ब्रह्माजी कहते हैं - आपस्तम्बतीर्थ तीनों लोकों में विख्यात है। वह स्मरण करने मात्र से समस्त पापराशिका विध्वंस करने में समर्थ है। आपस्तम्ब एक मुनि थे। वे परम बुद्धिमान् और महायशस्वी थे। उनकी पत्नीका नाम अक्षसूत्रा था, वह पातिव्रत-धर्म का पालन करनेवाली थी। मुनिके एक पुत्र थे, जो 'कर्की' नाम से विख्यात थे। वे बड़े विद्वान् और तत्त्ववेत्ता थे। एक दिन उनके आश्रम पर मुनि'श्रेष्ठ अगस्त्यजी आये। शिष्योंसहित मुनीश्वर आपस्तम्ब ने अगस्त्यजी का पूजन किया और इस प्रकार पूछा- 'मुनिवर! तीनों देवताओंमें कौन पूज्य है? अनादि और अनन्त कौन है तथा वेदों में किसका यशोगान किया गया है? महामुने! यही मेरा संशय है, इसे दूर करने के लिए आप कुछ उपदेश करें।
अगस्त्यजी बोले - धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धि में शब्द प्रमाण बतलाया जाता है। उसमें भी वैदिक शब्द सबसे श्रेष्ठ प्रमाण है। वेद के द्वारा जिनका यशोगान होता हिया, वे परात्पर पुरुष परमात्मा हैं। जो मृत्यु के अधीन होता हिया, उसे अपर (क्षर पुरुष) जानना चाहिये और जो अमृत है, उसे पर (अक्षर पुरुष) कहते हैं। अमृतके भी दो स्वरुप हैं- मूर्त और अमूर्त। जो अमूर्त (निराकार) है, उसे परब्रह्म जानना चाहिये और मूर्तको अपर ब्रह्म कहते हैं। गुणोंकी व्यापकताके अनुसार मूर्तके भी तीन भेद हैं- ब्रह्मा, विष्णु और शिव। ये एक होते हुए भी तीन कहलाते हैं। इन तीनों देवताओं का भी वेद्यतत्त्व एक ही है। उसे ही परब्रह्म कहते हैं। गुण और कर्म के भेद से एक की ही अनेक रूपों से अभिव्यक्ति होती है। लोकों का उपकार करने के लिए एक ही ब्रह्मके तीन रूप हो जाते हैं। जो इस परमतत्त्वको जनता है, वही विद्वान् है; दूसरा नहीं। जो इन तीनों में भेद बतलाता है, उसे लिङ्गभेदी कहते हैं। उसके लिए कोई प्रायश्चित नहीं है।* तीनों देवताओं के रूप एक-दूसरे से भिन्न और पृथक्-पृथक् हैं। सम्पूर्ण साकार रूपों में पृथक्-पृथक् वेद प्रमाण हैं। जो निराकार तत्त्व है, वह एक है। वह उन तीनों की अपेक्षा उत्कृष्ट माना गया है।
आपस्तम्ब बोले - इससे मैं किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सका। इसमें जो रहस्यकी बात हो, उसे विचारकर बतलाइये।
अगस्त्यजी ने कहा - यद्यपि इस देवताओं में परस्पर कोई भेद नहीं है तथापि सुखस्वरुप शिवसे ही सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। मुने! पराभक्ति के साथ भगवान् शिव की ही आराधना करो। दण्डकाराण्य में गौतमी के तटपर भगवान् शिव समस्त पापराशिका निवारण करते हैं।
महर्षि अगस्त्यकी यह बात सुनकर आपस्तम्ब मुनिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने गङ्गामें जाकर स्नान किया और व्रतपालनका नियम लेकर भगवान् शंकरका स्तवन करना आरम्भ किया।
