ब्रह्म महा पुराण
92 - वर्ण और आश्रमोंके धर्मका निरूपण
मुनियोंने कहा — ब्रह्मन् ! अब हम वर्णधर्म और आश्रमधर्मका विशेष रूपसे वर्णन सुनना चाहते हैं। विप्रवर ! अब उसीका वर्णन कीजिये।
व्यासजी बोले- द्विजवरो ! अब मैं क्रमशः ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र- इन चारों वर्णोंके धर्मका वर्णन करूँगा । तुमलोग एकाग्रचित्त होकर सुनो । ब्राह्मणको सदा दान , दया , तपस्या , देवयज्ञ और स्वाध्यायमें तत्पर रहना चाहिये तर्पण और अग्निहोत्र उसका प्रतिदिनका कार्य होना चाहिये जीविकाके लिये वह अन्य द्विजोंका यज्ञ कराये तथा उन्हें पढ़ाये । यज्ञ करनेके लिये वह जान बूझकर भी प्रतिग्रह ले सकता है । सब लोगोंका हितसाधन करना और किसीका भी अपने द्वारा अहित न होने देना , यह ब्राह्मणका कर्तव्य है समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीका होना , यह ब्राह्मणके लिये सबसे उत्तम धन है।* केवल ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम करना ब्राह्मणके लिये प्रशंसाकी बात है । क्षत्रिय भी अपने इच्छानुसार ब्राह्मणको दान दे , नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करे और स्वाध्यायमें संलग्न रहे । शस्त्र चलाकर जीवन निर्वाह करना और पृथ्वीका पालन करना— ये दो क्षत्रियकी मुख्य जीविकाएँ हैं । उनमें भी पृथ्वीकी रक्षा उसके लिये मुख्य आजीविका है I पृथ्वीका पालन करनेसे ही राजा कृतार्थ होते क्योंकि उसीसे उनके यज्ञ आदि कार्योंकी रक्षा होती है । जो राजा दुष्ट पुरुषोंका दमन और साधु पुरुषों का पालन करके सब वर्णोंको अपने - अपने धर्ममें स्थापित करता है , वह मनोवाञ्छित लोकोंको प्राप्त होता है । लोकपितामह ब्रह्माजीने वैश्योंके लिये पशुओंका पालन , व्यापार और खेती- तीन आजीविकाएँ प्रदान की हैं । वेदोंका अध्ययन यज्ञ , दान , धर्म तथा नित्य और नैमित्तिक आदि कर्मोंका अनुष्ठान वैश्यके लिये भी उत्तम है। शूद्र द्विजातियोंकी सेवाका कार्य करे और उसीसे अर्थोपार्जन करके अपना जीवन-निर्वाह करे । अथवा खरीद-बिक्री या शिल्पकर्मके द्वारा धन पैदा करके उससे जीविका चलाये । शूद्र भी दान दे और मन्त्रहीन पाक-यज्ञोंद्वारा यजन करे । वह श्राद्ध आदि सब कार्य बिना मन्त्रके कर सकता है । भृत्य आदिका भरण - पोषण करनेके लिये सबके लिये संग्रह आवश्यक है । ऋतुकालके समय अपनी पत्नीके पास जाना , सब प्राणियोंके प्रति दयाभाव रखना , शीत , उष्ण आदि द्वन्द्वोंको सहन करना , अभिमान न रखना , सत्य बोलना , पवित्रतापूर्वक रहना , किसीको कष्ट न पहुँचाना , सबका मङ्गल करना , प्रिय वचन बोलना , सबके प्रति मैत्रीका भाव रखना , किसी वस्तुकी कामना न करना , कृपणता न करना तथा किसीके भी दोष देखना- ये सभी वर्णोंके लिये सामान्यरूपसे उत्तम गुण बताये गये हैं । चारों आश्रमोंके लिये भी ये सामान्य गुण हैं । ब्राह्मणो ! अब ब्राह्मण आदि वर्णोंके उपधर्म बतलाये जाते हैं । आपत्तिकालमें ब्राह्मणके लिये क्षत्रियका कर्म , क्षत्रियके लिये वैश्यका कर्म तथा वैश्य और क्षत्रिय दोनोंके लिये शूद्रका कर्म कर्तव्य बताया गया है । सामर्थ्य रहते इन दोनोंको शूद्रका कर्म नहीं करना चाहिये , परंतु आपत्तिकालमें वही कर्तव्य हो जाता है । आपत्ति न होनेपर कर्म - संकर कदापि न करे । ब्राह्मणो ! इस प्रकार मैंने वर्णधर्मका वर्णन किया है ।
