ब्रह्माजी कहते हैं - प्राचीन सत्ययुगकी बात है, इन्द्रद्युम्न नाम से विख्यात एक राजा थे, जो इन्द्र के समान पराक्रमी थे। वे सत्यवादी, पवित्र, दक्ष, सर्वशास्त्रविशारद, रूपवान्, सौभाग्यशाली, शूरवीर, दानी, उपभोग में समर्थ, प्रिय वचन बोलनेवाले, समस्त यज्ञों का अनुष्ठान करनेवाले, ब्राह्मणभक्त, सत्यप्रतिज्ञ, धनुर्वेद और वेद-शास्त्रमें निपुण, विद्वान तथा पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति सब स्त्री-पुरुषों के प्रेमपात्र थे। सूर्य की भाँति उनकी ओर देखना कठिन था। वे शत्रुसमुदाय के लिये भयंकर, विष्णुभात, सत्त्वगुणसम्पन्न, क्रोध को जीतनेवाले, जितेन्द्रिय, अध्यात्मविद्याके प्रेमी, मुमुक्षु और धर्मपरायण थे। इस प्रकार वे सर्वगुणसम्पन्न राजा इन्द्रद्युम्न समूची पृथ्वी का पालन करते थे। एक समय उनके मन में भगवान् श्रीहरिकी आराधनाका विचार उत्पन्न हुआ। वे सोचने लगे, 'मैं किस क्षेत्र में, किस तीर्थमें, किस नदी के तटपर अथवा किस आश्रममें देवाधिदेव भगवान् जनार्दन की आराधना करूँ!' इस चिंता में पड़कर उन्होंने मन-ही-मन समस्त पृथ्वी पर दृष्टिपात किया, समस्त तीर्थों, क्षेत्रों और नगरोंकी ओर देखा; परन्तु सबको छोड़कर वे विश्वविख्यात मोक्षदायक पुरुषोत्तमक्षेत्रमें गये। वहाँ उन्होंने बहुत ऊँचा मंदिर बनवाकर उसमें बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्रा की स्थापना की तथा विधिपूर्वक स्नान, दान, तप होम और देव-दर्शनरूप पञ्चतीर्थोंका अनुष्ठान करके प्रतिदिन भक्तिपूर्वक श्रीपुरुषोत्तमकी आराधना की और उन्हींकी कृपासे मोक्ष प्राप्त किया।
मुनियों ने पूछा - सुरश्रेष्ठ! राजा इन्द्रद्युम्न मुक्तिदायक पुरुषोत्तमक्षेत्र में किसलिए गये? और वहाँ जाकर उन्होंने वह त्रिभुवनविख्यात प्रसाद किस प्रकार बनवाया? प्रजापते! उन्होंने श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा की स्थापना कैसे की? ये सब बातें विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।
ब्रह्माजी बोले - द्विजवरो! तुम लोग जो प्राचीन वृतान्त पुच रहे हो, वह सब पापोंको दूर करनेवाला, पवित्र, भोग और मोक्ष देनेवाला तथा शुभ है। इस प्रश्न के लिये तुम्हें साधुवाद देता हूँ। तुम जितेन्द्रय एवं विशुद्धचित्त होकर सुनो। मैं सत्ययुग के राजा इन्द्रद्युम्न चरित्र बतलाता हूँ। इस पृथ्वीपर मालवामें अवन्ती (उज्जैन) नाम की नगरी विख्यात है। वही राजा इन्द्रद्युम्नकी राजधानी थी। अवन्ती इस पृथ्वी के मुकुट के समान थी।वहाँ ह्रष्ट-पुष्ट मनुष्य भरे थे। उसकी चहारदीवारी और दरवाजे दृढ़ बने हुए थे। दरवाजों पर मजबूत किंवाड़ और सुदृढ़ यंत्र लगे थे। नगर के चारों ओर अनेकों खाईयाँ बनी हुई थीं। नगर में बहुत-से व्यापारी बसते थे। नाना प्रकार के बर्तनों की अच्छी बिक्री होती थी। रथ चलने लायक सड़कें और बाज़ार सुंदर थे। चौराहों से चारों ओर जाने के लिये मार्गों का अच्छी प्रकार विभाग हुआ था। अनेकों घर और गोपुर बने हुए थे। बहुत-सी गलियाँ उस नगर की शोभा बढ़ाती थीं। राजहंसों के समान श्वेत और मनोहर महल लाखों की संख्या में