81 - श्रीकृष्ण की संतति, अनिरूद्ध के विवाहित में रुक्मीका वध, भौमासुरका बढ़, पारिजात-हरण तथा इन्द्रकी पराजय

व्यासजी कहते हैं - रुक्मिणी ने प्रद्युम्नके अतिरिक्त चारूदेष्ण, सुदेष्ण, चारुदेह, सुषेण, चारूगुप्त, भद्रचारु, चारुविन्द, सुचारू और बलवानों में श्रेष्ठ चारु नामक पुत्र तथा चारुमती नाम की कन्या को जन्म दिया। रुक्मिणीके सिवा श्रीकृष्ण की सात पटरानियाँ और थीं। उनके नाम ये हैं- कालिन्दी, मित्रविंदा, राजा नग्नजित् की पुत्री सत्य, जाम्बवान् की कन्या इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली रोहिणी देवी (जाम्बवति), अपने शीलसे विभूषित मद्रराजकुमारी भद्रा, सत्राजित्की पुत्री सत्यभामा तथा मनोहर मुसकानवाली लक्ष्मणा। इनके सिवा श्रीकृष्ण के सोलह हजार स्त्रियाँ और थीं। महापराक्रमी प्रद्युम्न ने रुक्मी की सुन्दरी कन्या को और उस कन्या ने भी श्रीहरि के पुत्र प्रद्युम्न जी के अनुरुद्ध नमक पुत्र हुआ, जो महाबली, महापराक्रमी, युद्ध में कभी रुद्ध कुण्ठित) न होनेवाला, बल का समुद्र तथा शत्रुओं का दमन करनेवाला था। अनिरुद्ध को भी रुक्मीकी पौत्री ने वर्ण किया। यद्यपि रुक्मी श्रीकृष्ण के साथ लाग-डाँट रखता था तो भी उसने अपने दौहित्र अनिरुद्ध के सतह पौत्री का विवाह कर दिया। उस विवाह में बलराम आदि यदुवंशी श्रीकृष्ण के सतह रुक्मी के भोजकट नगर में गये थे। विवाह हो जाने पर कलिङ्गआदिने रुक्मीसे कहा- 'राजन्! बलराम जुआ खेलना नहीं जानते, तथापि उन्हें जुएका बड़ा भारी व्यसन है; अत: आज हमलोग उनको जुए से ही परास्त करें।' 'बहुत अच्छा' कहकर रुक्मी ने सभा में बलराम जी के साथ जुएका खेल प्रारम्भ किया। पहले ही दानव में बलभद्रजी एक हजार स्वर्णमुद्रा हार गये। उसके बाद भी कई बार उनकी हार हुई। यह देख मूर्ख कलिङ्गराज दांत दिखाते हुए बलरामजीका उपहास करने लगा।  मदोन्मत्त रुक्मीने भी कहा- 'बलभद्र को तो द्यूत-सिध्यका बिलकुल ज्ञान नहीं है। इसीलिये बार-बार हार खानि पड़ी है। ये व्यर्थ ही घमंड में आकार अपने को द्युत-विद्या का पूर्ण ज्ञाता मानते थे।' तब बलरामजी ने क्रोध में भरकर एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ दाँवपर लगा दिन। रुक्मी ने पाँसा फेंका। अबकी बार बलभद्र की जीत हुई। उन्होंने उच्चस्वर से कहा- 'मैंने जीत लिया।' रुक्मी बोला- 'क्यों झूठ बोलते हो। जीत तो मेरी हुई है। तुमने इस दानवके विषय में चर्चा अवश्य की थी, परंतु मैंने उसका अनुमोदन तो नहीं किया था। ऐसी दशा में भी यदि तुम्हारी जीत हुई है तो मेरी जीत कैसे नहीं हुई।' इसी समय महात्मा बलराम जी के क्रोध को बढ़ाती हुई आकशवाणी हुई- 'जीत तो बलदेवजी की ही हुई है। रुक्मी झूठ बोलता है। मुँह से अनुमोदनसूचक वकाहन न करनेपर भी जो उसने दानव को स्वीकार करके पासा फेंका है, इस कर्म से उसका अनुमोदन सिद्ध हो जाता है।'

