ब्रह्माजी कहते हैं - इलातीर्थके नामसे जिस तीर्थ की प्रसिद्धि है, वह मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला, ब्रह्महत्या आदि पापोंको दूर करनेवाला तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। वैवस्वत मनुके वंशमें इल नामक एक राजा हो गये हैं। वे बहुत बड़ी सेना साथ लेकर शिकार खेलने के लिए वन में गये। वहाँ उनकी बुद्धिमें कुछ दूसरा ही निश्चय हुआ। उन्होंने अमात्योंसे कहा- 'आप सब लोग मेरे पुत्रद्वारा पालित नगर में चले जाएँ। देश, कोश, बल, राज्य तथा मेरे पुत्रकी भी रक्षा करें। महर्षि बसिष्ठ भी हमारे लिए पिताके समान हैं। वे भी अग्निहोत्रकी अग्नियोंको लेकर मेरी पत्नियोंके साथ लौट जाएँ। मैं अभि इस वन में ही निवास करूँगा।' 'बहुत अच्छा' कहकर सब लोग चले गये और राजा धीरे-धीरे रत्नमय हिमालय पर्वतपर जाकर वहीँ निवास करने लगे। एक दिन उन्होंने उस पर्वत पर एक गुफ़ा देखी, जो नाना प्रकार के रत्नोंसे विचित्र शोभा पा रही थी। उस गुफ़ा में यक्षोंका राजा समुन्य रहता था। उसके साथ उसकी पतिव्रता पत्नी समा भी रहा करती थी। उस समय वह यक्ष मृगरूप धारण करके अपनी पत्नीके साथ विचार रहा था। भाँति-भाँति के रत्नोंसे चित्रित. उसका वह विशाल गृह दूना पड़ा था। अत: राजा अपनी भारी देनके साथ वहीँ ठहर गये। वह यक्ष अधर्मके कोपसे पत्नीके साथ मृगरूप धारण करके रहता था। उसने सोचा- 'इस राजा ने मेरअ घर छीन लिया। मैं इसे जीत सकता नहीं और यह माँगनेपर देगा नहीं। अब क्या करूँ?' इसी चिंता में पड़कर वह मृगीरूपधारिणी अपनी पत्नीसे बोला- 'कान्ते! इस राजा का मन मृगयाके व्यसनमें आसक्त है। यह कैसे विपत्तिमें फँसे- इसके लिए कोई उपाय सोचो। मेरा सिह्चार है कि तुम मनोहर मृगीका रूप धारण करके इसके सामनेसे निकलो और इसे अपनी ओर आकृष्ट करके किसी तरह अम्बिका-वनमें पहुँचा दो। उसके भीतर प्रवेश करते ही यह राजा स्त्रीहो जायगा। भद्रे! यह काम तुम्हीं कर सकती हो। मेरे लिए यह उचित न होगा।'
यक्षिणीने पूछा - नाथ! अम्बिका-वन तो बड़ा सुंदर है। तुम उसमें क्यों नहीं जा सकते? यदि तुम भी चले जाओ तो क्या दोष होगा? यह हमें ठीक-ठीक बताओ।
यक्ष ने कहा - एक समय पार्वती ने एकान्तमें बैठे हुए भगवान् शंकरसे कहा- 'देवेश्वर! स्त्रियोंकी यह स्वाभाविक इच्छा होती है कि उनकी रतिक्रीड़ा सदा गुप्त रहे। इसलिये मुझे ऐसा नित्य स्थान दीजिए, जो आपकी आज्ञा से सुरक्षित हो। मैं स्थान वही चाहती हूँ, जो उमावनके नामसे प्रसिद्ध है। उसमें आप, गणेश, कार्तिकेय और नन्दीके सिवा जो कोई भी प्रवेश करे, वह स्त्री हो जाए।' शंकरजी ने प्रसन्न होकर कहा- 'ऐसा ही हो।' इसलिये उमाके उस वन में मुझेनहीं जाना चाहिये।
अपने स्वामीका यह वचन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली यहे यक्षिणी विशाल नेत्रोंवाली मृगी बनकर राजाके सामने आयी। यक्ष वहीँ ठहर गया। राजा ने मृगीको देखा। मृगयामें तो उनकी आसक्ति थी ही। मृगीपर दृष्टि पड़ते ही वे अकेले घोड़ेपर जा वैठे और उसका पीछा करने लगे। वह धीरे-धीरे राजा को अम्बिका-वनतक खींच ले गयी। जब घोड़े पर बैठे-ही-बैठे उमावनमें प्रविष्ट हो गये, तब यक्षिणी ने मृगीका रूप छोड़कर दिव्य रूप धारण कर लिया और अशोक वृक्षके नीचे खड़ी हो राजा को देखकर हँसने लगी। पतिकी कही हुई बातोंको याद करके वह राजसे बोली-'सुन्दरी इला! तुम अकेली अबला घोड़ेपर चढ़कर पुरुषके वेष में कहाँ जाति हो, किसके पास जाओगी?' उसके मुखसे 'इला' शब्द सुनकर राजा क्रोधसे मुर्च्छित हो उठे और यक्षिणीको डाँटकर मृगीका पता पूछने लगे। यक्षिणी ने पुन; कहा- 'इले! इल! अपने-आपको इच्छी तरह देख तो लो, फिर मुझे मिथ्यावादिनी या सत्यवादिनी कहना।' तब राजा ने देखा- उनकी छातीमें दो ऊँचे-ऊँचे स्तन उभर आये थे। 