मुनियों ने कहा - मुनिश्रेष्ठ! आपने श्रीकृष्ण और बलरामका कैसा अद्भुत महात्म्य बतलाया! उनकी महिमा अलौकिक है। इस पृथ्वी पर भगवान् के माहात्म्यकी चर्चा अत्यन्त दुर्लभ है। महाभाग! आपके मुख से भगवत्कथा सुनते-सुनते हमें तृप्ति नहीं होती, अत: उनकी लीलाओं का पुन: वर्णन कीजिये। हमने साधु पुरुषों के मुख से सुना है कि पुराणों में अमिततेजस्वी भगवान् विष्णु के वराह अवतार का वर्णन है। ब्रह्मन्! भगवान् नारायण ने किस प्रकार वाराहरूप धारण किया? और किस प्रकार दंष्ट्रासे एकार्णव में डूबी हुई पृथ्वी का उद्धार किया? सबको अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीहरि समस्त लीलाओं ला हम विस्तारपूर्वक श्रवण करना चाहते हैं।
व्यासजी बोले - मुनिवरो! तुम लोगों ने मुझपर यह बहुत बड़े प्रश्नका भार रख दिया। मैं यथाशक्ति तुम्हारें प्रश्नोंका उत्तर दूँगा। भगवान् विष्णु की लीला-कथा श्रवण क्रो। भगवान् विष्णु के प्रभाव को सुनने में जो तुम्हारा मन लगा है, यह बहुत बड़े सौभाग्य की बात है। अत: श्रीविष्णुकी जो-जो लीलाएँ हैं, उन सबका वर्णन सुनो। वेदवेत्ता ब्राह्मण जिन्हें सहस्त्रमुख, सहस्त्रनेत्र, सह्स्त्रचरण, सह्स्त्रशिरा, सहस्त्रकर, अविनाशी देव, सह्स्त्रजिव्ह, भास्वान्, सहस्त्रमुकुट, प्रभु, सहस्त्रदाता, सह्स्त्रादि, सह्स्त्रबाहु, हवन, सवन, होता, हव्य, यज्ञपात्र, पवित्रक, वेदी, दीक्षा, समिधा, स्त्रुवा, स्त्रुक्, सोम, सूर्य, मूसल, प्रोक्षणी, दक्षिणायन, अध्वर्यु, सामग ब्राह्मण, सदस्य, सदन, सभा, यूप, चक्र, ध्रुवा, दर्वी, चरु, उलूखल, प्राग्वंश, यज्ञभूमि, छोटे-बड़े चराचर जीव, प्रायश्चित, अघर्य, स्थण्डिल, कुश, मन्त्र, यज्ञ को वहन करनेवाले अग्निदेव, यज्ञभाग, भागवाहक, अग्राशनभोजी, सोमभोक्ता, हुतर्चि, उदायुध तथा यज्ञ में सनातन प्रभु कहते हैं, उन श्रीवत्सचिह्नविभूषित देवेश्वर भगवान् विष्णु के सहस्त्रों अवतार हो चुके हैं और समय-समयपर होते रहते हैं। उनका जो वाराह अवतार है, वह वेद्प्रधान यज्ञस्वरुप है। चारों वे उनके चरण और यूप उनकी दाढ़े हैं। यज्ञ दाँत और चितियाँ मुख हैं। साक्षात् अग्नि ही उनकी जिव्हा, कुश रोमावलि और ब्रह्म मस्तक है। उनका तप महान् है। दिन और रात्रि उनके नेत्र हैं।वे दिव्यस्वरूप हैं। वेद उनका अङ्ग और श्रुतियाँ आभूषण हैं। हविष्य नासिका, स्त्रुवा थूथुन और सामवेदका गंभीर घोष ही उनका स्वर है। वे सत्य धर्मस्वरुप, श्रीसम्पन्न तथा क्रम (गति) और विक्रम (पराक्रम) के द्वारा सम्मानित हैं। प्रायश्चित्त उनके नख, पशु उनके घुटने तथा यज्ञ उनका स्वरुप है। उद्राता अन्त्र (आँत), होम लीङ्ग ओषधि एवं महान् फल बीज हैं। वादी अंतरात्मा, मन्त्र नितम्ब और सोमरस उनका रक्त है। वेदी, कंधा, हविष्य गन्ध तथा हावी और गव्य उनका प्रचण्ड वेग है। प्राग्वंश (यजमान-गृह) उनका शरीर है। वे परम कान्तिमान् और नाना प्रकार की दीक्षाओं से सम्पन्न हैं। दक्षिणा उनका हृदय है। वे महान योगी और महायज्ञमय हैं। उपाकर्म (वेदों का स्वाध्याय) उनका हार और प्रवर्ग (एक प्रकार