लोमहर्षण जी कहते हैं - महर्षियों! ब्रह्माजी की कही हुई पवित्र कथा सुनकर उन महर्षियों को बड़ी प्रसन्नता हुई। उनके शरीर में रोमाञ्च हो आया। उन्होंने कहा- 'ब्रह्मन्! अब आप एकाम्रकक्षेत्र का वर्णन कीजिये।'
ब्रह्माजी बोले - मुनिवरो! वह क्षेत्र सब पापों को हरनेवाला, पवित्र एवं परम दुर्लभ है। मैं उसका संक्षेप से वर्णन करूँगा, सुनो। एकाम्रक नाम से विख्यात क्षेत्र वाराणसी के समान कोटि शिवलिङ्गों से युक्त एवं शुभ है। उसमें आठ तीर्थ हैं। पूर्व कल्प में वहाँ एक आमका वृक्ष था। उसी के नाम से एक एकाम्रक क्षेत्र के रूप में विख्यात हुआ। वह स्थान ह्रष्ट-पुष्ट मनुष्यों से भरा रहता है, वहाँ स्त्रियाँ भी रहेती हैं और पुरुष भी। उस क्षेत्र में विद्वानों की अधिकता है, वह धन-धान्य से सम्पन्न स्थान है। घर और गौपुर वहाँ की शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ अनेकों व्यवसायी भरे हुए हैं। भाँति-भाँति के रत्न उस क्षेत्र की शोभा बढ़ाते हैं। नगर, अटारी, सड़क और राजहंसों के समान श्वेत महल आदि के द्वारा उसकी बड़ी शोभा होती है। उसके चारों ओर सफेद चहारदीवारी बनी है। शास्त्रों द्वारा उस पुरकी रक्षा होती है। अनेकों खाईयों से वह क्षेत्र अलङ्कृत है। वहाँ प्रतिदिन उत्सव का आनन्द छाया रहता है। नाना प्रकार के बाजों की ध्वनि सुनायी पड़ती है। चहारदीवारी और बगीचों से युक्त अनेक दिव्य देव मंदिर सब ओर उस क्षेत्र की शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र बड़े धार्मिक हैं। वे अपने-अपने धर्मों मियन संलग्न रहते हैं। उस क्षेत्र में निर्धन, मुर्ख, दूसरों से द्वेष रखनेवाले, रोगी, मलिन, नीच, मायावी, रूपहीन, दुराचारी तथा परद्रोही मनुष्य नहीं हैं। वहाँ सर्वत्र सुखपूर्वक सब लोग घूमते-फिरते हैं। वह स्थान सब जीवों के लिये सुखद है। वहाँ नाना प्रकार के पक्षियों का कलरव सुनायी पड़ता है। वहाँ के उद्यान नन्दनवन के समान एवं सबके सेवन करने योग्य हैं। वहाँ के वृक्ष फलों के भारसे झुके रहते हैं और सभी ऋतुओं में उनसे फूल झड़ते रहते हैं। दीर्घका, तड़ाग, पुष्करिणी, वापी तथा अन्यान्य जलाशय सदा कमलवन से सुशोभित रहते हैं। भाँति-भाँति के वृक्ष, नाना प्रकार के सुंदर पुष्प तथा अनेक प्रकार के पवित्र जलाशय सब ओर से उस स्थान की शोभा बढ़ाते हैं।
उस क्षेत्र में साक्षात् भगवान् शङ्कर सब लोकों का हित करने के लिये निवास करते हैं। वे भोग और मोक्ष दोनों के दाता हैं। इस पृथ्वी पर जितने तीर्थ, नदियाँ, सरोवर, पुष्करिणी, तड़ाग, वापी, कूप और सागर हैं, उन सबसे पृथक्-पृथक् जल की बूँदें संगृहित करके देवताओं सहित भगवान् शङ्कर ने उस क्षेत्र में सम्पूर्ण लोकोंके हित के लिए विन्दुसर नामक तीर्थ स्थापित किया। इसीलिये वह विन्दुसर नाम से विख्यात है। अगहन के कृष्णपक्ष की अष्टमीको जो वहाँ की यात्रा करता है तथा जो जितेन्द्रिय भाव से विषुवयोग में श्रध्दाके साथ विधिपूर्वक विन्दुसरोवर में स्नान करके तिल और जल से नाम-गोत्रके उच्चारणपूर्वक देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों एवं पितरों का तर्पण करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। जो ग्रहण, विषुवयोग, संक्रान्ति, अयनारम्भ, छियासी युगादि तिथि तथा अन्यान्य शुभ तिथियोंमें वहाँ ब्राह्मणों को धन आदिका दान करते हैं, वे अन्य तीर्थों की अपेक्षा सौगुना फल पाते हैं। जो विन्दुसरोवर के तटपर पितरोंको पिण्डदान देते हैं, वे उन पितरोंकी अक्षय तृप्ति का सम्पादन करते हैं।