'यह मुझे क्या हो गया' यह कहते हुए राजा चकित हो गये। उन्होंने यक्षिणीसे पूछा- 'सुव्रते! यह मुझे क्या हो गया- इस बातको आप ठीक-ठीक जानती हैं। अत: बताइये। आप कौन हैं? इसका भी परिचय दीजिए।'
यक्षिणी बोली - हिमालय की श्रेष्ठ गुफ़ा में मरे पति यक्षराज समन्यु निवास करते हैं। मैं उन्हीं की पत्नी हूँ। जिस शीतल कन्दरा में आप ठहरे हुए हैं, वह हमारा ही घर है। मैं ही मृगी बनकर आपको यहाँ तक ले आयी हूँ। यह उमावन है। यहाँके लिए पूर्वकाल में महादेवजी यह वर दे चुके हैं कि जो पुरुष इसमें प्रवेश करेगा, वह स्त्री हो जाएगा। अत: आप भी स्त्री हो गये, इससे आपको दु:खी नहीं होना चाहिये। कोई कितना ही प्रौढ क्यों न हो, भावितव्यताको कोई नहीं जनता।
इस प्रकार इलाको आश्वासन दे वह सुन्दरी यक्षिणी अन्तर्धान हो गयी। उसने पतिसे सारा हाल के सुनाया। यक्ष भी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। इधर इला गाती और नृत्य करती हुई उमावन में ही रहने लगी। वह कर्मकी गतिका स्मरण करती हुई स्त्रीस्वभावके अनुसार ही चेष्टा करती थी। एक दिन जब इला नृत्य कर रही थी, बुधने उसे देखा। वे अपने पिताको नमस्कार करनेके लिए जा रहे थे। इलापर दृष्टि पड़ते ही उन्होंने यात्रा स्थगित कर दी और उसके पास आकार कहा- 'देवि! तू स्वर्गमें रहकर मेरी प्रिया भार्या हो जा।' इला ने भक्तिपूर्वक बुधकी आज्ञाका अभिनन्दन करके उसे स्वीकार कर लिया। बुध अपने उत्तम स्थानपर ले जाकर इलाके साथ प्रेमपूर्वक विहार करने लगे। उसने भी सब प्रकारकी सेवाओं से पतिको संतुष्ट किया। इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो जानेपर बुधने प्रसन्न हो अपनी प्रियसे कहा- 'कल्याणी! मैं तुझे क्या दूँ? तेरे मन में जो प्रिय वस्तु हो, उसे माँग ले।' इला सहसा बोल उठी- 'पुत्र दीजिये।'
बुधने कहा - यह मेरा वीर्य अमोघ तथा प्रेमसे प्रकट हुआ है। अत: तेरे गर्भसे विश्वविख्यात क्षत्रिय-पुत्र उत्पन्न होगा। उससे चंद्रवंशकी वृद्धि होगी। वह तेजमें सूर्य, बुद्धि में बृहस्पति, क्षमामें पृथ्वी, युद्धसम्बन्धी पराक्रममें भगवान् विष्णु तथा क्रोध में अग्निके समान होगा।
समय आनेपर महात्मा बुधका पुत्र उत्पन्न हुआ। उस समय देवलोक में सब ओर जय-जयकारका शब्द गूँज उठा। उसके जन्मोत्सवमें सभी प्रधान-प्रधान देवता आये। मैं भी बड़ी प्रसन्नता के साथ उसमें सम्मिलित हुआ। वह बालक जन्म लेते ही उच्च स्वरसे रोया था। अत: वहाँ एकत्रित हुए देवताओं तथा ऋषियोंने एक-दूसरेसे कहा- 'इस बालकने पुरु (अत्यन्त उच्च स्वर से) रव (शब्द) किया है, अत: इसका नाम पुरुरवा होना चाहिये।' सबने संतुष्ट होकर यही नाम रखा। तदनन्तर बुधने अपने पुत्रको क्षत्रिययोचित विद्या पढ़ायी और प्रयोगसहित धनुर्वेदका ज्ञान कराया। पुरुरवा शुक्लपक्षके चद्रमाकी भाँति शीघ्र ही बढ़कर बड़ा हो गया। उसने अपनी माता को दु:खी देख विनीत भाव से नमस्कार करके कहा- 'माताजी! बुधमेरे पिता और आपके प्रियतम पति हैं। मुझ- जैसा कर्मठ पुरुष आपका पुत्र है। फिर आपके मन में चिंता किस बात की है?'
