ब्रह्म पुराण

84 - द्विविदका वध, यदुकुलका संहार, अर्जुनका पराभव और पाण्डवोंका महाप्रस्थान

व्यासजी कहते हैं - मुनियो! बलशाली भगवान् बलरामजी जो और पराक्रम किया था, वह भी सुनो। द्विविद नाम से प्रसिद्ध एक महापराक्रमी वानर था, जो देवद्रोही दैत्यपति नरकासुरका मित्र था। उसने देवताओं से वैर बाँध लिया था। वह कहता था- 'श्रीकृष्ण ने देवताओंके कहने से ही बलवान् नरकासुरका वध किया है, अत: मैं समस्त देवताओं से इसका बदला लूँगा।' इस निश्चय के अनुसार वह यज्ञों का विध्वंस और मर्त्यलोकका विनाश करने लगा। अज्ञान से मोहित होने के कारण उसने साढू पुरुषों की मर्यादा तोड़ डाली और देहधारी जीवों का संहार आरम्भ कर दिया। वह चञ्चल वानर देश, नगर और गाँवों में आगा लगाने लगा। कहीं-कहीं पर्वत गिराकर गाँवों आदिको कुचल डालता था। पर्वतों को उखाड़कर समुद्र के जल में डाल देता था। इससे क्षुब्ध होकर समुद्र अपनी सीमा लाँघकर आगे बढ़ जाता और तटपर बसे हुए गाँवों तथा नगरों को डुबो देता था। वानर द्विविद इच्छानुसार विशाल रूप धारण करके खेतों में लोटता, घूमता और खेती को कुचलकर नष्ट कर डालता था। उस सुरात्मा ने सम्पूर्ण जगत् के विरुद्ध कारू आरम्भ कर दिया था। कहीं कोई स्वाध्याय और वषट्करका नाम लेनेवाला नहीं था। सब संसार अत्यन्त दु:खित हो गया था। एक दिन रैवत पर्वत के उद्यान में बलभद्रजी तथा महाभागा रेवती विहार कर रहे थे। उनके साथ और भी सुन्दर स्त्रियाँ थीं। बलभद्रजी रमणियों के बीच में विराजमान थे और वे उनके सुयशका गान कर रही थीं। इसी समय द्विविद भी वहाँ आया और उनके सम्मुख बड़ा हो उन्हीं की नक़ल करने लगा। वह दुष्ट वानर उन युवतियों की ओर देख-देखकर जोर-जोर से हँसने लगा। यह देखकर बलभद्रजी ने कुपित होकर उसे डाँटा, किन्तु उनके डांटने की पर्वा न करके वह किलकारी मारने लगा। तब बलराम जी ने उठकर बड़े रोष के साथ मूसल हतः में लिया। उधर वानर ने भी एक भयंकर शिलाखण्ड उठा लिया और उसे बलभद्र जी पर चलाया; किन्तु उन्होंने मूसल से मारकर उस शिलाके सहस्त्रों टुकड़े कर दिए। द्विविद ने बलराम जी के मुसलका वार बचाकर उनकी छाती में बड़े वेग और रोष के साथ घूसा मारा। यह देख बलराम जी ने क्रोध में भरकर मुक्केसे उसके मस्तकपर प्रहार किया। इससे वह रक्त वमन करता हुआ निर्जीव होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। गिरते समय उसके शरीर के आघात से उस पर्वत-शिखर के सैकड़ों टुकड़े हो गये, मानो उसपर वज्र गिरा हो। उस समय देवता बलराम जी के ऊपर फूलों की वर्षा तथा उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे और बोले- 'वीर! आपने यह बड़ा अच्छा कार्य किया, यह दुष्ट वानर दैत्य- पक्षका सहायक था। इसने सम्पूर्ण जगत् को संकट में डाल रखा था। सौभाग्य की बात है कि आज यह मारा गया।'

इस प्रकार इस पृथ्वी को धारण करनेवाले परम बुद्धिमान् बलराम जी के अनेक अद्भुत पराक्रम हैं, जिनकी कोई गणना नहीं हो सकती।

