ब्रह्म पुराण

31 - पुरुषोत्तमक्षेत्रमें भगवान् नृसिंह तथा श्वेतमाधवका महात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं - इस प्रकार बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्राको प्रणाम करके भगवान् के मन्दिरसे बाहर निकले। तत्पश्चात् जगन्नाथजी के मंदिर को प्रणाम करके एकाग्रचित्त हो उस स्थानपर जाय, जहाँ भगवान् विष्णुकी इन्द्रनीलमयी प्रतिमा बालूके बितर छिपी हिया। वहाँ अदृश्यरूपसे स्थित भगवान्को प्रणाम करके मनुष्य श्रीविष्णुके धाम में जाता है। ब्राह्मणो! जो भगवान् सर्वदेवमय हैं, जिन्होंने आधा शरीर सिंहका बनाकर असुरराज हिरण्यकशिपुका वध किया था, वे भगवान् नृसिंह भी पुरुषोत्तमतीर्थ में निवास करते हैं। जो भक्तिपूर्वक उनका दर्शन प्रणाम करता है, वह समस्त पातकों से निश्चय ही मुक्त हो जाता है। जो मानव इस पृथ्वीपर भगवान् नृसिंहके भक्त होते हैं, उन्हें पाप कभी छू नहीं सकते और मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। अत: सब प्रकारसे प्रयत्न करके भगवान् नृसिंहकी शरण ले; क्योंकि वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप फल प्रदान करते हैं।

मुनियों ने कहा - इस पृथ्वीपर भगवान् नृसिंहका महात्म्य सुखदायक और दुर्लभ है। हम उनका प्रभाव विस्तारके साथ सुनना चाहते हैं। इसके लिए हमें बड़ी उत्कण्ठा है।

ब्रह्माजी बोले - ब्राह्मणो! मैं अजित, अप्रमेय तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् नृसिंहका प्रभाव बतलाता हूँ; सुनो। उनके समस्त गुणों का वर्णन कौन कर सकता है, अत: मैं भी संक्षेप से ही बतलाऊँगा। इस लोकमें जो कोई दैवी अथवा मानुषी सिद्धियाँ सुनी जाति हैं, वे सब भगवान् के प्रसाद से ही सिद्ध होती हैं। स्वर्ग,मर्त्यलोक, पाताल, दिशा, जल, गाँव तथा पर्वत- इन सब स्थानों में भगवान् के प्रसाद से मनुष्य की अबाद गति होती है। इस चराचर जगत् में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो भक्तवत्सल भगवान् नृसिंहके लिए असाध्य हो। मुनिवरो! सनातन कल्परा (पूजाकी सर्वश्रेष्ठ विधि) एवं नरसिंहका तत्त्व, जिसे देवता या असुर भी नहीं जानते, तुम्हें बताता हूँ; सुनो। उत्तम साधकको चाहिये कि साग, जौकी लपसी, मूल, फल, खली अथवा सत्तूसे भोजन की आवश्यकता पूर्ण करे अथवा दूध पीकर रहे। इन्द्रियोंको काबू में रखकर धर्मपरायण रहे। वन, एकांत प्रदेश, पर्वत, नदी-संगम, ऊसर, सिद्धक्षेत्र अथवा नृसिंहके मन्दिरोंमें जाकर या स्वयं स्थापना करके भगवान् की विधिपूर्वक पूजा करे। शुक्ल पक्षकी द्वादशीको उपवास करके जितेन्द्रियभाव से बीस लाख भगवन्नामका जप करे। ऐसा करनेवाला साधक उपपातक और महापातकों से युक्तहोनेपर भी मुक्त हो जाता है। पहले भगवान् नृसिंहकी प्रदक्षिणा करके चन्दन और धूप आदि के द्वारा उनकी पूजा करे। मस्तक झुकाकर प्रभुको प्रणाम करे तथा उनके माथे पर कपूर और चन्दन मिले हुए चमेलीके फूल चढ़ावे। इससे सिद्धि प्राप्त होती है। किसी भी कार्य में भगवान् कीगति कुण्ठित नहीं होती। ब्रह्मा, रूद्र आदि देवता भी उनके तेजको नहीं सह सकते। फिर ससार में सिद्ध, गन्धर्व, मानव, दानव, विद्याधर, यक्ष, किंनर और महानागोंकी तो बात ही क्या है। अन्य साधक जिन असुरोंका अनश करनेके लिये मन्त्र-जप करते हैं, वे सब नृसिंहभक्तोंको सूर्यके समान तेजस्वी देखकरतत्क्षण नष्ट हो जाते हैं। महाबली भगवान् नरसिंह सदा अपने भक्तोंकी रक्षा करते हैं। अत: मुनीश्वरो! समस्त अभिलषित फलोंके दाता महापराक्रमी भगवान् नरसिंह की सदा भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र और अन्त्यज भी सुरश्रेष्ठ नृसिंह का भक्तिपूर्वक पूजन करके कोटिजन्मोंके पापओरदु:खोंसे मुक्त हो जाते हैं। मनोवाञ्छित फल पाते हैं। देव, गन्धर्व एवं इन्द्रका पद भी प्राप्त कर लेते हैं। एक बार भी भगवान् नरसिंह का भक्तिपूर्वक दर्शन करनेसे करोड़ों जन्मोंके पापों और दु:खों से छुटकारा मिल जाता है। संग्राम, संकट, दुर्गमस्थान, छोर-व्याघ्र आदिकी पीड़ा, प्राणसंशय, विष, अग्नि, जल, राजभय, समुद्र्भय तथा ग्रह-रोग आदिजनित कष्ट प्राप्त होनेपर जो पुरुष भगवान् नरसिंहका स्मरण करता है, वह सब प्रकारकी आपत्तियों से छुटकारा पा जाता है। जैसे सूर्योदय होनेपर महान् अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार भगवान् नरसिंहकादर्शन होनेपर सभी उपद्रव नष्ट हो जाते हैं।

