ब्रह्म पुराण

27 - राजा इन्द्रद्युम्न के द्वारा भगवान् श्रीविष्णुकी स्तुति

ब्रह्माजी कहते हैं - अश्वमेध-यज्ञ के अनुष्ठान और प्रासाद-निर्माण का कार्य पूर्ण हो जाने पर राजा इन्द्रद्युम्न के मन में दिन-रात प्रतिमा के लिए चिंता रहने लगीI वे सोचने लगे-कौन-से उपाय करूँ, जिससे सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले लोकपावन भगवान् पुरुषोत्तमका मुझे दर्शन होI इसी चिंता में निमन्ग रहने के कारण उन्हें न रात में नींद आती न दिन मेंI वे न तो भाँति-भाँति के भोग भोगते और न स्नान एवं श्रृंङ्गार ही करते थेI वाध्य, सुगन्ध, संगीत, अङ्गराग, इन्द्रनील, महानील, पद्मराग, सोना, चाँदी, हीरा, स्फटिक आदि मणियाँ, राग, अर्थ, काम, वन्य पदार्थ अथवा दिव्य वस्तुओं से भी उनके मनको संतोष नहीं होता थाI पत्थर, मिट्टी और लकड़ी में से इस पृथ्वी पर सर्वोत्तम वस्तु कौन हैं? किससे भगवान् विष्णु की प्रतिमा का निर्माण ठीक हो सकता है? इस प्रकार की चिंता में पड़े-पड़े उन्होंने पाञ्चरात्र की विधिसे भगवान् पुरुषोत्तमका पूजन किया और अन्त में इस प्रकार स्तवन आरम्भ किया-

