56 - तपस्तीर्थ, इन्द्रतीर्थ और वृषाकपि एवं अब्जकतीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं - तपस्तीर्थ बहुत बड़ा तीर्थ है। वह तपस्याकी वृद्धि करनेवाला, समस्त अभिलाषित वस्तुओंका दाता, पवित्र तथा पितरोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। उस तीर्थमें जो पापनाशक घटना घटी है, उसे बतलाता हूँ; सुनो। ऋषियोंमें अग्नि और जलकी श्रेष्ठता को लेकर परस्पर संवाद हुआ। एक पक्ष कहता था, जल श्रेष्ठ है और दूसरे पक्षके लोग अग्निकी श्रेष्ठता का प्रतिपादन करते थेव अग्निकी श्रेष्ठता बतलानेवाले अपनी युक्तियाँ इस प्रकार उपस्थित करते थे- 'अग्निके बिना जीवन कहाँ रह सकता है, क्योंकि अग्नि ही जीवरूप है। आत्मा और हविष्य भी वही है। अग्नि से ही समस्त जगत् की उत्पत्ति होती है। अग्निने समस्त विश्वको धारण कर रखा है। अग्नि ही ज्योतिर्मय जगत् है। अत: अग्निसे बढ़कर दूसरा कोई भी अत्यन्त पावन देवता नहीं है। अग्निको ही अन्तज्र्योति तथा परमज्योति कहते हैं। अग्निके बिना कोई भी वस्तु नहीं है। यह त्रिलोकी अग्निका धाम है इसलिये पाँचों भूतोंमें अग्निसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। नारिकी यानिमें पुरुष जो वीर्य स्थापित करता है और उसमें जो देह आदि के निर्माणकी शक्ति होती है, वह सब अग्निकी ही है। अग्नि देवताओंका मुख है; अत: उससे बड़ा कुछ भी नहीं है।'

दूसरे वेदवादी पुरुष जलको श्रेष्ठ मानते थे। उनका कहना था- 'जलसे ही अन्नकी उत्पत्ति होती है तथा जलसे ही मनुष्य शुद्ध होता है। जलने ही सबको धारण कर रखा है, अत: जलको माता माना गया है। पुराणवेत्ताओंका कथन है कि जल ही तीनों लोकोंका जीवन है। जलसे ही अमृत उत्पन्न हुआ है और जलसे ही ओषधियाँ होती हैं।' इस प्रकार एक पक्ष अग्निको श्रेष्ठ कहता था और दूसरा पक्ष जलको। यों ही मीमांसा करते हुए एक-दूसरेके विरुद्ध तर्क उपस्थित करनेवाले वेदवादी ऋषि मेरे पास आकर बोले- 'भगवन्! आप तीनों लोकों के प्रभु हैं। बतलाइये, अग्नि श्रेष्ठ है या जल?' मैंने कहा- 'दोनों ही इस जगत् में परम पूजनीय हैं। दोनोंसे जगत् उत्पन्न होता है। दोनोंसे हव्य-कव्य और अमृतका प्राकट्य होता है। दोनोंसे ही जीवन है। दोनों ही शरीर को धारण करनेवाले हैं। इनमें परस्पर कोई विशेषता नहीं है। दोनों समानरूप से ही श्रेष्ठ माने गये हैं।

मेरे कथन से यह बात सिद्ध हुई कि दोनों ही श्रेष्ठ हैं, कोई एक नहीं; परन्तु वे ऋषि ऐसा ही मानते थे कि इन दोनोंमें से एक ही श्रेष्ठ है। अत: उन्हें मेरी बातोंसे संतोष नहीं हुआ। तब वे क्षीरसागर में शयन करनेवाले शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णुके पास गये और नाना प्रकारके स्त्रोतोंसे उनकी स्तुति करने लगे।

