13 - तीर्थ-वर्णन

मुनियों ने कहा - धर्म के ज्ञाता सूतजी! पृथ्वी-पर जो-जो पवित्र तीर्थ और मन्दिर हैं, उनका वर्णन कीजिये। इस समय हमारे मन में उन्हीं का वर्णन सुनने की इच्छा है।

लोमहर्षणजी बोले - जिसके हाथ, पैर और मन काबू में हों तथा जिसमें विद्या, तप और कीर्ति हो, वह मनुष्य तीर्थ के फलका भागी होता है। पुरुष का शुद्ध मैन, शुद्ध वाणी तथा वश में की हुई इन्द्रियाँ- ये शारीरिक तीर्थ हैं, जो स्वर्गका मार्ग सूचित करती हैं। भीतर का दूषित चित्त तीर्थस्नान से शुद्ध नहीं होता। जिसका अन्त:कारण दूषित है, जो दम्भ में रूचि रखता है तथा  जिसकी इन्द्रियाँ चञ्चल है, उसे तीर्थ, दान, व्रत और आश्रम भी पवित्र नहीं कर सकते। मनुष्य इन्द्रियों को अपने वश में करके जहाँ-जहाँ निवास करता है, वहीँ-वहीँ कुरुक्षेत्र, प्रयाग और पुष्कर आदि तीर्थ वास करने लगते हैं। द्विजवरो! अब में पृथ्वी के पवित्र तीर्थों और मंदिरों का संक्षेप से वर्णन आरम्भ  करता हूँ, सुनो। पुष्कर, नैमिषारण्य,प्रयाग, धर्मारण्य, धेनुक, चम्पकारण्य, सैन्धवारण्य, मगधारण्य, दण्डकारण्य, गया, प्रभास, श्रीतीर्थ, कनखल, भृगुतुङ्ग, हिरण्याक्ष, भीमारण्य, कुशस्थली, लोहाकुल, केदार, मन्दरारण्य, महाबल, कोटितीर्थ, रूपतीर्थ, शूकर, चक्रतीर्थ, योगतीर्थ, सोमतीर्थ शाखोटक, कोकामुख, बद्रिशैल, तुङ्गकूट, स्कन्दाश्रम, अग्निपद, पञ्चशिख, धर्मोभ्दव, बन्धप्रमोचन, गङ्गाद्वार, पञ्चकूट, मध्यकेसर, चक्रप्रभ, मतङ्ग, कुशदण्ड, दंष्ट्राकुण्ड, वह्निकुंड, सत्यपद, चतु:स्रोत, चतु:श्रृङ्ग, द्वादषधार, मानस, स्थूलश्रृङ्ग, स्थूलदण्ड, उर्वशी, लोकपाल, मनुवर, सोमशैल, सदाप्रभ, मेरुकुण्ड, सोमाभिषेचनतीर्थ, महास्रोत, कोटरक, पञ्चधार, त्रिधार, सप्तधार, एकधार, अमरकण्टक, शालग्राम, कोटिद्रुम, बिल्वप्रभ, देवहृद, विष्णुहृद,  शङ्खप्रभ, देवकुण्ड, वज्रायुध, अग्निप्रभ, पुनांग, देवप्रभ, विद्याधरतीर्थ, गान्धर्वतीर्थ, मणिपुर गिरि, पञ्चहृद, पिण्डारक, मलव्य, गोप्रभाव, गोवर, वटमूल, स्नानदण्ड, विष्णुपद, कन्याश्रम, वायुकुण्ड, जम्बूमार्ग, गभ स्तितीर्थ, यजातिपतन, भद्रवट, महाकाल वन, नर्मदातीर्थ, तीर्थ वज्र, अर्बुद, पिङ्गतीर्थ, वासिष्ठतीर्थ, पृथुसंगम, दौर्वासिक, पिञ्जरक, ऋषितीर्थ, ब्रह्मतुङ्ग, वसुतीर्थ, कुमारिक, शक्रतीर्थ, पञ्चनद, रेणुकातीर्थ, पैतामह, विमलतीर्थ, रूद्रपाद, मणिमान्, कामख्य, कृष्णतीर्थ, कुलिङ्गक, यजनतीर्थ, याजनतीर्थ, ब्रह्मवालुक, पुष्पन्यास, पुण्डरीक, मणिपूर, दीर्घसत्र, हयपद, अनशनतीर्थ, गङ्गोभ्देद, शिवोभ्देद, नर्मदोभ्देद, वस्त्रापद, दारुबल, छायारोहण, सिध्देश्वर, मित्रबल, कालिकाश्रम, वटावट, भद्रवट, कौशाम्बी, दिवाकर, सारस्वतद्वीप, विजयतीर्थ, कामदतीर्थ, रूद्रकोटि, सुमनस्तीर्थ, समन्तपञ्चक, ब्रह्मतीर्थ, सुदर्शनतीर्थ, पारिप्लव, पृथूदक, दशाश्वमेधिक, साक्षिद, विजय, पञ्चनद, वाराह, यक्षिणीहृद, पुण्डरीक, सोमतीर्थ, मुञ्चवट, बदरीवन, रत्नमूलक, स्वर्लोकद्वार,  