80 - बलरामजी की व्रजयात्रा, श्रीकृष्ण द्वारा रुक्मिणीका हरण तथा प्रद्युम्नके द्वारा शम्बरासुरका वध

व्यासजी कहते हैं - तदनन्तर बलदेवजी अपने बन्धु-बान्धवों के दर्शन के लिये उत्कण्ठित हो नन्दगाँव में आये। उस समय सम्पूर्ण गोप और गोपियाँ उनसे पूर्ववत् मिलीं। बलरामजी ने सबको आदर देते हुए सबके साथ प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया। किन्हीं ने उनको हृदय से लगाया। कुछ लोगो का उन्होंने गाढ़ आलिङ्गन किया तथा कुछ गोप-गोपियों के साथ बैठकर उन्होंने हास्य-विनोद किया। वहाँ गोपों ने बलरामजी से अनेकों प्रिय लगनेवाली बातें कहीं। कुछ गोपियाँ उन्हें देखकर प्रेमानंद में निमग्न हो गयीं तथा कुछ दूसरी गोपियोंने ईर्ष्यापूर्वक पूछा- 'चञ्चल प्रेमरस से आस्वादन में व्यग्र रहनेवाले नागरी स्त्रियों के प्रियतम श्रीकृष्ण तो सुखसे हैं न? क्षणिक अनुराग दिखानेवाले श्यामसुन्दर क्या कभी हमारी चेष्टाओंका उपहास करते हुए नगर की महिलाओं के सौभाग्यका माँ नहीं बढ़ाते? क्या श्रीकृष्ण कभी हमारे गीतोंका अनुसरण करनेवाले मधुर स्वरका स्मरण करते हैं? क्या वे एक बार भी अपनी माता को देखने के लिये यहाँ आयेंगे? अथवा उनकी बात करनेसे हमें क्या लाभ। कोई दूसरी बात क्रो।यदि हमारे बिना उनका काम चल सकता है तो उनके बिना हमारा भी चल जाएगा। हमने उनके लिये पिता, माता, भ्राता, पति और बन्धु-बान्धव-किसको नहीं छोड़ दिया। फिर भी वे कृतज्ञ न हो सके तथापि बलराम जी! क्या श्रीकृष्ण कभी यहाँ आने के विषय में भी आप से बात करते हैं? दामोदर श्रीकृष्णका मन तो नगर की स्त्रियों में आसक्त हो गया है। हमपर अब उनका प्रेम नहीं रहा। अत: हमारे लिये उनका दर्शन दुर्लभ ही जान पड़ता है।'

भगवान् श्रीकृष्ण ने गोपियों का चित्त आकृष्ट कर लिया था। वे बलभद्रजी को भी 'हे कृष्ण! हे दामोदर!' कहकर पुकार ने और जोर-जोर से हँसने लगीं। तब बलरामजीने श्रीकृष्ण के सौम्य, मधुर, प्रेमगर्भित, अभिमानशून्य और अत्यन्त मनोहर संदेश सुनाकर गोपियों को सान्त्वना दी। फिर गोपों के साथ प्रेमपूर्वक हास- परिहासयुक्त मनोहर बातें किन और पहलेकी ही भाँति वे उनके साथ व्रजभूमि में विचरण करने लगे। दो महीने वहाँ रहकर वे पुन: द्वारका को चले गये। उनका विवाह राजा रेवतकी कन्या रेवतीसे हुआ। उसके गर्भसे बलरामजी ने निशठ और उल्मुक नामक दो पुत्र उत्पन्न किये।

विदर्भ देश में कुण्डिनपुर नामक एक नगर है, वहाँ राजा भीष्म राज्य करते थे। उनके पुत्रका नाम रुक्मी और कन्याका नाम रुक्मिणी था। श्रीकृष्ण रुक्मिणी को प्राप्त करना चाहते थे और मनोहर मुसकानवाली रुक्मिणी भी श्रीकृष्णचन्द्र को पतिरूप में पाने की अभिलाषा रखती थी। उन्होंने कुण्डिननरेश से रुक्मिणीके लिये प्रार्थना भी की, किन्तु रुक्मीने द्वेषवश श्रीकृष्ण की प्रार्थना ठुकरा दी। जरासंधकी प्रेरणासे परम पराक्रमी राजा भीष्मकने रुक्मीके साथ मिलकर शिशुपालको विवाह सम्पन्न करनेके लिये जरासंध आदि सभी प्रमुख राजा उसे साथ ले कुण्डिनपुर में गये। श्रीकृष्ण भी बलभद्र आदि यादवों के साथ चैद्यनरेश का विवाह देखने के लिये वहाँ उपस्थित हुए।

