26 - राजा इन्द्रद्युम द्वारा अश्वमेध-यज्ञ तथा पुरुषोत्तम-प्रसाद-निर्माण का कार्य

मुनियों ने कहा - 'भगवन्! अब हम राजा इन्द्रद्युम्नका शेष वृत्तान्त सुनना चाहते हैं। उस श्रेष्ठ तीर्थ में जाकर उन्होंने क्या किया?

ब्रह्माजी बोले - मुनिवरो! सुनो, मैं उस क्षेत्र के दर्शन और राजा के कृत्य का संक्षेप से वर्णन करता हूँ। उस त्रिभुवन विख्यात पुरुषोत्तम क्षेत्र में जाकर महाराज इन्द्रद्युम्न ने रमणीय स्थानों और नदियों का दर्शन किया। वहाँ एक बड़ी पवित्र नदी बहती हैं, जो विन्ध्याचलकी घाटी से निकली है। वह स्वित्रोत्पलाके नाम से विख्यात, सब पापों को दूर करनेवाली तथा कल्याणमयी है। उसका स्रोत बहुत बड़ा है। उसकी महत्ता गङ्गाजी के समान है। वह दक्षिण समुद्र में मिली है। वह पुण्यसलिला सरिता महानदी के नाम से भी विख्यात है। उसके दोनों किनारों पर अनेकों गाँव और नगर बसे हुए हैं। वे सभी गाँव अच्छी फसल होने के कारण बड़े मनोहर दिखायी देते हैं। वहाँ के लोग बड़े हृष्ट-पुष्ट होते हैं और वहाँ रहनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र शान्तभाव से पृथक्-पृथक् अपने धर्मों में तत्पर दिखायी देते हैं। ब्राह्मणों के मुख से छहों अङ्ग, पद और क्रम से युक्त वैदिक वाणी निकलती रहती है। कोई अग्निहोत्रमें लगे रहते हैं और कोई उपासना में। वे समस्त शास्त्रों के अर्थ समझने में कुशल, यज्ञकर्ता एवं प्रचुर दक्षिणा देनेवाले होते हैं। वहाँ चबूतरों, सड़कों, वनों, उपवनों, सभामण्डपों, महलों और देवमन्दिरों में महान् जनसमुदाय एकत्रित होकर इतिहास, पुराण, वेद, वेदाङ्ग, काव्य एवं शास्त्रों की कथा सुनते रहते हैं। उस देश की स्त्रियों को अपने रूप और यौवनपर गर्व होता है। वे सभी उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न होती हैं। उस क्षेत्र में संन्यासी, वानप्रस्थ, सिद्ध, स्नातक, ब्रह्मचारी, मन्त्रसिद्ध, तपस्यासिद्ध और यज्ञसिद्ध पुरुष निवास करते हैं। इस प्रकार राजा ने उस क्षेत्र को परम शोभायमान देखा, इसलिये मन में यह निश्चय किया कि यहीं रहकर परम देव, परम अपार, परमपद, अनन्त, अपराजित, सर्वेश्वरेश्वर, जगदुरु, सनातन भगवान् श्रीविष्णु की आराधना करूँगा। यहीं भगवान् का मानस तीर्थ पुरुषोत्तमक्षेत्र है, यह बात मुझे मालुम हो गयी, क्योंकि यहाँ कल्पवृक्षस्वरुप वोशल वटवृक्ष खड़ा है। यहीं इन्द्रनीलमणि की बनी हुई मणिमयी प्रतिमा है, जिसे भगवान् ने स्वयं छिपा दिया है। क्योंकि यहाँ दूसरी कोई प्रतिमा नहीं दिखायी देती। मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे सत्यपराक्रमी जगदीश्वर भगवान् विष्णु मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दें। मैं अनन्य भाव से भगवान् में मन लगाकर यहाँ यज्ञ, दान, तपस्या, होम, ध्यान, पूजन तथा उपवास आदि के द्वारा विधिपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करूँगा। साथ ही यहाँ श्रीविष्णु भगवान् के मन्दिर बनाने का कार्य भी प्रारम्भ करूँगा।