पञ्चतीर्थ, कपिलातीर्थ, सूर्यतीर्थ, शङ्खिनीतीर्थ, गोभावनतीर्थ, यक्षराजतीर्थ, ब्रह्मावर्त, कामेश्वर, मातृतीर्थ, शातवनतीर्थ, स्नानलोमापह, माससंसरक, केदार, ब्रह्मोदुम्बर, सप्तर्षिकुण्ड, देवीतीर्थ, जम्बुकतीर्थ, ईहास्पद, कोटिकूट, किंदान, किंजय, कारण्डव,अवेध्य, त्रिविष्टप, पाणिखात, मिश्रक, मधुवट, मनोजव, कौशिकीतीर्थ, देवतीर्थ, ऋणमोचनतीर्थ, नृगधूम, अमरहृद, श्रीकुञ्ज, शालितीर्थ, नैमिषेयतीर्थ, ब्रह्मस्थान, कन्यातीर्थ, मनसतीर्थ, कारूपावनतीर्थ, सौगन्धिकवन, मणितीर्थ, सरस्वतीतीर्थ, ईशानतीर्थ, पाञ्चयज्ञिकतीर्थ, त्रिशूलधार, माहेन्द्र, देवस्थान, कृतालय, शाकम्भरी,  देवतीर्थ, सुवर्णतीर्थ,  कलिहृद, क्षीरस्त्रव, विरुपाक्ष, भृगुतीर्थ, कुशोभ्दवतीर्थ, ब्रह्मयोनि, नीलपर्वत, कुब्जाम्बाक, वसिष्टपद, स्वर्गद्वार, प्रजाद्वार, कलिकाश्रम, रुद्रावर्त, सुगन्धाश्व, कपिलावन, भद्रकर्णहृद, शङ्कुकर्णहृद, सप्तसारस्वत, औशनसतीर्थ, कपालमोचन, अवकीर्ण, काम्यक, चतु:सामुद्रिक, शतिक, सहस्त्रिक, रेणुक, पञ्चवटक, विमोचन, स्थाणुतीर्थ, कुरुतीर्थ, कुशध्वज, विश्वेश्वर, मानवकूप, नारायणाश्रम, गङ्गाहृद, बदरीपावन, इन्द्रमार्ग, एकरात्र, क्षीरकावास, दधीच, श्रुततीर्थ, कोटितीर्थस्थली, भद्रकालीहृद, अरुन्धतीवन, ब्रह्मावर्त, अश्ववेदी, कुब्जावन, यमुनाप्रभव, वीर, प्रमोक्ष, सिन्धूत्थ, ऋषिकुल्या, कृत्तिका, उर्वीसंक्रमण, मायाविध्योभ्द, महाश्रम, वेतसिका, सुन्दरिकाश्रम, बाहुतीर्थ, चारुनदी, विमलाशोक, मार्कण्डेयतीर्थ, सितोद, मत्स्योदरी, सूर्यप्रभ, अशोकवन, अरुणास्पद,  शुक्रतीर्थ, वालुकातीर्थ, पिशाचमोचन, सुभद्राहृद, विरलदण्डकुण्ड, चण्डेश्वरतीर्थ, ज्येष्ठस्थानहृद, ब्रह्मसर, जैगीषव्यगुहा, हरिकेशवन, अजामुखसर, घण्टाकर्णहृद, कर्कोटकवापी, सपर्णास्योदपान, श्वेततीर्थहृद, घर्घरिकाकुण्ड, श्यामाकूप, चन्द्रिकातीर्थ, श्मशानस्तम्भकूप, विनायकहृद, सिन्धूभ्दवकूप, ब्रह्मसर, रुद्रावास, नागतीर्थ, पुलोमतीर्थ, भक्तहृद, क्षीरसर, प्रेताधार, कुमारतीर्थ, कुशावर्त, दधिकर्णोदपानक, श्रृङ्गतीर्थ, महातीर्थ, महानदी, गयशीर्ष, अक्षयवट, कपिलाहृद, गृध्रवाट, सावित्रीहृद, प्रभासन, शीतवन, योनिद्वार, धन्यक, कोकिलातीर्थ, मतङ्गहृद, पितृकूप, सप्तकुण्ड, मणिरत्नहृद, कैशिक्यतीर्थ, भरततीर्थ, ज्येष्ठालिकातीर्थ, कल्पसार, कुमारधारा, श्रीधारा, गौरीशिखर, शुन:कुण्ड, नन्दितीर्थ, कुमावास, श्रीवास, कुम्भकर्णहृद, कौशिकीहृद, धर्मतीर्थ, कामतीर्थ, उद्दालकतीर्थ, संध्यातीर्थ, लोहितार्णव, शोणोभ्दव, वंशगुल्म, ऋषभ, कालतीर्थ, पुण्यावर्तिहृद, बदरिकाश्रम, रामतीर्थ, पितृवन, विरजातीर्थ, कृष्णतीर्थ, कृष्णवाट, रोहिणीकूप, इन्द्रद्युम्नसरोवर, सानुगर्त, माहेन्द्र, श्रीनद, इषुतीर्थ, वार्षभतीर्थ, कावेरीहृद, गोकर्ण, गायत्रीस्थान, बदरीहृद, मध्यस्थान, विकर्णक, जातीहृद, देवकूप, कुशप्रथन, सर्वदेवव्रत, कन्याश्रमहृद, वालखिल्यहृद तथा अखण्डितहृद- ये सब पवित्र तीर्थ हैं  । जो मनुष्य इन तीर्थों में उत्तम श्रद्धा से सम्पन्न हो उपवास एवं इन्द्रियसंयमपूर्वक विधिवत् स्नान, देवता, ऋषि, मनुष्य तथा पितरों का तर्पण, देवताओं का पूजन एवं तीन रात्रि तक निवास करता है, वह प्रत्येक तीर्थ के पृथक्-पृथक् फलरूप से अश्वमेध-यज्ञ का पुण्य प्राप्त करता है- इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जो प्रतिदिन इस उत्तम तीर्थ-महात्म्य को सुनता, पढ़ता अथवा सुनाता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।