इस तरह जगत् का उपकार करनेके लिये बलरामसहित भगवान् श्रीकृष्ण ने दैत्यों और दुष्ट राजाओं का वध किया। फिर अर्जुन के साथ मिलकर भगवान् ने अनेक अक्षौहिणी सेनाओं का वध कराकर इस पृथ्वी का भार उतारा। इस प्रकार सम्पूर्ण दुष्ट राजाओं का संहार करके भूभार उतारने के पश्चात् उन्होंने ब्राह्मणों के शाप को मिनिट बनाकर अपने कुलका भी संहार कर डाला। अन्त में स्वयम्भू श्री कृष्ण द्वारका पुरी छोड़कर अपने अंशभूत बलराम आदि के साथ पुन: अपने आश्रयभूतपरम धाम को चले गये।

मुनियों ने पूछा - ब्रह्मन्! भगवान् ने ब्राह्मणों के शाप को निमित्त बनाकर किस प्रकार अपने कुल का संहार किया?

व्यास जी बोले - एक समय की बात है- पिण्डारक नाम के महातीर्थ में विश्वामित्र, कण्व तथा महामुनि नारद पधारे थे। वहाँ यदुकुल के कुमारों ने उनका दर्शन किया। वे सभी कुमार यौवन के मद से उन्मत्त थे, अत: भावी की प्रेरणासे उन्होंने जाम्बवतीकुमार साम्बको स्त्री के वेष में विभूषित किया और मुनियों को प्रणाम करके विनीत भाव से पूछा- 'महर्षियो! यह स्त्री पुत्रकी अभिलाषा रखती है। बताइये, यह अपने पेट से क्या जनेगी?' वे महर्षि दिव्य ज्ञान से सम्पन्न थे, तथापि यदुकुमारों ने उनके साथ छल किया। यह देख उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन महर्षियों ने यादवों के नाश के लिए शाप देते हुए कहा- 'यह स्त्री एकमुसल पैदा करेगी, जिससे सम्पूर्ण यदुकुलका संहार हो जाएगा।' उनके यों कहनेपर यदुकुमारों ने पुरीमें आकर राजा उग्रसेन को सब हाल कह सुनाया। साम्ब के पेटसे मूसल पैदा हुआ। उग्रसेन ने उस मूसल के लोहे को कुटवाकर चूर्ण बना दिया और उसे समुद्र में फेंक दिया। वह चूर्ण एरका नाम की घासके रूप में उत्पन्न हो गया। मुसलका जप लोहा था, उसे चूर्ण कर देनेपर भी उसका एक टुकड़ा बचा रह गया। उसे यादवगण किसी प्रकार भी चूर्ण न कर सके। उसकी आकृति तोमर के समान थी। वह टुकड़ा भी समुद्र में फेंक फिय गया, किन्तु उसे एक मत्स्य ने निगल लिया। उस मत्स्यको मछेरों ने जाल बिछाकर पकड़ लिया। जब उसका पेट चिर गया, तब वह लोहा निकला और उसे जरा नामक व्याधने ले लिया। भगवान् श्रीकृष्ण इन सभी बातों को अच्छी तरह जानते थे तो भी उन्होंने विधाता के विधान को बदलना नहीं चाहा। इसी बीच में देवताओं ने भगवान् श्री कृष्णके पास अपना दूत भेजा। उसने एकान्तमें भगवान् को प्रणाम करके कहा- 'भगवन्! वासु, अश्विनीकुमार, मृद्र्ण, आदित्य, रूद्र तथा साध्य आदि देवताओं के साथ इन्द्र ने मुझे दूत बनाकर भेजा है। प्रभो! देवगन आपसे जो निवेदन करना चाहते हैं, वह इस प्रकार है; सुनिये। देवताओं के प्रार्थना करनेपर आपने जो इस पृथ्वीका भार उतारने के लिए अवतार लिया था, उसे आज सौ वर्ष से अधिक हो गये। दुराचारी दैत्य मारे गये। पृथ्वीका भार उतर गया। अब देवता आप से सनाथ होकर स्वर्ग में निवास करें। जगन्नाथ! यदि आपको स्वीकार हो तो अब अपने परमधाम को पधारें।'