ऋषि बोले - जो भविष्यमें होनेवाला है, जो जन्म ले चुका है तथा जो अभि गुहा (गर्भ)- में प्रविष्ट हुआ है, उस सम्पूर्ण भुवन को जो सदा अपनी ज्ञानदृष्टिमें रखते हैं, यह चित्र-विचित्र रूपोंवाली समस्त त्रिलोकी अन्त में जिनके भीतर लीन होती है, जिन्हें महर्षिगण अक्षर, सनातन, अप्रेमय तथा वेदवेद्य बतलाते हैं, जिनकी शरण में गये हुए प्राणी अपने अभीष्ट पदार्थ को प्राप्त कर लेते हैं, उन परमार्थवस्तुरूप परमेश्वर की हम शरण लेते हैं। जगन्निवास! म्हाभूतमय जगत् में जो भूत सबसे प्रधान और श्रीविष्णुका स्वरुप है, जिसे योगी भी नहीं जान पाते, उसीका प्रतिदिन करने के लिए ये महर्षिगण यहाँ आये हुए हैं। आप यहाँ सत्यको प्रकट कर दें। जगदीश्वर! आप सम्पूर्ण देहधारियोंके अन्तरात्मा हैं। आप ही सब कुछ हैं। आपमें ही यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है तथापि कितने आश्चर्यकी बात है कि प्रकृतिसे प्रभावित होने के कारण कोई कहीं भी आपकी सत्ता का अनुभव नहीं करते। वास्तव में आप बाहर और भीतर सब ओर विद्यमान हैं। सम्पूर्ण विश्वके रूप में आप ही सब ओर उपलब्ध हो रहे हैं।

ऋषियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर जगज्जननी दैवी वाक् (आकाशवाणी)- ने कहा- 'तुमलोग तपस्या, भक्ति और नियम के साथ दोनों की आराधना करो। जिसकी आराधना से पहले सिद्धि प्राप्त हो, वह भूत सबसे श्रेष्ठ कहा जाएगा।' 'बहुत अच्छा' कहकर सम्पूर्ण लोकमान्य महर्षि वहाँसे चल दिए। वे थक गये थे। उनका अन्त:करण खिन्न हो रहा था। उन्होंने उत्तम वैराग्यका आश्रय लिया और तपस्या करनेका दृढ संकल्प लेकर वे सब लोग त्रिभुवन को पवित्र करनेवाली जगज्जननी गौतमीके तटपर आये और जलदेवता तथा अग्निदेवताकी पृथक्-पृथक् पूजा करनेको उद्यत हुए। जो अग्नि के पूजक थे, वे जलके पूजन में प्रवृत्त हुए। उस समय वहाँ वेदमाता दैवी वाणी सरस्वती ने फिर कहा- 'जलसे ही शुद्धि होती है। जो अग्निके पूजक हैं, वे विचार तो करें- बिना जलका पूजन कैसा। जल होनेपर ही मनुष्य सब कर्मों के अनुष्ठान का अधिकारी होता है। वेदवेत्ता पुरुष जबतक शीतल जलमें श्रद्धापूर्वक स्नान नहीं कर लेता, तबतक अपवित्र, मलिन एवं शुभ कर्म का अनधिकारी रहता है। इसलिये जल सबसे श्रेष्ठ है। उसे माता की पदवी दी गयी है। अत: जल ही श्रेष्ठ है।'

वेदवादी ऋषियोंने यह आकाशवाणी सुनी। इससे उन्हें निश्चय हो गया कि जल ही श्रेष्ठ है। जिस तीर्थ में यह ऋषिसत्र सम्पन्न हुआ, उसे तपस्तीर्थ और सत्रतीर्थ भी कहते हैं। अग्नितीर्थ और सारस्वततीर्थ भी उसी के नाम हैं। वहाँ चौदह सौ पुण्यदायक तीर्थोंका निवास है। उनमें किया हुआ स्नान और दान स्वर्ग एवं मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है। जहाँ आकशवाणीने ऋषियों का संदेह निवारण किया था, वहाँ सरस्वती नाम की नदी प्रकट हुई, जो गङ्गामें मिली है। सरस्वती और गङ्गाके संगमका माहात्म्य बतलाने में कौन मनुष्य समर्थ हो सकता है।