'वासुदेव! आपको नाम्स्कार हैI आप मोक्ष के कारण हैंI आपको मेरा नस्कार हैI सम्पूर्ण लोकों के स्वामी परमेश्वर! आप इस जन्म मृत्युरुपी संसार-सागर से मेरा उद्धार कीजियेI पुरुषोत्तम! आपका स्वरुप निर्मल आकाश के समान हैI आपको नमस्कार हैI सबको अपनी ओर खींचनेवाले संकर्षण! आपको प्रणाम हैI धरणीधर! आप मेरी रक्षा कीजियेI हेमगर्भ (शालग्रामशिला) की-सी आभावाले प्रभो! आपको नाम्स्कार हैI मकरध्वज! आपको प्रणाम हैI रतिकान्त! आपको नमस्कार हैI शम्बरासुरका संहार करनेवाले प्रदुम्न! आप मेरी रक्षा कीजियेI भगवन्! आपका श्रीअङ्ग अञ्जन के समान श्याम हैI भक्तवत्सल! आपको नमस्कार हैI अनिरुद्ध! आपको प्रणाम हैI आप मेरी रक्षा करें और वरदायक बनेंI सम्पूर्ण देवताओं के निवासस्थान! आपको नमस्कार हैI देवप्रिय! आपको प्रणाम हैI नारायण! आपको नमस्कार हैI आप मुझ शरणागत की रक्षा कीजियेI बलवानों में श्रेष्ठ बलराम! आपको प्रणाम हैI लाङ्गलायुध! आपको नमस्कार हैI चतुर्मुख! जगद्धाम! प्रपितामह! मेरी रक्षा कीजियेI नील मेघके समान आभावाले घनश्याम! आपको नमस्कार हैI देव्पुजित परमेश्वर! आपको प्रणाम हैI सर्वव्यापी जगन्नाथ! में भवसागर में डूबा हुआ हूँ, मेरा उद्धार कीजियेI* प्रलयाग्नि समान तेजस्वी अट्टहा दहकते हुए नेत्रोंवाले महापराक्रमी दैत्यशत्रु नृसिंह! आपको नमस्कार हैI आप मेरी रक्षा कीजियेI पूर्वकाल में महावारहरूप धारण कर आपने जिस प्रकार इस पृथ्वीका रसातल से उद्धार किया था, उसी प्रकार मेरा भी दु:ख के समुद्र से उद्धार कीजियेI कृष्ण! आपके इन वरदायक स्वरूपों का मैंने स्तवन किया हैंI ये बलदेव आदि, जो पृथक्रूप से स्थित दिखायी देते हैं, आपके ही अङ्ग हैंI देवेश! प्रभो! अच्युत! गरुड़ आदि पार्षद, आयुधोंसहित दिक्पाल तथा केशव आदि जो आपके अन्य भेद मनीषियोंद्वारा बतलाये गये हैं, उन सबका मैंने पूजन किया हैI प्रसन्न तथा विशाल नेत्रोंवाले जगन्नाथ! देवेश्वर! पूर्वोत्तर सब स्वरूपों के साथ मैंने आपका स्तवन और वन्दन किया है। आप मुझे धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष देनेवाला वर प्रदान करें। हरे! संकर्षण आदि जो आपके भेद बताये गये हैं, वे सब आपकी पूजा के लिए प्रकट; अत: वे आपके ही आश्रित हैं। देवेश! वस्तुत: आप में कोई भेद नहीं है। आपके जो अनेक प्रकार के रूप बताये जाते हैं, वे सब उपचार से ही कहे गये हैं; आप तो अद्वैरूप कैसे कह सकता है। हरे! आप एकमात्र व्यापक, चित्स्वभाव तथा निरञ्जन हैं। आपका जो परम स्वरुप है, वह भाव और अभाव से  रहित, निर्लेप, निर्गुण, श्रेष्ठ, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, समस्त उपाधियों से निर्मुक्त और सत्तामात्र रूप से स्थित है। प्रभो! उसे देवता भी नहीं जानते, फिर में ही कैसे उसे जान सकता हूँ। इसके सिवा आपका जो अपर स्वरुप है, वह पीताम्बरधारी और चार भुजाओंवाला है। उसके हाथों में शङ्ख, चक्र और गदा सुशोभित हैं। वह मुकुट और अङ्गद धारण करता है। उसका वक्ष:- स्थल श्रीवत्सचिह्न से युक्त है तथा वह वनमाला से विभूषित रहता है। उसी की देवता तथा आपके अन्यान्य शरणागत भक्त पूजा करते हैं। देवदेव! आप सब देवताओं में श्रेष्ठ एवं भक्तों को अभय देनेवाले हैं। कमलनयन! में विषयों के समुद्र में डूबा हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये। लोकेश! मैं आपके सिवा और किसी को नहीं देखता, जिसकी शरण में जाऊँ। कमलाकान्त! मधुसूदन! मुझपर प्रसन्न होइये।*