इतना सुनते ही बलराम जी क्रोध से लाल आँखें करके उठ खड़े हुए। उन्होंने जूआ खेलनेके पासे से ही रुक्मी को मौत के घात उतार दिया। फिर काँपते हुए कलिङ्गराजको बलपूर्वक धार दबाया और जिन्हें दिखा-दिखाकर वह हँसता था, उन दाँतों को कुपित होकर तोड़ डाला। फिर सभाभवन' के सुवर्णमय विशाल स्तम्भको खींच लिया और क्रोध में आकर रुक्मी के पक्ष में आये हुए समस्त राजाओं का संहार कर डाला। बलराम जी के कुपित होनेपर सम्पूर्ण राजालोग हाहाकार करते हुए भाग खड़े हुए। बालरामजी के द्वारा रुक्मीको मारा गया सुनकर श्रीकृष्ण चुप रहे। रुक्मिणी और बलराम दोनों के संकोच से वे कुछ बोल न सके। तदनन्तर विवाह के बाद भगवान् श्रीकृष्ण अनिरुद्धसहित यादवों को साथ ले द्वारका चले आये।

एक दिन त्रिभुवन के स्वामी इन्द्र मतवाले ऐरावतकी पीठपर बैठकर द्वारका में श्रीकृष्ण के पास आये और इस  प्रकार बोले- 'मधुसूदन! यद्यपि आप इस समय मनुष्यरूप में स्थित हैं, तथापि आपने रक्षक बनकर देवताओं के सम्पूर्ण दु:ख दूर कर दिये हैं। तपस्वीजनोंकी रक्षा के लिये अरिष्ट, धेनुक, प्रलम्ब तथा केशी आदि सब दैत्यों का नाश किया और कंस, कुवल यापीड, बालघातिनी पूतना तथा जितने इस जगत् के उपद्रव थे, उन सबको आपने शान्त कर दिया है। आपके भुजदण्डसे तीनों लोक सुरक्षित होने के कारण देवता यज्ञों में हविष्य ग्रहण करके तृप्त हो रहे हैं। जनार्दन! इस समय मैं जिस उद्देश्य से आया हूँ, उसे सुनकर उसके प्रतिकार का उपाय करें। भूमिका पुत्र नरक, जो इस समय प्राग्ज्योतिषपुरका स्वामी है, सम्पूर्ण भूतोंका विनाश कर रहा है। जनार्दन! उसने देवताओं, सिद्धों और राजाओं की कन्याओंका अपहरण करके अपने महल में कैद कर रखा है। वरुणका छत्र, जिससे जलकी बूँदें चूती रहती हैं, अपने अधिकार में कर लिया है। मन्दराचल के शिकार मणिपर्वतको भी हरण कर लिया है; इतना ही नहीं, नरकासुरने मेरी माता अदितिके दोनों दिव्य कुण्डल भी, जिनसे अमृत झरता रहता है, हर लिये हैं। अब वह मुझसे ऐरावत हाथी लेना चाहता है। गोविन्द! उसका यह दुराचार मैंने आपसे निवेदन कर दिया। इसके बदले में उसके साथ जो कुछ करना चाहिये, वह आप स्वयं ही विचारे।'