गौतमी-तटपर इन्द्रतीर्थ के नाम से जो प्रसिद्ध तीर्थ है, वही वृषाकपितीर्थ भी है। उसे ही फेना-संगम, हनुमत्तीर्थ तथा अब्जकतीर्थ भी कहते हैं। वहाँ भगवान् त्रिविक्रमका निवास है। उस तीर्थ में स्नान और दान करने से संसार में लौटना नहीं पड़ता। अब वहाँ का वृत्तान्त बतलाते हैं। गङ्गाके दक्षिण और उत्तम-तटपर इन्द्रेश्वरतीर्थ है। पूर्वकाल में नमुचि नामक दैत्य देवराज इन्द्रका प्रबल शत्रु था। वह मदसे उन्मत्त रहता था। एक बार इन्द्रके साथ उसका युद्ध हुआ। इन्द्रने फेनसे उसका मस्तक काट डाला। वह वज्ररूपधारी फेन शत्रुका मस्तक काटने के पश्चात् गङ्गा के दक्षिण-तटपर गिरा और पृथ्वीको छेदकर रसातलमें समा गया। रसातल में जो गङ्गाजी का जल है, वह सम्पूर्ण विश्वको पवित्र करनेवाला है। वज्रने पृथ्वी को छेदकर जो मार्ग बना दिया था, उसी मार्गसे वह पातालगङ्गा का जल पृथ्वी के ऊपर निकल आया। उसी को फेना नदी कहते हैं। गङ्गाजी के साथ जो उसका पवित्र संगम हुआ है, वह सम्पूर्ण विश्व में विख्यात है। गङ्गा-यमुना के संगम की भाँति वह भी समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान करनेमात्रसे हनुमान् जी की उपमाता, जिनका मुख बिलावका-सा हो गया था, उस संकटसे मुक्त हुई थीं। उस तीर्थ को मार्जारतीर्थ और हनुमत्तीर्थ भी कहते हैं। उसका उपाख्यान पहले कहा जा चुका है। अब वृषाकपि और अब्जकतीर्थकी कथा सुनो। हिरण्य नाम से विख्यात एक दैत्योंका पूर्वज था, वह तपस्या करके सम्पूर्ण देवताओंसे अजेय हो गया था। हिरण्य बड़ा भयंकर दैत्य था। उसका बलवान् पुत्र महाशनि के नाम से विख्यात था। वह भी देवताओंके लिए सदा दुर्जय था। उसकी स्त्रीका नाम पराजिता था। एक बार महापराक्रमी महाशनि ने युद्धके मुहानेपर ऐरावतसहित इन्द्र को परास्त किया और उन्हें ले जाकर अपने पिता को सौंप दिया। इन्द्र पर विजय पाने के बाद महाशनि ने वरुणको जीतने के लिए उनपर आक्रमण किया; किन्तु वरुण बड़े बुद्धिमान् थे, उन्होंने महाशनिको पानी कन्या ब्याह दी। इधर तीनों लोक बिना इन्द्रके हो गये। तब सब देवताओं ने मिलकर सलाह की कि 'भगवान् विष्णु ही पुन: इन्द्रको दे सकते हैं; क्योंकि वे ही दैत्योंके हन्ता हैं। मन्त्रद्रष्टा भी वे ही हैं। अत: वे दूसरे को भी इन्द्र बना देंगे।'

ऐसा निश्चय करके सब देवता भगवान् विष्णुके पास गये और उन्हें सब हाल कह सुनाया। भगवान् विष्णुने कहा- 'महादैत्य महाशनि मेरे लिए अवध्य है।' यों कहकर वे महाशनिके श्वशुर वरुणके पास गये और उन्हें इन्द्र के पराभवका समाचार बतलाते हुए बोले- तुम्हें ऐसा यत्न करना चाहिये, जिससे इन्द्र पुन: अपने पदपर लौट आयें।' भगवान् विष्णु के आदेश से वरुण शीघ्र ही वहाँ गये। दैत्य ने विनयपूर्वक अपने श्वशुर से वहाँ पधारनेका कारण पूछा। वरुणने कहा- 'महाबाहो! कुछ दिन पहले तुमने इन्द्रको परास्त करके रसातल में बंदी बना लिया है। वे देवताओं के राजा हैं। उन्हें लौटा दो। यदि शत्रुको बाँधकर फिर छोड़ दिया जाय तो वह सत्पुरुषों के लिए महान् कारण होता है।' 'बहुत अच्छा' कहकर दैत्यराज महाशनि ने ऐरावतसहित इन्द्रको लौटा दिया और उनसे यह बात कही- इन्द्र! आज से तुम शिष्य हुए और मेरे श्वशुर वरुणजी तुम्हारे गुरु हुए; क्योंकि इन्होंने तुम्हें मुक्ति दिलायी है। अब तुम वरुण के प्रति स्वामिभाव रखकर स्वयं भृत्यका-सा बर्ताव करना, नहीं तो फिर तुम्हें बाँधकर रसातलके कारागृहमें डाल दूँगा।'