द्विजवरो! यह सोचकर महाराज इन्द्रद्युम्न ने वहाँ भगवान् का मन्दिर बनवाने के लिये कार्य आरंभ किया। उन्होंने ज्योतिषशास्त्र के पारंगत समस्त आचार्यों को बुलाकर बड़ी प्रसन्नता के साथ यत्नपूर्वक भूमिका शोधन कराया। इस कार्य में ज्ञान सम्पन्न ब्राह्मणों, वेद-शास्त्र के पारंगत अमात्यों, मंत्रियों तथा वास्तुविद्या के विद्वानों का भी सहयोग प्राप्त था। उन सबके सतह भली-भाँति विचार करके शुभ दिन और शुभ मुहूर्तमें, जब कि उत्तम चन्द्रमा और नक्षत्रों का योग था तथा ग्रहों की भी  अनुकूलता थी, राजा ने श्रद्धापूर्वक अर्घ्य दिया। उस समय जय-जयकार तथा मङ्गलमय शब्द हो रहे थे, भाँति-भाँति के वाद्यों की मनोहर ध्वनि गूँज रही थी। वेद-मन्त्रों के गंभीर घोष और मधुर संगीत हो रहे थे। फूल, लाजा, अक्षत, चन्दन, भरे हुए कलश तथा दीपक आदि के द्वारा पूजा-कार्य सम्पन्न किया गया था। इस प्रकार अर्घ्य-दान दे महाराज इन्द्रद्युम्न ने शूरवीर कलिङ्गराज, उत्कलराज और कोसलराज को बुलाकर कहा - 'राजाओ! तुम सब लोग एक ही साथ मन्दिर के निमित्त शिला ले आने के लिए जाओ। अपने साथ प्रधान-प्रधान शिल्पियों को भी, जो शिला खोदने के काम में निपुण हों, ले लो। विन्ध्याचल बहुत विस्तृत पर्वत है। वह अनेकों कन्दराओं से सुशोभित है। उसके सभी शिखरों को भलीभाँति देखकर सुन्दर-सुन्दर शिलाएँ कटवाओ और उन्हें छकड़ों तथा नावोंपर लादकर ले आओ, विलम्ब न करो।'

इस प्रकार राजाओं को शिला के लिये जाने की आज्ञा दे महाराज ने अमात्यों और पुरोहितों से कहा- 'सर्वत्र शीघ्रगामी दूत भेजे जायँ और वे पृथ्वी के समस्त राजाओं के पास जाकर मेरी यह आज्ञा सुना दें- 'राजाओं! महाराज इन्द्रद्युम्न की आज्ञा के अनुसार तुम सब लोग हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना तथा अमात्यों एवं पुरोहितों के साथ चलो।' ऐसी आज्ञा पाकर दूत राजाओं के पास गये और सबको महाराज की आज्ञा सुना दी। दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और पूर्व देशों के रहनेवाले, दूर और समीप निवास करनेवाले, पर्वत तथा भिन्न-भिन्न द्वीपों के निवासी नरेश महाराज इन्द्रद्युम्न का आदेश सुनकर रथ, घोड़े और पैदल सेना के साथ बहुत धन लेकर भारी संख्या में एकत्रित हुए। राजाओं को अमात्यों और पुरोहितों सहित आया देख महाराज को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोले- 'नृपवरो! मैं आप लोगों से कुछ निवेदन करना चाहता हूँ, सुनें। यह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला कल्याणमय क्षेत्र है। मैं यहाँ अश्वमेध-यज्ञ करना और भगवान् विष्णुका मंदिर बनवाना चाहता हूँ; किन्तु मैं इसे कैसे पूर्ण कर सकता हूँ, इस चिंता से मेरा चित्त व्याकुल हो रहा है। यदि आपलोग भलीभाँति मेरी सहायता करें तो मेरा सब कार्य सम्पन्न हो सकता है।'