स्नान के पश्चात् मौन एवं जितेन्द्रिय भाव से भगवान् शङ्कर के मंदिर में प्रवेश करके उनकी पूजा करे। तीन बार शिवकी प्रदक्षिणा करे। घृत और दुग्ध आदि के द्वारा पवित्रतापूर्वक भगवान् शङ्कर को स्नान कराकर उनके सब अङ्गोमें सुगन्धित चन्दन एवं केसर लगाये। तदनन्तर नाना प्रकार के पवित्र पुष्पों तथा बिल्वपत्र, आक और कमल आदि के द्वारा वैदिक एवं तान्त्रिक मन्त्रों से तथा केवल नाममय मूल मन्त्र से गन्ध, पुष्प, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य, उपहार, स्तुति, दण्डवत्- प्रणाम, मनोहर गीत- वाद्य, नृत्य, जप, नमस्कार, जय-शब्द तथा प्रदक्षिणा समर्पण करते हुए महादेवजी का पूजन करे। इस प्रकार देवाधिदेवका विधिपूर्वक पूजन करनेवाला पुरुष सब पापों से मुक्त हो शिवलोक में जाता है। जो उत्तम बुद्धिवाले पुरुष वहाँ हर समय महादेवजी का दर्शन करते हैं, वे भी पापमुक्त होकर शिवलोक में जाते हैं। भगवान् शिव से पश्चिम, पूर्व, दक्षिण, उत्तर- चारों ओर ढाई-ढाई योजनतक वह क्षेत्र भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। उस उत्तम क्षेत्र में भास्करेश्वर नाम से प्रसिद्ध एक शिवलिङ्ग है। जो लोग वहाँ कुण्डमें स्नान करके भगवान् सूर्यद्वारा पूजित त्रिनेत्रधारी देवाधिदेव महादेवका दर्शन करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो उत्तम विमानपर बैठकर गन्धर्वोंके मुखसे ओनी स्तुति सुनते हुए शिवलोक में जाते हैं अथवा योगियों के घर में वेद-वेदाङ्गों के पारंगत, सर्वभूतहितकारी श्रेष्ठ द्विज के रूप में उत्पन्न होते हैं। उस समय वे मोक्षशास्त्र के तात्पर्य को समझने में कुशल और सर्वत्र समबुद्धि होते हैं तथा भगवान् शङ्कर से श्रेष्ठ योग प्राप्त करके भाव-बन्धनसे मुक्ति पा जाते हैं। द्विजवरो! स्त्री भी श्रद्धापूर्वक वहाँ भगवान् शिवका पूजन करके पूर्वोक्त फलको प्राप्त कर लेती है। मुनिवरो! भगवान् महेश्वर के अतिरिक्त दूसरा कौन ऐसा है, जो उस उत्तम क्षेत्र के सम्पूर्ण गुणों का वर्णन कर सके भगवान् शिवका एकाम्रकक्षेत्र वाराणसी के समान शुभ है। जो वहाँ स्नान करता है, वह निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
वहाँ और भी अनेक पवित्र तीर्थ एवं मंदिर हैं। उनका भी ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। समुद्र के उत्तर-तटपर उस प्रदेश में एक परम गोपनीय मुक्तिदायक क्षेत्र है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। उस परमदुर्लभ क्षेत्रका विस्तार दस योजन है। वहाँ की भूमिपर सब ओर बालू बिछी हुई है। वह परम पवित्र एवं सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। अशोक, अर्जुन, पुनांग, मौलसिरी, सरल, कटहल, नारियल, शाखू, ताड़, कैथ, चम्पा, कनेर, आम, बेल, गुलाब, कदम्ब, कचनार, लकुच, नागकेसर, पीपल, छितवन, महुआ, सहिजन, शीशम, आँवला, नीम तथा बहेड़ा आदि के वृक्षों से उसकी बड़ी शोभा होती है। वहाँ पक्षियों के मुख से निकले हुए अत्यन्त मधुर कलरव कानों और मनको