इस प्रकार इन्द्रको फटकारकर उसने बारंबार हँसते हुए कहा- ;जाओ, जाओ; वरुणजी का सदा आदर करना।; इन्द्र अपने घर आये। वे अपमानपूर्ण लज्जा से काले पड़ गये थे। उन्होंने शत्रुद्वारा तिरस्कृत होनेकी सारी बातें इन्द्राणीको कह सुनायीं और पूछा- 'सुमुखि! शत्रुने मुझसे इस तरह कठोर बातें कहीं और मेरे साथ ऐसा अनुचित बर्ताव किया। इससे मेरे हृदय में आग लग रही है। तुम्हीं बताओ- कैसे अपने हृदयको शीतल करूँ?'

इन्द्राणी ने कहा - बलसूदन! में दानवोंकी उत्पत्ति, पराजय, माया, वरदान तथा मृत्यु- सब जनती हूँ। महाशनि को तपस्यासे ही यह दहकती प्राप्त हुई है। तपस्यासे कुछ भी असाध्य नहीं है। यज्ञ-कर्म से कोई बता असम्भव नहीं है। जगन्नाथ भगवान् विष्णु तथा विश्वनाथ शिवकी भक्तिसे कोई भी कार्य ऐसा नहीं है, जो सिद्ध न हो सके।१ प्राणनाथ! मैंने और भी एक बहुत सुन्दर बात सुन रखी है। कारण कि स्त्रियाँ ही स्त्रियोंके स्वाभाव को जानती हैं। प्रभो! भूमि तथा जल की अधिष्ठात्री देवियोंके द्वारा कोई भी कार्य असाध्य नहीं हैं। तपस्या अथवा यज्ञ आदि उन्हीं दोनों के सहयोग से होते हैं। उसमें भी जो तीर्थ भूमि हो, वहीं आप चलें। उस स्थान पर भगवान् विष्णु तथा शिव की पूजा करके सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ प्राप्त कर लेंगे। मैंने यह भी सुना है कि जो स्त्रियाँ पतिव्रता हैं, वे ही सब कुछ जानती हैं। उन्होंने ही चराचर जगत्को धारण कर रखा है।२ पृथ्वीपर सबसे सारभूत स्थान है दण्डकवन। वहाँ जगज्जननी गङ्गा बहती हैं। वहीँ चलकर दीन-दु:खियोंकी पीड़ा दूर करनेवाले जगदीश्वर श्रीविष्णु अथवा शिवकी आराधना करें। दु:ख के समुद्र में डूबनेवाले अनाथ मनुष्योंको श्रीशिव तथा श्री विष्णु अथवा गङ्गाके सिवा दूसरा कोई भी शरण देनेवाला नहीं हैं। अत: एकाग्रचित होकर पूर्ण प्रयत्न करके आप इनको संतुष्ट करें। मेरे साथ रहकर भक्ति, स्तोत्र तथा तपस्याके द्वारा इनकी आराधना करें। तत्पश्चात् भगवान् शिव और विष्णु के प्रसाद से आप कल्याण के भागी होंगे। बिना जाने किया हुआ कर्म कर्मनिष्ठ पुरुषको एकगुना फल देता है। उसके विधि-विधान और तत्वको अच्छी प्रकार जानकार करनेसे सौ-गिना फल मिलता है और पत्नीके साथ उसका अनुष्ठान करनेसे वही कर्म अनन्त फल देनेवाला होता है*। गृहस्थ पुरुष के सब कार्यों में यहाँ पत्नी ही सहायता करनेवाली है। उसके सहयोग बिना छोटे-से-छोटे कार्य भी सिद्ध नहीं होते। नाथ! पुरुष अकेले जो कर्म करता है, उसका आधा फल ही उसे मिलता है। किन्तु पत्नी के साथ जो कर्म किया जाता हिया, उसका पूरा फल पुरुष को प्राप्त होता हिया। सुना जाता है- दण्डकारण्य में सरिताओंमें श्रेष्ठ गौतमी गङ्गा बहती हैं। वे समस्त पापों का नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको देनेवाली हैं। अत: मेरे साथ वहाँ चलिए और महान् फलदायक पुण्यकर्म का अनुष्ठान कीजिये। इससे आप संग्राममें अपने शत्रुओंका संहार करके महान् सुख के भागी होंगे।