की होमाग्नि) उनका आभूषण है। नाना प्रकार के छन्द उनके चलने के मार्ग हैं। गूढ उपनिषद् उनके बैठने के लिए आसन हैं। पृथ्वीकी छायारूप पत्नी सदा उनके साथ रहती हैं, वे मणिमय शिखर की भाँति पानी के ऊपर प्रकट हुए। समुद्र, पर्वत, वन और काननोंसहित समस्त पृथ्वी एहावर्ण के जल मेंडूबी थी। सम्पूर्ण जगत् के आदि कारण और सहस्त्रों मस्तकों वाले भगवान् ने वाराहरूप में प्रकट होकर एकवर्ण में प्रवेश किया तथा सब लोकों का हित करनेकी इच्छा से पृथ्वीको अपनी दाढ़पर उठा लिया। इस प्रकार समस्त जीवों के हितैषी भगवान् यज्ञवाराह ने समुद्रजल को धारण करनेवाली समूची पृथ्वीका उद्धार किया।
द्विजवरो! यह वाराह-अवतार का वर्णन हुआ। उसके बाद भगवान् का नरसिंह अवतार हुआ। उस अवतारमें भगवान् ने नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपु नामक दैत्यका वध किया था। प्राचीन काल के सत्ययुगकी बात है, दैत्योंके आदिपुरुष देवशत्रु बलाभिमानी हिरण्यकशिपु ने बड़ी भारी तपस्या की। वह साढ़े ग्यारह हजार वर्षों तक शम-दम तथा ब्रह्मचर्यका पालन करता हुआ मौनव्रत लेकर जप और उपवास में संलग्न रहा। उसकी तपस्या और नियम-पालन से स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने हँससे जुड़े हुए सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा स्वयं आकर दैत्यको वरदान दिया। उनके साथ आदित्य, वसु, मरुद्र्ण, देवता, रुद्रगण और विश्वेदेव भी थे। ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ चराचरगुरु ब्रह्माजी ने उस दैत्य से कहा- 'सुव्रत! तुम मेरे भक्त हो। मैं तुम्हारी इस तपस्या से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। तुम कोई वर माँगो और उसके द्वारा अभीष्ट वस्तु प्राप्त करो।'
हिरण्यकशिपु बोला - लोकपितामह! देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग और राक्षस मुझे मार न सकें। तपस्वी ऋषि भी क्रोध में आकर मुझे शाप न दें। किसी अस्त्र या शस्त्र से वृक्ष, उया पर्वत से अथवा सूखी या गीली वस्तु से, ऊपर या नीचे- खिन भी मेरी मृत्यु न हो।जो मेरे सेवक, सेना और वाहनों सहित मुझे एक ही थप्पड़ से मार डालने में समर्थ हो, उसी के हाथ से मेरी मृत्यु हो।
ब्रह्माजीने कहा - तात! ये दिव्य और अद्भुत वर मैंने तुम्हें दिए। इन सम्पूर्ण अभीष्टों को तुम नि:संदेह प्राप्त करोगे।
यों कहकर पितामह ब्रह्माजी ब्रह्मर्षिगणों से सेवित वैराजपद- ब्रह्मधाम को चलेगये गये। तदनन्तर उस वरदान की बात सुनकर देवता, नाग, गन्धर्व और मनुष्य ब्रह्माजीकी सेवा में उपस्थित हुए और बोले- 'भगवन्! इस वरदान से तो वह असुर हम-लोगों को सदा ही कष्ट पहुँचाता रहेगा, अत: हमारे ऊपर प्रसन्न हो उसके वधका भी उपाय सोचिए।'
ब्रह्माजीने कहा - देवताओ! उसे अपनी तपस्याका फल अवश्य प्राप्त होगा। उसका भोग समाप्त होनेपर वह साक्षात् भगवान् विष्णु के हाथसे मारा जाएगा।
ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर सब देवता प्रसन्न हो अपने-अपने दिव्य स्थानों को चले गये। वर पाते ही दैत्यराज हिरण्यकशिपू अभिमान में आकर समस्त प्रजा को कष्ट देने लगा। आश्रम में रहनेवाले सत्यधर्मपरायण, जितेन्द्रिय एवं उत्तम व्रतधारी महाभाग मुनियों को भी उसने सतना आरम्भ कर दिया। स्वर्गके देवताओं को हराकर तीनों लोकों को अपने अधीन करके वह महाबली असुर स्वयं ही स्वर्ग में रहने लगा। वरदान के मदसे उन्मत्त होकर पृथ्वी पर विचरते हुए उस दानव ने दैत्यों को तो यज्ञ का भागी बनाया और देवताओं को उससे वञ्चित कर दिया। तब आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव और मदुद्र्ण शरणागतरक्षक सनातन प्रभु महाबली भगवान् विष्णु की शरण में गये और इस प्रकार बोले- 'देवेश्वर! आप हिरण्यकशिपुके भयसे हमारी रक्षा करें। आप ही हमारे परम देवता, परम गुरु और परम विधाता हैं। सुरश्रेष्ठ! आप ब्रह्मा आदि देवताओं के भी पालक हैं। आपके नेत्र विकसित कमलदल के समान शोभा पाते हैं। आप शत्रुपक्ष का नाश करनेवाले हैं। भगवन्! हमें शरण दीजिये और दैत्यों का संहार कीजिये।'
भगवान् वासुदेव ने कहा - देवताओ! भय छोड़ो। मैं तुम्हें अभय देता हूँ। तुम शीघ्र ही पहले की भाँति स्वर्गलोकको प्राप्त करोगे। मैं वरदान से उन्मत्त दानवराज हिरण्यकशिपुको, जो देवेश्वरों के लिये अवध्य हो रहा है, उसके सेवकगणों सहित मार डालूँगा।
यों कहकर भगवान् उन देवेश्वरों को विदा करके स्वयं हिरण्यकशिपु के स्थानपर आये। उस समय उन्होंने आधा शरीर मनुष्यका और आधा सिंहका बना रखा था। इस प्रकार नृसिंहदेह धारण किये हाथ-में-हाथ मिलाये हुए आये। उनके शरीरका वर्ण मेघके समान श्याम था। शब्द भी मेघकी गर्जना के समान ही गंभीर था। ओज और वेग में भी वे मेघ के ही सदृश थे। अत्वाले सिंह के समान उनकी चाल थी। यद्यपि हिरण्यकशिपु बलाभिमानी दैत्यों से सुरक्षित और अत्यन्त बलशाली था तो भी भगवान् ने उसे एक ही थप्पड़ से मरकर यमलोक पहुँचा दिया।
यह नृसिंह अवतार की कथा कही गयी। अब वामन-अवतारका वर्णन सुनो। भगवान् का वामनरूप दैत्यों का विनाश करनेवाला था। उस रूप को धारण कर श्रीहरि बलवान् बलि के यज्ञ में गये और वहाँ उन्होंने अपने तीन ही पगोंसे त्रिलोकी को नापकर सम्पूर्ण दैत्यों को क्षुब्ध कर डाला। बलि के हाथ से समूची पृथ्वी लेकर भगवान् ने इन्द्रको दे दी। यही महात्मा श्रीविष्णु का वामन अवतार है। वेदवेत्ता ब्राह्मण भगवान् वामन के यशका सदा गान करते हैं।
तदनन्तर भगवान् विष्णुने दत्तात्रेय नामक अवतार धारण किया। दत्तात्रेयजी में क्षमाकी पराकाष्ठा थी। उस समय वेद, वेदों की प्रक्रिया और यज्ञ- सभी नष्टप्राय हो गये थे। चारों वर्णों में संकरता आ गयी थी। धर्म शिथिल हो चला था। सत्य मिटता जाता था और सब ओर असत्यका बोलबाला था। प्रजा क्षीण हो रही थी और धर्म पाखण्डमिश्रित हो गया था। ऐसे समय में भगवान् दत्तात्रेय ने यज्ञों तथा क्रियाओं सहित वेदोंका पुनरुद्धार किया और चारों वर्णों को पृथक्-पृथक् करके उन्हें व्यवस्थितरूप दिया। दत्तात्रेय जी परम बुद्धिमान और वरदायक थे; उन्होंने हैहयराज कार्तवीर्य को यह वर दिया था कि 'राजन्! तुम्हारी ये दो भुजाएँ मेरी कृपासे एक हजार हो जाएँगी। वसुधापते! तुम सम्पूर्ण वसुधाका पालन करोगे। जिस समय तुम युद्ध में कहदे होगे, तुम्हारे शत्रु तुम्हें आँख उठाकर देख भी नहीं सकेंगे- तुम उनके लिए अजेय हो
