ब्रह्म पुराण

102 - कर्म तथा ज्ञानका अन्तर, परमात्मतत्त्वका निरूपण तथा अध्यात्मज्ञान और उसके साधनोंका वर्णन

मुनि बोले- महर्षे ! यदि वेदकी ऐसी आज्ञा है कि ' कर्म करो ' तथा यह भी आदेश है कि 'कर्मका त्याग करो ' तो यह बताइये कि मनुष्य ज्ञानके द्वारा कर्म त्याग देनेपर किस गतिको प्राप्त होते हैं तथा कर्म करनेसे उन्हें किस फलकी प्राप्ति होती है ? इस बातको हम सुनना चाहते हैं । क्योंकि उक्त दोनों आज्ञाएँ परस्पर विरुद्ध प्रतीत होती हैं ।

व्यासजीने कहा – ब्राह्मणो ! ज्ञानसे मनुष्य जिस गतिको पाते हैं और कर्मसे उन्हें जैसी गति मिलती है , उसका वर्णन करता हूँ ; सुनो। तुम्हारे इस प्रश्नका उत्तर गहन है। शास्त्रमें दो मार्गोंका वर्णन है – एकका नाम प्रवृत्तिधर्म है और दूसरेको निवृत्तिधर्म कहा गया है। प्रवृत्तिमार्गको कर्म और निवृत्तिमार्गको ज्ञान भी कहते हैं । कर्म ( अविद्या )-से मनुष्य बन्धनमें पड़ता है और ज्ञानसे मुक्त हो जाता है ; इसलिये पारदर्शी यति कर्म नहीं करते। कर्मसे मरनेके बाद जन्म लेना पड़ता है , सोलह तत्त्वोंसे बने हुए शरीरकी प्राप्ति होती है । किंतु ज्ञानसे नित्य , अव्यक्त एवं अविनाशी परमात्मा प्राप्त होते हैं । कुछ मन्दबुद्धि मानव कर्मकी प्रशंसा करते हैं , अतः वे भोगासक्त होकर बारंबार देहके बन्धनमें पड़ते हैं । परंतु जो धर्मके तत्त्वको भलीभाँति समझते हैं तथा जिन्हें उत्तम बुद्धि प्राप्त है , वे कर्मकी उसी तरह प्रशंसा नहीं करते , जैसे नदीका पानी पीनेवाला मनुष्य कुएँका आदर नहीं करता । कर्मके फल मिलते हैं- सुख और दुःख , जन्म और मृत्यु । किंतु ज्ञानसे उस पदकी प्राप्ति होती है , जहाँ जाकर मनुष्य सदाके लिये शोकसे मुक्त हो जाता है । जहाँ जन्म , मृत्यु , जरा और वृद्धि उसका स्पर्श नहीं करते , वहाँ केवल अव्यक्त , अचल , ध्रुव , अव्याकृत एवं अमृतस्वरूप परब्रह्मकी ही स्थिति है । उस स्थितिमें पहुँचे हुए मनुष्योंको शीत-उष्ण आदि द्वन्द्व बाधा नहीं पहुँचाते । मानसिक विकार और क्रियाद्वारा भी उन्हें कष्ट नहीं होता। वे समत्वभावसे युक्त, सबके प्रति मैत्री रखनेवाले और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रहनेवाले होते हैं।  ब्राह्मणो ! देह , इन्द्रिय और मन आदि जो प्रकृतिके विकार हैं , वे क्षेत्रज्ञके ही आधारपर स्थित हैं । वे जड होनेके कारण क्षेत्रज्ञको नहीं जानते , किंतु क्षेत्रज्ञ उन सबको जानता है । जैसे चतुर सारथि अपने वशमें किये बलवान् एवं उत्तम घोड़ोंसे अच्छी तरह काम लेता है , उसी प्रकार क्षेत्रज्ञ भी अपने अधीन किये हुए मन और इन्द्रियोंद्वारा सम्पूर्ण कार्य सिद्ध करता है । इन्द्रियोंकी अपेक्षा उनके विषय ( शब्दादि तन्मात्रा ) पर-सूक्ष्म और श्रेष्ठ हैं। विषयोंसे मन पर है । मनसे बुद्धि पर है । बुद्धिसे महत्तत्त्व पर है । महत्तत्त्वसे अव्यक्त ( मूल प्रकृति ) पर है और अव्यक्तसे अविनाशी परमात्मा पर है । अविनाशी परमात्मासे पर कुछ भी नहीं है । वही परताकी सीमा है तथा वही परम गति है । इस प्रकार सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर छिपा हुआ यह परमात्मा सबके जाननेमें नहीं आता । उसे तो सूक्ष्मदर्शी ज्ञानी महात्मा ही अपनी सूक्ष्म एवं श्रेष्ठ बुद्धिसे देखते हैं ।