बने हुए थे, जो उस पुरकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। अनेकों यज्ञ सम्बन्धी उत्सवों के कारण उस नगर में आनन्द छाया रहता था। गाने और बजाने के ध्वनि गूँजती रहती थी। भाँति-भाँति की ध्वजा और पताकाओं से वह पुरी सुशोभित थी। हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी सेना सब ओर व्याप्त थी। अनेक प्रकार के सैनिक वहाँ भरे थे। अनेकों जनपदों के लोग वहाँ बसे हुए थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा विद्वान पुरुषों से वह नगरी सुशोभित थी। वहाँ मलिन, मुर्ख, निर्धन, रोगी, अङ्गहीन तथा जुवारी मनुष्यों का अभाव था। वहाँ के स्त्री-पुरुष सदा प्रसन्नचित्त दिखायी देते थे। वे सब रत्नों के दाता तथा सब प्रकार की संपत्तियों को भोगनेवाले तह। वहाँ की कुलवती स्त्रियाँ सब गुणों में आचार्य थीं। वे पतिव्रता, सौभाग्यशालिनी तथा सम्पूर्ण गुणों से सम्पन्न थीं। उस नगर में अनेकों वन, उपवन, पवित्र एवं मनोरम उद्यान, भाँति-भाँति के पुष्पों से सुशोभित दिव्य देवमंदिर, शाल, ताल, तमाल, बकुल, नागकेसर, पीपल, कनेर, चन्दन, अगर, चम्पा तथा अन्यान्य मनोहर वृक्ष, लता-गुल्म आदि शोभा पाते थे। अनेकों जलाशय उस महापुरीकी शोभा बढ़ा रहे थे। अवन्तिपुरीमें त्रिनेत्रधारी त्रिपुरशत्रु भगवान् शिव महाकाल नाम से प्रसिद्ध होकर रहते हैं। वे समस्त कामनाओं के पूर्ण करनेवाले हैं। वहाँ एक शिवकुण्ड है, जो सब पापों का नाश करनेवाला है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण करे। फिर शिवालय में जाकर भगवान् शिवकी तीन बार प्रदक्षिणा करे। तत्पश्चात् स्नान, पुष्प, गन्ध, धूप और दीप आदि के द्वारा भक्तिपूर्वक महाकालका विधिवत् पूजन करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य एक हजार अश्वमेध-यज्ञोंका फल पाता है। वह सब पापों से मुक्त हो समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले विमानोंद्वारा भगवान् शिव के परम धाम में जाता है।
अवन्तीमें शिप्रा नामसे प्रसिद्ध पवित्र नदी है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता और श्रेष्ठ विमानपर आरुढ़ हो स्वर्गलोक में नाना प्रकार के भोग भोगता है। वहीं देवाधिदेव भगवान् जनार्दन भी निवास करते हैं, जो गोविन्दस्वामी के' नाम से प्रसिद्ध हैं। वे भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य अपनी इक्कीस पीढ़ियों सहित मुक्त हो जाता है। उनके सिवा वहीं विक्रमस्वामीके नाम से भी भगवान् विष्णुका निवास है। स्त्री अथवा पुरुष, कोई भी उनका दर्शन करके पूर्वोक्त फल प्राप्तकर लेता है। वहाँ इन्द्र आदि देवता और समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाली देवियाँ भी निवास करती हैं। उन सबकी भक्तिपूर्वक पूजा और प्रणाम करके मनुष्य सब पापों से मुक्त हो स्वर्गलोकमें जात है। इस प्रकार राजाओं में श्रेष्ठ इन्द्रद्युम के द्वारा पालित वह रमणीय पुरी इन्द्रकी अमरावती के समान नित्य उत्सव के आनन्द से परिपूर्ण रहती थी। वहाँ दिन-रात इतिहास-पुराण, नाना प्रकार के शास्त्र तथा काव्यचर्चा सुनी जाती थी। इस तरह वह उज्जैनी पुरी सब गुणोंसे सम्पन्न बताई गयी है, जिसमें पूर्वकाल में परम बुद्धिमान् राजा इन्द्रदयुम्न हुए थे।