श्री भगवान् बोले - 'दूत! तुम जो कुछ कहते हो, वह सब मैं जनता हूँ। इसीलिये मैंने यादवों के संहार का कार्य आरम्भ कर दिया है। यदि यदुवंशियों का संहार न हो तो यह पृथ्वीपर बहुत बड़ा भार रह जायगा; अत: मैं सात रात के भीतर जल्दी ही इस भार को भी उतार डालूँगा। जिस प्रकार मैंने द्वारकापुरी बसानेके लिए समुद्र से भूमि माँगी थी, उसी प्रकार उसे वह भूमि लौटा भी दूँगा और यादवों का संहार करके अपने परमधाम को जाऊँगा। देवराज इन्द्र तथा देवताओं को यों मन्ना चाहिये कि मैं बलरामजी के साथ अब अपने धाम में आ ही गया। इस पृथ्वी के भार रूप जो जरासंध आदि राकाजा थे, वे मारे गये; तथापि इन यदुवंशियों का भार उनसे भी बढ़कर है, अत: पृथ्वी के इस महाभार को उतारकर ही मैं देवलोक की रक्षा के लिये अपने धाम में जाऊँगा।'

भगवान् वसुदेव के यों कहनेपर देवदूत उन्हें प्रणाम करके दिव्य गति से देवराज के समीप चला गया। इधर द्वारकापुरी में दिन रात विनाश के सूचक दिव्य, भौम एवं अन्तरिक्षसम्बन्धी उत्पात होने लगे। उन्हें द्केह्कर भगवान् ने यादवों से कहा- 'देखो, ये अत्यन्त भयंकर महान् उत्पात हो रहे हैं। इनकी शांति के लिए हम सब लोग शीघ्र ही प्रभासक्षेत्र में चलें।' उस समय महान् भगवद्भक्त उद्धवजी ने श्री हरि को प्रणाम करके कहा- 'भगवन्! अब मुझे क्या करना चाहिये? इसके लिए आज्ञा दें। मैं समझता हूँ आप इस समस्त यदवकुल का संहार करना चाहते हैं; क्योंकि मुझे ऐसे निमित्त दिखायी देते हैं, जो इस कुल के विनाश की सूचना देने वाले हैं।'

श्री भगवान् बोले - उद्धव! तुम मेरी कृपा से प्राप्त हुई दिव्य गति के द्वारा गन्धमादन पर्वत पर परम पवित्र बदरिका श्रमतीर्थ में चले जाओ। वह श्रीनर-नारायणका स्थान है। वहाँ की भूमि बड़ी पवित्र है। उस तीर्थ में मेरा चिन्तन करते हुए निवास करो, फिर मेरी कृपा से तुम्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त होगी। मैं इस कुल का संहार करके अपने धाम को जाऊँगा। मेरे त्याग देनेपर समुद्र इस द्वारकापुरी को डुबो देगा।