यह सुनकर भगवान् देवकीनन्दन मुसकराये और इन्द्रका हाथ पकड़कर अपने सिंहासन से उठे। उन्होंने गरुड़का आवाहन किया चिन्तन करते ही गरुड़ आ पहुँचे। भगवान् सत्यभामा को बिठाकर स्वयं भी गरुडपर सवार हुए और प्रग्ज्योतिषपुरकी ओर चल दिये। इन्द्र भी द्वारकावासियों के देखते-देखते ऐरावत हाथी पर सवार हुए और प्रसन्नचित हो देवलोकको चले गये। प्रग्ज्योतिषपुर के चारों ओर सौ योजनों तक भयंकर पाशों (लोहे के कँटीले तारों) - का घेरा बना था। शत्रुओं की सेना को रोकने के लिए वे पाश लगाये गये थे। श्रीहरि ने सुदर्शन चक्र चलाकर उन सब पाशों को काट डाला। तब मुर नामक दैत्य ने खड़े होकर भगवान्का सामना किया, किन्तु भगवान् ने उसे मार डाला। मुरके सात हजार पुत्र थे, श्रीहरि ने चक्र की धाररूप अग्नि से उन सबको पतंगों की भाँति भस्म कर दिया। मुरको मारकर उन्होंने हयग्रीव और पञ्चजन को भी यमलोक पठाया तथा बड़ी उतावली के साथ प्रागज्योतिषपुरपर धावा किया। नरक बहुत बड़ी सेना के साथ सामने आया। उसके साथ श्रीकृष्ण का घोर युद्ध हुआ। उसमें श्रीगोविन्दने सहस्त्रों दैत्यों का संहार किया। भूमिपुत्र नरक अस्त्र-शस्त्रोंकी वृष्टि कर रहा था। दैत्य-मण्डल का विनाश करनेवाले श्रीहरि ने चक्र चलाकर उस असुरके दो टुकड़े कर दिये। नरक के मारे जाने पर भूमि अदितिके दोनों कुण्डल लेकर उपस्थित हुईं और जगदीश्वर श्रीकृष्ण से इस प्रकार बोलीं- 'नाथ! आपने वाराहरूप धारण करके जिस समय मुझे उठाया था, उस समय आपका स्पर्श होनेपर मेरे गर्भसे यहपुत्र उत्पन्न हुआ था, अत: इसे आपने ही दिया और आपने ही मार गिरायाये दोनों कुण्डल लीजिये और नरकासुरकी संतानकी रक्षा कीजिये प्रभो! मेरा ही भार उतारनेके लिये आप अंशसहित अवतार धारण करके इस लोक में आये हैं आप ही करता, विकर्ता (बिगाड़नेवाले) और संहर्ता (नाश करनेवाले) हैं आप ही अविनाशी कारण हैं और आप ही जगत्स्वरूप हैं अच्युत! मैं आपकी क्या स्तुति कर सकती हूँ आप परमात्मा, जीवात्मा और अविनाधि भूतात्मा हैं अत: आपकी स्तुति हो ही नहीं सकती फिर किसलिये असम्भव चेष्टा की जाय सर्वभूतात्मन्! मुझपर प्रसन्न होइये नरकासुर ने जो अपराध किया है, उसे क्षमा कीजिये। वह आपका पुत्र था, अत: उसे दोषरहित करनेके लिये ही आपने मारा है।'

भूतभावन भगवान् श्रीकृष्ण ने पृथ्वीकी प्रार्थना सुनकर 'तथास्तु' कहा। नरकासुर के महल में जो रत्न थे, उन्हें अपने अधिकार में कर लिया। अन्त:पुर अमिन जाकर उन्होंने सोलह हजार एक सौ कन्याएँ देखीं। चार दाँतवाले छ:हज़ार हाथी और काम्बोज देश के इक्कीस लाख घोड़े भी देखे। श्री गोविन्द ने उन कन्याओं, हाथियों और घोड़ों को द्वारका पुरी भेज दिया। वरुण के छत्र और मणिपर्वतपर भी दृष्टि पड़ी। उन्होंने भगवान् ने पक्षिराज गरुडपर रख लिया। फिर सत्यभामा के सतह स्वयं भी गरुड़पर सवार हो अदिति को कुण्डल देने के लिये स्वर्गलोक में गये।

वरुणके छत्र, मणिपर्वत और पत्नीसहित श्री'कृष्ण को पीठपर लिये गरुड़जी मौजसे चले जा रहे थे। स्वर्गके द्वार पर पहुँचकर श्रीकृष्ण ने शङ्ख बजाया। शङ्खकी आवाज सुनकर सम्पूर्ण देवता अर्घ्यपात्र लिये भगवान् की सेवा में उपस्थित हुए। उनके द्वारा पूजित हो भगवान् श्रीकृष्ण देवमाता अदिति के महल में गये। वह भव्य भवन श्वेत बादलों के समान धवल और पर्वत-शिखर के सदृश ऊँचा था। उसमें प्रवेश करके भगवान् ने अदितिको देखा और इन्द्रसहित उनके चरणों में प्रणाम किया। फिर दोनों दिव्य कुण्डल उन्हें अर्पित किये और नरकासुर के मारे जानेका समाचार भी कह सुनाया। इससे जगन्माता अदिति को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने भगवान् में मन लगाकर जगदाधार श्रीहरिका इस प्रकार स्तवन किया।

