ब्रह्म पुराण

44 - श्वेततीर्थ, शुक्रतीर्थ और इन्द्रतीर्थ का माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं - नारद! श्वेततीर्थ तीनों लोकों में विख्यात है। उसके श्रवणमात्र से मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है। पूर्वकाल में श्वेतनाम के एक ब्राह्मण थे, जो महर्षि गौतमके प्रिय सखा थे। वे गोदावरीके तटपर रहकर अतिथियोंके स्वागत-सत्कारमें लगे रहते और मन-वाणी तथा क्रियाद्वारा भगवान् शिवका भजन करते थे। वे सदा भगवान् सदाशिवकी पूजा और ध्यान करते रहते थे। शिव के भजनमें ही उनकी आयु पूरी हो गयी। तब यमराज के दूत उन्हें ले जानेके लिए आये, परन्तु नारदजी! वे ब्राह्मण-देवताके घर में प्रवेश न कर सके। जब ब्राह्मणकी मृत्युका समय व्यतीत हो गया, तब चित्रक ने मृत्युसे पूछा- 'मृत्यो! श्वेतका जीवन समाप्त हो चुका है, वह अबतक क्यों नहीं आया? तुम्हारे दूत भी अभीतक नहीं लौटे। ऐसा होना उचित नहीं।' यह सुनकर मृत्युको बड़ा क्रोध हुआ और वे स्वयं ही श्वेत घरपर पधारे। उनके दूत भयभीत होकर बाहर ही खड़े थे। उन्हें देखकर मृत्युने पूछा- 'दूतो! यह क्या बात है?' दूत बोले- 'श्वेत भगवान् शिव के द्वारा सुरक्षित हैं। हम उनकी ओर आँख उठाकर देख भी  नहीं सकते। जिनके ऊपर भगवान् शंकर प्रसन्न हो जाएँ, उन्हें भय कैसा'

तब मृत्यु ने अपना फंदा हाथ में लेकर स्वयं ही ब्राह्मणके घर में प्रवेश किया। ब्राह्मण तो भक्तिपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा कर रहे थे। उन्हें न तो मृत्युके आनेका पता था और न यमदूतोंके। श्वेतके समीप पाशधारी मृत्युको खड़ा देख दण्डधारी भैरवने विस्मित होकर पूछा- 'मृत्युदेव! यहाँ क्या देखते हो?' मृत्युने उत्तर दिया- 'मैं श्वेतको ले जानेके लिए यहाँ आया हूँ, अत: इन्हीं को देखता हूँ।' भैरवने कहा- 'लौट जाओ।' मृत्युने श्वेतपर अपना फंदा फेंका। यह देखकर भैरव कुपित हो उठे। उन्होंने शिवके दिये हुए दण्डसे मृत्यु पर गहरी चोट की। मृत्युदेवता पाश हाथ में लिए हुए ही धरती पर गिर पड़े। मृत्युको मारा गया देख यमदूत भाग गये। उन्होंने मृत्युके वधका संचार यमराजसे कहा। यह सुनकर महिषवाहन यमराजको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अधिक बलवान् चित्रगुप्त, अपनी रक्षा करनेवाले यमदण्ड, महिष, भूत, वेताल तथा आधि व्याधियोंको शीघ्रता पूर्वक चलनेका आदेश दे तुरंत वहाँसे प्रस्थान किया। अपने साथियोंसहित यमराज उस स्थानपर पहुँच, जहाँ द्विजश्रेष्ठ श्वेत भगवान् शिवकी आराधनामें संलग्न थे।

उस समय यमराज तथा भगवान् शिव के पार्षदोंमें अत्यन्त भयानक संग्राम छिड़ गया। कार्तिकेयने स्वयं ही शक्ति सँभाली और यमराजके दूतोंको विदीर्ण कर डाला। साथ ही दक्षिण-दिशाके स्वामी अत्यन्त बलवान्यमराजको भी मौतके घाट उतार दिया। मरने से बचे हुए यमदूतोंने भगवान् सूर्यको यह सब समाचार कह सुनाया।यह अद्भुत बात सुनकर सूर्य समस्त देवताओं और लोकपालोंके साथ मेरे समीप आये। फिर मैं, भगवान् विष्णु, इन्द्र, अग्नि, वरुण तथा अन्य बहुत-से देवता यमराजके पास गये। वे गोदावरीके तटपर मरे पड़े थे। यमराजको सेनासाहित मरा देख देवता भयसे व्याकुल हो उठे और हाथ जोड़कर बारम्बार भगवान् शिवकी प्रार्थना करने लगे।