* मनसहित इन्द्रियोंको तथा इन्द्रियोंके साथ उनके  विषयोंको भी बुद्धिके द्वारा अन्तरात्मामें लीन करके नाना प्रकारके दृश्योंका चिन्तन न करे। ध्यानके द्वारा मनको विषयोंकी ओरसे हटाकर विवेकके द्वारा उसे स्थिर करे और शान्तभावसे स्थित हो जाय ; ऐसा करनेसे साधक परम पदको प्राप्त होता है । जो इन्द्रियोंके वशमें रहता है , वह मानव विवेकशक्तिको खो देता है और अपनेको काम आदि शत्रुओंके हाथमें देकर मृत्युको प्राप्त होता है । इसलिये सब प्रकारके संकल्पोंका नाश करके चित्तको सत्त्वयुक्त बुद्धिमें स्थापित करे । यों करनेसे चित्तमें प्रसाद गुण आता है , जिससे यति पुरुष | शुभ और अशुभ दोनोंको जीत लेता है । प्रसन्नचित्त साधक परमात्मामें स्थित होकर अत्यन्त आनन्दका अनुभव करता है । चित्तकी प्रसन्नताका लक्षण यह है कि सदा सुषुप्तिके समान सुखका अनुभव होता रहे अथवा वायुशून्य स्थानमें जलते हुए निष्काम दीपककी लौके समान मन कभी चञ्चल न हो । जो मिताहारी और शुद्धचित्त होकर रातके पहले तथा पिछले भागमें आत्माको परमात्माके ध्यानमें लगाता है , वही अपने अन्तःकरणमें परमात्माका दर्शन करता है । यह उपदेश सम्पूर्ण वेदोंका रहस्य है । यह परमात्माका बोध करानेवाला शास्त्र है । धर्म और सत्यके सम्पूर्ण उपाख्यानों में जो सार वस्तु है , उसका दस हजार वर्षोंतक मन्थन करके यह अमृतमय उपदेश निकाला गया है । जैसे दही से मक्खन निकलता और काष्ठसे अग्नि प्रकट होती है , उसी प्रकार मोक्षके लिये विद्वानोंका ज्ञान यहाँ | प्रकट किया गया है । इस शास्त्रका उपदेश स्नातकों को देना चाहिये । जिसका मन शान्त नहीं है , इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं तथा जो तपस्वी नहीं है , उसे इस ज्ञानका उपदेश नहीं करना चाहिये । जो वेदका ज्ञाता नहीं है , जिसके मनमें गुरुके प्रति भक्ति नहीं है , जो दोष देखनेवाला , कुटिल , आज्ञाका पालन न करनेवाला , व्यर्थ तर्क - वितर्कसे दूषित और चुगलखोर है , उसे भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये । जो प्रशंसनीय , शान्त , तपस्वी तथा सेवापरायण शिष्य अथवा पुत्र हो , उसीको इस गूढ़ धर्मका उपदेश देना उचित है ; दूसरे किसीको नहीं । यदि कोई रत्नोंसे भरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वी देने लगे तो भी तत्त्ववेत्ता पुरुष उसकी अपेक्षा इस ज्ञानको ही श्रेष्ठ माने । अतः मैं तुम्हें अत्यन्त गूढ़ अर्थवाले अध्यात्म ज्ञानका उपदेश देता हूँ , जो मानवीय ज्ञानसे बाहर है , जिसे महर्षियोंने ही जाना है तथा जिसका सम्पूर्ण उपनिषदोंमें वर्णन किया गया है । मुनिवरो ! तुमलोग जो बात पूछते थे और तुम्हारे हृदयमें जिसके विषयमें संदेह था , वह सब तुमने सुन लिया । मेरे मनमें जैसा निश्चय था , वह सब बता दिया ; अब और क्या सुनाऊँ ?

