ब्रह्म पुराण

52 - पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा, धन्वन्तरि और इन्द्रपर भगवान् की कृपा

ब्रह्माजी कहते हैं - गौतमी गङ्गाके उत्तर-तटपर पूर्णतीर्थ है। वहाँ यदि मनुष्य अनजान में नहा ले तो भी कल्याणका भागी होता है। पूर्णतीर्थके महात्म्यका वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ स्वयं चक्रधारी भगवान् विष्णु और पिनाकधारी भगवान् शंकर निवास करते हैं। पूर्वकाल में आयुके पुत्र धन्वन्तरि राजा थे। उन्होंने अश्वमेध आदि अनेक प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान किया, भाँति-भाँतिके दान दिये तथा प्रचुर भोग भोगे। फिर भोगोंकी विषमताका अनुभव करके उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ। धन्वन्तरि यह जानते थे कि पर्वत के शिखरपर, गङ्गा नदी के किनारे, समुद्रके तटपर, शिव और विष्णुके मंदिर में अथवा विशेषत: किसी पवित्र संगमपर किया हुआ जप, तप, होम- सब अक्षय होता है; इसलिये उन्होंने गङ्गा-सागर-संगमपर भारी तपस्या आरम्भ की। एक बार राजा धन्वन्तऋने राज्य करते समय एक महान् असुर को रणभूमिसे मार भगाया तह। उसका नाम था तम। वह एक हजार वर्षोंतक राजा के भयसे समुद्रमें छिपा रहा। जब उसे मालूम हुआ कि राजा धन्वन्तरि विरक्त होकर वन में चले आये हैं और उनका पुत्र राज्यसिंहासन पर आसीन हुआ है, तब वह समुद्र से निकला और उस स्थानपर आया, जहाँ महाराज धन्वन्तरि गङ्गातटका आश्रय ले जप और होम में संलग्न तथा ब्रह्मचिन्तनमें तटपर थे। उसने सोचा- 'इस बलवान राजा ने मुझे अनेक बार नष्ट करनेका प्रयत्न किया है, अत: मैं भी क्यों न अपने इस शत्रुको नष्ट कर डालूँ।' ऐसा निश्चय करके उसने माया से एक स्त्रीका रूप बनाया और राजा के पास आया। वह मायामयी सुन्दरी तरूणी देखनेमें बड़ी मनोहर थी। उसने हँसते हुए नाचना और गाना आरम्भ किया। उस सुन्दरी को बहुत समय्तल इस अवस्था में देख राजा ने कृपापूर्वक पूछा- 'कल्याणी! तुम कौन हो? किसके लिए इस गहन वं में निवास करती हो और किसे देखकर तुम्हें इतना उल्लास-सा हो रहा है?'

तरुणी बोली - राजन्! आपके रहते संसार में दूसरा कौन है, जो मेरे उल्लासका कारण हो सके। में इन्द्रकी लक्ष्मी हूँ। आपको सब भोगोंसे सम्पन्न देख बारंबार आपके सामने विचरती हूँ। असंख्य पुण्यके बिना मैं सभीके लिए अत्यन्त दुर्लभ हूँ।

उसकी यह बात सुनकर राजा ने वह अत्यन्त कठोर तपस्या त्याग दी और मन-ही-मन उसीका चिन्तन करने लगे। उसीके आश्रय तथा उसी के आज्ञा-पालनमें रहने लगे। जब सब तेरहसे वे एकमात्र उसीकी शरण में चले गये तब उनकी भारी तपस्या का नाश करके तम अन्तर्धान हो गया। इसी बीच में मैं राजा को वर देनेके लिए गया। वे तपोभ्रष्ट एवं विह्वल होकर मृतक के समान रो रहे थे। मैंने अनेक प्रकार की युक्तियोंसे महाराज धन्वन्तरिको सान्त्वना दी और कहा- राजन्! तुम्हारा शत्रु तम तुम्हें तपस्यासे भ्रष्ट करके कृतकार्य होकर चला गया। तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। प्राय: सभी तरुणी स्त्रियाँ पुरुषको पहले कुछ आनन्द और पीछे भारी संताप देती हैं, फिर वह तो मायामयी थी; अत: उसका संतापप्रद होना क्या आश्चर्यकी बात है।*