                   विवाह होने में एक ही दिन की देर थी, इसी समय श्रीहरि ने बलभद्र आदि बन्धुजनोंपर शत्रुओंके रोकने का भार रखकर राजकुमारी रुक्मिणीको हर लिया। इससे पौण्‌‌‍डक, दन्तवक्त्र, विदूरथ, शिशुपाल, जरासंध और शाल्व आदि राजा बहुत कुपित हुए। उन्होंने श्रीकृष्णको मार डालनेकी भारी चेष्टा की, किन्तु बलराम आदि यादव वीरों ने सामना करके उन सबको परास्त कर दिया। तब रुक्मीने यह प्रतिज्ञा करके कि 'मैं श्रीकृष्णको युद्ध में मारे बिना कुण्डिनपुर में प्रवेश नहीं करूँगा,' श्रीकृष्णका पीछा किया; परन्तु चक्रपाणि श्रीकृष्ण ने हाथी, घोड़, पैदल और रथों से युक्त रुक्मीकी चतुरङ्गिणी सेना का वध करके उसे लीलापूर्वक जीत लिया और पृथ्वीपर गिरा दिया। इस प्रकार रुक्मीको जीतकर मधुसूदन ने रुक्मिणी के साथ विधिपूर्वक विवाह किया। रुक्मिणी के साथ विधिपूर्वक विवाह किया। रुक्मिणी के गर्भसे बलवान् प्रद्युम्न का जन्म हुआ, जो कामदेव के अन्ध थे, जिन्हें जन्म के समय ही शम्बरादूरका वध किया था।

मुनियोंने पूछा - मुने! शम्बरासुर ने वीरवर प्रद्युम्नका अपहरण कैसे किया और महापराक्रमी शम्बर प्रद्युम्नके हाथसे किस प्रकार मारा गया?

व्यासजी बोले - ब्राह्मणों! शम्बरासुर कालके समान विकराल था। उसे यह बात मालूम हो गयी थी कि श्रीकृष्ण का पुत्र प्रद्युम्न मेरा वध करेगा; अत: उसने जन्म के छठे दिन ही प्रद्युम्नको सूतिका गृह से हर लिया और उन्हें ले जाकर समुद्र में फेंक दिया। वहाँ उस बालकको एक मत्स्यने निगल लिया, किन्तु उसकी जठराग्निसे तप्त होनेपर भी बालककी मृत्यु न हो सकी। तदनन्तर मछेरों ने अन्य मछलियों के साथ उस मत्स्य को भी मारा और असुरों में श्रेष्ठ शम्बरासुर को भेंट कर दिया। उसके घर में मायावती नामकी एक युवती गृहस्वामिनी थी। वह सुन्दरी रसोइयों का आधिपत्य करती थी। जब मछलीका पेट चीरा गया, तब उसमें मायावती ने एक अत्यन्त सुन्दर बालक देखा, जो जले हुए कामरूपी वृक्षका प्रथम अङ्कुर था। 'यह कौन है? किस प्रकार मछलीके पेट में आ गया?' इस प्रकार कौतूहल में पड़ी हुई उस कृशाङ्गी तरुणीसे नारदजी ने कहा- 'यह सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण का पुत्र है। इसे शम्बरासुर ने सौरीसे चुराकर समुद्र में फेंक दिया और वहाँ मत्स्य ने निगल लिया था। वही यह बालक है, जो आज तुम्हारे हाथ आ गया। सुन्दरी! यह मनुष्यों में रत्न है। तुम पूर्ण विश्वासके साथ इसका पालन क्रो।'

