ब्रह्म पुराण

86 - यमलोक के मार्ग और चारों द्वारों का वर्णन

मुनि बोले - ब्रह्मन! आपके मुख से निकले हुए पुण्यधर्ममय वचनमृतों से हमें तृप्ति नहीं होती, अपितु अधिकाधिक सुनने की उत्कंठा बढ़ती जाती है। मुने! आप परम बुद्धिमान् हैं और प्राणियों की उत्पत्ति, लय और कर्मगति को जानते हैं; इसलिये हम आपसे और भी प्रश्न करते हैं। सुनने में आता है कि यमलोक का मार्ग बड़ा दुर्गम है। वह सदा दु:ख और क्लेश देनेवाला है तथा समस्त प्राणियों के लिये भयंकर है। उस मार्ग की लंबाई कितनी है तथा मनुष्य उस मार्ग से यमलोक की यात्रा किस प्रकार करते हैं? मुने! कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे नरक के दु:खों की प्राप्ति न हो?

व्यासजी ने कहा - उत्तम व्रत का पालन करनेवाले मुनिवरो! सुनो। यह संसारर चक्र परवाहरूप से निरंतर चलत रहता है। अब मैं प्राणियों की मृत्यु से लेकर आगे जो अवस्था होती है, उसका वर्णन करूँगा। इसी प्रसङ्गमें यमलोक के मार्ग का भी निर्णय किया जाएगा। यमलोक और मनुष्यलोक में छियासी हजार योजनों का अन्तर है। उसका मार्ग तपाये हुए ताँबे की भाँति पूर्ण तप्त रहता है। प्रत्येक जीवको यमलोक के मार्ग से जाना पड़ता है। पुण्यात्मा पुरुष पुण्यलोकों में और नीच पापचारी मानव पापमय लोकों में जाते हैं। यमलोक में बाईस नरक हैं, जिनके भीतर पापी मनुष्यों को पृथक्-पृथक् यातनाएँ दी जाती हैं। उन नरकों के नाम ये हैं- नरक, रौरव, रौद्र, शूकर, ताल, कुम्भीपाक, महाघोर, शाल्मल, विमोहन, कीटाद, कृमिभक्ष, लालाभक्ष, भ्रम, पीब बहानेवाली नदी, अग्निज्वाल, महारौद्र, संदंश, शुनभोजन, घोर वैतरणी और असिपत्रवन। यमलोकके मार्ग में न तो कहीं वृक्ष की छाया है न तालाब और पोखरे हैं, न बावड़ी न पुष्पकरिणी है, न कूप हैं न पौन्सले हैं, न धर्मशाला है न मण्डप है, न घर है न नदी एवं पर्वत हैं और न ठहरने के योग्य कोई स्थान ही है, जहाँ अत्यन्त कष्ट में पड़ा हुआ थका-माँदा जीव  विश्राम कर सके। उस महान पथपर सब पापियों को निश्चय ही जाना पड़ता है। जीव की यहाँ जितनी आयु नियत है, उसका भोग पूरा हो जानेपर इच्छा न रहते हुए भी उसे प्राणों का त्याग करना पड़ता है। जल, अग्नि, विष, क्षुधा, रोग अथवा पर्वत से गिरने आदि किसी भी निमित्त को लेकर देहधारी जीव की मृत्यु होती है। पाँच भूतों से बने हुए इस विशाल शरीर को छोड़कर जीव अपने कर्मानुसार यातना भोगने के योग्य दूसरा शरीर धारण करता है। उसे सुख और दु:ख भोगने के लिए सुदृढ़ शरीर की प्राप्ति होती है। पापाचारी मनुष्य उसी देहसे अत्यन्त कष्ट भोगता है और धर्मात्मा मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक सुख का भागी होता है।