अनन्त नामक वासुदेवका भक्तिपूर्वक दर्शन और उन्हें वन्दन करनेपर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो परम पदको प्राप्त होता है। मैंने, इन्द्रन तथा विभीषणने भी उनकी आराधना की है। फिर कौन मनुष्य उनकी आराधना न करेगा। जो मनुष्य श्वेतगङ्ग्में स्नान करके श्वेतमाधव तथा मत्स्यमाधवका दर्शन करता है, वह श्वेतद्वीपमें जाता है।

मुनियों ने कहा - भगवन्! आप श्वेतमाधवके महात्म्यका पूर्णरूप से वर्णन कीजिये। साथ ही भगवान् की प्रतिमाका वृत्तान्त भी विस्तार के साथ बतलाइये। भूतलमें विख्यात भगवान् के पवित्र क्षेत्रमें श्वेतमाधवकी स्थापना किसने की थी?

ब्रह्माजी बोले - सत्ययुगमें श्वेत नाम के एक बलवान् राजा थे। वे बड़े बुद्धिमान्, धर्मज्ञ, शूरवीर, सत्यप्रतिज्ञ और दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले थे। उनके राज्य में दस हजार वर्षोंतक मनुष्योंकी आयु होती थी और किसी बालककी मृत्यु नहीं होती थी। इस प्रकार राजा श्वेतके राज्य में कुछ काल व्यतीतहोने के पश्चात् एक घटना घटित हुई। कपालगौतम नामक एक ओअरम धर्मात्मा ऋषि थे। उनके एक पुत्र हुआ, जो कालवश दाँत निकलनेके पहले ही चल बसा। उसे गोद में लेकर बुद्धिमान् ऋषि राजा के निकट आये। राजा ने ऋषिकुमार को अचेतअवस्था में सोया देख उसको जीवित करने के लिये प्रतिज्ञा की।