इला बोली - बेटा! ठीक कहते हो। बुध मेरे स्वामी हैं और तुम मेरे गुणाकर पुत्र हो। अत: मुझे पति और पुत्र के लिए कभी चिंता नहीं होती। तथापि मेरे मन में पहलेका ही कुछ दु:ख है, जिसका बारंबार स्मरण हो आनेसे मैं चिंता में डूब जाती हूँ।
पुरूरवाने कहा - माँ! पहले मुझे अपना वही दु:ख बताओ। तब इलाने पुरूरवाको इक्ष्वाकुवंशका परिचय देते हुए अपने जन्म, नाम, राज्यप्राप्ति, पुत्रजन्म, पुरोहित वसिष्ठ, प्रिय पत्नी, वना में आगमन, हिमालयकी कन्दरामें निवास, उमावनमें प्रवेश, स्त्रीत्वकी प्राप्ति, बुधसे समागम, प्रेम तथा पुन: पुत्र जन्म आदि से सम्बन्ध रखनेवाली सब बातें कह सुनायीं। सुनकर पुरूरवाने माता से पूछा- 'मैं क्या करूँ? क्या करनेसे शुभ परिणाम होगा?'
इला बोली - बेटा! तुम्हारे अनुग्रहसे मैं पुरुषत्वकी प्राप्ति, उत्तम राज्य, तुम्हारा तथा अन्य पुत्रों का अभिषेक, सान देना, यज्ञ करना तथा मुक्ति के मार्ग का अवलोकन करना आदि सब कुछ चाहती हूँ। तुम अपने पिता बुधके पास जाकर सब बातें यथार्थरूप से पूछो। वे सब जानते हैं। तुम्हारे लिये हितकर उपदेश देंगे।
माता के कहनेसे पुरूरवा अपने पिता के पास गये और उन्हें प्रणाम करके उन्होंने अपनी माता का तथा अपना कर्तव्य पूछा।
बुधने कहा - 'महामते! मैं राजा इलको जनता हूँ। उनके इला होनेका वृत्तान्त भी मुझसे छिपा नहीं है। उमके वन में आना और उस वनके विषयमें भगवान् शंकरकी आज्ञा का हल भी मुझे मालूम है। बेटा! भगवान् शिव और माता पार्वती के प्रसादसे इलाका शाप दूर हो सकता है। उन दोनोंकी आराधना के सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है। तुम गोदावरी नदीके तटपर जाओ। वहाँ भगवान् शिव पार्वतीजी के साथ सदा विराजमान रहते हैं। वे ही वरदान देकर शापका नाश करेंगे।
पिता की बात सुनकर पुरूरवा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने माता को पुरुषत्व प्राप्त जोने की इच्छा से हिमालय पर्वत, माता, पिता तथा गुरुको मस्तक झुकाया और तपस्या करनेके लिये तुरंत ही त्रिभुवनपावनी गौतमी गङ्गाकी ओर प्रस्थान किया। पुत्रके पीछे-पीछे इला और बुध भी गये। वे सब लोग गौतमी के तटपर पहुँचे और वहाँ स्नान करके तपस्या करते हुए भगवान्की स्तुति करने लगे। पहले बुधने, फिर इलाने, तत्पश्चात् पुरूरवाने देवी पार्वती तथा भगवान् शंकरका स्तवन किया।
बुध बोले - जो अपने शरीरकी केसरसे स्वभावतः सुवर्णके सदृश कान्तिमान् एवं सुन्दर दिखायी देते हैं, कार्तिकेय और गणेशजीके द्वारा जिनकी सदा अर्चना होती रहती है, वे शरणागतवत्सल उमा-महेश्वर मुझे शरण दें।'
इला बोली - संसार के त्रिविध तापरूपी दावानलसे दग्ध होनेवाले देहधारी जिनका चिन्तन करनेसे तत्काल परम शान्तिको प्राप्त होते हैं, वे कल्याणकारी उमा-महेश्वर मुझे शरण दें। देव! मैं आर्त हूँ। मेरे हृदय में बड़ी पीड़ा है। क्लेश आदि से मेरी रक्षा करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। शरणागतकी रक्षा करनेवाले आपके जो दोनों परम पवित्र चरण हैं, वे मुझे शरण दें।