 मुनियोंने कहा- ऋषिश्रेष्ठ ! अब पुनः अध्यात्म ज्ञानका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये । अध्यात्म क्या है और उसे हम किस प्रकार जानें ?

 व्यासजी बोले- ब्राह्मणो ! अध्यात्मका जो स्वरूप है , उसे बताता हूँ । तुम उसकी व्याख्या ध्यान देकर सुनो । पृथ्वी , जल , तेज , वायु और आकाश ये पञ्चमहाभूत सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरमें स्थित हैं । शब्द , श्रवणेन्द्रिय और शरीरके सम्पूर्ण छिद्र आकाशसे प्रकट हुए हैं । प्राण , चेष्टा और स्पर्शकी उत्पत्ति वायुसे हुई है । रूप , नेत्र और जठरानल ये तीन अग्निके कार्य हैं । रस , रसना और चिकनाहट - ये जलके गुण हैं । गन्ध , नासिका और देह - ये पृथ्वीके कार्य हैं । यह पाञ्चभौतिक विकार बताया गया । स्पर्श वायुका , रस जलका , रूप तेजका , शब्द आकाशका और गन्ध भूमिका गुण है । मन बुद्धि और स्वभाव- ये स्वयोनिज -गुण हैं । ये गुणोंकी सीमाको लाँघ जाते हैं , अतः उनसे श्रेष्ठ माने गये हैं । जैसे कछुआ अपने अङ्गोंको फैलाकर फिर सिकोड़ लेता है , उसी प्रकार बुद्धिके | द्वारा श्रेष्ठ पुरुष सम्पूर्ण इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे समेट लेता है । मनुष्यके शरीरमें पाँच इन्द्रियाँ हैं , छठा तत्त्व मन है , सातवाँ तत्त्व बुद्धि है और क्षेत्रज्ञको आठवाँ समझो । आँख देखनेके लिये ही है , मन संदेह करता है , बुद्धि निश्चय करनेके लिये है और क्षेत्रज्ञको साक्षी कहा जाता है । सत्त्व , रज और तम- ये तीनों गुण अपने कारणभूत प्रकृतिसे प्रकट हैं । वे सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान वे - भावसे स्थित हैं । उनके कार्योद्वारा उनकी पहचान करनी चाहिये । जब अन्तःकरण कुछ प्रीतियुक्त सा जान पड़े , अत्यन्त शान्तिका सा अनुभव हो , | तब उसे सत्त्वगुण जानना चाहिये । जब शरीर और  मनमें कुछ संतापका - सा अनुभव हो , तब उसे रजोगुणकी प्रवृत्ति मानना चाहिये । जब अन्तःकरण में अव्यक्त , अतर्क्य और अज्ञेय मोहका संयोग होने लगे , तब उसे तमोगुण समझना चाहिये । जब अकस्मात् किसी कारणवश अत्यन्त हर्ष , प्रेम , आनन्द , समता और स्वस्थचित्तताका विकास हो , तब उसे सात्त्विक गुण कहते हैं । अभिमान , असत्य भाषण , लोभ और असहनशीलता – ये रजोगुणके चिह्न हैं । मोह , प्रमाद , निद्रा , आलस्य और अज्ञान आदि दुर्गुण जब किसी तरह प्रवृत्त हों तब उन्हें तमोगुणका कार्य जानना चाहिये ।