राजा बोले - यदि यमलोकमें गये हुए इस बालकको मैं सात दिनके भीतर न ला सकूँ तो जलती हुई चितापर चढ़ जाउँगा।

यों कहकर राजाने लाख नीलकमलों से महादेवजीकी पूजा करके उनके मन्त्रका जप आरम्भ किया। जगदीश्वर भगवान् शिव राजा की अत्यन्त भक्तिका विचार करके पार्वतीजी के साथ उनके सामने प्रकट हुए और बोले- 'राजन्! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ।' महादेवजीका यह वचन सुनकर राजा श्वेतने सहसा उनकी ओर देखा। वे सब अङ्गों में भस्म रमाये हुए थे। उनके शरीर की कान्ति शरत्कालीन चद्रमा और कुन्दके समान थी। उनके नेत्र विकट थे। व्याघ्रचर्मका वस्त्र और ललाटमें चन्द्रमाकी रेखा थी। उनपर दृष्टि पड़ते ही राजा ने सहसा पृथ्वी पर गिरकर उन्हें प्रणाम किया और कहा- 'प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, यदि आपकी मुझपर दया है तो कालके वशमें पड़ा हुआ यह ब्राह्मण-बालक पुन:जीवित हो जाय। यही मेरी प्रतिज्ञा है। महेश्वर! आप इसे यथायोग्य आयुसे युक्त और कल्याणका भागी बनायें।'

श्वेतकी यह बात सुनकर महादेवजीको बड़ीप्रसन्नता हुई। उन्होंने सब भूतोंको भय देनेवाले कालको आज्ञा दी और कालने मृत्युके मुखमें पड़े हुए उस बालकको जीवित कर दिया। इसके बाद वे पार्वतीदेवीके साथ अन्तर्धान हो गये।

तदनन्तर राजा ने हजारों वर्षों तक एकाग्रचित होकर राज्य किया। फिर लौकिक धर्मों और वैदिक नियमोंका विचार करके भगवान् केशाव्की आराधनाका निश्चित व्रत ग्रहण किया। इसके बाद वे' दक्षिणसमुद्रके पुरुषोत्तमक्षेत्रमें गये और जगन्नाथजी के पास ही सुन्दर रमणीय प्रदेश में एक सुंदर मन्दिर बनवाया और श्वेतशिला के द्वारा भगवान् श्वेतमाधवकी प्रतिमा बनवाकर विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा की। उस समय ब्राह्मणों, दीनों, अनाथों और तपस्वियोंको दान दे राजा ने भगवान् माधवके समीप पृथ्वीपर गिरकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया। फिर एक मासतक मौन एवं निराहार रहकर द्वादशाक्षर-मन्त्रका जप किया। जप समाप्त होनेपर भगवान् देवेश्वरकी इस प्रकार स्तुति आरम्भ की।