महाराज इन्द्रद्युम्न यों कह्नेपर सब राजाओं को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने महाराज की आज्ञा से धन, रत्न, सुवर्ण, मणि, मोटी, कम्बल, मृगचर्म, सुंदर बिछौने, हीरे, पुखराज, माणिका, लाल, नीलम, हातही, घोड़े, रथ, हथिनी, भाँति-भाँति द्रव्य, भक्ष्य, भोज्य तथा अनुलेप आदि पदार्थो की वर्षा की। राजा इन्द्रद्युम्नने देखा, यज्ञ की सब सामग्री एकत्रित हो गयी है और यज्ञकर्म के ज्ञाता, वेद-वेदाङ्गों में पारंगत, शास्त्रज्ञान में निपूर्ण तथा सब कर्मों में कुशल ऋषि, महर्षि, देवर्षि, तपस्वी, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी, स्नातक तथा अग्निहोत्रपरायण ब्राह्मण भी उपस्थित हैं; तब उन्होंने अपने पुरोहित से कहा- 'ब्रह्मन्! कुछ विद्वान् ब्राह्मण, जो वेदों के पारंगत पंडित हों, जाकर अश्वमेध-यज्ञकी सिद्धि के लिए उत्तम स्थान देखें।' राजा यों कह्नेपर विद्वान् पुरोहित ने यज्ञ कर्म में कुशल ब्राह्मणों को आगे करके शिल्पियों के साथ प्रस्थान किया और उस देश में, जहाँ धिवरों का गाँव था, विधिपूर्वक यज्ञशाला बनवायी। उसमें गली-कूचे और छतरियाँ भी बनवायी गयीं थीं। सैकड़ों महल बनाये गये थे। सारा यज्ञमण्डप सुवर्ण, रत्न तथा श्रेष्ठ मणियों से विभूषित हो इन्द्र्भवन के समान रमणीय दिखायी देता था। खंभों पर सुवर्ण से चित्रकारी की गयी थी। दरवाजे बहुत बड़े-बड़े बने हुए थे। यज्ञ के प्रत्येक भवन में सुध सुवर्णका उपयोग किया गया था। धर्मात्मा पुरोहित ने भिन्न-भिन्न देशों के निवासी राजाओं के लिए अन्त:पुर भी बनवाये थे। नाना देशों से आये हुए ब्राह्मणों और वैश्यों के लिए भी उन्होंने अनेक शालाएँ बनवायी थीं। महाराज इन्द्रद्युम्न प्रिय करने के लिए समस्त राजा अनेक प्रकार के रत्न लेकर वहाँ आये थे। साथI उनकी स्त्रियाँ भी उत्सवमें सम्मिलित हुई थीं। महाराज ने उन समस्त समागत अतिथियों के लिए ठहरने के स्थान, शय्या, भाँति-भाँति भोज्य पदार्थ, महीन चावल, इंखका रस और गोरस आदि प्रदान किये उस महायज्ञ में जो भी श्रेष्ठ ब्राह्मण पधारे, उन सबको राजा ने स्वगात्पुर्वक ग्रहण किया महातेजस्वी नारेश्ने दम्भ छोड़कर स्वयं ही सब ब्राह्मणों का सब तरह से स्वागत-सत्कार कियाI तत्पश्चात् शिल्पियोंने अपनी शिल्प-रचना का कार्य पूरा करके राजा को यज्ञ मण्डप तैयार हो जाने की सुचना दी तत्पश्चात् यह सुनकर मंत्रियों सहित राजा बहुत प्रसन्न हुएI उसके शरीर में रोमाञ्च हो आयाI यज्ञमण्डप तैयार हो जाने पर महाराज ने ब्राह्मण-भोजन का कार्य आरम्भ करायाI प्रतिदिन जब एक लाख ब्राह्मण भोजन कर लेते, तब बारंबार मेघर्जना के समान गम्भीर स्वर में दुन्दुभिकी ध्वनि होने लगती थीI इस प्रकार राजा ने यग्य की वृद्धि होने लगीI उसमें अन्न का इतना दान किया गया, जिसकी कहीं उपमा नहीं थीI लोगों ने देखा वहाँ दूध, दही और घीकी नदियाँ बह रही हैंI भिन्न-भिन्न जनपदों के साथ समूचे जम्बूद्वीप के लोग वहाँ जुटे थेI वहाँ कितने ही सहस्त्र पुरुष बहुत-से  पात्र लेकर इधर-उधर एकत्र हुए थेI राजा के अनुगामी पुरुष ब्राह्मणों को तरह-तरह के अनुपान और राजाओं के उपभोग में आनेवाले भोज्य पदार्थ परोसते थेI यज्ञ में आये हुए वेदवेत्ता ब्राह्मणों तथा राजाओं का महाराज ने पूर्ण स्वागत-सत्कार कियाI इसके बाद उहोने राजकुमारों से कहाI

राजा बोले - राजपुत्रो! अब समस्त शुभ लक्षणों से युक्त श्रेष्ठ अश्व ले आओ और उसे समूची पृथ्वी घुमाओI विद्वान् और धर्मात्मा ब्राह्मण यहाँ होम करें और यह यज्ञ उस समयतक चाली रहे, जबतक कि भगवान् इसके समीप प्रकट होकर मुझे प्रत्यक्ष दर्शन न देंI

यों कहकर राजाओं में श्रेष्ठ इन्द्रद्युम्न ने बहुत-सा सुवर्ण, करोड़ों के आभूषण, लाखों हाथी-घोड़े, अरबों बैल तथा सुवर्णमय सींगोंवाली सुधारू गौएँ, जिनके साथ काँसेके दुग्धपात्र थे, वेदवेत्ता ब्राह्मणों को दान कियेI इसके सिवा बहुमूल्य वस्त्र, हरिणके बालों से बने हुए बिछौने, मूँगा, मणि अट्टहा हिरा, पुखराज, माणिक और मोति आदि भाँति-भाँति के रत्न भी दिएI उस अश्वमेध-यज्ञ में याचकों और ब्राह्मणों को भाँति-भाँति के भक्ष्य-भोज्य पदार्थ प्रदान किये गयेI मीठे पूवे तथा स्वादिष्ट अन्न सब जीवों की तृप्तिके लिए बारंबार दिए जाते थेI वहाँ दिए गये तथा दिए जानेवाले धनका कभी अन्त नहीं होता थाI इस प्रकार उस महायज्ञ को देखकर देवता, दैत्य, चारण, गन्धर्व, अप्सरा, सिद्ध, ऋषि और प्रजापति- सब-के-सब बड़े विस्मय में पड़ गयेI उस श्रेष्ठ यज्ञ की सफलता देख पुरोहित, मन्त्री तथा राजा-सबको बड़ी प्रसन्नता हुईIवहाँ कोई भी मनुष्य मलिन, दीन अथवा भूखा नहीं रहाI उस यज्ञ में किसी प्रकार का उपद्रव, ग्लानि, आधि, व्याधि, अकाल-मृत्यु, दंशन, ग्रहपीड़ा अथवा विषका कष्ट नहीं हुआI इस प्रकार राजा ने अश्वमेध-यज्ञ तथा पुरुषोत्तमप्रासाद-निर्माणका कार्य विधिपूर्वक पूर्ण कियाI