'अच्छा, ऐसा ही करूँगा।' यों कहकर अपने गुरु बृहस्पति और पत्नी शचीको साथले इन्द्र जगज्जनणी गौतमीके तटपर गये। दण्डकारण्य के भीतर उनकी पावन धाराका दर्शन करके इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने देवाधिदेव शिवकी प्रसन्नता लिये तपस्या करनेका विचार किया। पहले गङ्गामें स्नान करके उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा एकमात्र भगवान् शिवके शरण होकर उनका स्तवन आरम्भ किया।

इन्द्र बोले - जो अपनी माया से सम्पूर्ण चराचर जगत् की सृष्टि, रक्षा और संहार करते हैं, किन्तु उसमें आसक्त नहीं होते, जो एक, स्वतंत्र तथा अद्वैत चिदानन्दस्वरुप हैं, वे पिनाकधारी भगवान् शंकर हमपर प्रसन्न हों। वेदान्तके रहस्योंको भलीभाँति जाननेवाले सनकादि मुनि भी जिनके तत्त्वको ठीक-ठीक नहीं जानते, वे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंके दाता अन्धकासुरविनाशक पार्वतीपति भगवान् शिव हमपर प्रसन्न हों।जब पाप, दरिद्रता, लोभ, याचना, मोह और विपत्ति आदि अनन्त सांसारिक दु:ख प्रकट हुए, उनका प्रभाव फैलने लगा और उनसे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया, तब यह सब अवस्था देखकर देवेश्वर महादेवजी बड़े चकित हुए और देवी पार्वतीसे बोले- 'लोकेश्वरि! यह सम्पूर्ण जगत् नष्ट होना चाहता है। तुम इसकी रक्षा करो। लोकमाता उमा! तुम सबको शरण देनेवाली, उत्तम ऐश्वर्यसे युक्त, परम कल्याणमयी तथा सम्पूर्ण जगत् की प्रतिष्ठा हो। वरदायिनि! तुम्हारी जय हो। तुम भोग, समाधि, परम मुक्ति, स्वाहा, स्वधा, स्वस्ति, अनादि सिद्धि, वाणी, बुद्धि तथा अजर-अमर हो। मेरी आज्ञा के अनुसार तीनों लोकों में विद्या आदि रूप से तुम रक्षा करती हो। तुमने ही प्रकृतिरूप से इस विचित्र त्रिलोकीकी सृष्टि की है।' शंकर जी के यों कहनेपर उनकी प्राणवल्लभा भगवती उमा उनका आलिङ्ग करके प्रेमालाप करने लगीं और थककर भगवान् के आधे शरीर में लग गयीं तथा अपने हाथ की अंगुलियोंसे पसीनेका जल पोंछकर फेंका। उस जलसे पहले धर्म का प्रादुर्भाव हुआ। उसके बाद लक्ष्मी प्रकट हुईं। फिर दान, उत्तम वृष्टि, सत्त्व, सरोवर, धान्य, पुष्प, फल, शस्त्र, शास्त्र, गृहोपयोगी अस्त्र, तीर्थ, वन तथा चराचर जगत्का आविर्भाव हुआ। देवि! यह सब पापरहित सृष्टि थी। भगवती उमा! तुम्हारे प्रभाव से संसार में प्रचुर सुखकी वृद्धि हुई। सदा सब ओर मङ्गलमय कृत्य शोभा पाने लगे। जगदम्ब! तुम सम्पूर्ण जगत् की स्वामिनी हो और हम भयसे डरे हुए हैं। अत: तुम हमारी रक्षा करो। कोई तर्क करते-करते मोहित हो जाते हैं और कोई उसी में लीन रहते हैं। परन्तु हम तो शिव और शक्तिके सुन्दर अद्वैत रूप को सर्वदा नमस्कार करते हैं।