अदिति बोलीं - भक्तों को अभय देनेवाले कमलनयन परमेश्वर! आपको नमस्कार है। आप सनातन आत्मा, भूतात्मा, सर्वात्मा और बहुतभावन हैं। मन, बुद्धि और इन्द्रियों के प्रेरक हैं। गुणस्वरूप! आप श्वेत, दीर्घ आदि सम्पूर्ण कल्पनाओं से रहित हैं, जन्म आदि विकारों से पृथक् हैं तथा स्वप्न आदि तीनों अवस्थाओं से परे हैं; आपको नमस्कार है। अच्युत! सन्ध्या, रात्रि, दिन, भूमि, आकाश, वायु, जल, अग्नि, मन, बुद्धि और अहंकार - सब आप ही हैं। ईश्वर! आप ब्रह्मा, विष्णु और शिव नामक अपनी मूर्तियों से जगत् की सृष्टि, स्थिति और संहार करनेवाले हैं। आप कर्ताओंके भी अधिपति हैं। यह चराचर जगत् आपकी मायाओं से व्याप्त है। जनार्दन! अनात्म वस्तु में जो आत्मबुद्धि होती है, वह आपकी माया है। उसी के द्वारा अहंता और ममताका भाव उत्पन्न होता है।नाथ! इस संसार में जो कुछ होता है, वह सब आपकी माया की चेष्टा है। भगवन्! जो मनुष्य अपने धर्म में तत्पर हो आपकी निरन्तर आराधना करते हैं, वे पनि मुक्ति के लिये इस सारी माया को तर जाते हैं। ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवता, मनुष्य और पशु- ये सभी श्रीविष्णुमाया के महान् भँवर में पड़े हुए मोहान्धकारसे आवृत हैं। भगवन्! जो आपकी आराधना करके भोगों को प्राप्त करना चाहते हैं, वे आपकी माया द्वारा बँधे हुए हैं। मैंने भी पुत्र की कामना से और शत्रुपक्ष का नाश करनेके लिये आपकी आराधना की है, मोक्ष के लिये नहीं। यह आपकी माया का ही विलास है। पुण्यरहित मनुष्य यदि कल्पवृक्षसे भी कौपीनमात्र ही लेनेकी इच्छा करे तो यह अपराध उसके अपने ही पापकर्मों का है। अपनी माया से सम्पूर्ण जगत् को मोहित करनेवाले अविनाशी परमेश्वर! मुझपर प्रसन्न होइये। ज्ञानस्वरूप सम्पूर्ण भूतेश्वर! मेरे अज्ञान का नाश कीजिये। आपके हाथों में चक्र, शार्ङ्गधनुष, गदा और शङ्ख शोभा पाते हैं। विष्णो! आपको बारंबार नमस्कार है। परमेश्वर! शङ्ख-चक्र आदि स्थूल चिह्नों से सुशोभित आपके इस रूप का मैं दर्शन करती हूँ। आपका जो परम सूक्ष्म स्वरूप है, उसको मैं नहीं जनती।आप मुझपर प्रसन्न होइये।'

देवमाता अदिति के इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् श्रीकृष्ण हँसकर बोले- 'देवि! आप हम सब लोगों की माता हैं, अत: आप ही प्रसन्न होकर हमें वरदान दें।

अदिति बोलीं - एवमस्तु! नरश्रेष्ठ! जैसी आपकी इच्छा है, मैं वही करूँगी। आप मर्त्यलोक में सम्पूर्ण देवताओं और असुरों से अजेय होंगे।