उस नगरी में अपनी उत्तम राज्य का उपभोग करते हुए राजा इन्द्रद्युम्न औरस पुत्रोंकी भाँति प्रजाका पालन करते थे। वे सत्यवादी, परम बुद्धिमान्, शूरवीर, समस्त गुणों के आकर, मतिमान्, धर्मात्मा तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ थे। उनमें सत्य, शील और इन्द्रिय-संयम के गुण थे। दान, यज्ञ और तपस्या में उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई राजा नहीं था। वे अपने प्रत्येक यज्ञ में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सोना, मणि, मोती, हाथी और घोड़े दान किया करते थे। उनके पास अच्छे-अच्छे हाथी, घोड़े, रथ, कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र, रत्न और धन-धान्यका कभी अन्त नहीं होता था। इस प्रकार समस्त वैभवसे युक्त और सम्पूर्ण गुणों से अलंकृत राजा इन्द्रद्युम निष्कण्टक राज्यका उपभोग करते थे। एक बार उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले सर्वयोगेश्वर श्रीहरि की आराधना किस प्रकार करूँ। उन्होंने समस्त शास्त्र, तन्त्र, आगम, इतिहास, पुराण, वेदाङ्ग, धर्मशास्त्र, ऋषियोंके बताये हुए नियम तथा सम्पूर्ण विद्यास्थानों का विचार किया। यत्नपूर्वक गुरुजनोंकी सेवा की और वेदों के पारगामी ब्राह्मणों का सत्संग किया। फिर इन्द्रियों को वश में करके मोक्ष की इच्छा से विचार किया - 'मैं देवाधिदेव सनातन पुरुष पीताम्बरधारी चतुर्भुज शङ्खचक्रगदाधर वनमालाविभूषित कमलनयन श्रीवत्सशोभित और मुकुट-अङ्गद आदि आभुषणोंसे अलंकृत श्रीहरि की आराधना किस प्रकार करूँ? यह विचार कर वे बहुत बड़ी सेना को साथ ले पुरोहित और भृत्योंके साथ अपनी नगरी उज्जैनी से बाहर निकले। उनके पीछे रथारूढ़ सैनिक हथियार हाथ में लिये प्रस्थित हुए। उनके रथ विमान के समान जान पड़ते थे। उनपर ध्वजा-पताकाएँ फ़हरा रहा थीं। रथियों के पीछे गजयुद्धकी विद्यामें निपुण असंख्य पैदल भी चके, जिनके हाथों में धनुष, प्रास और खड्ग शोभा पा रहे थे। वे सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्रोंको चलाने में कुशल, शूरवीर तथा सर्वदा संग्राम की अभिलाषा रखनेवाले थे। अन्त:पुरकी सब स्त्रियाँ भी वस्त्राभूषणों से अलंकृत हो महाराज के साथ चलीं। उनके नेत्र पद्मपत्र के समान विशाल थे और शस्त्रधारी सैनिक उन्हें घेरकर चलते थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों ने भी राजाका अनुसरण किया। अनेक नगरों के निवासी व्यापारी भी धन, रत्न, सुवर्ण, स्त्री तथा अन्य उपकरणोंके साथ प्रस्थित हुए। अस्त्र, शस्त्र, ताम्बूल, तृण, काष्ठ, तेल, वस्त्र, फल और पत्र आदि की बिक्री करनेवाले लोग अपनी-अपनी दुकान लेकर राजा के साथ चले। घसियारे, धोभी, ग्वाले, नाई और दर्जी भी हजारों की संख्या में साथ-साथ चल रहे थे। मङ्गलपाठ करनेवाले, पुराणोंका अर्थ करने में प्रवीण कथावाचक, काव्य-रचियता कवि, विष झाड़नेवाले, गुरुड-विद्याके जानकार, भाँति-भाँति के रत्नों की परीक्षा करनेवाले, गज-चिकित्सक, मनुष्य-चिकित्सक, वृक्ष-चिकित्सक, गो-चिकित्सक तथा समस्त पुरवासी राजा के पीछे-पीछे चलने लगे। जैसे दूसरे गाँवको जाते हुए पिता के पीछे पुत्र भी उत्सुक होकर जाने लगते हैं, उसी प्रकार समस्त पुवासियों ने भी राजा इन्द्रद्युम्न का अनुसरण किया।