जाओगे।'
यह श्रीविष्णु के दत्तात्रेयावतारकी चर्चा की गयी। इसके बाद भगवान् ने परशुरामावतार ग्रहण किया। राजा कार्तवीर्य अर्जुन अपनी सहस्त्र भुजाओं के कारण युद्ध में शत्रुओं के लिए दुर्जय था तो भी परशुराम जी ने उसे सेना के बीच में मार डाला। राजा अर्जुन रथपर बैठा था, किन्तु परशुरामजी ने उसे धरती पर गिरा दिया और छाती पर चढ़कर तीखे फरसेके द्वारा उसकी हजारों भुजाएँ काट डालीं। उस समय कार्तवीर्य बड़े जोर-जोर से चीखता, चिल्लाता रहा। उन्होंने मेरुगिरिसे विभूषित समस्त पृथ्वीपर करोड़ो क्षत्रियों की लाशें बिछा दीं, इक्कीस बार भूतल को क्षत्रियों से शून्य कर दिया और अपने समस्त पापों का नाश करने के लिये उन्होंने अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञ में भृगुनन्दन परशुराम ने कश्यपजी को सारी पृथ्वी दक्षिणारूप में दे दी। साथ ही बहुत-से हाथी, घोड़े, सुंदर रथ और गौएँ भी दान कीं। आज भी व विश्व का कल्याण करने के लिये घोर तपस्या करते हुए महेन्द्र पर्वत पर निवास करते हैं।
यह सनातन परमात्मा श्री हरि के परशुरामावतार का परिचय दिया गया। चौबीसवें त्रेतायुग में भगवान् ने दशरथ नन्दन कमलनयन श्री राम के रूप में अवतार लिया। भगवान् विष्णु उस समय चार रूपों में प्रकट हुए थे। उनका तेज सूर्यके समान था। वे लोक में श्रीराम केनाम से विख्यात हुए और विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए उनके पीछे-पीछे गये।महायशस्वी श्रीराम सब लोगों को प्रसन्न रखने, राक्षसों को मारने और धर्म की वृद्धि करनेके लिए अवतीर्ण हुए थे। कहते हैं, राजा श्रीराम सदा सब भूतों का हित करने के लिए तत्पर रहते थे। वे सम्पूर्ण धर्मों के ज्ञाता थे। उन्होंने लक्ष्मण को साथ ले चौदह वर्षों तक वन में निवास किया था। उनके साथ उनकी पत्नी सीता भी गयी थी, जो मूर्तिमती लक्ष्मी थीं। जनस्थान में निवास करते हुए श्रीराम ने देवताओं के अनेक कार्य सिद्ध किये। उन्होंने रावण के द्वारा अपहृत सीता का पता लगाकर उन्हें प्राप्त किया और रावण का वध किया। पुलस्त्यवंशी राक्षसराज रावण देवता, असुर, यक्ष, राक्षस और नागों के लिए भी अवध्य था।युद्ध अमिन उसको जीतना बहुत ही कठिन था। उसका शरीर कज्जलराशि के समान काला था। उसे कोटि-कोटि राक्षस सदा घेरे रहते थे। वह तीनों लोकों को मार भगाने वाला, क्रूर, दुर्जय, दुर्धर, गर्वयुक्त, सिंह के समान पराक्रमी और वरदान से उन्मत्त था। देवताओं के लिए तो उसकी ओर देखना भी कठिन था। ऐसे रावण को भगवान् श्रीराम ने सेना और सचिवोंसहित संग्राम में मार डाला।