मैं बुढ़ापे और सैकड़ों व्याधियों से युक्त हो भाँति-भाँति के दु:खों से पीड़ित हूँ तथा अपने कर्मपाश में बँधकर हर्ष-शोक में मग्न हो विवेकशून्य हो गया हूँ। अत्यन्त भयंकर घोर संसार-समुद्र में गिरा हुआ हूँ। यह विषयरुपी जलराशि के कारण दुस्तर है। इसमें राग- द्वेषरुपी मत्स्य भरे पद हैं। इन्द्रियरुपी भँवरों से यह बहुत गहरा प्रतीत होता है। इसमें तृष्णा और शोकरुपी लहरें व्याप्त हैं। यहाँ न कोई आश्रम हैं, न कोई अवलम्ब। यह सारहीन एवं अत्यन्त चञ्चल है। प्रभो! में माया से मोहित होकर इसके भीतर चिरकाल से भटक रहा हूँ। हजारों भिन्न-भिन्न योनियों में बारंबार जन्म लेता हूँ। जनार्दन! मैंने इस संसार में नाना प्रकार के हजारों जन्म धारण किये हैं। अङ्गोंसहित वेद, नाना प्रकार के शास्त्र, इतिहास-पुराण तथा अनेक शिल्पों का अध्ययन किया है। यहाँ मुझे कभी असंतोष मिला है, कभी संतोष। कभी धनका संग्रह किया है, कभी हानि उठायी है और कभी बहुत खर्च किये हैं। जगन्नाथ! इस प्रकार मैंने ह्रासवृद्धि, उदय और अस्त अनेक बार देखे हैं, स्त्री, शत्रु, मित्र तथा बन्धु-बांधवोंके संयोग और वियोग भी देखने को मिले हैं। मैंने अनेक पिता देखें हैं और अनेक माताओं का दर्शन किया है। अनेक प्रकार के जो दु:ख और सुख हैं, उनके अनुभवका भी मुझे अवसर मिला है। भाई, बन्धु, पुत्र और कुटुम्बी भी प्राप्त हुए हैं। विष्ठा और मूत्रकी कीचसे भरे हुए स्त्रियोंके गर्भाशय में भी मैंने निआस किया है। प्रभो! गर्भवास में जो महान् दु:ख होता है, उसका भी मैंने अनुभव किया है। बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में जो अनेक प्रकार के दु:ख होते हैं, उनसे भी मैं वञ्चित नहीं रहा। मृत्यु के समय, यमलोक के मार्ग में तथा यमराज के घर में जो दु:ख प्राप्त हैं, उनको तथा नरकों में होनेवाली यातनाओं को भी मैंने भोगा है। कृमि, कीट, वृक्ष, हाथी, घोड़े, मृग, पक्षी, भैंसे, ऊँट, गाय तथा अन्य वनवासी जन्तुओं की योनि में मुझे जन्म लेना पड़ा है। समस्त द्विजातियों और शूद्रों के यहाँ भी मेरा जन्म हुआ है। देव! धनी क्षत्रियों, दरिद्र तपस्वियों, राजाओं, राजा के सेवकों तथा अन्य देहधारियों के घरों में भी मैं अनेक बार उत्पन्न हो चुका हूँ। नाथ! मुझे अनेकों बार ऐसे मनुष्यों का दास होना पड़ा है, जो स्वयं दूसरों के दास हैं। मैं दरिद्र, धनी और स्वामी भी रह चुका हूँ।*

मुझे दूसरों ने मारा और मेरे हाथ से दूसरे मारे गये। मुझे दूसरों ने मरवाया और मैंने भी दूसरों की हत्या करवायी। मुझे दूसरों ने और मैंने दूसरों को अनेकों बार दान दिए हैं। जनार्दन! पिता, माता, सुहृद्, भाई और पत्नी के लिए मैंने लज्जा छोडकर धनियों, श्रोत्रियों, दरिद्रों और तपस्वियों के सामने दीनता से  भरी बातें की हैं। प्रभो! देवता, पशु-पक्षी, मनुष्य तथा अन्य स्थाव-जङ्गम भूतों में ऐसा कोई स्थान नहीं हैं, जहाँ मेरा जाना न हुआ हो। जगत्पते! कभी नरक में और कभी स्वर्ग में मेरा निवास रहा है। कभी मनुष्यलोक में और कभी तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेना पड़ा है। सुश्रेष्ठ!जैसे रहटमें रस्सी से बँधी हुई घटी कभी ऊपर जाती, कभी निचे आती और कभी बीच में ठहरी रहती है, उसी प्रकार मैं कर्मरुपी रज्जुमें बाँधकर दैवयोग से ऊपर, निचे तथा मध्यवर्ती लोक में भटकता रहता हूँ। इस प्रकार यह अन्सा-चक्र बड़ा ही भयानक एवं रोमाञ्चकारी है। मैं इसमें दीर्घकाल से घूम रहा हूँ, किन्तु कभी इसका अन्त नहीं दिखायी देता। समझ में नहीं आता, अब क्या करूँ। हरे! हमारी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयी हैं। मैं शोक और तृष्णा आक्रान्त होकर अब कहाँ जाऊँ। मेरी चेतना लुप्त हो रही है। देव! इस समय व्याकुल होकर मैं आपकी शरण में आया हूँ। कृष्ण! मैं संसार-समुद्र में डूबकर दु:ख भोगता हूँ। मुझे बचाइये। जगन्नाथ! यदि आप मुझे अपना भक्त मानते हैं तो मुझपर कृपा कीजिये। आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा बन्धु नहीं है, जो मेरी चिंता करेगा। देव! प्रभो! आप-जैसे स्वामीकी शरण में आकर अब मुझे जीवन, मरण अथवा योगक्षेम के लिए कहीं भी भय नहीं होता। देव! जो नराधम आपकी विधिपूर्वक पूजा नहीं करते, उनकी इस संसार-बन्धन से मुक्ति एवं सद्गति कैसे हो सकती है। जगदाधार भगवान् केशव में जिनकी भक्ति नहीं होती, उनके कुल, शील, विद्या और जीवन से क्या लाभ है। जो आसुरी प्रकृतिका आश्रय एविवेकशून्य हो आपकी निन्दा करते हैं, वे बारंबार जन्म लेकर घोर नरकमें पड़ते हैं तथा उस नरक-समुद्र से उनका कभी उद्धार नहीं होता। देव! जो दुराचारी नीच पुरुष आपपर दोषारोपण करते हैं, वे कभी नरक से छुटकार नहीं पाते। हरे! अपने कर्मों में बँधें रहने के कारण मेरा जहाँ कहीं भी जन्म हो, वहाँ सर्वदा आप में मेरी दृढ़ भक्ति बनी रहे। देव! आपकी आराधना करके देवता, दैत्य, मनुष्य तथा अन्य संयमी पुरुषोंने परम सिद्धि प्राप्त की है; फिर कौन आपकी पूजा न करेगा। भगवान्! ब्रह्मा आदि देवता भी आपकी स्तुति करने में समर्थ नहीं हैं, फिर मानव-बुद्धि लेकर में आपकी स्तुति कैसे कर सकता हूँ। क्योंकि आप प्रकृति से परे परमेश्वर हैं। प्रभो! मैंने अज्ञान के भाव से आपकी स्तुति की है। यदि आपकी मुझपर दया हो तो मेरे इस अपराध को क्षमा करें। हरे! साधु पुरुष अपराधीपर भी क्षमाभाव ही रखते हैं, अत: देवेश्वर! आप भक्तस्नेह के वशीभूत होकर मुझपर प्रसन्न होइये। देव! मैंने भक्तिभाव चित्त से आपकी जो स्तुति की है, वह साङ्गोपाङ्ग सफल हो। वासुदेव! आपको नमस्कार है।*