श्वेत बोले - ॐ वासुदेव को नमस्कार है। सबको अपनी ओर खींचनेवाले संकर्षणको नमस्कार है। अत्यन्त द्युतिमान् प्रद्युम्न,कभी रुद्ध न होनेवाले अनिरुध्द तथा नारायणको नमस्कार है। जिनके अनेक रूप है, जो विश्वरूप, विधाता, निर्गुण, अतर्क्य, शुद्ध एवं उज्जवल कर्मवाले हैं, उनको नमस्कार है। जिनकी नाभि में कमल है, जो पद्मगर्भ ब्रह्माजी की उत्पत्ति के कारण हैं, उनको नमस्कार है।जिनका वर्ण कमल के समान है, जो हाथ में भी कमल लिये रहते हैं, उको नमस्कार है। जिनके नेत्र कमल के समान हैं, जो सहस्त्रों नेत्रोंसे युक्त और शिवस्वरूप हैं, उन्हें नस्कार हैं। जिनके सहस्त्रों पैर और सहस्त्रों भुजाएँ हैं, उन मन्युरूप परमेश्वरको नमस्कार है। ॐ वराहरूपधारी भगवान् को नमस्कार है। जो वर देनेवाले, उत्तम बुद्धिसे युक्त, वरिष्ठ, वरेण्य, शरणागतरक्षक और अपनी महिमसे कभी च्युतन होनेवालेहैं, उन भगवान् को प्रणाम है। ॐ बालरूप धारी, बाल-कमलके समान कान्तिमान्, बालसूर्य और चन्द्रमारूप नेत्रोंवाले, मनोहर केशों से सुशोभित, बुद्धिमान् भगवान् विष्णुको प्रणाम है। केशवको नमस्कार है, नारायणको नित्य नमस्कार है। सर्वश्रेष्ठ माधव एवं गोविन्दको नमकार है। ॐ विष्णुको नमस्कार है। हिरण्यरेता अग्निदेव को नित्य नमस्कार है। मधुसूदनको प्रणाम है। शुद्ध स्वरुप एवं किरणों को धारण करनेवाले भगवान् को नमस्कार है। अनन्तको नमस्कार है। सूक्ष्मस्वरुप एवं श्रीवत्सधारीको प्रणाम है। तीन बड़े-बड़े डगोंवाले तथा दिव्य पीताम्बर धारण करनेवाले वामनको नमस्कार है। भगवन्! आप सृष्टिकरता हैं। आपको नमस्कार है। आप ही सबके धारण-पोषण करनेवाले हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। गुणस्वरुप एवं निर्गुणको नमस्कार है। वामनरूप भगवान् को नमस्कार है। वामनकर्ता श्रीहरिको प्रणाम है। वामननेत्र प्रभुको नमस्कार है और वामनवाहन माधवको प्रणाम है। रमणीय,पूज्य तथा अव्यक्तस्वरुप भगवान् को नमस्कार है। अतर्क्य, शुद्ध एवं भयहारी हरिको प्रणाम है। जो संसाररुपी समुद्र से तारनेके लिये नौकाके समान हैं, जो परम शान्त एवं चैतन्यस्वरुप हैं, शिव, सौम्यरूप, रूद्र तथा उद्धारकरता हैं, उन भगवान् को नमस्कार है। जो संसारका संहार करनेवाले और उसे भोग प्रदान करनेवाले हैं, समस्त विश्व जिनका स्वरुप है और जो समस्त विश्व की स्रष्टि करनेवाले हैं, उन भगवान् को नमस्कार है। ॐ दिव्यरूप सोम, अग्नि और वायुस्वरूप भगवान् को नमस्कार है। चन्द्रमा और सूर्यकी किरणें जिनके केश हैं, जो गौओं तथा ब्राह्मणों का हित करनेवाले हैं, उन भगवान् को प्रणाम है। ॐ ऋक्स्वरूप पद और क्रमरूप भगवान् को प्रणाम है। ऋग्वेदके मन्त्रोंद्वारा जिनकी स्तुति होती है, ऋचाओंका जप जिनकी प्राप्तिका साधन है, उन भगवान् को नमस्कार है। ॐ यजुर्वेदको धारण करनेवाले और यजुर्वेदरूपधारी भगवान् को प्रणाम है। जिनका यजुर्वेदके मन्त्रोंसे यजन किया जाता है, जो सबसे सेवित और यजुर्वेदके मंत्रोंके अधिपति हैं, उन परमात्मा को नमस्कार है। ॐ देव श्रीपते! आपको नमस्कार है। सर्श्रेष्ठ श्रीधरको प्रणाम है। जो लक्ष्मीके प्रियतम, मन और इन्द्रियोंको संयम में रखनेवाले, योगियोंके ध्येय और योगी हैं, उन भगवान् को प्रणाम है। ॐ सामस्वरूप परमात्माको नमस्कार है। जो श्रेष्ठ सामध्वनि हैं, साम (शान्तभाव)- के कारण जो सौम्य प्रतीत होते हैं तथा जो सामयोग के ज्ञाता हैं, उन भगवान् को प्रणाम है। जो साक्षात् सामवेद, सामगान और सामवेद को दारण क्र्नेआले हैं, जिन्हें