ब्रह्म पुराण

14 - भारतवर्ष का वर्णन

मुनियों ने कहा - वक्ताओं में श्रेष्ठ सूतजी!  इस पृथ्वी पर धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली जो उत्तम भूमि एवं श्रेष्ठ तीर्थ हो, उसे बतलाइये।

लोमहर्षणजी बोले - ब्राह्मणो! पूर्वकाल में महर्षियों मेरे गुरु व्यासजी से यही प्रश्न पूछा था। में वाही प्रसंग कहता हूँ। कुरुक्षेत्र की बात है, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ व्यासजी, जो सब शास्त्रों के विद्वान्, महाभारत के रचियता, अध्यात्मनिष्ठ, सर्वज्ञ, सब भूतों के हित में संलग्न, पुराण और आगमों के वक्ता तथा वेद-वेदाङ्गों के पारंगत पण्डित हैं, अपने परम पवित्र आश्रम में बैठे हुए थे। भाँति-भाँति के पुष्प उस आश्रम की शोभा बढ़ा रहे थे। उसी समय उत्तम व्रतका पालन करनेवाले अनेक महर्षि उनके दर्शन के लिये आये। कश्यप, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, वसिष्ठ, जैमिनि, धौम्य, मार्कण्डेय, वाल्मीकि, विश्वामित्र, शतानन्द, वात्स्य, गार्ग्य, आसुरि, सुमन्तु, भार्गव, कण्व, मेधातिथि, माण्डव्य, च्यवन, धूम्र, असित, देवल, मौद्रल्य, तृणयज्ञ, पिप्पलाद, अकृतव्रण, संवर्त, कौशिक, रैभ्य, मैत्रेय, हरित, शाण्डिल्य, विभाण्ड, दुर्वासा, लोमेश, नारद, पर्वत, वैशम्पायां, गालव, भास्करि, पूरण, सूत, पुलस्त्य, कपिल, पुलह, देवस्थान, सनत्कुमार, पैल, कृष्ण तथा कृष्णानुभौतिक- ये तथा और भी बहुत-से मुनिवर सत्यवतीननन्दन व्यास को घेरकर बैठ गये। उनके बीच में व्यासजी नक्षत्रों से घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाते थे। कुछ बातचीत के बाद उन्होंने व्यासजी से अपना सन्देह इस प्रकार पूछा।

मुनि बोले - मुने! आप वेद, शास्त्र , पुराण, तन्त्रशास्त्र, महाभारत, भूत, वर्तमान, भविष्य तथा सम्पूर्ण वाङ्मयका ज्ञान रखते हैं। यह संसार एक समुद्र के समान है। इसमें दु:ख-ही-दु:ख भरा है। यह कष्टमय एवं नि:सार है। इस भयानक भवसागर में रागरुपी ग्राह रहते हैं। यह विषयरूपी जल से भरा रहता है। इन्द्रियाँ ही इसमें भँवर हैं। यह क्षुधा, पिपासा आदि सैकड़ों ऊर्मियों से व्याप्त है। इसे मोहरूपी कीचड़ ने मालिन बना रखा है। लोभ की गहराई के कारण इसके पार जाना अत्यन्त कठिन है। हम देखते हैं की सम्पूर्ण जगत् इसमें डूबकर कोई सहारा न पा सकने के कारण अचेत बहा जा रहा है। अत: आपसे पूछते हैं, इस भयंकर संसार में कौन-सा साधन कल्याणकारी है? इस बात का उपदेश देकर आप सम्पूर्ण लोकों का उभ्दार कीजिये। इस पृथ्वी पर जो परम दुर्लभ मोक्षदायक क्षेत्र एवं कर्मभूमि है, उसे बतलाइये। हम उसका श्रवण करना चाहते हैं।