शरीर में जो गर्मी या पित्त है, वह तीव्र वायु से प्रेरित होकर जब अत्यन्त कुपित हो जाता है, उस समय बिना ईंधन के ही उदीप्त हुई अग्नि की भाँति बढ़कर मर्मस्थानों को विदीर्ण कर देता है।     तत्पश्चात्  उदान नामक वायु ऊपर की ओर उठता है और खाये-पीये हुए अन्न-जल को निच्चे की ओर जाने से रोक देता है। उस आपत्ति की अवस्था में भी उसी को प्रसन्नता रहती है, जिसने पहले जल, अन्न एवं रस का दान किया है। जिस पुरुष ने श्रद्धा से पवित्र किये हुए अन्त:करण के द्वारा पहले अन्न-दान किया है, वह उस रुग्णावस्था में अन्न के बिना भी तृप्तिलाभ करता है। जिसने कभी मिथ्याभाषण नहीं किया, दो प्रेमियों के  पारस्परिक प्रेम में बाधा नहीं डाला तथा जो आस्तिक और श्रद्धालु है, वह सुखपूर्वक मृत्यु को प्राप्त होता है। जो देवता और ब्राह्मणों की पूजा में संलग्न रहते, किसीकी निन्दा नहीं करते तथा सात्विक, उदार और लज्जाशील होते हैं, ऐसे मनुष्यों को मृत्यु के समय कष्ट नहीं होता। जो कामना से, क्रोध से अथवा द्वेष के कारण धर्म का त्याग नहीं करता, शास्त्रोक्त आज्ञा का पालन करनेवाला तथा सौम्य होता है, उसकी मृत्यु भी सुख से होती है। जिन्होंने कभी जल का दान नहीं किया है, उन मनुष्यों को मृत्युकाल उपस्थित होनेपर अधिक जलन होती है तथा अन्नदान न करनेवालों को उस समय भूख का भारी कष्ट भोगना पड़ता है। जो लोग जाड़े के दिनों में लकड़ी दान करते हैं, वे शीत के  कष्ट को जीत लेते हैं। जो चन्दन दान करते हैं, वे तापपर विजय पाते हैं तथा जो किसी भी जीव को उद्वेग नहीं पहुँचाते, वे मृत्युकाल में प्राणघातिनी क्लेशमय वेदना का अनुभव नहीं करते। ज्ञानदाता पुरुष मोहपर और दीपदान करनेवाले अन्धकारपर विजय पाते हैं। जो झूठी गवाही देते, झूठ बोलते, अधर्मका  उपदेश देते और वेदोंकी निन्दा करते हैं, वे सब लोग मूर्च्छाग्रस्त होकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं

ऐसे लोगों की मृत्यु के समय यमराज के दुष्ट दूत हताहों में हथौड़ी एवं म्रुद्रर के लिए आते हैं; वे बड़े भयंकर होते हैं और उनकी देह से दुर्गन्ध निकलती रहती है। उन यमदूतों पर दृष्टि पड़ते ही मनुष्य काँप उठता है और भ्राता, माता अततः पुत्रों का नाम लेकर बारंबार चिल्लाने लगता है। उस समय उसकी वाणी स्पष्ट समझने में नहीं आती।'  एक ही शब्द, एक ही आवाज-सी जान पड़ती है। भयके मारे रोगी की आँखें झुमने लगती हैं और उसका मुख सूख जाता है। उसकी साँस ऊपर को उठने लगती है। दृष्टि की शक्ति भी नष्ट हो जताई है। फिर वह अत्यन्त वेदनासे पीड़ित होकर उस शरीर को छोड़देता है और वायु के सहारे चलता हुआ वैसे ही दूसरे शरीर को धारण कर लेता है जो रूप, रंग और अवस्था में पहले शरीर के समान ही होता है। वह शरीर माता-पिता के गर्भ से उत्पन्न नहीं, कर्मजनित होता है और यातना भोगने के लिए ही मिलता है; उसी से यातना भोगनी पड़ती है। तदनन्तर यमराज के दूत शीघ्र ही उसे दारुण पाशों से बाँध लेते हैं। मृत्युकाल आनेपर जीवको बड़ी वेदना होती है, जिससे वह अत्यन्त व्याकुल हो जाता है।उस समय सब भूतों से उसके शरीर का सम्बन्ध टूट जाता है। प्राणवायु कण्ठतक आ जाति है और जीव शरीर से निकलते समय जोर-जोर से रोता है।माता, पिता, भाई, मामा, स्त्री, पुत्र, मित्र और गुरु- सबसे नाता छूट जाता है। सभी सगे-सम्बन्धी नेत्रों में आँसू भरे दु-खी होकर उसे देखते रह जाते हैं और वह अपने शरीर को त्यागकर यमलोक के मार्गपर वायुरूप होकर चला जाता है।

