ब्रह्म पुराण

6 - आयु और नहुषके वंशका वर्णन, रजि एवं ययातिका चरित्र

लोमहर्षणजी कहते हैं - आयु के उनकी पत्नी स्वर्भानुकुमारी प्रभा के गर्भ से पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। वे सभी वीर और महारथी थे। सर्वप्रथम नहुष का जन्म हुआ। उनके बाद वृद्धशर्मा उत्पन्न हुए। तत्पश्चात् क्रमशः रम्भ, रजि तथा अनेना हुए। ये तीनों लोकों मई विख्यात थे। रजि ने पाँच सौ पुत्रों को जन्म दिया। वे सभी राजेय क्षत्रिय के नाम से विख्यात हुए। उनसे इन्द्र भी डरते थे। पूर्वकाल में देवताओं तथा असुरों में भयंकर युद्ध आरम्भ होने पर दोनों पक्षों के लोगों ने ब्रह्माजी से पूछा- 'भगवन्! आप सब भूतों के स्वामी हैं, बताइये, हमारे युद्ध में कौन विजयी होगा? हम इस बात को ठीक-ठीक सुनना चाहते हैं।'

ब्रह्माजी ने कहा - राजा रजि हथियार हाथ में लेकर जिनके लिए युद्ध करेंगे, वे नि: संदेह तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। जिस पक्ष में रजि हैं, उधर ही धृति है। जहाँ धृति है, वहीँ लक्ष्मी है तथा जहाँ धृति और लक्ष्मी हैं, वाही धर्मएवं विजय है।

यह सुनकर देवता और दानव दोनों का मन प्रसन्न हो गया। वे रजि के पास आकर बोले- 'राजन्! आप हमारी विजय के लिए श्रेष्ठ धनुष धारण कीजिये।' तब रजि ने स्वार्थ को सामने रखकर अपने यश को प्रकाश में लाते हुए उभय पक्ष के लोगों से कहा- 'देवताओं! यदि मैं अपने पराक्रम से समस्त दैत्यों को जीतकर धर्मत: इन्द्र बन सकूँ तो तुम्हारी ओर से युद्ध करूँगा।' देवताओं ने इस शर्त को पहले ही प्रसन्नतापूर्वक मान लिया। वे बोले- 'राजन्! ऐसा ही करो। तुम्हारी मन:-कामना पूर्ण हो।' देवताओं की यह बात सुनकर राजा रजि ने असुरों से भी वही बात पूछी। तब अहंकारी दानवों ने स्वार्थ को ही सोचकर उन्हें अभिमानपूर्वक उत्तर दिया- 'राजन्! तुम इस युद्ध में चुपचाप खड़े रहो। हमारे इन्द्र तो प्रह्लाद ही होंगे। इनके लिए हम विजय करने को प्रस्तुत हैं।' देवताओं ने फिर कहा- 'राजन्! तुम दैत्यपक्ष को जीतकर देवेन्द्र हो सकते हो।' तब रजि ने उन सब दानवों का, जो देवराज इन्द्र के लिये अवध्य थे, संहार कर डाला और देवताओं की नष्ट हुई सम्पत्ति को पुन: उनसे छीन लिया। उस समय देवताओं सहित इन्द्र महाराज रजि के पास आये और अपने को उनका पुत्र घोषित करते हुए बोले- 'तात! आप नि:संदेह हम सब लोगों के इन्द्र हैं, क्योंकि मैं इन्द्र आज से आपका पुत्र कहलाऊँगा।' इन्द्र की बात सुनकर उनकी माया से वञ्चित हो महाराज रजि ने 'तथास्तु' कह दिया। वे इन्द्र पर बहुत प्रसन्न थे। रम्भ के कोई पुत्र नहीं था। अब अनेना के वंश का वर्णन करूँगा। अनेना के पुत्र महायशस्वी राजा प्रतिक्षत्र हुए। प्रतिक्षत्र के पुत्र संजय, संजय के जय, जय के विजय, विजय के कृति, कृति के हर्यश्व, हर्यश्व के प्रतापी सहदेव, सहदेव के धर्मात्मा नदीन, नदीन के जयत्सेन, जयत्सेन के संकृति तथा संकृति के पुत्र महायशस्वी धर्मात्मा क्षत्रवृद्ध हुए। क्षत्रवृद्ध का पुत्र सुनहोत्र था। उसके काश, शल और गृत्समद- ये तीन परम धर्मात्मा पुत्र हुए। गृत्समद के पुत्र शुनक थे। शुनक से शौनक का जन्म हुआ। शल के पुत्र का नाम आर्ष्टिषेण था। उनके काश्य हुए। काश्य के पुत्र का नाम काशिप हुआ। काशिप के दीर्घतपा, दिर्घतपा के धनु और धनु के पुत्र धन्वन्तरि हुए। वे काशी के महाराज और सब रोगों का नाश करने वाले थे। उन्होंने भरद्वाज से आयुर्वेद का अध्ययन करके चिकित्सा का कार्य किया और उसके आठ भाग करके शिष्यों को पढ़ाया। धन्वन्तरि के पुत्र केतुमान् हुए और केतुमान् के वीर पुत्र भीमरथ के नाम से प्रसिद्ध हुए। भीमरथ के पुत्र राजा दिवोदास हुए, जो काशी के सम्राट् और धर्मात्मा थे। दिवोदास के उनकी पत्नी दृषद्वती के गर्भ से प्रतर्दन नामक पुत्र हुआ। प्रतर्दन के दो पुत्र थे- वत्स और भार्ग। वत्स के पुत्र अलर्क और अलर्क के संनति हुए। अलर्क बड़े ब्राह्मणभक्त और सत्यप्रतिज्ञ थे। संनति के पुत्र धर्मात्मा सुनीथ हुए। सुनीथ के महायशस्वी क्षेम, क्षेम के केतुमान्, केतुमान् के सुकेतु, सुकेतु के धर्मकेतु, धर्मकेतु के महारथी सत्यकेतु, सत्यकेतु के राजा विभु, विभु के आनर्त, आनर्त के सुकुमार, सुकुमार के धर्मात्मा धृष्टकेतु, धृष्टकेतु के राजा वेणुहोत्र और वेणुहोत्र के पुत्र राजा भार्ग हुए। प्रतर्दन के जो वत्स और भार्ग नामक दो पुत्र बतलाये गये हैं, उनमें वत्स के वत्सभूमि और भार्ग के भार्गभूमि नामक पुत्र हुए थे। काश्य के कुल में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यजाति के हाजारों पुत्र हुए। अब नहुष की संतानों का वर्णन सुनो।