तब राजा धन्वन्तरिका भ्रम दूर हुआ। वे हाथ जोड़कर बोले- 'ब्रह्मन्! क्या करूं? तपस्याके पार कैसे जाऊँ?' मैंने उत्तर दिया- 'देवाधिदेव जनार्दनकी यत्नपूर्वक स्तुति करो। उससे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी। भगवान् विष्णु वेदवेद्य पुरातन परमात्मा हैं। उन्होंने ही सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की है। तीनों लोकों में उनके सिवा दूसरा कोई पुरुष ऐसा नहीं है, जो प्राणियोंके समस्त मनोरथोंकी सिद्धि कर सके।' मेरी आज्ञा मानकर राजा धन्वन्तरि गिरिराज हिमालयपर चले गये और वहाँ दोनों हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुकी स्तुति करने लगे।

धन्वन्तरि बोले - सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले विष्णो! आपकी जय हो। अचिन्त्य परमेश्वर! आपकी जय हो। विजयशील अच्युत! आपकी जय हो। गोपाल! आपकी जय हो। लक्ष्मी के स्वामी, जगन्मय श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। भूतपते! आ[की जय हो। नाथ आपकी जय हो। आप शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सर्वव्यापी गोविन्द! आपकी जय हो, जय हो। आप विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। देव! आपकी जय हो, जय हो। आप विश्व का पालन और धारण करनेवाले हैं। ईश! आपकी जय हो। आप सदसत्स्वरूप हैं। माधव! आपकी जय हो। आप धर्मनिष्ठ परमात्माको नमस्कार है। कामनाओंको पूर्ण करनेवाले और काम्स्वरूप केशव! आपकी जय हो। गुणोंके सागर श्रीराम! आपकी जय हो। आप पुष्टि देनेवाले और पुष्टिके स्वामी हैं। आपकी जय हो, जय हो। कल्याणदाता! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण भूतोंके पालक! आपकी जय हो। भूतेश्वर! आपकी जय हो। आप मौन धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। कर्मफलों के दाता! आपकी जय हो। आप ही कर्मस्वरुप हैं। पीताम्बरधारी प्रभो! आपकी जय हो। सर्वेश्वर! आपकी जय हो। आप सर्वस्वरुप हैं। आप मङ्गलरूप प्रभुको नमस्कार है। नाथ! आप सत्त्वगुण के अधिनायक हैं। आपकी जय हो, जय हो। आप सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता हैं। आपको मेरा नमस्कार है। आप ही जन्मदाता हैं और आप ही जन्म लेनेवाले प्राणियोंके भीतर निवास करते हैं। आपकी जय हो। परमात्मन्! आपको नमस्कार है। मुक्तिदाता! आपकी जय हो। आप ही मुक्ति हैं। भोग प्रदान करनेवाले केशव! आपकी जय हो। लोकप्रद परमेश्वर! आपकी जय हो। पापोंका नाश करनेवाले लोकेश्वर! आपकी जय हो। भक्तवत्सल! आपकी जय हो, जय हो। चक्र धारण करनेवाले आप परमेश्कार को प्रणाम है। मंदता! आपकी जय हो। आप ही मान हैं। विश्वन्दित देव! आपकी जय हो। धर्मदाता! आपकी जय हो। आप धर्मस्वरुप हैं। संसारसे पार लगानेवाले परमात्मन्! आपकी जय हो। अन्नदाता! आपकी जय हो, जय हो। आप ही अन्न हैं। वाचस्पते! आपको नमस्कार है। शक्तिदाता! आपकी जय हो, आप ही शक्ति हैं। विजयका वरदान देनेवाले ईश्वर! आपकी जय हो। आप ही यज्ञ हैं। आपके नेत्र पद्मपत्रकी तरह विशाल हैं। आपकी जय हो। दान देनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो। आप ही दान हैं। कैटभका नाश करनेवाले नारायण! आपकी जय हो। कीर्तिदाता! आपकी जय हो। आप ही कीर्ति हैं। मुर्तिदाता! आपकी जय हो। आप ही मूर्ति धारण करनेवाले हैं। सौख्यादाता! आपकी जय हो। आप ही सौख्यस्वरुप हैं। पावनको भी पावन बनानेवाले परमात्मन्! आपकी जय हो। शांतिदाता! आपकी जय हो! आप ही शान्ति हैं। भगवान् शंकर की भी उत्पत्तिके कारण! आपकी जय हो। ज्योति: स्वरुप! आपकी जय हो। वामन! आपकी जय हो। वित्तेश! आपकी जय हो। धूममयी पताकावाले! आपकी जय हो। सम्पूर्ण जगत् के लिए दातारूप परमेश्वर! आपको नमस्कार है। पुण्डरीकाक्ष! आप ही त्रिलोकीमें रहनेवाले जीवसमुदायका क्लेश निवारण करनेमें दक्ष हैं। कृपानिधे! विष्णो! आप मेरे मस्तकपर अपना वरद हाथ रखिये।

 समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले शङ्खचक्र-गदाधार भगवान् विष्णुने इस प्रकार स्तुति करनेवाले धन्वन्तरि से वर माँगनेको कहा। तब राजा ने विनीत होकर कहा- 'मैं देवताओं का राजा होना चाहता हूँ।' 'तथास्तु' कहकर भगवान् वहाँसे अन्तर्धान हो गये और राजा धन्वन्तरिने क्रमशः उन्नति करते हुए देवेन्द्रपद प्राप्त किया। पूर्वजन्ममें किये हुए अनेक कर्मोंके परिणामवश इन्द्रको तीन बार अपने पदसे भ्रष्ट होना पड़ा। वृत्रासुरका वध होनेपर नहुषके द्वारा इन्द्रका पद छीना गया। इसके बाद इन्द्र ने सिन्धुसेनकी हत्या कर डाली। अत: उस पापसे भी उनके पदकी हानि हुई। तीसरी बार अहल्याके साथ समागम करनेके कारण तथा अन्य कारणों से भी उन्हें पदभ्रष्ट होना पड़ा। इन्द्र उन बातोंको याद करके चिंताजनित संतापसे उदास रहा करते थे। तदनन्तर एक दिन उन्होंने बृहस्पतिजीसे पूछा- 'वागीश्वर! क्या कारण है कि बीच-बीच में मुझसे अपने राज्यसे भ्रष्ट होना ओअद्ता है? इस प्रकार पदभ्रष्ट होनेकी अपेक्षा तो निर्धन हो जाना ही अच्छा है। कर्मोंकी गहन गतिको कौन ठीक-ठीक जनता है। सब पदार्थोंके रहस्यको जानने में आपके सिवा और कोई समर्थ नहीं है।'

तब बृहस्पतिजी ने इन्द्रसे कहा- 'चलकर ब्रह्माजीसे पूछा। वे ही भूत, भविष्य और वर्तमान की बातें जानते हैं। महामते! जिस कारणसे ऐसा होता है, वह सब वे बटा देंगे।' ऐसा निश्चय करके वे दोनों मेरे पास आये और मुझे नमस्कार करके हाथ जोधकर बोले- 'भगवन्! किस दोषसे शचीपति इन्द्र अपने राज्यसे भ्रष्ट होते हैं? नाथ! इस संदेहका निवारण कीजिये।'