व्यासजी ने कहा - पूर्वकाल में महर्षियों का ब्रह्माजी के साथ जो संवाद हुआ था, उसे आप सब लोग सुनें। नाना रत्नों से विभूषित मेरुगिरि के विशाल शिखरपर भगवान् ब्रह्माजी विराजमान थे। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, विद्याधर, नाग, मुनि तथा सिद्ध उनकी सेवा में उपस्थित थे। उस समय भृगु आदि महर्षियों ने पितामह को प्रणाम करके इस प्रकार प्रश्न किया- 'भगवन्! इस पृथ्वी पर कर्मभूमि कौन है तथा दुर्लभ मोक्ष-क्षेत्र कौन है? यह बताने की कृपा करें।'

ब्रह्माजी बोले - मुनिवरो! सुनो, इस पृथ्वी पर भारतवर्ष को कर्मभूमि बतलाया गया है। वह परम प्राचीन, वेदों से सम्बन्ध रखनेवाला तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला उत्तम क्षेत्र है। वहीँ किये हुए कर्मों के फलस्वरूप से स्वर्ग और नरक प्राप्त होते हैं। भारतवर्ष में पाप या पुण्य करके मनुष्य निश्चय ही उसके अशुभ अथवा शुभ फलका भागी होता है। वहाँ ब्राह्मण आदि वर्ण भली-भाँति संयमपूर्वक रहते हुए अपने-अपने कर्मों का अनुष्ठान करके उत्तम सिध्दि को प्राप्त होते हैं। भारतवर्ष में संयमशील पुरुष धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - सब कुछ प्राप्त करता है। इन्द्र आदि देवताओं ने भारतवर्ष में शुभ कर्मों का अनुष्ठान करके देवत्व प्राप्त किया है। इनके सिवा अन्य जितेन्द्रिय पुरुषों ने भी भारतवर्ष में शांत, वीतराग एवं मात्सर्यरहित जीवन बिताते हुए मोक्ष प्राप्त किया है। देवता सदा इस बात की अभिलाषा करते हैं कि हमलोग कब स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाले भारतवर्ष में जन्म लेकर निरंतर उसका दर्शन करेंगे।