इस प्रकार स्तुति करनेवाले इन्द्रके समक्ष भगवान् शंकर प्रकट हुए और बोले- 'देवराज! तुम क्या छाते हो? अपना अभीष्ट मनोरथ कहो।' इन्द्रने कहा- 'भगवन्! मेरा बलवान् शत्रु महाशनि, जो देखनेमें वज्रके समान भयंकर है, मुझे बाँधकर रसातल ले गया था। वहाँ उसने अनेक बार मेरा तिरस्कार किया और वचनरुपी बाणोंसे बींधता रहा। मेरा यह प्रयत्न उसीका वध करनेके लिए है। आप मुझे वह शक्ति प्रदान कीजिये, जिससे शत्रुका नाश कर सकूँ। जिसने मेरा अपमान किया है, उसका नाश करनेपर ही मैं अपना नया जन्म मानूँगा। विजय और लक्ष्मीकी अपेक्षा कीर्ति ही श्रेष्ठ है।' यह सुनकर शिव ने इन्द्रसे कहा- 'अकेले मेरे द्वारा तुम्हारे शत्रुका वध नहीं हो सकता अत: तुम अविनाशी भगवान् जनार्दनकी भी आराधना करो। शची भी ऐसा ही करें। भगवान् नारायण तीनों लोकों के एकमात्र आश्रय हैं। उनकी अनन्य चित्त से उपासना करो।'

भगवान् शिवकी आज्ञासे इन्द्र गङ्गाजी के दक्षिण-तटपर मुनीश्वर आपस्तम्बके पास गये और उनको साथ लेकर फेना तथा गङ्गाके पवित्र संगमपर भाँति-भाँति के वैदिक मन्त्रों एवं तपस्या के द्वारा भगवान् जनार्दनकी स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति से भगवान् विष्णुको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे प्रत्यक्ष प्रकट होकर बोले- 'इन्द्र! तुम्हें क्या वरदान दूँ?' वे बोले- 'मुझे एक ऐसा वीर दीजिए, जो मेरे शत्रुका वध कर सके।' भगवान् ने कहा- 'दे दिया।' फिर तो शिव, गङ्गा तथा विष्णुके प्रसादसे जल के भीतरसे एक पुरुष प्रकट हुआ। उसने भगवान् शिव और विष्णु दोनों के स्वरुप धारण किये थे। उसके हाथ में चक्र भी था और त्रिशूल भी। उसने रसातल में जाकर इन्द्रशत्रु महाशनिका वध किया। उसका नाम अब्जक और वृषाकपि हुआ। वह इन्द्रका सखा बन गया। इन्द्र स्वर्ग में रहते हुए भी प्रतिदिन वृषाकपिके पास आते थे। उन्हें अन्यत्र आसक्त देख शचीके हृदय में प्रणयकोपका उदय हुआ।