जैसे जलचर पक्षी जलमें विचरता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता , उसी प्रकार मुक्तात्मा योगी संसारमें रहकर भी उसके गुण - दोषोंसे लिप्त नहीं होता।*  इसी प्रकार ज्ञानी पुरुष विषयोंमें आसक्त न होनेके कारण उनका उपभोग करते हुए भी उनके दोषोंसे लिप्त नहीं होता । जो सदा परमात्माके चिन्तनमें ही लगा रहता है , वह पूर्वकृत कर्मों  बन्धनसे रहित हो सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा हो जाता है और विषयोंमें कभी आसक्त नहीं होता । गुण आत्माको नहीं जानते , किंतु आत्मा उन्हें सदा जानता रहता है ; क्योंकि वह गुणोंका द्रष्टा है । प्रकृति और आत्मामें यही अन्तर है । एक ( प्रकृति ) तो गुणोंकी सृष्टि करती है , किन्तु दूसरा ( आत्मा ) ऐसा नहीं करता । वे दोनों स्वभावतः पृथक् होते हुए भी एक - दूसरेसे संयुक्त हैं । जैसे पत्थरमें सुवर्ण जड़ा होता है , जैसे गूलर और उसके कीड़े साथ साथ रहते हैं तथा जिस प्रकार मूँजमें सींक होती है और ये सभी वस्तुएँ पृथक् होती हुई भी परस्पर संयुक्त रहती हैं , उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष भी एक दूसरेसे संयुक्त रहते हैं । प्रकृति गुणोंकी सृष्टि करती है और क्षेत्रज्ञ आत्मा उदासीनकी भाँति अलग रहकर समस्त विकारशील गुणोंको देखा करता है । प्रकृति जो इन गुणोंकी सृष्टि करती है , वह सब उसका स्वाभाविक कर्म है । जैसे मकड़ी अपने शरीरसे तन्तुओंकी सृष्टि करती है , वैसे ही प्रकृति भी समस्त त्रिगुणात्मक पदार्थोंको जन्म देती है । किन्हींका मत है कि तत्त्वज्ञानसे जब गुणोंका नाश कर दिया जाता है , तब वे फिर उत्पन्न नहीं होते , उनका सर्वथा बाध हो जाता है । क्योंकि फिर उनका कोई चिह्न नहीं उपलब्ध होता । इस प्रकार वे भ्रम या अविद्याके निवारणको ही मुक्ति मानते हैं । दूसरोंके मतमें त्रिविध दुःखोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति ही मोक्ष है । इन दोनों मतोंपर अपनी बुद्धिके अनुसार विचार करके सिद्धान्तका निश्चय करे । आत्मा आदि और अन्तसे रहित है । उसे जानकर मनुष्य हर्ष और क्रोधको त्याग दे और मात्सर्यरहित होकर विचरण करे । जैसे तैरनेकी कला न जाननेवाले मनुष्य यदि भरी हुई नदीमें कूद पड़ते हैं तो वे डूब जाते हैं , किंतु जो तैरना जानते हैं , वे कष्टमें नहीं पड़ते , वे तो जलमें भी स्थलकी ही भाँति विचरते हैं , उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप | आत्माको प्राप्त हुआ तत्त्ववेत्ता पुरुष संसार - सागरसे पार हो जाता है । जो सम्पूर्ण प्राणियोंके आवागमनको  जानकर सबके प्रति समभाव रखते हुए बर्ताव करता है , वह उत्तम शान्तिको प्राप्त होता है । ब्राह्मणमें इस ज्ञानको प्राप्त करनेकी सहज शक्ति होती है । मन और इन्द्रियोंका संयम तथा आत्माका ज्ञान- ये मोक्षप्राप्तिके लिये पर्याप्त साधन हैं। तत्त्वका ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य बुद्ध

(ज्ञानी) हो जाता है । बुद्धका इसके सिवा और क्या लक्षण हो सकता है । बुद्धिमान् मनुष्य इस आत्मतत्त्वको जानकर कृतकृत्य हो संसार बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं । अज्ञानी पुरुषोंको परलोकमें जो महान् भय प्राप्त होता है , वह ज्ञानीको नहीं होता । ज्ञानी पुरुषोंको जो सनातन गति प्राप्त होती है , उससे बढ़कर दूसरी कोई गति नहीं है ।

 मुनि बोले- भगवन् ! अब आप उस धर्मका वर्णन कीजिये , जो सब धर्मोंसे श्रेष्ठ है तथा जिससे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है ।