ब्रह्माजी कहते हैं - राजा इन्द्रद्युम्न के इस प्रकार स्तुति करने पर भगवान् गरुड़ध्वजने प्रसन्न होकर उनका सब मनोरथ पूर्ण किया। जो मनुष्य भगवान् जगन्नाथ पूजन करके प्रतिदिन इस स्रोत से उनका स्तवन करता है, वह बुद्धिमान निश्चय ही मोक्ष प्राप्त का लेता है। जो विद्वान् पुरुष तीनों संध्याओं के समय पवित्र हो इस श्रेष्ठ स्रोतका जप करता है, वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पाता है। जो एकाग्रचित हो इसका पाठ या श्रवण करता अथवा दूसरों को सुनाता है, वह पापरहित हो भगवान् विष्णु के सनातन धाम में जाता है। यह स्रोत परम प्रशंसनीय, पापों को दूर करनेवाला, भोग एवं मोक्ष देनेवाला, कल्याणमय, गोपनीय, अत्यन्त दुर्लभ तथा पवित्र है। इसे जिस किसी मनुष्य को नहीं देना चाहिये। नास्तिक, मूर्ख, कृतघ्न, मानी, दुष्टबुद्धि तथा अभक्त मनुष्य को कभी इसका उपदेश न दे। जिसके हृदय में भक्ति हो, जो गुणवान्, शीलवान्, विष्णुभक्त, शांत तथा श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करनेवाला हो, उसीको इसका उपदेश देना चाहिये।