आपस्तम्ब बोले - जो काष्ठोंमें अग्नि, फूलोंमें सुगन्ध, बीजों में वृक्ष आदि, पत्थरों में सुवर्ण तथा समौर्ण भूतों में आत्मारूप से छिपे रहते हैं, उन भगवान् सोमनाथ की मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने खेल-खेल में ही इस विश्वकी रचना की, जो तीनों लोकों के भरण-पोषण करनेवाले तथा उसके रचियता हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरुप है और जो सत्-असत्से परे हैं, उन भगवान् सोमनाथ की मैं शरण लेता हूँ। जिनका स्मरण करनेसे देहधारी जीव को दरिद्रताके महान् अभिशाप और रोग आदि स्पर्श नहीं करते तथा जिनकी शरण में गये हुए मनुष्य अपनी अभीष्ट वस्तुको प्रपात कर लेते हैं, उन भगवान् सोमनाथ की मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने पहले तीनों वेदों में वर्णित शर्म का साक्षात्कार करके उसमें ब्रह्मा आदि देवताओं को नियुक्त किया और इस प्रकार जिन्होंने दो शरीर धारण किये, उन भगवान् सोमनाथ की मैं शरण लेता हूँ। नमस्कार, मन्त्रोच्चारणपूर्वक हवन किया हुआ हविष्य तथा श्रद्धापूर्वक किया हुआ पूजन- ये सब जिनको प्राप्त होते हैं तथा सम्पूर्ण देवता जिनकी दी हुई हविको ग्रहण करते हैं, उन भगवान् सोमनाथ की मैं शरण लेता हूँ। जिनसे बढ़कर दूसरी कोई उत्तम वस्तु नहीं है, जिनसे बढ़कर अत्यन्त सूक्ष्म भी कोई नहीं है तथा जिनसे बढ़कर महान्-से-महान् वस्तु भी दूसरी नहीं है, उन भगवान् सोमनाथ की मैं शरण लेता हूँ। जिनकी आज्ञा से यह विचित्र, अचिन्त्य, नाना प्रकार का और महान् विश्व एक ही कार्य में संलग्न हो निरंतर परिचालित रहता है, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जिनमें ऐश्वर्य, सबका आधिपत्य, कर्तृत्व, दातृत्व, महत्त्व, प्रीति, यश और सौख्य- ये अनादि धर्म हैं, उन भगवान् सोमनाथ की मैं शरण लेता हूँ। जो सदा शरण लेने योग्य, सबके पूजनीय, शरणागत के प्रिय, नित्य कल्याणमय तथा सर्वस्वरुप हैं, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ।
इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् शंकर ने प्रसन्न होकर कहा- 'मुने! कोई वर माँगों।' आपस्तम्बने कहा- 'मेरा और दूसरों का कल्याण हो। जो मनुष्य यहाँ स्नान करके सम्पूर्ण जगत् के स्वामी आपका दर्शन करें, वे अपनी समस्त अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त करें।' भगवान् शिव ने 'एवमस्तु' कहकर इसका अनुमोदन किया। तबसे वह तीर्थ आपस्तम्बके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह अनादि अविद्यामय अन्धकारराशि का उन्मूलन करने में समर्थ है।
शुक्लतीर्थ मनुष्यों को सब प्रकार की सिद्धि प्रदान करनेवाला है। उसके स्मरणमात्र से सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति होति है। भरद्वाज नाम से विख्यात एक बड़े शर्मात्म मुनि थे। उनकी पत्नी का नाम पैठीनसी था। वह पातिव्रत-धर्मका पालन करती हुई पति के साथ गौतमीके तटपर निवास करती थी। एक बार मुनिने अग्नि और सोम देवताओं के लिए तथा इन्द्र और अग्नि देवताओं के लिए पुरोडाश (खीर) बनाया। पुरोदाश जब पक रहा था, तब धूएँसे एक पुरुष प्रकट हुआ, जो तीनों लोकों को भयभीत करनेवाला था। उसने पुरोडाश कहा लिया। यह देखकर मुनिने क्रोधपूर्वक पूछा- 'तू कौन है, जो मेरा यज्ञ नष्ट कर