देवता बोले - भगवन्! आपको अपने भक्त सदा ही प्रिय हैं तथा आप दुष्टोंका वध किया करते हैं। संसार के आदि स्त्रष्टा नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। ब्राह्मप्रिय! आपको नमस्कार है। देवप्रिय! आपको नमस्कार है। विप्रवर श्वेत आपके भक्त हैं। इनकी आयु क्षीण हो जानेपर भी यम आदि सब लोग इन्हें ले जानेमें समर्थ न हो सके। आपका अपने भक्तों पर ऐसा महान् प्रेम देखकर हम सबको बड़ा संतोष हुआ। नाथ! सचमुच ही आप बड़े भक्तवत्सल हैं। जो लोग आप-जैसे दयालु परमेश्वरकी शरण में आ गये हैं, उन्हें यमराज भी नहीं देख सकता। यह जानकार ही सब लोग पराभक्तिके साथ आपका भजन करते हैं। शंकर! आप ही इस जगत् के स्वामी हैं। क्या यह बात आप भूल गये? आपके बिना यहाँ व्यवस्था करनेमें कौन समर्थ हो सकता है।

इस प्रकार स्तुति करनेवाले देवताओंके समक्ष भगवान् शंकर स्वयं प्रकट हो गये और बोले- 'देवताओं! तुम्हें क्या दूँ?'

देवताओं ने कहा - देवेश्वर! ये सूर्यके पुत्र धर्म हैं, जो समस्त देहधारियों का नियन्त्रण करते हैं। इन्हें धर्म और अधर्म की व्यवस्थामें नियुक्त किया गया है। ये लोकपाल हैं। अपराधी और पापी नहीं हैं। अत: इनका वध नहीं होना चाहिये। इनके बिना ब्रह्माजीका कोई कार्य नहीं चल सकता। इसलिये सेना और वाहनोंसहित यमराजको जीवित कर दीजिए। नाथ! महात्माओंके सामने की हुई प्रार्थना सफल ही होती है। वह कभी व्यर्थ नहीं जाती।

भगवान् शिव बोले - देवताओ! मेरी बात सुनो-जो मेरे तथा भगवान् विष्णुके भक्त हैं, गौतमी गङ्गाका निरंतर सेवन करनेवाले है, उनके स्वामी हमलोग स्वयं ही हैं। मृत्यु का उनके ऊपर कोई अधिकार नहीं है। यमराजको तो कभी उनकी बाततक नहीं चलानी चाहिये। व्याधि-आधिके द्वारा उनका पराभव करना कदापि उचित नहीं है। जो मेरी शरण में आ जाते हैं, वे तत्काल मुक्त हो जाते हैं। यमराजको तो चाहिये अपने अनुचरोंसहित उन्हें प्रणाम करे।

'बहुत अच्छा' कहकर देवताओंने भगवान् शिवकी बातका अनुमोदन किया। तब भगवान् शिव ने अपने वाहन नन्दीसे कहा- 'तुम गौतमीका जल लेकर मरे हुए यमराज आदि के शरीर पर छिड़क दो।' आज्ञा पाकर नन्दीने यम आदि सब लोगों पर गोदावरीका जल छिड़का। इससे वे जीवित होकर उठ बैठे और दक्षिण दिशा की ओर चले गये। गौतमीके उत्तर-तटपर विष्णु आदि सब देवता तहर गये और देवाधिदेव महेश्वरकी पूजा करने लगे। उस समय वहाँ एक लाख बारह हजार तीर्थ एकत्रित हुए थे। इसी प्रकार गोदावरीके दक्षिण-तटपर तीस हजार तीर्थ एकत्रित हुए। यही श्वेततीर्थ का पवित्र उपाख्यान है। जहाँ मृत्यु देवता मरकर गिरे थे, वह स्थान मृत्युतीर्थ कहलाता है। वहाँ किया हुआ स्नान और दान सब पापों का नाश करनेवाला है। उसके माहात्म्यका श्रवण, पठन और स्मरण अन्त:करण के मलको धोनेवाला और सबा लोगों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है।