उनका यह प्रश्न सुनकर मैंने बहुत देरतक विचार किया। तत्पश्चात् बृहस्पतिसे कहा- 'ब्रह्मन! खण्डधर्म नामक दोषकेकारण इन्द्रको राज्यपदसे च्युत होना पड़ता है। देश-काल आदिके दोषसे, श्रद्धा और मन्त्रका अभाव होनेसे, यथावत् दक्षिणा न देनेसे, असत् वस्तुका दान करनेसे और विशेषत: देवता तथा ब्राह्मणोंकी अवहेलनाके पातकसे जो देहधारियों का अपना धर्म खण्डित हो जाता है, उससे अत्यधिक मानसिक संतापका सामना करना पड़ता है तथा पदकी हानि भी अनिवार्य हो जाती है। क्षोभपूर्ण चित्तसे किया हुआ धर्म भी अनिष्टका ही कारण होता है। उससे कार्यकी सिद्धि नहीं होती। अपना धर्म पूर्ण न होनेपर कौन-सा अनिष्ट नहीं होता।' यों कहकर मैंने उनके पूर्वजन्मका वृत्तान्त भी बतलाया। 'पूर्वजन्म में इन्द्र राजा आयु के पुत्र धन्वन्तरि थे। उनकी तपस्या में तम नामक राक्षस विघ्न डाल दिया, फिर भगवान् विष्णने उस विघ्नका निवारण किया। इस तरह इनके पूर्वजन्मोंमें ऐसे वृत्तान्त अनेक हो सकते हैं। उन्हींके फालसे इन्हीं कभी-कभी अपने राज्यसे वञ्चित रहना पड़ता है।'

मेरी बात सुनकर इन्द्र और बृहस्पति दोनों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने फिर मुझसे ही पुच्चा- 'सुरश्रेष्ठ! खण्डधर्मत्व दोषका निवारण कैसे होगा?' तब मैंने पुन: सोचकर कहा- 'सुनो; एक उपाय बताता हूँ, जो समस्त दोषोंका हरक समस्त सिद्धियोंका कारक और दु:खमय संसार-सागरसे समस्त प्राणियोंका तार्क है। जिनके चित्तमें संताप रहता है, उनको इसी उपाय की शरण लेनी चाहिये। यह समस्त जीवोंको शान्ति प्रदान करनेवाला है। वह उपाय है- गौतमी देवीके तटपर जाकर भगवान् विष्णु और शिवकी स्तुति करना।' यह सुनकर वे उसी समय गौतमीके तटपर गये और स्नान करके बड़ी प्रसन्नता के साथ भगवान् विष्णु और शिवकी स्तुति करने लगे। इन्द्रने श्रीविष्णुकी स्तुति की और बृहस्पतिने श्रीशिवकी।

इन्द्र बोले - मस्त्य, कूर्म और वाराहरूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णुको बारंबार नमस्कार है। नरसिंहदेव तथा वामनको भी नमस्कार है। हयग्रीवरूपधारी भगवान्को नाम्स्कार है। त्रिविक्रम! आपको नमस्कार है। श्रीराम, बुद्ध और कल्किरूप भगवान् को नमस्कार है। परमेश्वर! आप अनन्त एवं अच्युत हैं। आपको नमस्कार है। परशुरामरूपधारी! आपको नमस्कार है। मैं इन्द्र, वरुण और यम आपके ही स्वरुप हैं। आपको नमस्कार है। त्रिलोकीरूप धारी देवता परमेश्वरको नमस्कार है। भगवन्! आप अपने मुखमें सरस्वतीको धारण करते हैं और सर्वज्ञ हैं। आप लक्ष्मीवान् हैं। अतएव लक्ष्मीको वक्ष:स्थलपर धारण करते हैं। पाप-ताप आपको छू भी नहीं सकते। आपकी बाँहें, जङ्घा तथा चरण अनेक हैं। कान, नेत्र तथा मस्तक भी बहुत हैं। आप ही वास्तव में सुखी हैं। आपको पाकर बहुत-से जीव सुखी हो गये। हरे! आप करुणाके सागर हैं। मनुष्योंको तभीतक निर्धनता, मलिनता और दीनताका सामना करना पड़ता है, जबतक वे आपकी शरण में नहीं जाते।