बहुत सुख देते हैं। ऊपर बताये हुए वृक्षों के अतिरिक्त अन्यान्य मनोहर पुष्पों, लताओं और भाँति-भाँति के जलाशयों से वह क्षेत्र सुशोभित है। अनेकानेक ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी तथा स्वधर्मपरायण ब्राह्मणादि वर्णों से उस क्षेत्र की शोभा होती है। वह हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों तथा अनेक नर-नारियों से भरा हुआ है। वह सम्पूर्ण विद्याओं का स्थान तथा समस्त धर्मों एवं गुणों का आकर है। इस प्रकार वह परम दुर्लभ क्षेत्र सर्वगुणसम्पन्न है। मुनिवरो! वहाँ भगवान् श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम नाम से विख्यात हैं। उत्कल प्रांत की सीमा समुद्र की ओर जहाँतक बताई गयी है, वह सब स्थान श्रीकृष्ण के प्रसादसे अत्यन्त पवित्र है। उस देश में विश्वात्मा भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं। वे जगद्व्यापी जगन्नाथ हैं। उन्हीं में सब कुछ प्रतिष्ठित है। मैं, भगवान् शिव, इन्द्र तथा अग्नि आदि देवता सदा उस देश में निवास करते हैं। गन्धर्व, अप्सरा, पितर, देवता, मनुष्य, यक्ष विद्याधर, सिद्ध, उत्तम व्रतवाले मुनि, बालखिल्य आदि ऋषि, कश्यप आदि प्रजाति, गुरुड, किंनर, नाग, अन्यान्य सर्ववासी, अङ्गोंसहित चारों वेद, नाना प्रकार के शास्त्र, इतिहास-पुराण, उत्तम दक्षिणावाले यज्ञ, अनेक पवित्र नदियाँ, पुण्यतीर्थ, मंदिर, समुद्र तथा पर्वत-सब उस देशमें स्थित हैं। इस प्रकार देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंद्वारा सेवित उस पावन प्रदेश में, जहाँ सब प्रकार के उपभोग सुलभ हैं, निवास करना किसको रुचिकर नहीं प्रतीत होगा। भला, उसके सिवा कौन देश श्रेष्ठ है, उससे बढ़कर दूसरा कौन स्थान है, जहाँ मुक्तिदाता भगवान् पुरुषोत्तम स्वयं ही विराजमान हैं। वे मनुष्य जो उत्कलदेश में निवास करते हैं, देवताओं के समान और धन्य हैं। जो समस्त तीर्थों के राजा समुद्र में स्नान करके भगवान् पुरुषोत्तम का दर्शन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्ग में बसते हैं, यमलोक में नहीं जाते। जो उत्कलदेशीय पवित्र पुरुषोत्तमक्षेत्र में निवास करते हैं, उन श्रेष्ठ बुद्धिवाले मनुष्यों का जीवन सफल है; क्योंकि वे देवश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण के मुखकमलका दर्शन करते हैं। भगवान् का मुखकमल तीनों लोकोंका आनन्द प्रदान करनेवाला है। उनके नेत्र प्रसन्न एवं विशाल हैं। उनकी भौंहें, केश अट्टहा मुकुट सुंदर हैं, कानों में मनोहर कुण्डल शोभा पाते हैं। उनकी मुस्कान मनोहर और दन्तपङ्क्ति सुंदर है। वे सुंदर नाक, सुंदर कपोल, सुंदर ललाट और उत्तम लक्षणों वाले हैं।
Summary of chapter 23 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The supreme efficacy of tīrthas (sacred pilgrimage centres) is established through a general discourse on the purifying power of sacred waters, holy forests, and places sanctified by the tapas of great ṛṣis. The chapter teaches that pilgrimage destroys sin, elevates one's progeny, and grants liberation, and provides the theological foundation for the extensive tīrtha-māhātmya sections that follow.