इसके आगे शुक्रतीर्थ है, जो मनुष्योंको सब प्रकार की सिद्धि देनेवाला है। वह सब पापोंको शान्त करनेवाला तथा सब प्रकार की व्याधियोंका नाशक है। अङ्गिरा और भृगु- ये दो परम धर्मात्मा ऋषि हुए हैं। इन दोनोंके दो-दो पुत्र हुए, जो बड़े ही विद्वान और रूप तथा बुद्धिसे सुशोभित थे। अङ्गिराके पुत्र का नाम था जीव और भृगुके पुत्रका नाम था कवि।ये दोनों अपने माता-पिता के अधीन रहते थे। जब दोनोंका यज्ञोंपवीत-संस्कार हो गया, तब उनके पिता परस्पर कहने लगे- 'हम दोनोंमें से एक ही इन दोनों पुत्रोंका शिक्षक हो। इससे एक ही शासन करेगा और दूसरा सुखसे बैठा रहेगा।' यह सुनकर अङ्गिराने कहा- 'मैं कविको भी अपने पुत्रके समान ही पढ़ाऊँगा। वह सुखपूर्वक मेरे यहाँ रहे।'

अङ्गिरा की बात सुनकर भृगुने कहा- 'ठीक है' और उन्होंने अपने पुत्र शुक्रको अङ्गिराकी सेवा में सौंप दिया। परन्तु अङ्गिरा उन दोनों बालकों में विषम बुद्धि रखते थे। इसलिये दोनोंको पृथक्-पृथक् पढ़ाते थे। बहुत दिनों तक किसी प्रकार चलता रहा, तब एक दिन शुक्रने कहा- 'गुरुदेव! आप मुझे प्रतिदिन विषमभाव से पढ़ाते हैं। गुरुओंके लिए यह उचित नहीं कि वे पुत्र और शिष्योंमें भेदभाव समझें। जो लोग विषम बुद्धि रखते हैं, उनके पापकी कोई गणना नहीं है। आचार्य! अब मैंने आपको अच्छी तरह समझ लिया। आपको बारंबार नमस्कार करता हूँ। अब दूसरे किसी गुरुके यहाँ जाऊँगा। मुझे जानेकी आज्ञा दीजिए।'

इस प्रकार गुरु और बृहस्पतिसे पूछकर उनकी आज्ञा ले शुक्र चले गये। उन्होंने सोचा अब पूर्ण विद्या प्राप्त करके ही पिताके पास चलूँ। किन्तु किससे पूछूँ, कौन सबसे श्रेष्ठ गुरु हो सकता है? इन्हीं सब बातोंका विचार करते हुए शुक्रने महाप्राज्ञ गौतमके पास जाकर पूछा- 'मुनिश्रेष्ठ! बताइये, कौन मेरा गुरु हो सकता है? जो तीनों लोकों का गुरुहो, उसीके पास मैं जाउँगा।'

गौतम ने कहा - जगद्रुरु भगवान् शंकर ही गुरु होने योग्य हैं।

शुक्रने पूछा - मैं कहा रहकर शङ्करजी की आराधना करूँ?

गौतम बोले - गौतमी गङ्गामें स्नान करके पवित्र हो स्तोत्रोंद्वारा भगवान् शंकर को संतुष्ट करो। संतुष्ट होनेपर वे जगदीश्वर तुम्हें विद्या प्रदान करेंगे।

गौतमके कहनेसे शुक्र गोदावरीके तटपर गये और वहाँ स्नान करके पवित्र हो भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे।

शुक्र बोले - प्रभो! में बालक हूँ। मेरी बुद्धि बालककी ही है और आप बालचन्द्रमाको मस्तकपर धारण करनेवाले हैं। मुझे आपकी स्तुति करनेका कुछ भी ज्ञान नहीं है। केवल आपको नमस्कार करता हूँ। गुरुने मुझे त्याग दिया है। मेरा कोई सुहृद् अथवा सखा नहीं है। आप ही सब प्रकार से मेरे प्रभु हैं। जगन्नाथ! आपको नमस्कार है। आप गुरुवालोंके भी गुरु और बड़ोंके भी बड़े है। मैं छोटा बच्चा हूँ। मुझपर कृपा कीजिये। जगन्मय! आपको नमस्कार है। सुरेश्वर! मैं विद्याके लिए आपकी शरण में आया हूँ। मुझे आपके स्वरुपका कुछ भी ज्ञान नहीं है। आप स्वयं ही कृपा करके मेरी ओर देखें। लोकसाक्षी शिव! आपको नमस्कार है।

शुक्रके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् शंकर प्रसन्न होकर बोले- 'वत्स! तुम्हारा कल्याण हो। तुम इच्छानुसार वर माँगों, भले ही वह देवताओंके लिए भी दुर्लभ क्यों न हो।' उदारबुद्धि कविने भी हाथ जोड़कर कहा- 'नाथ! ब्रह्मा आदि देवताओं तथा ऋषियोंको  भी जो विद्या नहीं प्राप्त हुई हो, उसके लिए मैं याचना करता हूँ। आप ही मेरे गुरु और देवता हैं।'