इसके पूर्व में किरात और पश्चिम में यवन रहते हैं। मध्यभाग में ब्रह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों का निवास है। वे क्रमशः यज्ञ, युद्ध और व्यापार आदि विशुद्ध कर्मों के द्वारा अपने को पवित्र करते हैं। उनका जीवन-निर्वाह भी इन्हीं कर्मों से होता है। यहाँ किया हुआ पुण्य सकाम होने पर स्वर्ग आदि का तथा निष्काम होने पर मोक्ष का साधक होता है। इसी प्रकार पाप भी अपना फल प्रदान करता है। महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्षपर्वत, विन्ध्य और पारियात्र- ये ही सात यहाँ कुल-पर्वत हैं। उनके आस-पास और भी हजारों पर्वत हैं। वे सभी विस्तृत, ऊँचे और रमणीय हैं। उनके शिखर भाँति-भाँति के और सुन्दर हैं। कोलाहल, वैभ्राज, मन्दर, दर्दुराचल, वातंधय, वैद्युत, मैनाक, सुरस, तुङ्गप्रस्थ, नागगिरि, गोधन, पाण्डुराचल, पुष्पगिरि, वैजयन्त, रैवत, अर्बुद, ऋष्यमूक, गोमन्त, कृतशैल, कृताचल, श्रीपर्वत, चकोर तथा अन्य अनेक पर्वत ऐसे हैं, जिनसे मिले हुए म्लेच्छ आदि जनपद पृथक्-पृथक् बसे हुए हैं। वहाँ के लोग जिन श्रेष्ठ नदियों का जल पीते हैं, उनके नाम इस प्रकार जानो- गङ्गा, सरस्वती, सिंधु, चन्द्रभागा (चनाब), यमुना, शतद्रु (सतलज), विपशा (व्यास), वितस्ता (झेलम), इरावती (रावी), कुहू(गोमती), धूतपापा, बाहुदा, दृषद्वती, देविका, चक्षु, निष्ठीवी, गण्डकी तथा कैशिकी। ये हिमालय की घाटी से निकली हुई नदियाँ हैं। देवस्मृति, देववती, वातघ्नी, सिन्धु, वेण्या, चन्दना, सदानीरा, मही, चर्मण्वती (चंबल), वृषी, विदिशा, वेदवती, क्षिप्रा तथा अवन्ती - ये पारियात्रपर्वतका अनुसरण करनेवाली नदियाँ हैं। शोणा (सोन), महानदी, नर्मदा, सुरथा, क्रिया, मन्दाकिनी, दशार्णा, चित्रकूटा, चित्रोत्पला, वेत्रवती (बेतवा), कर्मोदा, पिशाचिका, अतिलघुश्रोणी, विपाप्मा, शैवला, सधेरुजा, शक्तिमती, शकुनी, त्रिदिवा, क्रम तथा वेगवाहिनी- ये नदियाँ ऋक्षपर्वत की संतानें हैं। चित्रा, प्योष्णी, निर्विन्ध्या, तापी, वेणा, वैतरणी, सिनीवाली, कुमुद्वती, तोय, महागौरी, दुर्गा तथा अन्तशिश्ला- ये पुण्यसलिला सरिताएँ विन्ध्याचल की घाटियों से निकली हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणा, तुङ्गभद्रा, सुप्रयोगा तथा पापनाशिनी- ये श्रेष्ठ नदियाँ सह्यगिरि की शाखा से प्रकट हुई हैं। कृतमाला, ताम्रपर्णी, पुष्पवती, उत्पलावती- ये शीतल जलवाली पवित्र नदियाँ मल्याचल से निकली हैं। पितृकुल्या, सोमकुल्या, ऋषिकुल्या, वञ्जुला, त्रिदिवा, लाङ्गलिनी तथा वंशकरा- इनका प्राकट्य महेन्द्रपर्वत से हुआ है। सुविकला, कुमारी, मानुगा, मन्दगामिनी, क्षया और पलाशिनि- ये शुक्तिमान्पर्वत निकली हैं। समुद्र में मिलनेवाली सभी नदियाँ पुण्यसलिला सरस्वती तथा गङ्गा के समान हैं। सभी इस विश्व की जननी एवं पापहारिणी मनाई गयी हैं। इनके अतिरिक्त भी सहस्त्रों छोटी-छोटी नदियाँ बताई गयी हैं, जिनमें से कुछ तो केवल वर्षाकाल में बहती हैं और कुछ सदा ही जल से पूर्ण रहती हैं। मत्स्य, मुकुटकुली, कुंतल, काशी, कोसल, अन्ध्रक, कलिङ्ग, शमक तथा वृक- ये प्राय: मध्यदेश के जापद बताए गये हैं। सह्य पर्वत के उत्तर का प्रदेश, जहाँ गोदावरी नदी बहती है, सम्पूर्ण भूमण्डल में सर्वाधिक मनोरम है।

वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रम के धर्मों का पालन करने से जो फल होता हिया, कुआँ, बावली आदि खुदवाने, बगीचे लगाने, यज्ञ करने तथा अन्य शुभ कर्मों के अनुष्ठान से जो फल मिलता हिया, वह सब केवल भारतवर्ष में ही सुलभ है। ब्राह्मणो! भारतवर्ष के समस्त गुणों का वर्णन करने में कौन समर्थ हो सकता है? इस प्रकार मैंने भारतवर्ष का वर्णन किया। यह सबसे उत्तम, सब पापों का नाश करनेवाला, पवित्र, धन्य तथा बुध्दि को बढ़ानेवाला है। जो सदा अपनी इन्द्रियों को वश में रखकर इस प्रसंग का पाठ या श्रवण करता है, वह सब पापों से मुक्त हो भगवान् विष्णु के लोक में जाता है।