वह मार्ग अंधकारपूर्ण, अपार, अत्यन्त भयंकर तथा पापियों के लिए अत्यन्त दुर्गम होता है। यमदूत पाशों में बाँधकर उसे खींचते और मुद्र्रों से पीटते हुए उस विशाल पथपर ले जाते हैं। यमदूतों के अनेक रूप होते हैं। वे देखने में बड़े डरावने और समस्त प्राणियों को भय पहुँचानेवाले होते हैं। उनके मुख विकराल, नासिका टेढ़ी, आँखें तीन, ठोड़ी, कपोल और मुख फैले हुए तथा ओठ लंबे होते हैं। वे अपने हाथों में विकराल एवं भयंकर आयुध लिए रहते हैं। उन आयुधों से आग की लपटें निकलती रहती हैं। पाश, साँकल और डंडे से भय पहुँचानेवाले, महाबली, महाभयंकर यमकिंकर यमराज  की आज्ञा से प्राणियों की आयु समाप्त होनेपर उन्हें लेने के लिए आते हैं। जीव यातना भोगने के लिये अपने कर्म के अनुसार जो भी  शरीर ग्रहण करता है, उसे ही यमराज के दूत यमलोक में जाते हैं। वे उसे कालपाश में बाँधकर पैरों में बेड़ी की सांकल वज्रके समान कठोर होती है। यमकिंकर क्रोध में भरकर उस बाँधे हुए जीव को भलीभांति पीटते हुए ले जाते हैं। वह लडखडा कर गिरता हिया, रोता हिया और 'हाय बाप! हाय मैया! हाय पुत्र!; कहकर बारंबार चीखता-चिल्लाता है; तो भी दूषित कर्मवाले उस पापी को वे तीखे शूलों, मुद्र्रों, खड्ग और शक्ति के प्रहारों और वज्रमय भयंकर डाँडो से घायल करके जोर-जोर से डाँटते हैं। कभी-कभी तो एक-एक पापी को अनेक यमदूत चारों ओर से घेरकर पीटते हैं। वेचारा जीव दु:ख से पीड़ित हो मुर्च्छित होकर इधर-उधर गिर पड़ता है; तथापि वे दूत उसे घसीटकर ले जाते हैं; तथापि वे दूत उसे घसीटकर ले हाते हैं। कहीं भयभीत होते, खिन त्रास पाते, कहीं लड़खड़ाते और कहीं दु:ख से करुण क्रन्दन करते हुए जीवों को उस मार्ग से जाना पड़ता है। यमदूतों की फटकार पड़ने से वे उद्विग्न हो उठते हैं और भय से विह्वल हो काँपते हुए शरीर से दौड़ने लगते हैं। मार्गपर कहीं काँटे बिछे होते हैं और कुछ दूरतक हुई बालू मिलती है।

जिन मनुष्यों ने दान नहीं किया है, वे उस मार्गपर जलते हुए पैरों से चलते हैं। जीवहिंसक मनुष्य के सब ओर मरे हुए बकरों की लाशें पड़ी होती हैं, जिनकी जली और फटी हुई चमड़ी से मेदे और रक्त की दुर्गन्ध आती रहती है। वे वेदना से पीड़ित हो जोर-जोर से चीखते-चिल्लाते हुए यममार्ग की यात्रा करते हैं। शक्ति, भिन्दिपाल, खड्ग, तोमर, बाण और तीखी नोक्वाले शूलों से उनका अङ्ग-अङ्ग विदीर्ण कर दिया जाता है। कुत्ते, बाघ,भेड़िये और कौए उनके शरीरका मानस नोच-नोचकर खाते रहते हैं। मानस खानेवाले लोग उस मार्ग पर चलते समय ओरसे चीरे जाते हैं, सूअर अपनी दाढ़ोंसे उनके शरीर को विदीर्ण कर देते हैं।