ब्रह्माजी कहते हैं - शुक्रने जब इस प्रकार प्रार्थना की, तब देवश्रेष्ठ भगवान् शिव ने उन्हें मृतसंजीवनी विद्या प्रदान की, जिसका ज्ञान देवताओं को भी नहीं था। साथ ही उन्होंने लौकिकी, वैदिकी तथा अन्यान्य विद्याएँ भी दीं। जब साक्षात् भगवान् शंकर ही प्रसन्न हो गये थे, तब क्या बाकी रह जाता। वह महाविद्या पाकर शुक्र अपने पिता और गुरुके पास गये। अपनी विद्या से पूजित होकर वे दैत्योंके गुरु हुए। किसी समय कुछ कारणवश बृहस्पतिके पुत्र कचने शुक्राचार्यसे मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की। कचसे बृहस्पतिने और बृहस्पतिसे पृथक्-पृथक् देवताओं ने उस विद्या को ग्रहण किया। गौतमीके उत्तरतटपर, जहाँ भगवान् महेश्वरकी आराधना करके शुक्रने विद्या पायी थी, वह स्थान शुक्रतीर्थ कहलाता है। मृत्यु-संजीवनीतीर्थ भी उसका नाम है। वह आयु और आरोग्यकी वृद्धि करनेवाला है। वहाँ स्नान, दान आदि जो कुछ भी शुभ कर्म किया जाता है, वह अक्षय पुण्य देनेवाला होता है।

शुक्रतीर्थके बाद इन्द्रतीर्थ है। वह ब्रह्महत्याका विनाश करनेवाला है। उसके स्मरणमात्रसे पाप-राशि तथा क्लेशसमुदायका नाश हो जाता है। नारद! पूर्वकालकी बात है। जब इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया, तब ब्रह्महत्या उनके पीछे लग गयी। उसे देखकर इन्द्रको बड़ा भय हुआ। वे इधर-उधर भागने लगे। किन्तु जहाँ-जहाँ वे जाते, ब्रह्महत्या उनका पीछा नहीं छोड़ती थी। तब वे एक बहुत बड़े सरोवर में प्रवेश करके कमलकी नाल में छिप गये और उसमें तन्तुकी भाँति होकर रहने लगे। ब्रह्महत्या भी उस सरोवरके तटपर एक हजार दिव्य वर्षोंतक बैठी रही। इस बीच में सब देवता बिना इन्द्रके हो गये थे। उन्होंने आपस में सलाह की, किस प्रकार इन्द्र प्रकट हों? उस समय मैंने देवताओं से कहा- 'ब्रह्महत्याके लिये दूसरा स्थान दे दिया जाय और इन्द्रको शुद्ध करनेके लिए गोदावरी नदीमें नहलाया जाय। उसमें स्नान करनेसे इन्द्र पुन:शुद्ध हो जाएँगे।'

इन्द्र का प्रथम अभिषेक नर्मदा-तटपर हुआ। वहाँ उनके मलका शोधन होने के कारण उस देशका नाम मालव पड़ा। तत्पश्चात् वे गौतमी गङ्गाके तटपर लाये गये। वहाँ पुण्या नदीके जल में गौतमीका जल लाकर उसीसे समस्त देवता, ऋषि, मैं, विष्णु, वसिष्ठ, गौतमी, अगस्त्य, अत्रि, कश्यप, अन्यान्य ऋषि, यक्ष तथा पन्नगों ने इन्द्रका अभिषेक किया। तत्पश्चात् मैंने उन्हें अपने कमण्डलुके जलसे भी अभिषिक्त किया। इस प्रकार वहाँ 'पुण्या' और 'सिक्ता' दो नदियाँ हो गयीं और वे दोनों गौतमी गङ्गा में आकार मिलीं। उन दोनों के संगम मुनियों द्वारा सेवित विख्यात तीर्थ बन गये। तबसे उस तीर्थको पुण्यासंगम कहते हैं। सिक्तासङ्गमका ही नाम इन्द्रतीर्थ हो गया। वहाँ सात हजार मङ्गलमय तीर्थ निवास करने लगे। उन तीर्थोमें तथा विशेषत: संगमके जल में जो स्नान-दान किया जाता है, वह सब अक्षय जानना चाहिये। इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। जो इस पवित्र उपाख्यान को पढ़ता अथवा सुनता है, वह मन, वाणी, शरीर और कियाद्वारा होनेवाले समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।