जो निर्मल हृदयवाले मनुष्य उन परम सूक्ष्म नित्य पुराणपुरुष मुरारि श्रीविष्णु भगवान् का ध्यान करते हैं, वे मुक्ति के भागी हो भगवान् विष्णु में प्रवेश कर जाते हैं- ठीक उसी तरह, जैसे मन्त्रोंद्वारा यज्ञाग्नि में हवन किया हुआ हविष्य भगवान् विष्णु को प्राप्त होता है। एकमात्र वे देवदेव भगवान् विष्णु ही संसार के दु:खों का नाश करनेवाले तथा परों से भी पर हैं। उनसे भिन्न किसी भी वस्तु की सत्ता नहीं हैं। वे ही सबकी सृष्टि, पालन और संहार करने वाले हैं। वे ही समस्त संसार में सारभूत हैं। मोक्ष-सुख देनेवाले जगद्रुरु भगवान् श्रीकृष्ण में यहाँ जिनकी भक्ति नहीं होती, उन्हें विद्या से, अपने गुणों से तथा यग्य, दान और कठोर तपस्या से क्या लाभ हुआ। जिस पुरुष की भगवान् पुरुषोत्तम के प्रति भक्ति है, वही संसार में धन्य, पवित्र और विद्वान् है। वही, यज्ञ, तपस्या और गुणों के कारण श्रेष्ठ है तथा वाही ज्ञानी, दानी और सत्यवादी है।*

* वासुदेव नमस्तेऽस्तु नमस्ते मोक्षकारण। त्राहि मां सर्वलोकेश जन्मसंसारसागरात् ॥

निर्मलाम्बरसंकाश नमस्ते पुरुषोत्तम। संकर्षण नमस्तेऽस्तु त्राहि मां धरणीधर ॥

नमस्ते हेमगर्भाय नमस्ते मकरध्वज। रतिकान्त नमस्तेऽस्तु त्राहि मां शम्बरान्तक ॥

नमस्तेऽञ्जनसंकाश नमस्ते भक्तवत्सल। अनिरुद्ध नमस्तेऽस्तु त्राहि मां वरदो भव ॥

नमस्ते विबुधावास नमस्ते विबुधप्रिय। नारायण नमस्तेऽस्तु त्राहि मां शरणागतम् ॥

नमस्ते बलिनां श्रेष्ठ नमस्ते लाङ्गलायुध। चतुर्मुख जगद्धाम त्राहि मां पपितामह ॥

नमस्ते नीलमेघाभ नमस्ते त्रिदशार्चित। त्राहि विष्णो मग्नं मां भवसागरे ॥

     (४९ । १-७)

* प्रलयानलसंकाश नमस्ते दितिजान्तक। नरसिंह महावीर्य त्राहि मां दीप्तलोचन ॥

यथा रसातलादुर्वी त्वया दंष्ट्रोद्धृता पुरा। तथा महावराहस्त्वं त्राहि मां दु:खसागरात् ॥

तवैता मूर्तय: कृष्ण वरदा: संस्तुता मया। तवेमे बलदेवाद्या: पृथग्रूपेण संस्थिता ॥

अङ्गानि तव देवेश गरुत्माद्यास्तथा प्रभो। दिक्पाला: सायुधाश्चैव केशवाद्यास्तथाच्युत ॥

ये चान्ये तव देवेश भेदा: प्रोक्ता मनीषिभि:। तेऽपि सर्वे जगन्नाथ प्रसन्नायतलोचन ॥

मयार्चिता: स्तुता: सर्वे अट्टहा यूयं नमस्कृता:। प्रयच्छता वरं मह्यं धर्मंकामार्थमोक्षदम् ॥

भेदास्ते कीर्तिता ये तु हर संकर्षणादय:। तव पूजार्थसम्भूतास्ततस्त्वयि समाश्रिता: ॥

न भेदस्त्व देवेश विद्यते परमार्थत:। विविधं तव यद्रूपमुक्तं तदुपचारत: ॥

अद्वैतं त्वां कथं द्वैतं वक्तुं शक्नोति मानव:। एकस्तवं हि हरे व्यापी चित्स्वभावो निरञ्जन: ॥

परमं तव यद्रूवं भावाभावविवर्जितम्। निर्लेपं निर्गुणं श्रेष्ठं कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥

सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सत्तामात्रव्यवस्थितम्। तदे्वाश्च न जानन्ति कथं जानाम्यहं प्रभो ॥