जो अपने ऊपर विश्वास करनेवाले स्वामी, मित्र अथवा स्त्री की हत्या कराते हैं, वे शास्त्रों द्वारा छिन्न-भिन्न और व्याकुल होकर यमलोक के मार्गपर जाते हैं। जो निरपराध जीवों को मारते और मरवाते हैं, वे राक्षसों के ग्रास बनकर उस पथ से यात्रा करते हैं। जो परायी स्त्रियों के वस्त्र उतारते हैं, वे मर्नेपर नंगे करके दौड़ते हुए यमलोक में लाये जाते हैं। जो दुरात्मा पापचारी अन्न, वस्त्र, सोने घर और खेतका अपहरण करते हैं, उन्हें यमलोक के मार्गपर पत्थरों, लाठियों और डंडों से मारकर जर्जर कर दिया जाता है और वे अपने अङ्ग प्रत्यङ्ग से प्रचुर रक्त बहाते हुए यमलोक में जाते हैं। जो नराधम नरक की पर्व न करके इस लोक में ब्राह्मणका धन हड़प लेते, उन्हें मारते और गालियाँ सुनते हैं, उन्हें सूखे काठ में बाँधकर उनकी आँखें फोड़ दी जाति और नाक-कान काट लिए जाते हैं। फिर उनके शरीर में पीब और रक्त पोत दिए जाते हैं तथा काल के समान गीध और गीदड़ उन्हें नोक-नोचकर खाने लगते हैं। इस दशा में भी क्रोध में भरे हुए भयानक यमदूत उन्हें पीटते हैं और वे चिल्लाते हुए यमलोकके पथपर अग्रसर होते हैं।

इस प्रकार वह मार्ग बड़ा ही दुर्गम और अग्नि के समान प्रज्वलित है। उसे रौरव (जीवों को रुलानेवाला) कहा गया है। वह नीची-ऊँची भूमि से युक्त होने के कारण मानवमात्र केलिये अगम्य है। तपाये हुए ताँबे की भाँति उसका वर्ण है। वहाँ आग की चिंगारियाँ और लपटें दिखायी देती हैं। वह मार्ग कण्टकों से भरा है। शक्ति और वज्र आदि आयुधों से व्याप्त है। ऐसे कष्ट प्रद मार्ग पर निर्दयी यमदूत जीवको घसीटते हुए ले जाते हैं और उन्हें सब प्रकार के अस्त्र-शास्त्रों से मारते रहते हैं। इस तरह पपासक्त अन्यायी मनुष्य विवश होकर मार खाते हुए दुर्धर्ष यमदूतों के द्वारा यमलोक में ले जाये जाते हैं। यमराज के सेवक सभी पापियों को उस दुर्गम मार्ग में अवहेलनापूर्वक ले जाते हैं। वह अत्यन्त भयंकर मार्ग जब समाप्त हो जाता है, तब यमदूत पापी जीव को ताँबे और लोहेकी बनी हुई भयंकर यमपुरी में प्रवेश कराते हैं।

वह पुरी बहुत विशाल है, उसका विस्तार लाख योजनका है। वह चौकोर बताई जाती है। उसके चार सुंदर दरवाजे हैं। उसकी चारदीवारी दोनेकी बनी है, जो दस हजार योजन ऊँची है। यमपुरीका पूर्वद्वार बहुत ही सुंदर है। वहाँ फेह्राती हुई सैकड़ों पताकाएँ उसकी शोभा बढ़ाती हैं। हीरे, नीलम, पुखराज और मोतियों से वह द्वार सजाया जाता है। वहाँ गन्धर्वों, सिद्धों, यक्षों और विद्याधरों का प्रवेश होता है। उस नगरका उत्तरद्वारा घण्टा, छत्र, चँवर तथा नाना प्रकार के रत्नों से अलंकृत है। वहाँ वाणी और वेणुकी मनोहर ध्वनि गूँजती रहती है। गीत, मङ्गल-गान तथा ऋग्वेद आदि के सुमधुर शब्द होते रहते हैं। वहाँ महर्षियोंका समुदाय शोभा पाटा है। उस द्वार से उन्हीं पुण्यात्माओंका प्रवेश होता है, जो धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं। जिन्होंने गर्मी में दूसरों को जल पिलाया और सर्दी में अग्नि का सेवन कराया है, जो थके-माँदे मनुष्यों की सेवा करते और सदा प्रिय वचन बोलते हैं, जो दाता, शूर और माता-पिता के भक्त हैं अट्टहा जिन्होंने ब्राह्मणों की सेवा और अतिथियों का पूजन किया है, वे भी उत्तरद्वारा से ही पुरी में प्रवेश करते हैं।