 भगवान् के यों कहने पर उद्धवजी उन्हें प्रणाम करके नर-नारायण के आश्रम में चले गये। तदनन्तर सम्पूर्ण यादव शीघ्रगामी रथपर आरुढ़ हो बलराम और श्रीकृष्ण आदि के साथ प्रभासक्षेत्र में गये। वहाँ पहुँचकर कुकुर और अन्धकवंश के सब लोगों ने प्रसन्नतापूर्वक मदिरा-पान किया। पीते समय उनमें परस्पर संघर्ष हो गया, जिससे विनाश करनेवाली कलहाग्नि प्रज्वलित हो उठी। दैविक अधीन होकर उन्होंने एक-दूसरे को शास्त्रों से मरना आरम्भ किया। जब शस्त्र समाप्त हो गये, तब पास ही जमी हुई एरका नाम की घास सबने उखाड़ ली। उनके हाथों में आनेपर वह एरका वज्रकी भाँती दिखायी देने लगी। उसके द्वारा वे एक-दूसरे पर भयंकर प्रहार करने लगे। प्रद्युम्न, साम्ब, कृतवर्मा, सात्यकि, अनुरुद्ध, पृथु, विपृथु, चारुवर्मा, सुचारू तथा अक्रूर आदि सभी यदुवंशी एर्करूप वज्रसे एक-दूसरे को मारने लगे। श्रीहरि ने यादवों को ऐसा करने से रोका; किन्तु वे उन्हें अपने विपक्षी का सहायक मानने लगे और उनकी अवहेलना करके परस्पर प्रहार करते ही रहे। इससे भगवान् श्रीकृष्ण को भी क्रोध हो आया। अत: उन्होंने भी उनका वध करनेके लिए मुट्ठीभर एरका उखाड़ ली। हाथ में आते ही वह एरका लोहे का मुसल बन गयी। उस मुसल से भगवान् ने सहसा समस्त यादवों का संहार कर डाला तथा अन्य यादव आपस में ही लड़कर नष्ट हो गये। तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णका जैत्र नामक रथ दारुकके देखते-देखते समुद्र के मध्यवर्ती मार्ग द्वारा शीघ्र ही चला गया। उसमें जुते हुए घोड़े उस रथ को लेकर उस गये। फिर शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष, दोनों अक्षय तूणीर और खड्ग- ये सभी अस्त्र-शस्त्र भगवान् की परिक्रमा करके सूर्य के मार्ग से चले गये। क्षणभर में वहाँ सम्पूर्ण यदुवंशियों का संहार हो गया। केवल महाबाहु श्रीकृष्ण और दारुक रह गये। उन दोनों ने घूमते हुए आगे जाकर देखा, बलराम जी एक वृक्ष के नीचे आसन लगाकर बैठे हैं और उनके मुँह से एक विशाल नाग निकल रहा है। वह महाकाय सर्प उनके मुख से निकलकर सिद्धों और नागों  से पूजित हो समुद्रकी ओर चला गया। समुद्र सामने आकार उसे अर्घ्य दिया। तत्पश्चात् वह श्रेष्ठ नागों से पूजित हो समुद्र के जल में प्रवेश कर गया।

इस प्रकार बलराम जी का प्रयाण देखकर श्रीकृष्ण ने दारुक से कहा- ;तुम द्वारका में जाकर यह सब वृत्तान्त वसुदेवजी तथा राजा उग्रसेन से कहो-

'बलराम जी चले गये। यदुवंशियों कास अन्हार हो गया और मैं भी योगस्थ होकर परमधाम को चला जाऊँगा।' ये सब बातें बताकर द्वारकावासी मनुष्यों और उग्रसेन से यह भी कहना कि 'अब इस सम्पूर्ण द्वारकापुरी को समुद्र डुबो देगा, अत: आप लोग यहाँ से जाने के लिए रथों को सुसज्जित करके अजरुन के आगमन की प्रतीक्षा करें। जन अर्जुन द्वारका से निकलें तब कोई भी वहाँ न रहे। सब लोग अर्जुन के साथ ही चले जाएँ।' द्वारुक! तुम कुन्तीनन्दन अर्जुन से भी जाकर मेरी ये बातें कहो- 'द्वारका में जो मेरी स्त्रियाँ हैं, उनकी वे यथाशक्ति रक्षा करेंगे।' यह कहकर अर्जुनको साथ ले तुम द्वारका में आना और सबको बाहर निकाल ले जान। अब यदुकुल में अनिरुद्धकुमार वज्रनाभ राजा होंगे।"

यह सुनकर दारुक ने भगवान् श्रीकृष्ण को बारम्बार प्रणाम किया और अनेक बार उनकी परिक्रमा करके वह उनके कथानुसार वहाँ से चला गया। उसने जाकर भगवान् की आज्ञा के अनुसार सब कार्य किया। वह अर्जुन को द्वारका में बुला ले आया और महाबुद्धिमान् वज्रको यदुबंशियों का राजा बनाया। उधर भगवान् श्रीकृष्ण ने वासुदेवस्वरुप परब्रह्माको अपने आत्मा में आरोपित करके सम्पूर्ण भूतों में उनके व्याप्त होने की धारण की और योगयुक्त होकर अपने एक पैरको दूसरे पैर के घुटने पर रखकर बैठे। वे ब्राह्मण दुर्वासा के वचन का माँ रखना चाहते थे।* उसी समय जरा नामका व्याध उस ओर आ निकला। उसने मुसल के बचे हुए लोहखंड का बाण बनाकर उसे धारण कर रखा था। भगवान्का चरण उसे मृग के आकार का दिखायी दिया। उसे देखकर वह खड़ा हो गया और उसी तोमरसे उसने भगवान् के पैरको बींध स्दाला। जब वह उनके समीप गया तब वे उसे चार भुजाधारी मनुष्य के रूप में दृष्टिगोचर हुए। भगवान् को देखते ही वह उनके चरणों में पड़ गया और बनबार कहने लगे- 'प्रभो! प्रसन्न होइये। मैंने अनजान में हरिण के धोखेसे यह अपराध किया है, अत: क्षमा कीजिये।'