अब आश्रमधर्मका भलीभाँति वर्णन करता हूँ , सुनो । उपनयन संस्कार होनेपर ब्रह्मचारी बालक एकाग्रचित्त हो गुरुके घरपर रहते हुए वेदोंका अध्ययन करे । शौच और सदाचारका पालन करते हुए गुरुकी सेवा करे । पवित्र बुद्धिसे व्रतके पालनपूर्वक वेदोंकी शिक्षा ग्रहण करे । दोनों संध्याओंके समय एकाग्रचित्त हो सूर्योपस्थान , अग्निहोत्र और गुरुका अभिवादन करे । गुरुदेव खड़े हों तो स्वयं भी खड़ा रहे । वे जाते हों तो पीछे - पीछे जाय और वे बैठे हों तो उनसे नीचे आसनपर बैठे । शिष्यको चाहिये कि वह गुरुके विपरीत कोई आचरण न करे । उन्हींकी आज्ञासे उनके सामने बैठकर एकाग्रचित्तसे वेदका अध्ययन करे । गुरुका आदेश मिलनेपर भिक्षाका अन्न ग्रहण करे । जब आचार्य पहले स्नान कर लें तो स्वयं जलमें प्रवेश करके अवगाहन करे । प्रतिदिन प्रातः काल आचार्यके लिये समिधा और जल आदि ले आये । जब ग्रहण करनेके योग्य वेदोंका पूर्णरूपसे अध्ययन कर ले , तब विद्वान् पुरुष गुरुदक्षिणा देकर गुरुकी आज्ञा ले गृहस्थाश्रममें प्रवेश करे ।
विधिपूर्वक योग्य स्त्रीसे विवाह करके अपने वर्णोचित कर्मद्वारा धनका उपार्जन करे और उसीसे यथाशक्ति गृहस्थका सारा कार्य पूर्ण करे । श्राद्धके द्वारा पितरों , यज्ञद्वारा देवताओं , अन्नसे अतिथियों स्वाध्यायसे मुनियों , संतानोत्पादनसे प्रजापति बलिवैश्वदेवसे सम्पूर्ण भूतों और सत्यवचनके द्वारा सम्पूर्ण जगत्का पूजन करे । ऐसा करनेवाला पुरुष अपने कर्मोद्वारा उपार्जित उत्तम लोकों में जाता है । भिक्षापर निर्वाह करनेवाले संन्यासी और ब्रह्मचारी भी गृहस्थोंके ही अवलम्बसे रहते हैं , अतः गार्हस्थ्य आश्रम श्रेष्ठ माना गया है जो ब्राह्मण वेदाध्ययन तीर्थस्नान और पृथ्वीके दर्शनके लिये भूतलपर भ्रमण करते हैं , जिनका कोई घर नहीं है , प्रायः निराहार रहते हैं और जहाँ सन्ध्या हो गयी वहीं डेरा डाल देते हैं , ऐसे लोगोंका सहारा आधार गृहस्थ ही हैं । पूर्वोक्त द्विज जब घरपर पधारें तो मधुर वाणीसे सदा उनका स्वागत- सत्कार करना चाहिये । उन्हें शय्या , आसन और भोजन देना चाहिये । जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौटता है , वह उसे अपना पाप दे बदले में उसका पुण्य लेकर चल देता है।* गृहस्थ पुरुषमें दूसरोंके प्रति अवहेलना ,अपनेमें अहंकार, दम्भ , परनिन्दा , दूसरोंपर चोट करनेकी प्रवृत्ति और कटुवचन बोलनेका स्वभाव होना अच्छा नहीं माना गया है । जो गृहस्थ इस प्रकार उत्तम विधिका पालन करता है , वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त उत्तम लोकोंमें जाता है । गृहस्थ पुरुष बुढ़ापा आनेपर अपनी स्त्रीका भार पुत्रोंको सौंप दे और स्वयं तपस्याके लिये वनमें चला जाय अथवा स्त्रीको भी साथ ही लेता जाय । वहाँ पत्तियाँ , मूल और फल आदिका आहार करते हुए पृथ्वीपर शयन करे सिरके बाल , दाढ़ी और मूँछ न कटाये । वानप्रस्थ मुनिके लिये सब लोग अतिथि वह मृगचर्म , कास और कुश आदिकी कौपीन एवं चादर धारण करे । उसके लिये तीनों समय स्नान करना उत्तम माना गया है । देवपूजन , होम , सम्पूर्ण अतिथियोंका पूजन , भिक्षा और प्राणियोंको बलि समर्पण- ये सब बातें वानप्रस्थके लिये श्रेष्ठ मानी गयी हैं । वह अपने शरीरमें जंगली फल आदिके तेल लगा सकता है । उसका मुख्य कर्तव्य तपस्या- शीत और उष्ण आदि द्वन्द्वोंका सहन वानप्रस्थ मुनि नियमपूर्वक रहकर पूर्वोक्त रूपसे अपने कर्तव्यका पालन करता है , वह अग्निकी भाँति अपने सब दोषोंको जला देता और सनातन लोकोंको प्राप्त होता है।