व्यासजीने कहा- मुनिवरो ! मैं ऋषियोंके द्वारा प्रशंसित प्राचीन धर्मका , जो सम्पूर्ण धर्मोंसे श्रेष्ठ है , वर्णन करता हूँ । तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो । जैसे पिता अपने छोटे बालकोंको अपनी आज्ञाके अधीन रखता है , उसी प्रकार मनुष्य बुद्धिके बलसे अपनी प्रमथनशील इन्द्रियोंका यत्नपूर्वक संयम करे । मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही सबसे बड़ी तपस्या है , उसे ही सब धर्मोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ धर्म जानना चाहिये । पाँचों इन्द्रियोंसहित छठे मनको बुद्धिके द्वारा एकाग्र करके सदा अपने आपमें ही संतुष्ट रहे , नाना प्रकारके चिन्तनीय विषयोंका चिन्तन न करे । * जिस समय ये इन्द्रियाँ अपने विषयोंसे हटकर बुद्धिमें स्थित हो जायँगी , उसी समय तुम्हें सनातन परमात्माका दर्शन होगा । धूमरहित अग्निके समान देदीप्यमान उस परम महान् सर्वात्मा परमेश्वरको मनीषी ब्राह्मण ही देख पाते हैं । जलते हुए ज्ञानमय प्रदीपके द्वारा पुरुष अपने अन्तःकरणमें ही आत्माका दर्शन करता है । ब्राह्मणो ! तुमलोग भी इसी प्रकार आत्माका साक्षात्कार करके संसारसे विरक्त हो जाओ । जैसे साँप केंचुल छोड़ता है , वैसे ही तुम भी सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे । इस उत्तम बुद्धिको प्राप्त कर लेनेपर तुम्हारे मनमें चिन्ता तथा वेदना नहीं रहेगी । अविद्या एक भयंकर नदी है , जिसके सब ओर स्रोत हैं ; यह लोकोंको प्रवाहित करनेवाली है । पाँचों इन्द्रियाँ इस नदीके भीतर रहनेवाले ग्राह हैं । मानसिक संकल्प विकल्प ही इसके तट हैं । यह लोभ मोहरूपी तृण ( सेवार आदि ) से आच्छादित रहती है । काम और क्रोधरूपी सर्पोंसे युक्त है । सत्य ही इससे पार करनेवाला पुण्यतीर्थ है । इसमें असत्यका तूफान उठा करता है । क्रोध ही इस श्रेष्ठ नदीकी कीचड़ है । इसका उद्गम स्थान अव्यक्त है । यह काम - क्रोधसे व्याप्त तथा वेगसे बहनेवाली है । अजितेन्द्रिय पुरुषों के लिये इसे पार करना अत्यन्त कठिन है । यह नदी संसाररूपी समुद्रमें मिलती है । अपना जन्म ही इस नदीकी उत्पत्तिका कारण है । जिह्वारूपी भँवरके कारण इसको पार करना कठिन है । स्थिर बुद्धिवाले पवित्र मनीषी पुरुष ही इस नदीको पार कर पाते हैं । तुम सब लोग भी इस नदीके पार हो जाओ । इससे पार हो सब बन्धनोंसे मुक्त हुआ पवित्र जितात्मा पुरुष उत्तम बुद्धि पाकर ब्रह्मस्वरूप हो जाता है । वह सब क्लेशोंसे छूट जाता है , उसका अन्तःकरण प्रसन्नतासे पूर्ण रहता है तथा वह पापरहित हो जाता है । उसमें हर्ष और क्रोधरूपी विकार नहीं रह जाते । उसकी बुद्धि क्रूर नहीं होती । इस बुद्धिको प्राप्त करके तुमलोग समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और  प्रलयको देख सकोगे । यहाँ बताये हुए धर्मको विद्वानोंने सब धर्मोंसे श्रेष्ठ माना है । वह आत्मज्ञानका  उपदेश सम्पूर्ण गुह्य रहस्योंमें भी सबसे अधिक गोपनीय है । जो कोई परम पवित्र , हितैषी तथा भक्त हो , उसीको इसका उपदेश करना चाहिये । ब्राह्मणो ! मैंने यहाँ जिस ज्ञानका वर्णन किया है , वह अनायास ही आत्माका साक्षात्कार करानेवाला है । वह आत्मतत्त्व न स्त्री है , न पुरुष है और न नपुंसक ही है । उसमें दुःख और सुख दोनोंका अभाव है । वह साक्षात् ब्रह्म है । भूत , भविष्य और वर्तमान – सब उसीके रूप हैं । कोई पुरुष हो या स्त्री , जो उस ब्रह्मको जान लेता है , उसे फिर जन्म नहीं लेना पड़ता । विप्रगण ! सब प्रकारके मतोंने इस विषयका जैसा प्रतिपादन किया है , उसके अनुकूल ही मैंने भी वर्णन किया है ।