तदनन्तर सत्यभामा ने इन्द्राणीसहित अदिति को प्रणाम किया और कहा- 'देवि! आप मुझपर भी प्रसन्न हों।' अदिति ने कहा- 'सुभ्रू! मेरी कृपा से तुम्हें वृद्धावस्था और कुरूपता नहीं स्पर्श कर सकती। तुम्हारी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होंगी।' तत्पश्चात् अदिति की आज्ञा से देवराज इन्द्र ने भगवान् श्रीकृष्ण का आदरपूर्ण पूजन किया। श्रीकृष्ण भी सत्यभामा के साथ देवताओं के नन्दनवन आदि सम्पूर्ण उद्यानों में घूमने-फिरने लगे। एक स्थान पर बह्ग्वाना श्रीकृष्ण ने पारिजातका वृक्ष देखा, जो परम सुगन्धित मञ्जरियों से सुशोभित, शीतलता और आह्लाद प्रदान कनेवाला, ताम्रवर्ण के पल्लवों से अलंकृत और सुवर्ण के समान कान्तिमान् था। अमृत के लिये समुद्रका मन्थन होते समय वह प्रकट हुआ था। उसे देखकर सत्यभामा ने श्री गोविन्द से कहा- 'नाथ! इस वृक्ष को आप द्वाराका क्यों नहीं ले चलते। आप कहते हैं, सत्यभामा मुझे बड़ी प्रिय है। यदि आपकी यह बात सत्य हो तो मेरे घर के आँगन की शोभा बढ़ाने के लिये इस वृक्ष को ले चलिए।'

सत्यभामा के यों कहनेपर भगवान् श्रीकृष्ण ने पारिजात को गरुड़ पर रख लिया। यह देख उस वन में रक्षकों ने कहा- 'गोविन्द! देवराज की महारानी जो शची हैं, उनका इस पारिजातपर अधिकार है। आप उनके इस प्रिय वृक्ष को न ले जाइये। देवताओं ने अमृतमन्थन के समय महारानी शची को विभूषित करनेके लिये ही इस वृक्ष को प्रकट किया था। आप इसे लेकर कुशलपूर्वक नहीं जा सकते। आप अज्ञानवश ही इसे ले जानेकी अभिलाषा करते हैं। भला, इस पारिजात को लेकर कौन कुशल से जा सकता है। देवराज इन्द्र इसका बदला केने के लिए अवश्य आयेंगे। जब बे हाथ में वज्र लेकर आगे बढ़ेंगे, तब सम्पूर्ण देवता भी उनका साथ देंगे' अत: सम्पूर्ण देवताओं के साथ आपको विवाद करनेसे क्या लाभ। अच्युत! जिस कार्य का परिणाम कटु हो, उसकी विद्वान् पुरुष प्रशंसा नहीं करते।'

वनरक्षकों के यों कहनेपर सत्यभामा देवी अत्यन्त कुपित होकर बोलीं- 'शची अथवा देवराज इन्द्र इस पारिजात को लेनेवाले कौन होते हैं। यदि यह अमृतमन्थनके समय समुद्रसे निकला है, तब तो इसपर सम्पूर्ण लोकोंको समान अधिकार है। इसे इन्द्र अकेले कैसे ले सकते हैं। यदि अपने पतिकी भुजाओं के बलका अधिक घमंड होनेके कारण शची इस वृक्षको रोकती है तो तुमलोग शीघ्र शचीके पास जाकर मेरी यह बात कहो- 'सत्यभामा अपने पतिपर गर्व करके धृष्टापूर्वक कहती है कि यदि तुम अपने पतिको अत्यन्त प्रिय हो तो पारिजात वृक्ष को लेकर जाते हुए मेरे पतिको उनके द्वारा रोको।'