अपरं तव यद्रूपं पीतवस्त्रं चतुर्भुजम्। शङ्खचक्रगदापाणिमुकुटाङ्गदधारिणम् ॥

श्रीवत्सोरस्कसंयुक्तं वनमालाविभूषितम्। तदर्चयन्ति विबुधा ये चान्ये तव संश्रया: ॥

देवदेव सुरश्रेष्ठ भक्तानामभयप्रद। त्राहि मां पद्मपत्राक्ष मग्नं विषयसागरे ॥

नान्यं पश्यामि लोकेश यस्याहं शरणं व्रजे। त्वामृते कमलाकान्त प्रसीद मधुसूदन ॥

(४९ । ८-२२)

* जराव्याधिशतैर्युक्तो नानादु:खैर्निपीड़ित:। हर्षशोकान्वितो मूढ़: कर्मपाशै: सुयन्त्रित:॥

पतितोऽहं महारौद्रे घोरे संसारसागरे। विषयोदकदुष्पारे रागद्वेषझषाकुले ॥

इन्द्रियावर्तगंभीरे तृष्णाशोकोर्मिसंकुले। निराश्रये निरालम्बे नि:सारेऽत्यन्तचञ्चले ॥

मायया मोहितस्तत्र भ्रमामि सुचिरं प्रभो। नानाजातिसहस्त्रेषु जायमान: पुन: पुन: ॥

मया जन्मान्यनेकानि सहस्त्राण्ययुतानि च। विविधान्युभूतानि संसारेऽस्मिञ्जनार्दन ॥

वेदा: साङ्गा मयाधीता: शास्त्राणि विविधानि च। इतिहासपुराणिनी तथा शिल्पान्यनेकश: ॥

असंतोषाश्च संतोषा: संचयापचया व्यया:। मया प्राप्ता जगन्नाथ क्षयवृद्ध्युदयेतरा: ॥

भार्यारित्रित्रबन्धूनां वियोगा: संगमासत्था। पितरो विविध दृष्टा मातरश्च तथा मया ॥

दु;खानि चानूभूतानि यानि सौख्यान्यनेकश:। प्राप्ताश्च बान्धवा: पुत्रा भ्रातरो ज्ञातयस्तथा ॥

मयोषितं तथा स्त्रीणां कोष्ठे विण्मूत्रपिच्छले। गर्भवासे महादु:खमनुभूतं तथा प्रभो ॥

दु:खानि यान्यनेकानि बाल्ययौवनगोचरे। वार्धके च हृषिकेश तानि प्राप्तानि वै मया ॥

मरणे यानि दु:खानि यममार्गे यमालये। मया तान्यनुभूतानि नरके यातनास्तथा ॥

कृमिकीटद्रुमाणां च हस्त्यश्वमृगपक्षिणाम्। महिषोष्ट्रगवां चैव तथान्येषां वनौकसाम् ॥

द्विजातीनां च सर्वेषां शुद्राणां चैव योनिषु। धनिनां क्षत्रियाणां च दरिद्राणां तस्विनाम् ॥

नृपाणां नृपभृत्यानां  तथान्येषां च देहिनाम्। गृहेषु तेषामुत्पन्नो देव चाहं पुन: पुन: ॥

गतोऽस्मि दास्तां आठ भृत्यानां बहुशा नृणाम्। दरिद्र्त्वं चेश्वरत्वं स्वामित्वं च तथा गत: ॥

(४९ । २३-३८)

* हतो मया हताश्चन्ये घातितो घातितास्तथा। दत्तं ममान्यैरन्येभ्यो मया दत्तमनेकश: ॥

पितृमातृसुहृद्भ्रातृकलत्राणां कृतेन च। धनिनां श्रोत्रियाणां च दरिद्राणां तपस्विनाम् ॥

उक्तं दैन्यं च विविधं त्व्यक्ता लज्जां जनार्दन। देवतिर्यङ्मनुष्येषु स्थावरेषु चरेषु च ॥