बृहस्पति बोले - ईश! आप परम सूक्ष्म, ज्योतिर्मय, अनन्त, ओंकारमात्रसे अभिव्यक्त होनेवाले, प्रकृतिसे परे, चित्स्वरूप, आनन्दमय और पूर्णरूप हैं। मुमुक्ष पुरुष आपका स्वरुप ऐसा ही बतलाते अहिं। भगवान्! जिनके हृदयमें एक भी कामना नहीं अहि अथवा जो सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर चुके हैं, वे भी पञ्चमहाय यज्ञोंद्वारा आपकी आराधना करते हैं और उसके फलस्वरूप आपके दिव्य धाम अथवा दिव्य स्वरुप में, जो संसार-सागरसे परे है, प्रवेश कर जाते हैं। शम्भो! वे निष्काम अथवा आप्तकाम पुरुष समत्वबुद्धिके द्वारा सब प्राणियोंमें आपका दर्सहं करके क्षुधा-पिपासा, शोक-मोह और जरा-मृत्युरूप छ:ऊर्मियोंके प्राप्त होनेपर शान्तभावसे रहते, ज्ञानके द्वारा कर्मफलोंको त्याग देते और ध्यानके द्वारा आप में प्रवेश कर जाते हैं। मुझमें न जाति के धर्म हैं न वेद-शास्त्रका ज्ञान है। न ध्यानका अभ्यास है और न मैं समाधि ही लगाता हूँ। केवल शान्तचित्त भगवान् शिवको, जो रूद्र, शिव और सोम आदि नामों से पुकारे जाते हैं, भक्तिके साथ प्रणाम करता हूँ। भगवन! आपके चरणोंमें भक्ति रखनेसे मूर्ख मनुष्य भी आपके मोक्षमय स्वरुप को प्राप्त कर लेता है। ज्ञान, यज्ञ, तप, ध्यान तथा बड़े-बड़े फल देनेवाले होम आदि कर्मोंका सर्वोतम फल यही है कि भगवान् सोमनाथ में निरन्तर भक्ति बनी रहे। जगदाधार शिव! सब जीवों के लिए सदा देखे और सुने हुए प्रिय फलकी, स्वर्गकी तथा मोक्षकी प्राप्तिके लिए आपकी यह भक्ति ही सीढ़ी है। धीर पुरुष आपके चरणोंकी प्राप्तिरुपी फालके लिए दूसरी किसी सीढ़ीको नहीं बतलाते। दयालो! इसलिये आपके प्रति मेरी भक्ति बनी रहे। आपके श्रीविग्रहकी सेवक सौभाग्य प्राप्त होता रहे। दूसरा कोई उपाय नहीं है। ईश्वर! यद्यपि हमलोग पापी है, तथापि आप अपनी महिमाकी ओर देखकर हमपर कृपा कीजिये। आप स्थूल, सूक्ष्म, अनादि, नित्य, पिता, माता, असत् और सत्स्वरूप हैं- श्रुतियों और पुराणों ने इस प्रकार जिनका स्तवन किया है, उन परमेश्वर सोमनाथको मैं प्रणाम करता हूँ।