यह सुनकर रक्षकों ने शची के पास जा सत्यभामा की कही हुई सारी बातें ज्यों-की-त्यों सुना दिन। शची ने भी अपने स्वामी देवराज इन्द्रको युद्ध के लिये उत्साहित किया। तब इन्द्र पारिजात के लिये सम्पूर्ण देवसेना को साथ ले श्रीहरि से युद्ध करनेको उद्यत हुए। जब इन्द्र हाथ में वज्र लेकर युद्ध करने के लिए खड़े हुए, तब समस्त देवता भी परिघ, खड्ग, गदा और शूल आदि आयुधों के साथ तैयार हो गये। भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा इन्द्र ऐरावतपर सवार हो देवपरिवार को साथ ले युद्ध के लिये उपस्थित हैं; तब उन्होंने पाञ्जन्य शङ्ख बजाया। उसकी ध्वनि सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठीं। साथ ही उन्होंने सहस्त्रों और लाखों बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। उन बाणों से सम्पूर्ण दिशाएँ और आकाश आच्छादित हो गये। यह देख सम्पूर्ण देवता भी अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगे। सम्पूर्ण जगत् के स्वामी भगवान् मधुसूदन ने देवताओं के छोड़े हुए एक-एक अस्त्र-शस्त्रके खेल-खेल में हजारों टुकड़े कर डाले। पक्षिराज गरूड़ ने वरुण के पाश को खींच लिया और छोटे-छोटे साँपों के शरीर की भाँति उसके खण्ड-खण्ड कर डाले। भगवान् देवकीनन्दन ने यमराज के चलाये हुए दण्ड को गदा की मार से टूक-टूक करके पृथ्वीपर गिरा दिया। कुबेर की शिबिकाको चक्रसे तिल-तिल करके काट डाला। सूर्य और चन्द्रमा उनकी दृष्टि पड़ते ही अपना तेज और प्रभाव खो बैठे। अग्निदेव के सैकड़ों टुकड़े हो गये। आठों वसुओं ने भगवान् के बाणों की चोट खाकर आठों दिशाओं की शरण ली। ग्यारह रूद्र भी धराशायी हो गये। उनके त्रिशूलों के अग्रभाग चक्र की धार से छिन्न-भिन्न हो गये। साध्य, विश्वेदेव, मरुद्र्ण और गन्धर्व शार्ङ्गधनुषधारी भगवान् श्रीकृष्ण के बाणों से आहत हो सेमरकी रुई के समान आकाश में उड़ने लगे। गरूड़ तो सदा आकाश में ही चलनेवाले ठहरे। उन्होंने चोंचसे, पंखों से और पंजोंसे भी देवताओं और दानवों को घायलों कर डाला।

तदनन्तर देवराज इन्द्र और भगवान् मधुसूदन एक-दूसरेपर हजार-हजार बाणों की वृष्टि करने लगे, मानो दो मेघ परस्पर जल की धाराएँ बरसाते हों। ऐरावत और गरूड में घमासान युद्धहोने लगा। जब सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्र कटकर गिर गये, तब इन्द्र ने वज्र और श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र हाथ में लिया। उन दोनों को वज्र और चक्र हाथ में लिए देख चराचर जीवों सहित सम्पूर्ण त्रिलोकी में हाहाकार मच गया। अन्ततोगत्वा इन्द्रने वज्र को चला ही दिया, किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण ने उसे हाथ में पकड़ लिया। उन्होंने अपना चक्र नहीं छोड़ा। केवल इतना ही कहा, 'खड़ा रह, खड़ा रह।' देवराज का वज्र व्यर्थ हो गया और उनके वाहन को गरूड़ने  क्षत-विक्षत कर डाला' अत: वे रणभूमिसे भागने लगे। उस समय सत्यभामा ने कहा- 'त्रिलोकीनाथ! आप तो महारानी शची के परि हैं। आपका युद्धभूमि से भागना उचित नहीं। पारिजात-पुष्पों के हार से सुशोभित एवं प्रेमपूर्वक आयी हुई शचीको यदि आप पहले की भाँति विजयी होकर नहीं देखेंगे तो आपके लिये यह देव्राज्का पद कैसा प्रतीत होगा। इन्द्र! अब अधिक प्रयास करनेकी आवश्यकता नहीं। आप लज्जा का अनुभव न करें। अप यह पारिजात ले जाइये, जिससे देवताओं की पीड़ा दूर हो। मैं आपके घर गयी थी, किन्तु शची ने पति के गर्वसे उन्मत्त होकर मुझे आदरके साथ नहीं देखा।मैं भी स्त्री ही ठहरी और मुझे भी अपने पतिपर गर्व से, तथा स्त्री होने के कारण मेरा चित्त भी अधिक गम्भीर नहीं है; इसलिये मैंने आपके साथ युद्ध थां दिया।यह पारिजात दूसरेका धन है। इसका अपहरण करनेसे मुझे कोई लाभ नहीं।'