तब इन्द्रने हँसकर उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- 'प्रिये! मैं अपने शरीर की शपथ खाकर कहता हूँ- मित्रवर वृषाकपिके सिवा और किसीके घर नहीं जाता। अत: तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये। तुम पतिव्रता और मेरी प्रियतमा हो। धर्म करने तथा उचित सलाह देने में मेरी सदा सहायता करती हो। साथ ही संतान'वती और कुलीन भी हो। फिर तुम्हारे सिवा दूसरी कौन स्त्री मेरी प्रियतमा हो सकती है।तुम्हारे ही उपदेश से मैं महानदी गौतमी गङ्गाके तटपर गया और वहाँ भगवान् विष्णु, शिव तथा मित्र वृषाकपि के प्रसाद से दु:खसागर के पार हुआ और अब यहाँ राज्य से च्युत न होनेवाला इन्द्र हूँ। यह सब तुम्हारे सहयोगका फल है। जहाँ स्वामीके चित्तका अनुसरण करनेवाली पतिव्रता स्त्री हो, वहाँ कौन-सा कार्य असाध्य है। वहाँ तो मोक्ष भी दुर्लभ नहीं हियाफिर अर्थ, काम आदि की तो बात ही क्या है। पत्नी भी परम मित्र है। वह लोक और परलोक दोनों में हितकारिणी होती है। पत्नी भी यदि कुलीन, प्रिय बोलनेवाली, पतिव्रता, रूपवती, गुणवती तथा सम्पत्ति और विपत्ति में समान रूप से साथ देनेवाली हो तो उसके द्वारा इस त्रिलोकी में कुछ भी असाध्य नहीं है। प्रिये! तुम्हारी बुद्धि से ही मुझे यह मङ्गलमय अवसर प्राप्त हुआ है। अब तो तुम जो कहो, वही मुझे करना है; और कुछ नहीं। परलोक और धर्म के लिये उत्तम पुत्र के समान कोई सहायक नहीं है। संकट में पड़े हुए पुरुष के लिए स्त्री के समान दूसरी कोई ओषधि नहीं है। नि:श्रेयस-पदकी प्राप्ति तथा पाप से मुक्ति करने के लिए गङ्गाके समान कोई नदी नहीं है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि तथा पाप से छुटकारा पाने के लिए श्रीशिव और श्री विष्णु के एकत्व-ज्ञानसे बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। पतिव्रते! तुम्हारी बिद्धिसे तथा श्रीशिव, श्रीविष्णु और गङ्गाके प्रसाद से मुझे यह सब अभीष्ट वस्तु प्राप्त हुई है। मैं समझता हूँ मेरे मित्र के बल से अब यह इन्द्रपद स्थिर रहेगा। तीर्थोंमें गौतमी गङ्गा और देवताओं में भगवान् विष्णु और शिव श्रेष्ठ हैं। इन्हीं की कृपा से मुझे सब मनोवाञ्छित वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। यह त्रिलोक विख्यात तीर्थ मेरी प्रसन्नता को बढ़ानेवाला है। अत: मैं क्रमशः सम्पूर्ण देवताओंसे यह प्रार्थना करता हूँ; महर्षिगण, गङ्गा, विष्णु तथा शिव भी मेरी प्रार्थनाका अनुमोदन करें। देवताओ! गङ्गाके दोनों तटोंपर एक ओर इन्द्रेश्वरतीर्थ है और दूसरी ओर अब्जकतीर्थ। इन्द्रेश्वरमें भगवान् शिव रहते हैं और अब्जकमें साक्षात् भगवान् विष्णु। वे अपनी उपस्थिति से दण्डकवनको पवित्र करते हैं। इनके बीच में जो-जो तीर्थ हैं, वे सब पुण्यदायक हैं। उनमें स्नान क्र्नेमात्र से सबकी मुक्ति होती है। पापी पाप से मुक्त होते हैं और धर्मात्मा पुरुष अपनी पाँच-पाँच पीढ़ीके पितरोंसहित परममोक्षके भागी होते हैं। यहाँ आकर जो लोग याचकों को तिलभर भी दान करते हैं, वह दान दाताओंके लिए अक्षय होता हिया तथा मनोवाञ्छित भोग और मोक्ष प्रदान करता है। यहाँ भगवान् श्रीविष्णु और शिव के उपाख्यान को जानकार स्नान करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है। यह उपाख्यान धन, यश, आयु, आरोग्य और पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है। जो लोग इस तीर्थ के महात्म्यको सुनते और पढ़ते हैं, वे पुण्यके भागी होते हैं। उन्हें यहीं- इसी जीवन में भगवान् विष्णु और शिव की स्मृति प्राप्त होती है, जो समस्त पापराशिका संहार करनेवाली है तथा जिसके लिये जितेन्द्रिय एवं मनोजयी मुनि भी प्रार्थना करते रहते हैं।

इन्द्रके इस कथन का अनुमोदन करते हुए देवताओं और ऋषियों ने कहा- 'ऐसा ही होगा।'

१ - नासाध्यमस्ति तपसो नासाध्यं यज्ञकर्मण:। नासाध्यं लोकनाथस्य विष्णोर्भक्त्या हरस्य च ॥

(१२९।५०)

२ - श्रुतमस्ति पुनश्चेदं स्त्रियो याश्च पतिव्रता:। ता एव सर्वं जानन्ति धृतं ताभिश्चराचरम् ॥

(१२९।५४)

*अज्ञात्वैकगुणं कर्म फलं दास्यति कर्मिण:। ज्ञात्वा शतगुणं तत्स्याद् भार्यया च तदक्षयम् ॥

(१२९।५९)