सामवेदोंक्त यज्ञोंका ज्ञान है, जो सामवेद कोकरतलगत किये हुए हैं, उन भगवान् को नमस्कार है। जो अथर्वशीर्ष, अथर्वस्वरुप, अथर्वपाद और अथर्वकर हैं अर्थात् जिनका सिर आदि सब कुछ अथर्वमय है, उन परमेश्वरको प्रणाम है। ॐवज्रशीर्ष (वज्रके समान मस्तकवाले) प्रभु नमस्कार है। जो मधु और कैटभके घातक, महासागरके जलमें शयन करनेवाले और वेदोंका उद्धार करके लानेवाले हैं, उन भगवान् को प्रणाम है। जिनके स्वरूप अत्यन्त द्विप्तिमान् हैं, उन भगवान् को नमस्कार है।इन्द्रियों के नियन्ता हृशीषीकेशको प्रणाम है। प्रभो! आप भगवान् वासुदेवको बारंबार नमस्कार है। नारायण! आपको प्रणाम है। लोकहितकारि श्रीहरिको नमस्कार है। ॐ मोहनाशक तथा विश्वसंहारकारी प्रभुको प्रणाम है। जो उत्तम गतिके दाता और बन्धनका अपहरण करनेवाले हैं, त्रिलोकीमें तेजका आविर्भाव करनेवाले और तेज:स्वरुप हैं, उन भगवान् को नमस्कार है। जो योगियोंके ईश्वर, शुद्धस्वरूप, सबके भीतर रमण करनेवाले तथा जगत् को पार उतारनेवाले हैं, सुख ही जिनका स्वरुप है, जो सुखरूप नेत्रोंवाले तथा सुकृत धारण करनेवाले हैं, न भगवान् को प्रणाम है। वासुदेव, वन्दनीय और वामदेव को नमस्कार है। जो देहधारियोंके देहकी उत्पत्ति करनेवाले तथा भेददृष्टिको भङ्ग करनेवाले हैं, उन भगवान् को नमस्कार है। देवगण जिनके श्रीअङ्गकी वन्दना करते हैं, जो दिव्य मुकुट धारण करनेवाले हैं, उन श्रीविष्णुको प्रणाम है। जो निवासके भी निवास हैं तथा निवासस्थान को व्यवहार में लाते हैं, उन परमात्माको नमस्कार है। ॐ जो वसु (धन)- की उत्पत्ति करनेवाले और वसुको स्थान देनेवाले हैं, उन्हें प्रणाम है। यज्ञस्वरुप, यज्ञेश्वर एवं योगी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। आप संयमी पुरुषों को योग्की प्राप्ति करानेवाले ईश्वर हैं, आपको प्रणाम है। यज्ञरूप शरीर धारण करनेवाले भगवान् वराहको नमस्कार है। प्रलम्बासुरको मारनेवाले भगवान् संकर्षणको प्रणाम है।जिनकी वाणी मेघके समान गम्भीर है, जो प्रचण्ड वेगयुक्त हल धारण करते हैं, उन बलरामको नमस्कार है। सबको शरण देनेवाले नारायण! आप ही ज्ञानियोंके ज्ञान हैं। आपको नमस्कार है। प्रभो! आपके सिवा नरकसे उद्धार करनेवाला मेरा कोई बन्धु नहीं है। शरणागतवत्सल! मैं सम्पूर्ण भाव से आपके चरणों में पड़ा हूँ। केशव! अच्युत! मेरा जो शारीरिक और मानसिक मल है, उसे धोनेवाला आके सिवा दूसरा कोई नहीं है। भगवन्! मैंने समस्त सङ्ग त्यागकर आपकी शरण ली है। केशव! अब आपके ही साथ मेरा सङ्ग हो। इससे मुझे आत्मलाभ होगा। मुझे यह संसार कष्ट एवं आपत्तियोंका घर तथा दुस्तर जान पड़ता है। मैं आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंसे खिन्न हूँ। इसलिये आपकी शरण में आया हूँ। आपकी माया से यह समस्त जगत् नाना प्रकार की कामनाओंद्वारा मोहित हो रहा है। इसमें लोभ आदिका पूरा आकर्षण है। अत: मैंने आपकी शरण ली है। विष्णो! संसारी जीवको तनिक भी सुख नहीं है। यज्ञेश्वर! मनुष्यका मन जैसे-जैसे आपमें लगता जाता है, वैसे-वैसे निष्काम होकर वह परमानन्दको प्राप्त होता रहता है। में विवेकशून्य होकर नष्ट हो गया हूँ। सारा जगत् मुझे दु:खी दिखायी देता है। गोविन्द! मेरी रक्षा कीजिये। आप ही संसार से मेरा उद्धार कर सकते हैं। यह संसार-समुद्र मोहरूपी जलसे परिपूर्ण है। इसके पार जाना असंभव है। में इसमें गलेतक डूबा हुआ हूँ। पुण्डरीकाक्ष! आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो इससे मेरा उद्धार कर सके।