रहा है?' ऋषिकी बात सुनकर राक्षस ने उत्तर दिया- 'मेरा नाम हव्यन्घ (यज्ञघ्न) है। मैं संध्या का पुत्र हूँ। प्राचीनबर्हिष् का ज्येष्ठ पुत्र मैं ही हूँ। ब्रह्माजी ने मुझे वरदान दिया है कि तुम सुखपूर्वक यज्ञोंका भक्षण करो। मेरा छोटा भाई कलि भी बलवान् और अत्यन्त भीषण है। मैं काल, मेरे पिता काले, मेरी माँ काली तथा मेरा छोटा भाई भी काला ही है। मैं कृतान्त बनकर यज्ञ का नाश और यूपका छेदन करूँगा।'
भरद्वाजने कहा - तुम मेरे यज्ञ की रक्षा करो, क्योंकि यह प्रिय एवं सनातन धर्म है। मैं जनता हूँ तुम यज्ञका नाश करनेवाले हो तो भी मेरा अनुरोध है कि तुम ब्राह्मणों सहित मेरे यज्ञ की रक्षा करो।
यज्ञघ्नने कहा - भरद्वाज! तुम संक्षेपसे मेरी बात सुनो। पूर्वकाल में देवताओं और दानवों के समीप ब्रह्माजीने मुझे शाप दिया। उस समय मैंने लोकपितामह ब्रह्माजी को प्रार्थना करके प्रसन्न किया। तब उन्होंने कहा- 'जब श्रेष्ठ मुनि तुम्हारे ऊपर अमृत का छींटा दें, तब तुम शाप से मुक्ति हो जाओगे। इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है।' ब्रह्मन्! जब आप ऐसा करेंगे, तब आपकी जो-जो इच्छा होगी, वह सब पूर्ण होगी। यह बात कभी मिथ्या नहीं हो सकती।
भरद्वाजने फिर कहा - महामते! तुम मेरे सखा हो। अत: जिस उपाय से यज्ञ की रक्षा हो, वह बताओ। मैं उसे अवश्य करूँगा। देवताओं और दैत्यों ने एकत्रित होकर कभी क्षीरसमुद्रका मन्थन किया था। उस समय बड़े कष्ट से उन्होंने अमृत मिला। वही अमृत मुझे कैसे सुलभ हो सकता है। यदि तुम प्रेमवश प्रसन्न हो तो जो सुलभ वस्तु हो, वाही माँगो। ऋषिकी यह बात सुनकर राक्षस ने प्रसन्नतापूर्वक कहा- 'गौतमी गङ्गाका जल अमृत है। सुवर्ण अमृत कहलाता है। गायका घी भी अमृत है और सोम को भी अमृत ही माना जाता है। इन सबके द्वारा मेरा अभिषेक करो। अथवा गङ्गाका जल, घी और सुवर्ण- इन तीनों वस्तुओं से ही अभिषेक करो। सबसे उत्कृष्ट एवं दिव्य अमृत है- गौतमी गङ्गाका जल।'
यह सुनकर भरद्वाज मुनिको बड़ा संतोष हुआ। उन्होंने बड़े आदर के साथ गङ्गाका अमृतमय जल हाथ में लिया और उससे राक्षस का अभिषेक किया। इससे वह महाबली राक्षस शुक्ल वर्णका होकर प्रकट हुआ। जो पहले काला था, वह क्षणभरमें गोरा हो गया। प्रतापी भरद्वाज ने सम्पूर्ण यज्ञ समाप्त करके ऋत्विजोंको विदा किया। इसके बाद राक्षसने पुन: भरद्वाजसे कहा- 'मुने! अब मैं जाता हूँ। तुमने मुझे गौर वर्ण का कर दिया। तुम्हारे इस तीर्थ में जो लोग स्नान, दान और पूजन आदि करें, उन सबके अभीष्ट फलोंकी सिद्धि हो। इसके स्मरणमात्र से सब पाप नष्ट हो जाएँ।' तबसे वह शुक्लतीर्थ के नाम से विख्यात हुआ। दण्डकारण्यमें गौतमी गङ्गाके तटपर वह तीर्थ स्वर्गका खुला हुआ दरवाज़ा है। वहाँ गङ्गाजी के दोनों तटोंपर सात हजार तीर्थ हैं, जो सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं।