नहुष के उनकी पत्नी पितृकन्या विरजा के गर्भ से पाँच महाबली पुत्र हुए, जो इन्द्र के समान तेजस्वी थे। उनके नाम ये हैं- यति, ययाति, संयाति, आयाति तथा पार्श्वक। उनमें यति ज्येष्ठ थे। उनके बाद ययाति उत्पन्न हुए थे। यति ने ककुतस्थ की कन्या गौसे विवाह किया था। वे मोक्षधर्म का आश्रय ले ब्रह्मस्वरूप मुनि हो गये। उन पाँच भाइयों में ययाति ने इस पृथ्वी को जीतकर शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी तथा असुर-कन्या शर्मिष्ठा को पत्नी रूप में प्राप्त किये। देवयानी ने यदु और तुर्वसु को जन्म दिया तथा वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्या, अनु तथा पूरु नामक पुत्र उत्पन्न किये। ययातिपर प्रसन्न हो इन्द्र ने उन्हें अत्यन्त प्रकाशमान रथ प्रदान किया। उसमें मन के समान वेगशाली दिव्य अश्व जुते हुए थे। ययाति ने उस श्रेष्ठ रथ के द्वारा छ: रातों में ही सम्पूर्ण पृथ्वी तथा देवताओं और दानवों को भी जीत लिया। वे युद्ध में शत्रुओं के लिये दुर्धर्ष थे। समुद्र और सातों द्वीपों सहित समूची पृथ्वी को अपने अधिकार में करके उन्होंने उसके पाँच भाग किये और उन्हें अपने पाँचों पुत्रों में बाँट दिया। तत्पश्चात् एक दिन उन्होंने यदु से कहा- 'बेटा! कुछ आवश्यकतावश मुझे तुम्हारी युवावस्था चाहिये। तुम मेरा बुढ़ापा ग्रहण करो और मैं तुम्हारे रूप से तरुण होकर इस पृथ्वी पर विचरूँगा।' यह सुनकर यदुने उत्तर दिया- 'राजन्! बुढ़ापे में खान-पान-सम्बन्धी बहुत-से दोष हैं। अत: मैं उसे नहीं ले सकता। आपके अनेक पुत्र हैं, जो मुझसे भी बढ़कर प्रिय हैं। अत: युवावस्था ग्रहण करने के लिये किसी दूसरे पुत्र को बुलाइये।'

ययाति बोले - ओ मुर्ख! मेरा अनादर करके तेरे लिये कौन-सा आश्रम है? अथवा किस धर्म का विधान है? मैं तो तेरा गुरु हूँ, फिर मेरी बात क्यों नहीं मानता?