इसके पहले उन्होंने और भी कई अलोकिक कर्म किये थे। अपने मित्र सुग्रीव के लिए उन्होंने महाबली वानरराज वाली को मारा और सुग्रीव को किष्किन्धाके राज्य पर अभिषिक्त किया। मधु का पुत्र लवण नाम का दानव मधुवन में रहता था। वह वीर तो था ही , वर पाकर मतवाला हो उठा था। उसे भगवान् ने शत्रुघ्न के रूप में जाकर मारा। मारीच और सुबाहु नामक दो बलवान् राक्षस थे, जो शुद्ध अन्त:करणवाले मुनियों के यज्ञों में विघ्न डाला करते थे। उनको और उनके साथी अन्य राक्षसों को भी यद्धकुशल महात्मा श्रीराम ने मार गिराया। विराध और कबन्धन दो बड़े भयंकर राक्षस थे। वे पूर्वजन्म में गन्धर्व थे, किन्तु शाप से मोहित होकर राक्षस भाव को प्राप्त हुए थे। उन्हें भी नरश्रेष्ठ श्रीराम ने मारकर शापमुक्त कर दिया। श्रीराम के बाण अग्नि, सूर्यकिरण और विद्युत के समान तेजस्वी, तपाये हुए स्वर्ण से युक्त विचित्र पंखों से सुशोभित तथा महेन्द्र-वज्रके सदृश सारयुक्त थे। उन्हीं के द्वारा उन्होंने युद्ध में शत्रुओं का नाश किया। परम बुद्धिमान महर्षि विश्वमित्र ने देवताओं के लिए भी दुर्धर्ष दैत्यों का वध करनेके लिए श्रीरघुनाथ जी को अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये थे। पूर्वकाल में, जब कि महात्मा राजा जनक के यहाँ यज्ञ हो रहा था, श्रीराम ने खेल में ही महेश्वर के धनुष को तोड़ डाला था। धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीरघुनाथ जी ने सब अलौकिक कर्म करके दस अश्वमेध-यज्ञ भी किये थे, जो बिना किसी विघ्न-बाधा के पूर्ण हुए थे। श्रीराम चंद्र जी के राज्य करते समय कभी अमङ्गल की बात नहीं सुनी गयी। हवा तेज नहीं चलती थी। कोई किसी का धन नहीं चुराता था। न कभी विधवाओं के विलाप सुने जाते और न अनर्थ की ही प्राप्ति होती थी।उसस अमे सब कुछ शुभ-ही-शुभ होता था। प्राणियों को जल, अग्नि अठाव आँधी से कभी भय नहीं होता था। बूढों को बालकों की प्रेतक्रिया नहीं करनी पड़ती थी। क्षत्रिय ब्राह्मणों की परिचर्या करते थे। वैश्य क्षत्रियों के प्रति श्रद्धा रखते थे और शूद्र अहंकार छोड़कर ब्राह्मण आदि तीनों वर्णों की सेवा करते थे। श्रीराम के राज्य में स्त्रियाँ अपने पति के सिवा दूसरे किसी पुरुष में आसक्त नहीं होती थीं और पुरुष भी अपनी पत्नीको छोड़ किसी दूसरी स्त्री पर कुदृष्टि नहीं डालते थे। उस समय सारा जगत् जितेन्द्रिय था। पृथ्वीपर डाकुओंका खिन नाम भी नहीं था। एकमात्र श्रीराम ही सबके स्वामी और संरक्षक थे। उनके शासनकाल में मनुष्य हजारों वर्ष जीवित रहते और वे सहस्त्रों पुत्रों के पिता होते थे। किसी भी प्राणी को रोग नहीं सताता था। राम राज्य में इस भूतल पर देवता, ऋषि और मनुष्य एक साथ एकत्रित होते थे। पुराणवेत्त पुरुष इस विषय में एक गाथा कहा करते हैं- ''श्रीरघुनाथजी का वर्ण श्याम और अवस्था युवा है, उनके नेत्र कुछ-कुछ लालिमा लिये हुए हैं, मुख से तेज बरसता रहता है, वे बहुत कम बोलते हैं। उनकी लंबी भुजाएँ घुटनों तक पहुँचती हैं। उनका मुख बड़ा सुंदर है। कंधे सिंह के सदृश हैं। महाबाहु श्रीराम ने दस हजार वर्षों तक राज्य किया। उनके राज्य में सदा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदका घोष सुनायी देता था। धनुष की टंकार भी सर्वदा कानों में आती रहती थी। 'दान क्रो और स्वयं भी भोगो' का उपदेश कभी बंद नहीं होता था। दशरथ नन्दन श्री राम सत्त्ववान् और गुणवान् होनेके साथ ही सदा अपने तेज से देदीप्यमान रहते थे। उनकी सूर्य और चन्द्रमा से भी अधिक शोभा होती थी।''*