तब भगवान् ने उससे कहा- 'व्याध! तुझे तनिक भी भय नहीं है। तू मेरे प्रसाद से इन्द्रलोक में चला जा।' भगवान् के इतना कहते ही वहाँ विमान आ पहुँचा और वह व्याध उसपर बैठकर भगवान् की कृपासे स्वर्गलोकको चला गया। उसके चले जानेपर भगवान् श्रीकृष्ण ने त्रिविध गति को पार करके अपने आत्माको अव्यय, अचिन्त्य, अमल, अजन्मा, अजर, अविनाशी, अप्रमेय, अखिलात्मा एवं ब्रह्मभूत अपने ही वासुदेवस्वरुप में लीन कर लिया।

तत्पश्चात् अर्जुन ने सम्पूर्ण यादवों का विधिपूर्वक प्रेतकर्म (और्ध्वदैहिक संस्कार) किया। फिर वज्र आदि सब लोगोंको साथ ले वे द्वारकासे बाहर निकले। श्रीकृष्णकी हजारों पत्नियाँ भी साथ ही थीं। उन सबकी रक्षा करते हुए कुन्तीनन्दन अर्जुन धीरे-धीरे चले। व्हाग्वान श्रीकृष्ण ने मर्त्यलोक में जो सुधर्मा सभा मँगवायी थी, वह और परिजात वृक्ष दोनों ही पुन: स्वर्गको चले गये। श्री हरि जिस दिन इस पृथ्वीको छोड़कर अपने धाम को पधारे, उसी दिन यह मलिनकाय कलियुग भूतलपर प्रकट हुआ। समुद्र ने मनुष्यों से सूनी द्वारकाको डुबो दिया। केवल भगवान् श्रीकृष्ण का मांदरी वह अब भी नहीं डूबता। वहाँ भगवान् श्रीकृष्ण नित्य विराजमान रहते हैं। वह परम पवित्र भगवद्धाम सम्पूर्ण पातकों का नाश करनेवाला है। भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाओं से युक्त उस पवित्र स्थान का दर्शन करने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।

अर्जुन द्वारकावासियों के साथ ले प्रचुर धन-धान्य से सम्पन्न पञ्चनद (पंजाब) देश में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने सब लोगों के सात्ग एक स्थान पर पड़ाव डाला। वहाँ बहुत-से लुटेरे रहते थे। उन्होंने देखा एकमात्र धनुर्धर अर्जुन ही बहुत-सी अनाथ स्त्रियों को साथ लिये जाता है। तब उनके मन में लोभ उत्पन्न हुआ। लोभ से उनकी विचारशक्ति नष्ट हो गयी, अत: वे अत्यन्त दुर्मद पापाचारी आभीर एकत्रित होकर आपस में सलाह करने लगे- 'भाइयो! यह अर्जुन अकेला हम सब लोगों की अवहेलना करके इन अनाथ स्त्रियों को लिये जाता है। इसके हाथ में केवल धनुष है। इसीके बलपर यह हमें कुछ नहीं समझता। यह हमारे लिये धिक्कारकी बात है। तुम सब लोग बल लगाओ।'