देवर्षिन नारद के यों कहनेपर मायावती ने उस बालकका पालन किया। उसका अत्यन्त सुन्दर रूप देखकर वह मोहित थी और बचपनसे ही अत्यन्त अनुरागपूर्वक उसकी सेवा करने लगी। जिस समय वह बालक युवावस्थाकी संधिसे सुशोभित हुआ, उस समय वह गजगामिनी बाला प्रद्युम्न के प्रति कामनायुक्त भाव प्रकट करने लगी। मायावती ने महात्मा प्रद्युम्नको सारी माया सिखा दी। उसका मन उन्हींमें रमता था और उसके नेत्र सदा उन्हीं को निहारते रहते थे। मायावतीको अपने प्रति आसक्त होते देख कमलनयन प्रद्युम्नने कहा- 'तू मातृभाव का परित्याग करके यह विपरीत भावना कैसे करती है?' मायावती ने कहा- 'तुम मेरे नहीं, भगवान् श्रीकृष्ण के पुत्र हो। तुम्हें कालरूपी शम्बरने चुराकर समुद्र में फेंक दिया था। तुम मुझे मछली के पेट से प्राप्त हुए हो। प्रिय! तुम्हारी पुत्रवत्सला माता आज भी तुम्हारे लिये रोती है।'

मायावती के यों कहने पर महाबली प्रद्युम्न का चित्त क्रोधसे व्याकुल हो उठा। उन्होंने शम्बरासुरको युद्धके लिए ललकारा और उसकी सारी दैत्यसेनाका संहार करके सातों मायाओं को जीतकर उसके ऊपर आठवीं मायाका प्रयोग किया। उस माया से प्रद्युम्नने कालरुपी शम्बरको मार डाला और आकाशमार्गसे उड़कर वे मायावती के साथ अपने पिताके नगर में आये। अन्त:पुरमें उतरने पर मायावतीसहित प्रद्युम्न को देखकर श्रीकृष्ण की रानियाँ प्रसन्न हो अनेक प्रकार के संकल्प करने लगीं। रुक्मिणी की दृष्टि प्रद्युम्न की ओर से हटती ही नहीं थी। वे स्नेह में भरकर कहने लगीं- 'यह अवश्य ही किसी बड़भगिनी का पुत्र है। अभि इसकी युवावस्थाका आरम्भ हो रहा है। यदि मेरा पुत्र प्रद्युम्न जीवित होता तो उसकी भी यही अवस्था होती। बेटा! तुमने अपने जन्म से किस सौभाग्यशालिनी जननी की शोभा बढ़ायी है? अथवा तुम्हारे प्रति मेरे हृदय में जैसा स्नेह उमड़ रहा है, उसके अनुसार मैं यह स्पष्टरूप से कह सकती हूँ कि तुम श्रीहरि पुत्र हो।'

इसी समय श्रीकृष्ण के साथ नारदजी वहाँ आये। उन्होंने अन्त:पुर में रहनेवाली रुक्मिणी देवीसे प्रसन्नतापूर्वक कहा- 'सुभ्रू! यह तुम्हारा पुत्र प्रद्युम्न है। इस समय शम्बरासुर को मारकर यहाँ आया है। कुछ वर्ष पहले शम्बरासुर ने ही तुम्हारे पुत्रको सूतिकागृह से हर लिया था। यह तुम्हारे पुत्र की स्ति भार्या मायावती है। यह शम्बरासुरकी पत्नी नहीं है। इसका कारण सुनो। जब शंकर जी के कोपसे कामदेव का नाश हो गया, तब उनके पुनर्जन्मकी प्रतीक्षा करती हुई रति ने अपने मायामय रूपसे शम्बरासुर को मोहित किया। देवि! तुम्हारे पुत्ररूप में ये कामदेव ही अवतीर्ण हुए हैं और यह उन्हीं की पत्नी रति है। कल्याणी! यह तुम्हारी पुत्रवधू है, इसमें किसी प्रकार की विपरीत शङ्का न करना।'

यह सुनकर रुक्मिणी और श्रीकृष्णको बड़ा हर्ष हुआ। समस्त द्वारकापुरी 'धन्य! धन्य!' कहने लगी। चिरकाल से खोये हुए पुत्र के साथ माता रुक्मिणीका मिलन देख द्वारकापुरी के सब लोगों को बड़ा विस्मय हुआ।