इस ओरकार हाथी, घोड़े, रथ और पैदलसहित महान जनसमुदाय के साथ धीरे-धीरे यात्रा करते हुए महाराज इन्द्रद्युम दक्षिण समुद्र के तटपर पहुँचे। वहाँ उन्होंने रमणीय समुद्रका दर्शन किया, जो लाखों उत्ताल तरङ्गों से व्याप्त होने के कारण नृत्य करता-सा प्रतीत होता था। उसमें नाना प्रकार के रत्न और भाँति-भाँतिके प्राणी भरे थे। उसमें बड़े जोरका शब्द हो रहा था। वह अगाध समुद्र अत्यन्त भयंकर, अपार तथा मेघमाला के समान श्याम दिखायी देता था। उसी में भगवान् श्रीहरि के शयनका स्थान है। खारे पानी से भरा हुआ वह नदियों का स्वामी सिंधु परम पवित्र, सब पापों को दूर करनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलों को देनेवाला है। ऐसे समुद्र को देखकर राजाओं में श्रेष्ठ इन्द्रद्युम्न को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने समुद्र के तटपर पहुँचकर एक मनोहर प्रदेश में, जो सर्वगुणसम्पन्न एवं पवित्र था, निवास किया।
मुनियों ने पूछा - ब्रह्मन्! भगवान् विष्णुके उस परम पवित्र पुरुषोत्तमक्षेत्र में क्या पहले भगवान् की कोई प्रतिमा नहीं थी, जो राजाने सेना और सवारियों के साथ वहाँ जाकर श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राजी की स्थापना की?
ब्रह्माजी बोले - महर्षियो! इस विषय में समस्त पापों का विनाश करनेवाली प्राचीन कथा सुनो। मैं उसे संक्षेपसे कहूँगा। एक समय समस्त लोकोंकी सृष्टि करनेवाले अविनाशी भगवान् वासुदेव को प्रणाम करके भगवती लक्ष्मी ने सब लोगों के हित के लिये इस प्रकार प्रश्न किया - 'भगवन्! आप समस्त लोकों के स्वामी हैं। मेरे हृदय में एक संदेह खड़ा हुआ है, उसका इस समय निवारण कीजिये। अत्यन्त आश्चर्यमय मर्त्यलोकको, जो परम दुर्लभ कर्मभूमि है, लोभ और मोहरूपी ग्रहने ग्रस लिया है। वहाँ काम और क्रोध का महासागर लहराता है। देवेश! उस संसार-सागर से जिस प्रकार मुक्ति मिल सके, वह उपाय बतलाइये। इस संसार में मेरे संदेह का निवारण करने के लिए आपको छोड़कर दूसरा कोई वक्ता नहीं है।'
देवी का यह वचन सुनकर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन ने बड़ी प्रसन्नता के साथ यह सारभूत अमृतमय वचन कहा - 'देवि! समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ पुरुषोत्तमक्षेत्र विख्यात तीर्थ है। वह ब हट ही सुंदर, सुखपूर्वक सेवन करनेयोग्य, अनायास-साध्य तथा उत्तम फल देनेवाला है। तीनों लोकोंमें उसके समान कोई तीर्थ नहीं है। देवेश्वरि! पुरुषोत्तमतीर्थका नाम लेने मात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। उसे सम्पूर्ण देवता, दैत्य, दानव तथा मरीचि आदि मुनिवर भी भलीभाँति नहीं जानते। उसको मैंने अबतक गुप्त ही रखा है। इस समय तीर्थ राज की महिमा का वर्णन करता हूँ, तुम एकचित होकर सुनो!