श्रीविष्णुतीर्थ के नाम से जो विख्यात तीर्थ है, उसका वृत्तान्त सुनो। मुद्गल के पुत्र मौद्गल्य एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनकी पत्नी का नाम जाबाला था। वह उत्तम पुत्रोंकी जननी थी। मौद्गल्यके पिता मुद्गल ऋषि भी सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात थे। उनकी पत्नी भागीरथी के नाम से प्रसिद्ध थी। मौद्गल्य ऋषि प्रात:काल ही गङ्गा-स्नान करते थे। यह उनका नित्यका कार्य था। गङ्गाके तटपर कुश, मिट्टी और शमीके फूलोंसे वे प्रतिदिन भगवान् का पूजन करते थे। गुरुके बताये हुए मार्ग से अपने हृदयकमल के भीतर वे प्रतिदिन भगवान् विष्णुका आवाहन करते थे। उनके आवाहन करते ही शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले लक्ष्मीपति जगन्नाथ गरुड़पर आरुढ़ हो तुरंत वहाँ आते थे। फिर मौद्गल्य ऋषि के द्वारा यत्नपूर्वक पूजित होनेपर वे कुछ कालतक उन्हें विचित्र-सिचित्र कथाएँ सुनाया करते थे। जथा-वार्ता में जब तीसरे पहरका समय हो जाता, तब भगवान् विष्णु उनसे बार-बार कहते- 'बेटा! अब अपने घर जाओ, तुम बहुत थक गये होंगे।' इस प्रकार भगवान् के आग्रह करनेपर वे घर लौटते थे। उनके जानेपर भगवान् देवताओंके साथ अपने धामको लौटते थे। मौद्गल्य भी प्रतिदिन कुछ लेकर अपने घर आते और पत्नी को अपना उपार्जित धन देते थे। मौद्गल्यकी पत्नी जाबाला बड़ी पतिव्रता थी। उसके स्वामी शाक, फल अथवा मूल- जो कुछ भी ला देते, उसे ही लेकर वह उसका संस्कार करती और पहले अतिथियों, बालकों तथा अपने पतिको परोसती थी। इन सबको भोजन देकर वह पीछे स्वयं अन्न ग्रहण करती। जब सब लोग भोजन कर लेते तब मौद्रल्य मुनि प्रतिदिन रात में प्रसन्नतापूर्वक श्रीविष्णुके मुखसे सुनी हुई कथाएँ सबको सुनाते थे। इस प्रकार बहुत समय व्यतीत होने के बाद मौद्रल्य मुनि ने पत्नी, पुत्र, भाई, बन्धु और माता-पिता के साथ उत्तम भोग भोगे और अन्त में मोक्ष भी प्राप्त कर लिया। तबसे वह तीर्थ मौद्रल्यतीर्थ और श्रीविष्णुतीर्थ के नामसे प्रसिद्ध हुआ। वहाँ का स्नान और दान भोग एवं मोक्ष देनेवाला है। यदि किसी तरह उस तीर्थ के नाम का श्रवण अथवा उसका स्मरण ही हो जाय तो भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं और वह मनुष्य पापों से मुक्त होकर सुखी हो जाता है। वहाँ गौतमी के दोनों तटोंपर ग्यारह हजार तीर्थ हैं, जो स्नान, दान और जप आदि करनेसे सब पदार्थ देनेवाले हैं।
* लोकानामुपकारार्थमाकृतित्रितयं भवेत् ॥
यस्तत्त्वं वेत्ति परमं स च विद्वान्न चेतर:। तत्र यो भेदमाचष्टे लिङ्गभेदी स उच्यते ॥
प्रायश्चित्तं न तस्यास्ति यश्चैषां व्याहरेद् भिदम् ॥
(१३०।११-१३)
Summary of chapter 56 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The shrine of Mādhava within the Puruṣottama kṣetra is extolled. An extended hymn with obeisances to Śiva in his many terrific and benign forms is interwoven — Aghora, Ghora, Śiva, Śānta, Ugra — reflecting the theological richness of the kṣetra where both Vaiṣṇava and Śaiva shrines are equally venerated. The supreme glory of Mādhava as the preserver of all beings is declared.