ऐसा निश्चय करके लाठी और धेले चलानेवाले डाकू हजारों की संख्या में उन स्त्रियों पर टूट पड़े। यह देख कुन्तीनन्दन अर्जुनने उनका उओहास-सा करते हुए कहा- 'ओ पापियो! यदि तुम्हारी मरने ii इच्छा न हो तो लौट जाओ।' आभीरोंपर उनकी धमकी का कुछ भी असर न हुआ। उन्होंने अर्जुन के वचनों की अवहेलना करके सारा धन लूट लिया। तब अर्जुन ने अपने दिव्य गाण्डीव धनुष को चढ़ाना आरम्भ किया; किन्तु बलवान होनेपर भी वे उसे चढ़ा न सके। बड़ी कठिनाई से किसी तरह उन्होंने धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ायी भी तो वह पुन: ढीली हो गयी तथा उनके बहुत स्मरण करनेपर ही उन्हें किसी अस्त्र-शस्त्रकी याद न आयी। उन्होंने डाकुओंपर बाण चलाये, किन्तु वे बाण उन्हें घायल न कर सके। अग्निदेव के दिये हुए अक्षय बाण उन ग्वालों के साथ युद्ध करनेमें नष्ट हो गये। अर्जुनकी शक्ति भी क्षीण हो गयी। उस समय अर्जुन के मन में यह निश्चय हुआ कि 'मैंने अपने बाण-समूहों से जो बड़े-बड़े बलवान राजाओं को परास्त किया हिया, वह श्रीकृष्ण का ही बल था।' बनों के नष्ट हो जानेपर अर्जुन ने धनुष की नोकस डाकुओं को मारना आरम्भ किया, किन्तु वे उनके इस प्रहार की हँसी उड़ाने लगे। वे म्लेच्छ लुटेरे अर्जुन के देखते-देखते वृष्णि और अन्धकवंश की सुन्दरी स्त्रियों को लेकर चारों ओर चम्पत हो गये। तब अर्जुन ने दु:खी होकर कहा- 'हाय! यह बड़े कष्टकी बात हुई। अहो! भगवान् श्रीकृष्ण ने मुझे अकेला छोड़ दिया।´यों कहकर वे फूट-फूटकर रोने लगे और रोते-रोते ही बोले- 'हाय! यह वही धनुष है, वे ही बाण हैं, वही रथ और वे ही घोड़े हैं; किन्तु आज सब एक साथ ही नष्ट हो गये। अहो! दैव बड़ा प्रबल है। महात्मा श्रीकृष्ण के बिना मुझे सामर्थ्य रहते हुए नीच पुरुषों से अपमानित होना पड़ा। वे ही मेरी भुजाएँ, वही मुष्टि और वही मैं अर्जुन; किन्तु उन पुण्यपुरुष श्रीकृष्ण के बिना आज सब कुछ नि:सार हो गया। मेरा अर्जुनत्व और भीमसेनका भीमत्व भगवान् के ही कारण था, तभी तो आज उनके न रहनेपर मुझे आभीरों ने जीत लिया। अन्यथा यह कैसे सम्भव था।' इस प्रकार कहते हुए अर्जुन अपने श्रेष्ठ नगर इन्द्रप्रस्थ में गये। वहाँ उन्होंने यदाव्कुमार वज्रको यदुवंशियोंका राजा बनाया। तदनन्तर वे वन में आकार मुझसे मिले और मुझे विनयपूर्वक प्रणाम किया। अर्जुनको अपने चरणों की वन्दना करते देख मैंने पूछा- 'पार्थ! तुम इस प्रकार अत्यन्त उदास क्यों हो रहे हो? तुमसे किसी ब्राह्मण की हत्या तो नहीं हो गयी है? अथवा विजयकी आशा भङ्ग होनेसे तुम्हें दु:ख हो रहा है? इस समय तुम सर्वथा श्रीहीन हो गये हो। तुमने किसी अगम्या स्त्रीसे रमण तो नहीं किया, जिससे तुम्हारी कान्ति फीकी पड़ गयी है? या खिन निम्न श्रेणी के मनुष्यों ने तुम्हें युद्ध में परास्त कर दिया है?'