इस दोनोंकी स्तुतियोंसे भगवान् विष्णु और शिव बहुत प्रसन्न हुए और बोले- 'तुम दोनों अत्यन्त दुर्लभ अभीष्ट वर माँगो।' तब इन्द्रने कहा- 'भगवन्! मेरा राज्य बार-बार अधिकार में आता और छिन जाता है। जिस पापके कारण ऐसा होता है, वह पाप नष्ट हो जाय। यदि आप दोनों देवेश्वर अत्यन्त प्रसन्न हों तो मेरा सब कुछ सदा स्थिर रहे।' यह सुनकर भगवान् शिव और विष्णुने मुसकुराते हुए इन्द्रके वाक्यका अनुमोदन किया और इस प्रकार कहा- 'यह गोदावरी नदी ब्रह्मा, विष्णु और शिव- इन तीनों देवताओंसे सम्बन्ध रखनेवाला महान् तीर्थ है। यहाँ सबके मनोरथ पूर्ण होते हैं। तुम दोनों यहाँ श्रद्धापूर्वक स्नान करो। इन्द्रके मङ्गल के लिए तथा इनके वैभवकी स्थिरता के लिए बृहस्पति हम दोनोंका स्मरण करते हुए इन्द्रका अभिषेक करें तथा उस समय निम्नाङ्कित मन्त्र भी पढ़ें-

इह जन्मनि पूर्वस्मिन् यत्किंचित् सुकृतं कृतम्।

तत् सर्वं पूर्णतामेतु गोदावरि नमोऽस्तु ते ॥

(१२२।९१)

'गोदावरि! मैंने इस जन्ममें अथवा पूर्वजन्ममें कुछ भी पुण्यकर्म किया हो, वह सब पूर्णता प्राप्त हो। आपको नमस्कार है।'

जो इस प्रकार स्मरण करके गौतमी गङ्गामें स्नानकरता है, उसका धर्महम दोनोंकी कृपासे परिपूर्ण होता है तथा वह साधक अपने पूर्वजन्मके दोषसे भी मुक्त होकर पुण्यवान् हो जाता है।'

इन्द्र और बृहस्पतिने 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् की आज्ञा स्वीकार की और दोनों प्रसन्न होकर उस कार्य में लग गये। देवगुरुने इन्द्रका महाभिषेक किया। उससे एक नदी प्रकट हुई, जो पुण्या और मङ्गला कहलायी। उस नदीके साथ जो गङ्गाजिका संगम हुआ, वह बड़ा ही पवित्र एवं कल्याणकारक है। इन्द्रकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर जगन्मय भगवान् विष्णु प्रत्यक्ष प्रकट हुए और उनसे इन्द्रने त्रिलोकीका राज्य प्राप्त किया। अत: ('इन्द्रं गामविन्दयत्'- इस व्युत्पत्तिके अनुसार) भगवान् वहाँ गोविन्दके नाम से विख्यात हुए, क्योंकि इन्द्रने उनसे त्रिलोकमयी गौ प्राप्त की थी। देवगुरु बृहस्पतिने जहाँ इन्द्रके राज्यकी स्थिरताके लिए महादेवजी का स्तवन किया, वहाँ वे सिद्धेश्वर नामसे निवास करते हैं। सिद्धेश्वर नमक शिवलिङ्गकी सम्पूर्ण देवता भी पूजा करते हैं। तबसे वह तीर्थ गोविन्दतीर्थके नम से विख्यात हुआ। वहीं मङ्गला-संगम, पूर्णतीर्थ, इन्द्रतीर्थ और बार्हस्तप्यतीर्थ भी हैं। उन तीर्थों में जो स्नान, दान अथवा किंचिन्मात्र भी पुण्यका उपार्जन किया जाता है, वह सब अक्षय होता है। वहाँका श्रद्धा पितरोंको अत्यन्त प्रिय है। जो मनुष्य प्रतिदिन इस तीर्थ के महात्म्यको सुनता, पढ़ता और स्मरण करता है, उसे खोये हुए राज्यकी प्राप्ति होती है। नारद!  वहाँ गौतमीके दोनों तटोंपर सैंतीस हजार तीर्थ रहते हैं, जो सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाले हैं।

*आनन्दयन्ति प्रमदास्तापयन्ति च मानवम् ॥

सर्वा एव विशेषेण किमु मायामयी तु सा।

(१२२।२३-२४)