यमपुरीका पश्चिम महाद्वार भाँति-भाँति के रत्नों से विभूषित है। विचित्र-विचित्र मणियों की वहाँ सीढ़ियाँ बनी हैं। देवता उस द्वारा की शोभा बढ़ाते रहते हैं। वहाँ भेरी, मृदङ्ग और शङ्ख आदि वाद्यों की ध्वनि हुआ करती है। सिद्धों के समुदाय सदा हर्ष में भरकर उस द्वारपर मङ्गल-गण करते हैं। जो मनुष्य भगवान् शिव की भक्ति में संलग्न रहते हैं, जो सब तीर्थों में गोते लगा चुके हैं, जिन्होंने पञ्चाग्नि का सेवन किया है, जो किसी उत्तम तीर्थस्थान में अथवा कालिञ्जर पर्वतपर प्राण-त्याग करते हैं और जो स्वामी, मित्र अथवा जगत्का कल्याण करनेके लिए एवं गौओं की र्ख्सा के लिये मारे गये हैं, वे शूरवीर और तपस्वी पुरुष पश्चिमद्वार से यमपुरी में प्रवेश करते हैं। उस पुरीका दक्षिणद्वार अत्यन्त भयानक है। वह सम्पूर्ण जीवों के मन में भय उपजानेवाला है। वहाँ निरंतर हाहाकार मचा रहता है। सदा अँधेरा छाया रहता है। उस द्वारपर तीखे सींग, काँटे, बिच्छू, साँप, वज्रमुख कीट, भेड़िये, व्याघ्र, रीछ, सिंह, गीदड़, कुत्ते, बिलाव और गीध उपस्थित रहेते हैं। उनके मुखों से आग की लपटें निकला करती हैं। जो सदा सबका अपकार करनेवाले पापात्मा हैं, उन्हींका उस मार्ग से पुरी में प्रवेश होता है। जो ब्राह्मण, गौ, बालक, वृध्द, रोगी, शरणागत, विश्वासी, स्त्री, मित्र और निहत्थे मनुष्य की हत्या कराते हैं, अगम्या स्त्री के साथ सम्भोग करते हैं दूसरों के धन का अपहरण करते हैं, धरोहर हड़प लेते हैं, दूसरों को जहर देते और उनके घरों में आग लगाते हैं, पराई भूमि, गृह शय्या, वस्त्र और आभूषणकी चोरी करते हैं, दूसरों के छिद्र देखकर उनके प्रति क्रूरताका बर्ताव करते हैं, सदा झूठ बोलते हैं,  झूठी गवाही देते, कन्या बेचते, अभक्ष्य भक्षण करते, पुत्री और पुत्रवधू के साथ समागम करते, माता-पिता को कटुवचन सुनाते तथा अन्यान्य प्रकार के म्हापत्कों में संलग्न रहते हैं, वे सब दक्षिण द्वार से यमपुरी में प्रवेश करते हैं।*

* ये घातयन्ति विप्रान् गा बालं वृद्धं तथाऽऽतुरम्। शरणागतं विश्वस्तं स्त्रियं मित्रं निरयुधम् ॥

येऽगम्यागामिना मूढा: परद्रव्यापहारिण:। निक्षेप्स्यापहर्तारो विषवह्निप्रदाश्च ये ॥

परभूमिं गृहं शय्यां वस्त्रालङ्कारहारिणः। पररंध्रेषु ये क्रूरा ये सदानृतवादिन: ॥

ग्रामराष्ट्रपुरस्थाने महादु:खप्रदा हि ये। कूटसाक्षिप्रदातार: कन्याविक्रयकरका: ॥

अभक्ष्यभक्षणरता ये गच्छन्ति सुतां स्नुषाम्। मातरं पितरं चैव ये वदन्ति च पौरुषम् ॥

अन्ये ये चैव निर्दिष्टा महापातककारिण:। दक्षिणेन तु ते सर्वे द्वारेण प्रविशन्ति वै ॥

(२१४।१२३ - १२८)