मेरे ऐसा प्रश्न करनेपर अर्जुन ने लंबी साँस छोड़ते हुए कहा- भगवन्! सुनिये-जो हमारे तेज, बल, वीर्य, पराक्रम, श्री और कान्ति थे, वे भगवान् श्रीकृष्ण हम लोगोंको छोड़कर चले गये। मुने! जो महान् होकर भी साधारण मनुष्यों की भाँति हमसे हँस-हँसकर बातें किया करते थे, उन्हीं के बिना आज हम तिनकों के पुतलेकी भाँति सारहीन हो गये हैं। मेरे दिव्यास्त्रों, दिव्य बाणों और गाण्डीव धनुष के जो मूर्तिमान् सार थे, वे भगवान्\ पुरुषोत्तम हमें छोड़कर चले गये। जिनकी कृपादृष्टि से लक्ष्मी, विजय, सम्पत्ति और उन्नति ने कभी हमारा साथ नहीं छोड़ा, वे भगवान् गोविन्द हमें छोड़कर चके गये। जिनके प्रभावरुपी अग्निसे भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन आदि वीर जलाकर भस्म हो गये, उन भगवान् श्रीकृष्ण ने इस भूमण्डल को त्याग दिया। तट! चक्रपाणि गोविन्द के विरहमें केवल मैं ही नहीं, यह सारी पृथ्वी ही यौवन, श्री और कान्तिसे हीं प्रतीत होती है। जिनकी कृपासे भीष्म आदि वीर आग में पतङ्गोंकी भाँति मेरे पास आकार भस्म हो गये, आज उन्हीं श्रीकृष्ण के बिना मुझे ग्वालों ने हरा दिया। जिनके प्रभाव से मेरा गाण्डीव धनुष तीनों लोकों में विख्यात हो चुका था, उन्हीं श्री हरिके बिना उसे आभीरोंने डंडोंसे तिरस्कृत कर दिया। महामुने! मेरे साथ कई हजार अनाथ स्त्रियाँ थीं और मैं उनकी रक्षा के लिए पूर्ण यत्न कर रहा था तो भी डाकुओंने केवल लाठी के बलपर उन्हें छीन लिया। पितामह! ऐसी अवस्था में मेरा श्रीहीं होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आश्चर्य तो यह है कि मैं नीच पुरुषों द्वारा अपमान के पङ्क में साना जाकर भी निर्लज्जतापूर्वक जीवन धारण कर रहा हूँ।'

