

सावित्रीग्रन्थिसंयुक्तमुपवीतं तवार्पये ॥

ॐ नमो नारायणाय नम: ।

'भगवन्! ब्रह्माजी ने ऋक्, यजु: और सामवेदके मन्त्रोंसे जिसको त्रिवृत् (त्रिगुण) बनाया है, वह सावित्री-ग्रन्थि से युक्त यज्ञोपवीत मैं आपकी सेवा में अर्पित करता हूँ। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।'

अलंकार-मन्त्र

दिव्यरत्नसमायुक्त वह्निभानुसमप्रभ ।

गात्राणि तव शोभन्तु सालंकारणि माधव ॥

ॐ नमो नारायणाय नम: ।

'अग्नि और सूर्य के समान प्रभावाले, दिव्यरतविभूषित माधव! इन अलंकारोंको धारण करके आपके श्रीअङ्गसुशोभित हों। सच्चिदानन्दस्वरुप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।'

'ॐ नम:' यह अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रत्येक अक्षरके साथ लगाकर पृथक्-पृथक् पूजा करे अथवा समस्त मूल-मन्त्रका एक ही साथ उच्चारण करके पूजन करे।

धूप-मन्त्र

वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाढ्य: सुरभिश्च ते ।

मया निवेदितो भक्त्या धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥

ॐ मो नारायणाय नम: ।

'भगवन्! यह धूप सुगन्धद्रव्यों से मिश्रित वनस्पतिका दिव्य रस है, अतएव अत्यन्त सुगन्धित है; मैंने भक्तिपूर्वक इसे आपकी सेवा में अर्पित किया हिया, आप इसे स्वीकार करें। सच्चिदानन्दस्वरुप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।

दीप-मन्त्र

सूर्यचन्द्रमसोर्ज्योतिर्विद्युदग्न्योस्तथै च ।

त्वमेव ज्योतिषां देव दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥

ॐ नमो नारायणाय नम: ।

'देव! आप ही सूर्य और चन्द्रमाकी, बिजली और अग्निकी तथा ग्रहों और नक्षत्रोंकी ज्योति हैं। यह दीप ग्रहण कीजिये। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायण बारम्बार नमस्कार है।'

नैवेद्य-मन्त्र

अन्नं चतुर्विधं चैव रसै:षड्भि: समन्वितम् ।

मया निवेदितं भक्त्या नैवेद्यं तव केशव ॥

ॐ नमो नारायणाय नम:।

'केशव! मैंने [मधुर आदि] छ: रसों से युक्त चार प्रकारका (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) अन्न आपको भक्तिपूर्वक समर्पित किया है। आप यह नैवेद्य ग्रहण करें। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।'

पूर्वोक्त अष्टदल कमलके पूर्वदल में वासुदेवका, दक्षिणदलमें संकर्षणका, पश्चिमदल में प्रद्युम्नका, उत्तरदल में अनिरुद्धका, अग्निकोणवाले दल में वाराहका, नैर्ॠत्यकोणमें नरसिंहका, वायव्यकोण में माधवका तथा ईशानमें भगवान् त्रिविक्रमका न्यास करे। फिर अष्टाक्षरदेवके सम्मुख गुरुडकी स्थापना करे। भगवान्के वामभागमें चक्र और दक्षिणभागमें शङ्खकी स्थापना करे। इसी प्रकार उनके दक्षिणभाग में महागदा कौमोदकी और वामभाग में शार्ङ्गनामक धनुषको स्थापित करे। दक्षिणभागमें दो दिव्य तरकस और वामभाग में खड्गका न्यास करे। दक्षिणभागमें श्रीभागमें पुष्टिदेवीकी स्थापना करे। भगवान् के सामने वनमाला, श्रीवत्स और कौस्तुभ रखे। फिर पूर्व आदि चारों दिशाओं में हृदय आदिका न्यास करे। कोणमें देवदेव विष्णुके अस्त्रका न्यास करे। पूर्व आदि आठ दिशाओंमें तथा ऊपर और नीचे तान्त्रिक मन्त्रोंसे क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ॠति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, अनन्त तथा ब्रह्माजी का पूजन करे। इस प्रकार मण्डलमें स्थित देवश्वर जनार्दनका पूजन करके मनुष्य निश्चय ही मनोवाञ्छित भोगोंको प्राप्त करता है। इसी विधिसे पूजित मण्डलस्थ भगवान् जनार्दनका जो दर्शन करता है, वह भी अविनाशी विष्णुमें प्रवेश करता है। जिसने उपर्युक्त विधिसे एक बार भी श्रीकेशवका पूजन किया है, वह जन्म-मृत्यु और जरा अवस्थाको लाँघकर भगवान् विष्णु के पदको प्राप्त होता है। 'नम:' सहित ॐकार जिसके आदिमें और 'नम:' जिसके अन्त में है, वह 'ॐ नमो नारायणाय नम:' यह तेजस्वी मन्त्र सम्पूर्ण तत्त्वों का मन्त्र कहलाता है। इसी विधिसे प्रत्येकको गन्ध, पुष्प आदि वस्तुएँ क्रमशः निवेदन करनी चाहिये। इसी तरह क्रमशः आठ मुद्राएँ बाँधकर दिखाये। फिर मन्त्रवेत्ता पुरुष 'ॐ नमो नारायणाय' इस मूलमन्त्रका एक सौ आठ या अट्ठाईस अथवा आठ बार जप करे। किसी कामनाके लिये शास्त्रों में जितना बताया गया हो, उतनी संख्यामें जप करे अथवा अनिष्कामभावसे जितना हो सके, उतना एकग्रचित्तसे जप करे। पद्म, शङ्ख, श्रीवत्स, गदा, गुरुड, चक्र, खड्ग और शार्ङ्गधनुष- ये आठ मुद्राएँ बतलायी गयी हैं। जो लोग शास्त्रोक्त मन्त्रों द्वारा श्रीहरिकी पूजाका विधान न जानते हों, वे 'ॐ नमो नारायणाय'- इस मूलमन्त्रसे ही सदा भगवान् अच्युतका पूजन करें।

* श्राद्धे हवनकाले च पाणिनैकेन निरवपेत्। तर्पणे तूभ्यं कुर्यादेष एव विधि: सदा ॥

अन्वारब्धेन सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु। तृप्यतामिति सिञ्चेतु नामगोत्रेण वाग्यत: ॥

(६० । ५५-५६)

* उक्त मन्त्रोंमें से पहले तीन मन्त्रोंको पढ़कर हाथकी अँगुलियोंसे क्रमशः मस्तक, शिखा तथा दोनों बाहु-मूलोंका स्पर्श करे। चौथेसे सब ओर चुटकी बजाये और पाँचवेंको पढ़कर ताली बजाये।

* उक्त चार वाक्यों में से एक-एकका उच्चारण करके क्रमशः मस्तक, ललाट, ग्रीवा और हृदयका स्पर्श करे। इनका भावार्थ संक्षेपसे इस प्रकार है - शुक्लवर्ण वासुदेव मस्तक में हैं। रक्तवर्ण बलरामजी, गुरुड, अग्नि, तेज और सूर्य ललाट में स्थित हैं। पीतवर्ण प्रद्युम्न तथा वायु सहित मेघ ग्रीवामें हैं। कृष्णवर्ण अनिरुद्ध सम्पूर्ण शक्तियोंके साथ हृदयमें निवास करते हैं।