मुनियो ! मनीषी पुरुष जो भिक्षुका चतुर्थ आश्रम बतलाते हैं, उसके स्वरूपका वर्णन सुनो । भिक्षु चाहिये कि पुत्र , धन , स्त्रीके प्रति स्नेहका त्याग और ईर्ष्यारहित होकर चतुर्थ आश्रममें जाय । उसीको संन्यास आश्रम भी कहते हैं । संन्यासीको समस्त त्रैवर्णिक कर्मोंके आरम्भका त्याग करना चाहिये । वह मित्र और शत्रुमें समान भाव रखे सब प्राणियोंका मित्र बना रहे । जरायुज और अण्डज आदि किसी भी प्राणीके साथ मन , वाणी और क्रियाद्वारा कभी द्रोह न करे । वह सब प्रकारकी आसक्तियोंको त्याग दे । गाँवोंमें एक रात और नगरमें पाँच रातसे अधिक न रहे । पशु , पक्षी आदिके प्रति न तो उसका राग हो और न द्वेष ही रहे । जीवन निर्वाहके लिये वह उच्च वर्णवाले मनुष्योंके घरपर भिक्षाके लिये जाय वह भी ऐसे समयमें जब कि रसोईकी आग बुझ गयी हो डालकर और घरके सब लोग खा - पी चुके हों । भिक्षा न मिलनेपर खेद और मिलनेपर हर्ष न माने भिक्षा उतनी ही ले , जिससे प्राणयात्रा होती रहे । विषयासक्तिसे वह नितान्त दूर रहे । अधिक आदर- सत्कारकी प्राप्तिको घृणाकी दृष्टिसे देखे , क्योंकि - है। अधिक आदर - सत्कार मिलनेपर संन्यासी अन्य बन्धनोंसे मुक्त होनेपर भी बँध जाता है । काम क्रोध , दर्प , लोभ और मोह आदि जितने दोष हैं , उन सबका त्याग करके संन्यासी ममतारहित हो सर्वत्र विचरता रहे ।* जो सम्पूर्ण प्राणियोंको अभय दान देकर पृथ्वीपर विचरता रहता है , उस देहाभिमानसे मुक्त यतिको कहीं भय नहीं होता । ब्राह्मण अग्निहोत्रको भावनाद्वारा शरीरमें स्थापित करके अपने मुखमें भिक्षाप्राप्त अन्नरूपी हविष्य डालकर उस शरीरस्थ अग्निको आहुति देता है , वह उस संचित अनिके द्वारा उत्तम लोकों में जाता है । जो द्विज पवित्र एवं संयत बुद्धिसे युक्त हो शास्त्रोक्त विधिसे मोक्ष आश्रमका पालन करता , वह बिना ईंधनकी प्रज्वलित अग्निके सदृश शान्त तेजोमय ब्रह्मलोकमें जाता है ।
*सर्वलोकहितं कुर्यान्नाहितं कस्यचिद् द्विजाः। मैत्री समस्तसत्त्वेषु ब्राह्मणस्योत्तमं धनम् ॥
( २२२ । ५ )
*अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते। स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति॥
( २२२ । ३६ )
Summary of chapter 90 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
Balarāma, on a festive occasion, asks the river Yamunā to come to him. When she refuses, he uses his ploughshare to drag her toward him, forcing a new channel. The episode demonstrates Balarāma's immense divine strength even in playful moods, and the Yamunā, subdued, flows where Balarāma directs — confirming the divine authority of both Kṛṣṇa and Balarāma over the forces of nature.