व्यासजी कहते हैं - द्विजवरो! पाण्डुनन्दन महात्मा अर्जुन अत्यन्त दु:खी और दीन हो रहे थे। उनकी बात सुनकर मैंने कहा- 'पार्थ! तुम लज्जा न क्रो। शोक में भी न पड़ो। सोचो और समझो; सम्पूर्ण भूतों में काल की ऐसी ही गति है। पाण्डुनन्दन! प्राणियों की उन्नति और अवन्तीका कारण काल ही है। यह जो कुछ होता है और हुआ है, सब कालमूलक ही है- यह जानकर तुम धैर्य धारण क्रो। नदी, समुद्र, पर्वत, सम्पूर्ण, पृथ्वी, देवता, मनुष्य, पशु, वृक्ष और साँप, बिच्छू आदि सब भूतों को काल ने ही उत्पन्न किया है और काल के द्वारा ही पुन: उनका संहार होगा। यह सारा प्रपञ्च कालस्वरूप ही है- यह जानकर शान्त हो जाओ। धनंजय! तुमने श्रीकृष्ण की जैसी महिमा बतलायी है, वह वैसी ही है। उन्होंने पृथ्वीका भार उतारने के लिए ही यहाँ अवतार किया था। जब पृथ्वीपर भार अधिक हो गया और अवह दबने लगी, तब वह देवताओं के पास गयी थी। उसी के लिये इच्छानुसार रूप धरान करनेवाले श्रीहरि ने अवतार ग्रहण किया था। वह कार्य पूरा हो गया। सम्पूर्ण दुष्ट राजा मारे गये तथा वृष्णि और अंधकवंश का भी संहार हो गया। अब इस भूतल पर भगवान् के करनेयोग्य कोई कार्य शेष नहीं रह गया था, अत: अवतार-कार्य पूरा करके वे इच्छानुसार अपने धाम को चले गये हैं। देवदे भगवान् श्रीकृष्ण ही सृष्टिके समय संसार की सृष्टि और पालन के समय पालन करते हैं तथा वे ही संहारकाल में सम्पूर्ण जगत्का सहार करनेमें स्मार्ट होते हैं, जैसा कि इस समय भी उन्होंने दुष्ट राक्षसोंका सहार किया था।अत: पार्थ! तुम्हें अपनी पराजयसे दु:ख नहीं मनना चाहिये; क्योंकि अभ्युदयका समय आनेपर ही पुरुषोंद्वारा बड़े-बड़े पराक्रम होते हैं।जिस समय तुमने अकेले ही भीष्म-जैसे वीरोंका वध किया था, उस समय उनका भी क्या अपने से न्यून पुरुष के द्वारा पराभव नहीं हुआ था? किन्तु यह पराजय कालकी देन थी। भगवान् विष्णुके प्रभावसे जिस प्रकार तुम्हारे द्वारा उनकी पराजय हुई, उसी प्रकार लुटेरों के हाथ से तुम्हें भी पराजित होना पड़ा। वे जगत्पति बह्ग्वान श्रीकृष्ण भिन्न-भिन्न शरीरों में प्रवेश करके संसार का पालन करते हैं और अन्त में सब जीवों का संहार कर डालते हैं। जब तुम्हारे अभ्युदयका समय था, तब भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारे सहायक हो गये थे और जब वह समय बीत गया, तब तुम्हारे विपक्षियों पर भगवान् की कृपादृष्टि हुई है। तुम गङ्गानन्दन भीष्म के साथ सम्पूर्ण कौरवों का सहार कर डालोगे-  इस बात पर पहले कौन विश्वास कर सकता था और फिर तुम्हें आभीरों से परास्त होना पड़ेगा-  यह बात कौन मान सकता था। परन्तु दोनों ही बातें सम्भव हुईं। पार्थ! यह सम्पूर्ण भूतों में श्रीहरि की लीलाका ही विलास है। अत: तुम्हें तनिक भी शोक नहीं करना चाहिये। सम्पूर्ण जगत् के स्वामी बह्ग्वान श्रीकृष्ण ने ही सम्पूर्ण यादवों का संहार किया है। तुमलोगों का संहार-काल भी समीप ही है; इसीलिये भगवान् ने तुम्हारे बल, तेज, पराक्रम और म्हातम्यका पहले ही संहार कर दिया है। जो जन्म ले चुका है, उसकी मृत्यु निश्चित है। जो ऊँचे चढ़ चुका है, उसका नीचे गिरना भी अवश्यंभावी है। संयोगका अवसान वियोग में ही होता है और संग्रह हो जाने के बाद उसका क्षय होना भी निश्चित बात है।यह समझकर विद्वान् पुरुष हर्ष और शोक के वशीभूत नहीं होते और इतर मनुष्य भी उन्हीं के आचरण से शिक्षा लेकर वैसे ही बनते हैं।* नरश्रेष्ठ! यह समझकर तुम्हें भाईयों के साथ सारा राज्य छोड़कर तपस्या के लिए वन में जाना चाहिये। अब जाओ, धर्मराज युधिष्ठिरसे मेरी ये सारी बातें कहो। वीर! परसों तक अपने भाइयों के साथ जैसे भी हो सके घर से प्रस्थान कर दो।'

ये सुनकर अर्जुन ने धर्मराज के पास जा अपनी देखि और अनुभव की हुई सारी बातें कह सुनायीं। अर्जुन के मुख से मेरा संदेश सुनकर समस्त पाण्डव परीक्षित् को राज्य पर अभिषिक्त करके वन में चले गये मुनिवरो! इस प्रकार मैंने आपलोगों से यदुकुल में अवतीर्ण भगवान् श्रीकृष्ण की सम्पूर्ण लीलाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन किया।

* महाभारत में प्रसङ्ग आया है कि एक बार महर्षि दुर्वासा भगवान् श्रीकृष्ण के यहाँ पधारे। भगवान् ने उनका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। दुर्वासा ने कहा- 'आप मेरी जूठन अपने सारे शरीर में लगाइये।' भगवान् ने ऐसा ही किया। किन्तु उसे पैरके नीचे नहीं लगाया, इसलिये कि ब्राह्मण की जूठन का अपमान न हो जाए। दुर्वासा ने कहा, 'जहाँ-जहाँ जूठन लगी है, वह सारा अङ्ग दुर्भेद्य होगा और जहाँ नहीं लगी है, वह किसी शस्त्र बिंध जायगा।'

* जातस्य नियतो मृत्यु: पातनं च तथोन्नते:। विप्रयोगावसानस्तु संयोग: संचय: क्षय: ॥

विज्ञाय न बुधा: शोकं न हर्षमुपयान्ति ये। तेषमेवेतरे चेष्टां शिक्षन्त: सन्ति तादृशा: ॥

(२१२।८९-९०)