'दक्षिणसमुद्रके तटपर जहाँ एक वटका महान् वृक्ष खड़ा है, वह अत्यन्त दुर्लभ क्षेत्र है। उसका विस्तार दस योजनका है। वह वाट कल्पका संहार होनेपर भी नष्ट नहीं होता। उस वटवृक्षके दर्शन से तथा उसकी छायाके निचे चले जाने से ब्रह्माहत्या भी छुट जाति है, फिर अन्य पापों की तो बात ही क्या है। जिन्होंने उसकी परिक्रमा ही है, उसे मस्तक झुकाया है, वे सब पापरहित होकर भगवान् विष्णुके धाम को पहुँच गये हैं। उस वटवृक्ष उत्तर और भगवान् केशवके कुछ दक्षिण जो बहुत बड़ा महल खड़ा है, वह धर्ममय पद है। वहाँ स्वयं भगवान् की बनाई हुई प्रतिमाका दर्शन करके पृथ्वी के सब मनुष्य अनायास ही मेरे धाम में चले जाते हैं। प्रिये! इस प्रकार सब लोगों को वैकुण्ठधाम में जाते देख एक दिन धर्मराज मेरे पास पास आये और मुझे प्रणाम करके इस प्रकार बोले।'
यमराज ने कहा - भगवान्! आपको नमस्कार है ब्रह्माजी बोले - देव! आप सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी और समस्त विश्वके पालक हैं। आपको नमस्कार है। आप क्षीर-सागर के निवासी और शेषनागके शरीर की शय्यापर शयन करनेवाले हैं। आप सबसे श्रेष्ठ, वरेण्य और वरदाता हैं। सबके करता होते हुए भी स्वयं अकृत हैं - आपको किसी दूसरे ने नहीं बनाया है। आप प्रभु-शक्ति से सम्पन्न, समपूर्ण विश्व के ईश्वर, अजन्मा, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ तथा किसी से परास्त न होनेवाले हैं। आपका श्रीविग्रह नील कमलदलके समान श्याम है, नेत्र खिले हुए कमलकी शोभा धारण करते हैं। आप सबके ज्ञाता, निर्गुण, शान्त, जगदाधार, अविनाशी, सर्वलोकस्त्रष्टा तथा सबको सुख देनेवाले हैं। जानने योग्य पुराणपुरुष, व्यक्ताव्यक्तस्वरुप सनातन परमेश्वर, कार्य-कारण के उत्पादक, लोकनाथ एवं जगद्गुरु हैं। आपका वक्ष:स्थल श्रीवत्सचिह्न से सुशोभित है। आप वनमालासे विभूषित हैं। आपका वस्त्र पीले रंग का है। आपकी चार बाँहें हैं। आप शङ्ख, चक्र, गदा, हार, केयूर, मुकुट और अङ्गद धारण करनेवाले हैं। सब लक्षणों से सम्पन्न, समस्त इन्द्रियों से रहित, कूटस्थ अविचल, सूक्ष्म, ज्योति :- स्वरुप, सनातन, भाव और अभाव से मुक्त, व्यापक तथा प्रकृति से परे हैं। सबको सुख देनेवाले सामर्थ्यशाली ईश्वर हैं। आप भगवान् जगन्नाथ को मैं नमस्कार करता हूँ।
भगवान् विष्णु कहते हैं - महाभागे! यमराजको हाथ जोड़े मस्तक झुकाये खड़ा देख मैंने उनसे स्तोत्र कहने का कारण पूछा - 'महाबाहु सूर्यनन्दन! तुम सब देवताओं में श्रेष्ठ हो। तुमने इस समय मेरी स्तुति किस लिए की है? संक्षेप से बताओ।'
धर्मराज बोले - भगवन्! इस विख्यात पुरुषोत्तम-तीर्थ में जो इन्द्रनील मणिकी बनी हुई श्रेष्ठ प्रतिमा है, वह सब कामनाओं को देनेवाली है। उसका अनन्य भाव तथा श्रद्धा से दर्शन करके सभी मनुष्य कामनारहित हो आपके श्वेतधाम में चले जाते हैं। अत: अब मैं अपना व्यवहार नहीं चला सकता। प्रभो! आप कृपा करके उस प्रतिमा को समेट लीजिये।
धर्मराजका यह वकाहं सुनकर मैंने उनसे कहा - 'यम! मैं सब ओर से बालू के द्वारा उस प्रतिमा को छिपा दूँगा।' तदनन्तर वह प्रतिमा छिपा दी गयी। अब उसे मनुष्य नहीं देख पाते थे। उसे छिपा देने के बाद मैंने यमराज को दक्षिण दिशा में भेज दिया।
ब्रह्माजी कहते हैं - पुरुषोत्तमतीर्थ में इन्द्रनीलमयी प्रतिमाके लुप्त हो जाने पर आगे चलाकर जो-जो बातें हुईं, उन सबको भगवान् विष्णु ने लक्ष्मीदेवी से विस्तारपूर्वक कह सुनाया।
Summary of chapter 24 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
Brahmā, approached by sages who wish to learn the highest truth, expounds on the nature of dharma, the significance of sacred texts, and the purpose of the Purāṇa itself. The dialogue establishes Brahmā as the ultimate source of Purāṇic wisdom and transitions the narrative toward specific sacred geographies and their divine stories.