सत्यभामा यों कहनेपर देवराज इन्द्र लौट आये और बोले- 'मानिनी! खेदको अधिक बढ़ाने से क्या लाभ। जो सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं, उन विश्वरूपधारी परमेश्वरसे युद्ध में हारा जानेपर भी मुझे लज्जा नहीं हो सकती। देवि! जिनका आदि, अन्त और मध्य नहीं है, जिनमें सम्पूर्ण जगत्की स्थिथि है, जिनसे इसकी उत्पत्ति हुई है और जिन सर्वभूतमय परमेश्वरसे ही इसका संहार होगा, उन सृष्टि, पालन और संहारके कारणभूत परमात्मा से परास्त होनेपर मुझे लज्जा क्यों होने लगी। जिनकी अत्यन्त अल्प और सूक्ष्म मुर्तिको, जो सम्पूर्ण जगत्की जननी है, सब वेदों के ज्ञाता होनेपर भी दूसरे मनुष्य नहीं जान पाते, जो स्वेच्छासे ही सदा जगत्का उपकार करते हैं, उन अजन्मा, अकर्ता तथा सबके आदिभूत इस सनातन परमेश्वर को जितने में कौन समर्थ हो सकता है।'

व्यासजी कहते हैं - देवराज इन्द्रके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवाना श्रीकृष्ण ने गम्भीर भावसे हँसकर कहा- 'जगत्पते! आप देवराज इन्द्र हैं और हम मनुष्य हैं। आपको मेरे द्वारा किया हुआ यह अपराध क्षमा करना चाहिये। यह रहा आपका पारिजात वृक्ष। इसे इसके योग्य स्थानपर ले जाइये। इन्द्र! मैंने तो केवल सत्यभामा की बात रखनेके लिये ही इसको ले लिया था। आपने मेरे ऊपर जो वज्र चलाया था, उसे भी लीजिए। ये शत्रुसंहारक अस्त्र आपका ही है।'

इन्द्र बोले - प्रभो! मैं मनुष्य हूँ- यों कहकर आप मुझे क्यों मोह में डाल रहे हैं। भगवन्! हम तो आपके इस सगुण-स्वरूप को ही जानते हैं। आपके सूक्ष्म स्वरूप का ज्ञान हमें नहीं है। जगन्नाथ! आप जो कोई भी हों, इस समय जगत् की रक्षा में तटपर हैं। असुरसूदन! आप संहार का कण्टक दूर कर रहे हैं। श्रीकृष्ण! यह पारिजात आप द्वारकापुरीको ले जाएँ। जब आप मर्त्यलोक छोड़ देंगे, तब यह पृथ्वीपर नहीं रहेगा।

'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् श्रीहरि भूलोक में चले आये। उस समय सिद्ध, गन्धर्व अट्टहा ऋषि-महर्षि उनकी स्तुति कर रहे थे। उत्तम पारिजात वृक्ष लेकर श्रीकृष्ण सहसा द्वारकापुरीके ऊपर जा पहुँचे। उन्होंने शङ्ख बजकर द्वारका वासियों के हृदय में हर्ष भर दिया।फिर सत्यभामा के साथ गरूड से उतरकर पारिजात उनके आँगन में लगाया।उसके नीचे जानेपर सब लोगों को अपने पूर्वजन्म की बातें याद आ जताई थीं। उसकेफूलों की सुगन्ध से बाहर कोसतक की पृथ्वी सुवासित रहती थी। सम्पूर्ण यादवों ने उस वृक्ष के पास जाकर जब अपना मुख देखा, तब उन्होंने अपने को अमानव-देवतातुल्य पाया।