यह श्रीरामवतार का वर्णन हुआ। इसके बाद श्रीहरिका अवतार मथुरा में हुआ था। वह श्रीकृष्ण के नाम से विख्यात हुआ। भगवान् श्री कृष्ण समस्त संसार का हित करनेके लिए अवतीर्ण हुए थे। उन्होंने मानव-शरीर धारण करके शाल्व, शिशुपाल, कंस, द्विविद, अरिष्ट, वृषभ, केशी, दैत्यकन्या पूतना, कुवलयापीड हाथी तथा चाणूर और मुष्टिक नाम के मल्लों का वध किया। अद्भुत कर्म करनेवाले बाणासुर की हजार भुजाएँ काट डालीं। युद्ध में नरकासुर का संहार किया और महाबली कालयवनको भी भस्म करा दिया। भगवान् ने अपने तेजसे दुष्ट दुराचारी राजाओं के समस्त रत्न हर लिये और उन्हें मौत के घात उतार दिया। यह अवतार सम्पूर्ण लोकों का हित-साधन करनेके लिये हुआ था।
इसके बाद विष्णुयशा नाम से प्रसिद्ध कल्कि अवतार होनेवाला है। भगवान् कल्कि शम्भल नामक गाँव में अवतीर्ण होंगे। उनके अवतार का उद्देश्य भी सब लोकों का हित करना ही है। ये तथा और भी अनेक दिव्य अवतार हैं, जो पुराणों में ब्रह्वादी पुरुषों द्वारा वर्णित हैं। भगवान् के अवतारों का वर्णन करनेमें देवता भी मोहित हो जाते हैं। पुराण वेदों की श्रुतियों द्वारा समर्थित हैं। इस प्रकार यह अवतार-कथा संक्षेप से कही गयी। जो सम्पूर्ण लोकों के गुरु और सदा कीर्तन करनेयोग्य हैं, उन भगवान् विष्णु के अवतारों का वर्णन किया गया। इसके कीर्तन से पितरों को प्रसन्नता होती है। जो हाथ जोड़कर अमितपराक्रमी श्रीविष्णु के अवतार की कथा सुनता है, उसके पितृ भी अत्यन्त तृप्त होते हैं। योगेश्वर भगवान् श्रीहरि की योग माया का वर्णन सुनकर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है और भगवान् की कृपा से शीघ्र ही उसे ऋद्धि, समृद्धि तथा प्रचुर भोगों की प्राप्ति होती है। मुनिवरो! इस प्रकार मैंने अमिततेजस्वी श्री हरि के सर्वपाप हारी पवित्र अवतारों का वर्णन किया।
* श्यामो युवा लोहिताक्षो दीप्तास्यो मितभाषित: ॥
आजानुबाहु: सुमुख: सिन्ह्स्कंधो महाभुज:। दशवर्षहस्त्राणि रामो राज्यमकारयत् ॥
ऋक्सामयजुषां घोषो ज्याघोषश्च महात्मन:। अव्युच्छिन्नोऽभवद्रष्ट्रे दीयतां भुज्यतामिति ॥
सत्त्ववान् गुणसम्पन्नो दीप्यमान: स्वतेजसा। अतिचन्द्रं च सूर्यं च रामो दशरथिर्बभौ ॥
(२१३।१५३-१५६)
Summary of chapter 83 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
Kaṃsa sends the noble Akrūra to Vṛndāvana to invite Kṛṣṇa and Balarāma to Mathurā for a bow-festival, intending to have them killed. Akrūra, a devoted Vaiṣṇava, eagerly accepts this mission as an opportunity to behold Kṛṣṇa. His devotional journey to Gokula, his first darśana of the divine brothers, and the profound inner transformation he undergoes in their presence are described with great tenderness.