न विद्यते तथा स्थानं यत्राहं न गत: प्रभो। कदा मे नरके वास: कदा स्वर्गे जगत्पते ॥

कड़ा मनुष्यलोकेषु कदा तिर्यग्गतेषु च। जल्यन्त्रे यथा चक्रे घटी रज्जुनिबन्धना ॥

याति चोर्ध्वमधश्चैव कदा मध्ये च तिष्ठति। तथा चाहं सुरश्रेष्ठ कर्मरज्जुसमावृत्त: ॥

अधश्चोध्र्वं तथा मध्ये भ्रमन् गच्छामि योगत:। एवं संसाररचक्रेऽस्मिन् भैरवे रोमहर्षणे ॥

भ्रमामि सुचिरं कालं नान्तं पश्यामि कर्हिचित्। न जाने किं करोम्यद्य हरे व्याकुलितेन्द्रिय: ॥

शोकतृष्णाभिभूताऽहं कांदिशी को विचेतन:। इदानीं त्वामहं देव विह्वल: शरणं गत: ॥

त्राहि मां दु:खितं कृष्ण मग्नंसंसारसागरे। कृपां कुरु जगन्नाथ भक्तं मां यदि मन्यसे ॥

त्वदृते नास्ति मे बन्धुर्योऽसौ चिन्तां करिष्यति। देव त्वां नाथमासाद्य न भयं मेऽस्ति कुत्रचित्॥

जीविते मरणे चैव योगक्षेमेऽथवा प्रभो। ये तु त्वां विधिवदे्व नार्चयन्ति नराधमा:॥

सुग्तिस्तु कथं तेषां भवेत्संसारबन्धनात्। किं तेषां कुलशीलेन विद्या जीवितेन च ॥

येषां न जायते भक्तिर्जगद्धातरि केशवे। प्रकृतिं त्वसुरिं प्राप्य ये त्वां निन्दन्ति मोहिता: ॥

पतन्ति नरके घोरे जायमाना: पुन: पुन:। न तेषां निष्कृतिस्तस्माद्विद्यते नरकार्णवात् ॥

ये दुषयन्ति दुर्वृत्तास्त्वां देव पुरुषाधमा:। यत्रयत्र भवेज्जन्म मम कर्मनिबन्धनात् ॥

तत्र तत्र हरे भक्तिस्त्वयि चास्तु दृढा सदा। आराध्य त्वां सुरा दैत्या नराश्चान्येऽपि संयता: ॥

अवापु: परमां सिद्धिं कस्त्वां देव न पूजयेत्। न शक्नुवन्ति ब्रह्माद्या: स्तोतुं त्वां त्रिदशा हरे ॥

कथं मानुषबुद्ध्याहं स्तौमि त्वां प्रकृते: परम्। तथा चाज्ञानभावेन संस्तुतोऽसि मया प्रभो ॥

तत्क्षमस्वापराधं मे यदि तेऽस्ति दया मयि। कृतापराधेऽपि हरे क्षमां कुर्वन्ति साधव: ॥

तस्मात्प्रसीद देवेश भक्तस्नेहं समाश्रित:। स्तुतोऽसि यन्मया देव भक्तिभावेन चेतसा ।

साङ्गं भवतु तत्सर्वं वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥

(४९ । ३१-४१)

* ये तं सुसूक्ष्मं विमला मुरारि ध्यायन्ति नित्यं पुरुषं पुराण्म्। ते मुक्तिभाजा: प्रविशन्ति विष्णुं मन्त्रैर्यथाऽऽज्यं हुतमध्वराग्नौ ॥

एक: स देवो भवदु:खहन्ता परं परेषां न ततोऽस्ति चान्यत्। स्त्रष्टा स पाता स तु नाशकर्ता विष्णु: समस्ताखिलसारभूत: ॥

किं विद्या किं स्वगुणैश्च तेषां यज्ञै दानैश्च तपोभिरूग्रै:। येषां न भक्तिर्भवतीह कृष्णे जगद्गुरौ मोक्षसुखप्रदे च ॥

लोके स धन्य: स शुचि: स विद्वान्मखैस्तपोभि: स गुणैर्वरिष्ठ:। ज्ञाता स दाता स तु सत्वक्ता यस्यास्ति भक्ति: पुरुशोत्त्मख्ये ॥

(४९ । ६८-७१)