यों कहकर ययाति ने कुपित हो यदु को शाप दिया- 'ओ मुर्ख! तेरी संतति को कभी राज्य नहीं मिलेगा।' तत्पश्चात् ययाति ने क्रमशः द्रुह्य, तुर्वसु तथा अनु से भी यही बात कही; परन्तु उन्होंने भी युवावस्था देने से इन्कार कर दिया। तब ययाति ने अत्यन्त क्रोध में भयकर उन सबको भी पूर्ववत् शाप दे दिया। इस प्रकार सबको शाप दे राजा ने अपने छोटे पुत्र पुरु से भी वही प्रस्ताव किया- 'वत्स! यदि तुम्हें स्वीकार हो तो अपना बुढ़ापा तुम्हें देकर और तुम्हारी युवावस्था स्वयं लेकर इस पृथ्वी पर विचरुँ।' पिता की आज्ञा के अनुसार प्रतापी पूरु उनका बुढ़ापा ले लिया। ययाति भी पूरु के तरुण रूप से पृथ्वी पर विचरने लगे। वे कामनाओं का अन्त ढूँढ़ते हुए चैत्ररथ नामक वन में गये और वहाँ विश्वाची नामक अप्सरा के साथ रमण करने लगे। जब काम और भोग से तृप्त हो व्हुके, तब पूरु के समीप जाकर उन्होंने अपना बुढ़ापा ले लिया। उस समय ययाति ने जो उद्रार प्रकट किया, उसपर ध्यान देने से मनुष्य सब भोगों की ओर से अपने मन को उसी प्रकार हटा सकता है, जैसे कछुआ अपने अङ्गों को सब ओर से समेट लेता है। ययाति बोले-

न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति ।

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥

यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय: ।

नालमेकस्य तत्सर्वमिति कृत्वा न मुह्यति ॥

यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् ।

कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्मा सम्पद्यते तदा ॥

यदा तेभ्यो न बिभेति यदा चास्मान्न बिभ्यति ।

यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यत: ।

योऽसौ प्राणान्ति को रोगस्तां तृष्णां त्यजत: सुखम् ॥

जिर्यन्ति जीर्यत: केशा दन्ता जिर्यन्ति जीर्यत: ।

धनाशा जिविताशा च जिर्यतोऽपि न जीर्यति ॥

यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् ।

तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हन्ति षोडशीं कलाम् ॥

(१२। ४०-४६)

भोगों की इच्छा उन्हें भोगने से कभी शान्त नहीं होती, अपितु घीसे आग की भाँति और भी बढ़ती ही जाती है। इस पृथ्वी पर जितने भी धान, जौ, सुवर्ण, पशु तथा स्त्रियाँ हैं, वे सब एक मनुष्य के लिये भी पर्याप्त नहीं हैं- ऐसा समझकर विद्वान् पुरुष मोह में नहीं पड़ता। जब जीव मन, वाणी और क्रिया द्वारा किसी भी प्राणी के प्रति पाप-बुद्धि नहीं करता, तब वह ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। जब वह किसी भी प्राणी से नहीं डरता तथा उससे भी कोई प्राणी नहीं डरते, जब वह इच्छा और द्वेष से परे हो जाता है, उस समय ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। खोटी बुद्धि वाले पुरुषों द्वारा जिसका त्याग होना कठिन है, जो मनुष्य के बूढ़े होने पर भी बूढ़ी नहीं होती तथा जो प्राणनाशक रोग के समान है, उस तृष्णा त्याग करनेवाले को ही सुख मिलता है। बूढ़े होनेवाले मनुष्य के बाल पक जाते हैं, दाँत टूट जाते हैं; परन्तु धन और जीवन आशा उस समय भी शिथिल नहीं होती। संसार में जो कामजनित सुख है तथा जो दिव्य लोक का महान् सुख है, वे सब मिलकर तृष्णा-क्षय से होनेवाले सुख की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हो सकते।'

     यों कहकर राजर्षि ययाति स्त्रीसहित वन में चले गये। वहाँ बहुत दिनों तक उन्होंने भारी तपस्या की। तपस्या के अन्त में भृगुतुङ्ग नामक तीर्थ के भीतर उन्होंने सद्रति प्राप्त की महायशस्वी ययाति ने स्त्री सहित उपवास करके देह का त्याग किया और स्वर्गलोक को प्राप्त कर लिया।