पुरूरवा बोले - जिनसे इस जगत् की उत्पत्ति होती है तथा प्रलयकाल में यह सब जिनके ही भीतर लयको प्राप्त होता है, वे संसारको शरण देनेवाले जगदात्मा उमा-महेश्वर मुझे शरण दें। देवताओं के समुदायमें एक महान् उत्सव के अवसरपर गिरिराजकुमारी पार्वतीने महादेवजी से कहा था- 'ईश! आप मेरे दोनों चरण पकड़ें।' इसपर शिवजीने अत्यन्त प्रीतिवश पार्वतीके जिन दोनों शरणागतपालक चरणोंको ग्रहण किया था, वे मुझे शरण दें।
यह स्तुति सुनकर उमावर महेश्वर प्रकट हो गये। भगवती उमाने कहा- 'तुमलोगोंका मनोरथ क्या है? बताओ, मैं उसे पूर्ण करुँगी। तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब लोग कृतार्थ हो गये। जो वस्तु देवताओंके लिए भी दुर्लभ हो, वह भी मैं तुम्हें दूँगी।'
पुरूरवा बोले - 'जगदम्बिके! राजा इल अज्ञानवश आपके वन में घुस गये थे। देवेश्वरि! आप उनके उस अपराधको क्षमा करें और पुन: उन्हें पुरुषत्व दें।
पार्वती ने भगवान् शंकर की सम्मतिके अनुसार 'तथास्तु' कहकर उन सबकी प्रार्थना स्वीकार की। इसके बाद शिवजी ने कहा- 'राजा इल गौतमी गङ्गा में स्नान क्र्नेमात्र से पुरुष हो जाएँगे।' तब बुधकी पत्नी इलाने गङ्गामें स्नान किया। स्नानके पश्चात् इला के शरीरसे जो जल चू रहा था, उसके साथ उसके नारीजनोचित सौन्दर्य, नृत्य और संगीत भी गङ्गाकी धारा में मिल गये। वे ही नृत्या, गीता और सौभाग्या नाम की नदियोंके रूप में परिणत हुए। वे नदियाँ भी गङ्गा आ मिलीं। इससे वहाँ तीन पवित्र संगम हो गये। उनमें किया हुआ स्नान और दान इन्द्रपद की प्राप्ति करनेवाला है। शिव और पार्वतीके प्रसादसे पुरुषत्व प्राप्त करने के पश्चात् राजा इलने महान् अभ्युदयकी सिद्धिके लिए वहाँ अश्वमेध-यज्ञ किया। पुरोहित वसिष्ठ, अपनी पत्नी, पुत्र, अमात्य, सेना और कोशको भी लाकर उन्होंने वह यज्ञ सम्पन्न किया। दण्डक वन में इलने चतुरङ्गिणी सेनासहित राज्यकी स्थापना की। वहाँ इलके नामसे विख्यात उनका नगर भी है। सुर्यवंशकी परम्परा जो उन्होंने पहलेपुत्र उत्पन्न किये थे, उनको राज्यपर अभिषिक्त करके पीछे स्नेहवश पुरूरवाका भी अभिषेक किया। ये राजा पुरूरवा ही चंद्रवंश के प्रवर्तक हुए। जहाँ राजा को पुरुषत्वकी प्राप्ति हुई, वहाँ गौतमीके दोनों तटोंपर सोलह हजार तीर्थोंका निवास है। वहाँ इलेश्वर नामक भगवान् शंकर की भी स्थापना हुई है। उन तीर्थों में स्नान और दान करनेसे सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।
Summary of chapter 46 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
This chapter contains supplementary verses and Indradyumna's extended prayer (stotra) to Vāsudeva prior to the installation of the idol. Indradyumna worships Bhagavān through the Pañcarātra rites, composing hymns to Vāsudeva, Saṃkarṣaṇa, Pradyumna, and Aniruddha. His prayer emphasizes the theological unity behind the many divine forms, declaring that all names and forms ultimately resolve into the one supreme Puruṣa.