मुनि बोले -ब्रह्माजीने उपायसे ही मोक्षकी प्राप्ति बतायी है , बिना उपायके नहीं । अतः हम न्यायानुकूल उपायको ही सुनना चाहते हैं ।

 व्यासजीने कहा – महाप्राज्ञ मुनिवरो ! हमलोगोंमें ऐसी ही निपुण दृष्टि होनी उचित है । उपायसे ही सब पुरुषार्थोकी खोज करनी चाहिये । मोक्षका एक ही मार्ग है , उसे सुनो । क्षमाके द्वारा क्रोधका नाश करे । इच्छा , द्वेष और कामको धैर्यसे शान्त करे । तत्त्ववेत्ता योगी ज्ञानके अभ्याससे निद्रा तथा भेद-बुद्धिका निराकरण करे । हितकर , सुपक्व और स्वस्थ भोजनसे वह सब प्रकारके उपद्रवोंको मिटाये । विद्वान् पुरुष संतोषसे लोभ और मोहका , तात्त्विक दृष्टिसे विषयोंकी आसक्तिका , दयासे अधर्मका , सबमें अनित्य बुद्धिके द्वारा स्नेहका तथा योग साधनासे क्षुधाका निवारण करे पूर्ण संतोषसे तृष्णाको , उत्थान ( उत्तम ) -से आलस्यको , निश्चयसे तर्क वितर्कको , मौनावलम्बनसे बहुत बोलनेकी प्रवृत्तिको , शूरतासे भयको , बुद्धिसे मन और वाणीको तथा ज्ञानदृष्टिसे बुद्धिको जीते । शान्तचित्त हो पवित्र कर्मोंका अनुष्ठान करते हुए इस बातको समझे ।जिसके पाप धुल गये हैं , ऐसा तेजस्वी , मिताहारी  तथा जितेन्द्रिय पुरुष काम और क्रोधको अपने वशमें करके ब्रह्ममें प्रवेश करता है । अविवेक और आसक्तिका अभाव , दीनताका त्याग , अविनयसे दूर रहना , चित्तमें उद्वेग न आने देना , स्थिरता धारण किये रहना तथा मन , वाणी और शरीरको संयममें रखना - यह सब मोक्षका प्रसादपूर्ण निर्मल एवं पवित्र मार्ग है ।

* इन्द्रियेभ्यः  परा  हयर्था अर्थेभ्यः परमं मनः ।  मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ॥

  महत : परमव्यक्तमव्यक्तात्परतोऽमृतम् । अमृतान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥

  एवं  सर्वेषु  भूतेषु  गूढात्मा  न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्रयया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥

                                                                                                         ( २३६।२३ - २५ )

*यथा वारिचरः पक्षी न लिप्यति जले चरन् । विमुक्तात्मा तथा योगी गुणदोषैर्न लिप्यते ॥

                                                                                                              ( २३६ । ८२ )

*मनसश्चेन्द्रियाणां  चाप्यैकाग्रयं परमं  तपः । विज्ञेयः सर्वधर्मेभ्यः स धर्म पर उच्यते ॥ 

तानि सर्वाणि संधाय मनः षष्ठानि   मेधया । आत्मतृप्तः सदाऽऽसीत बहुचिन्त्यमचिन्तयन् ॥

                                                                                                           ( २३७।१८-१९ )