उस विख्यात दिव्य पुरुषोत्तमक्षेत्रमें राजा श्वेतके इस प्रकार स्तुति करनेपर देवाधिदेव जगद्गुरु श्रीहरि उनकी भक्तिका विचार करके सम्पूर्ण देवताओंके साथ राजा के सामने आये। नील मेघके समान श्यामवर्ण, कमल-पत्रके समान बड़ी-बड़ी आँखें, हाथों में देदीप्यमान सुदर्शन, बायें हाथ में पाञ्चजन्य शङ्ख तथा अन्य हाथों में गदा, शार्ङ्गधनुष और खड्ग- यही उनकी झाँकी थी। भगवान्ने कहा- 'राजन्! तुम्हारी बुद्धि बड़ी उत्तम है। तुममें पापका लेश भी नहीं है। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम अपनी इच्छा के अनुसार कोई उत्तम वर माँगो।'

देवाधिदेव भगवान् का यह अमृतमय वचन सुनकर महाराज श्वेत ने मस्तक नवाकर उन्हें प्रणाम किया और उन्हीं में मन लगाये हुए कहा- 'भगवन्! यदि मैं आपका भक्त हूँ तो मुझे यह उत्तम वरदान दीजिये। ब्रह्मलोकसे भी ऊपर जो अविनाशी वैकुण्ठधाम है, जिसे निर्मल, रजोगुणरहित, शुद्ध एवं संसारकी आसक्तिसे शून्य बताया गया है, मैं उसीको प्राप्त करना चाहता हूँ। जगत्पते! आपकी कृपासे मेरा यह मनोरथ सफल हो।'

श्रीभगवान् बोले - राजेन्द्र! सम्पूर्ण देवता, मुनि, सिद्ध और योगी भी जिस रमणीय और रोगशोकरहित पदको नहीं प्राप्त  होते, उसे ही तुम प्राप्त करोगे। सम्पूर्ण लोकों के लाँघकर मेरे लोकमें जाओगे। यहाँ तुमने जो कीर्ति प्राप्त की है, वह तीनों लोकों में फैलेगी और मैं सदा ही यहाँ निवास करूँगा। इस तीर्थको देवता और दानव आदि सब लोग श्वेतगङ्गा कहेंगे। जो कुशके अग्रभाग से भी श्वेतगङ्गाका जल अपने ऊपर छिडकेगा, वह स्वर्गलोकमें जाएगा। जो यहाँ स्थापित श्वेतमाधव नाम की प्रतिमाका दर्शन और उसे प्रणाम करेगा, वह देह त्यागकर भगवान् का स्मरण करते हुए शान्तपदको प्राप्त होगा।