ब्रह्माजी कहते हैं - नारद! गारुड नामक तीर्थ सब विघ्नोंकी शान्ति करनेवाला है। उसके प्रभावका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो। शेषनाग के एक महाबली पुत्र था, जो मणिनाग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसे सदा गरुड़का भय बना रहता था, अत: उसने अपनी भक्तिके द्वारा भगवान् शंकरको संतुष्ट किया। प्रसन्न होनेपर भगवान् महेश्वरने कहा- 'नाग! कोई वर माँगो।' नागने कहा- 'प्रभो! मुझे गरुड़से अभय-दान दीजिये।' भगवान् शिवने कहा- 'ऐसा ही होगा। तुम्हें गरुड़ से भय न हो।' वरदान पाकर मणिनाग गरुड़ निर्भय हो बाहर निकला। वह क्षीरसागरके समीप, जहाँ भगवान् विष्णु शयन करते हैं, इधर-उधर विचरने लगा। जहाँ गरुड़ निवास करते थे, उस स्थान पर भी वह जाया करता। गरुड़ने उस नागको निर्भय विचरते देख पकड़ लिया और अपने गहर में लाकर डाल दिया।
इसी बीचमें नन्दीने जगदीश्वर भगवान् शिव से कहा- 'देवेश्वर! अब मणिनाग नहीं आता है। जान पड़ता है गुरुडने उसे कहा लिया या बाँध रखा है। यदि वह जीवित होता तो यहाँ आये बिना न रहता।' नन्दीकी बात सुनकर भगवान् शिव ने नाग कीअवस्थाको जान लिया और कहा- 'वह नाग गुरुडके घर में बँधा पड़ा है। तुम शीघ्र जाकर जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी स्तुति करो और गरुड़के द्वारा बन्धनमें डाले हुए नागको मेरे कहनेसे ले आओ।' प्रभुकी बात सुनकर नन्दी स्वयं ही लक्ष्मीपतिके पास उपस्थित हुए और भगवान् शिवकी कही हुई बातें वहाँ निवेदन कीं। तब भगवान् नारायणने प्रसन्न होकर गरुड़से कहा -'विनतानन्दन! मेरी बात मानकर नन्दीको वह नाग लौटा दो' गरुड़ने नाग देना स्वीकार नहीं किया और गर्वसे कहा -'मैं आपका भृत्य हूँ; मैं नाग को लाया, आप उसे नन्दीको दे रहे हैं। स्वामी तो सेवकोंको दिया करते हैं, परंतु आप तो मेरी प्राप्य वस्तुको छीन रहे हैं। मेरी शक्ति आप जानते ही हैं। मेरे ही बलसे तो आपने संग्राममें दैत्योंप्र विजय प्राप्त की है।'
भगवान् विष्णुने गरुड़की बात सुनकर सबके सामने हँसकर कहा- 'पक्षिराज! ठीक है, तुम्हारे ही बलसे मैंने असुरोंपर विजय पायी है।' फिर भगवान् ने क्रोध न करके कहा- 'गरुड़! मैं मानता हूँ तुममें विलक्षण शक्ति है; पर तुम मेरी इस कनिष्ठ अँगुलीको तो वहन क्रो।' इतना कहकर भगवान् ने अपनी अँगुली गरुड़ के मस्तकपर रख दी। गरुड़ अँगुलीका भार सह नहीं सके। तब गरुड़ ने दीनभावसे लज्जित होकर हाथ जोड़कर प्रार्थना की और कहा- 'मैं आपका अपराधी सेवक हूँ। मेरा परित्राण कीजिये।' फिर उन्होंने माता लक्ष्मीसे प्रार्थना की। लक्ष्मीजी ने कृपाकुल होकर जनार्दन से कहा- 'नाथ! विपन्न भृत्य गरुड़की रक्षा कीजिये।' तब भगवान् ने नन्दी से कहा- 'नन्दीकेश्वर! तुम गरुड़के सतह ही नाग को महादेवजी के पास ले जाओ।' 'बहुत अच्छा' कहकर नन्दी गरुड़ और नाग के साथ धीरे-धीरे शंकरजी के पास गये और सब समाचार उन्हें कह सुनाया।
तब शंकरजी ने गरुड़से कहा- 'महाबाहो! तुम लोकपावनी गौतमी गङ्गाके पास जाओ। वे समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली हैं। उस शान्तिमयी सरिता में स्नान करनेसे तुम्हें समस्त इच्छित वस्तुएँ सौगुनी अथवा सहस्त्रगुनी होकर मिलेंगी। गरुड़! जो सब प्रकार के पापों से संतप्त हैं, दुर्दैव से जिनका उद्योग नष्ट हो गया है, उन प्राणियोंके लिए मनोवांछित फल देनेवाली गोदावरी नदी ही शरण हैं।' भगवान् शिव की यह बात सुनकर गरुड़ प्रणाम करके चले गये। गोदावरीके तटपर पहुँचकर उन्होंने जल में स्नान किया और भगवान् शिव तथा विष्णुके चरणोंमें मस्तक झुकाया। फिर उनमें पूर्ववत् वेग आ गया और वे उड़कर भगवान् विष्णु के समीप चले गये। तबसे वह समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला तीर्थ 'गारुडतीर्थ' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। वत्स नारद! मनुष्य मन और इन्द्रियों को संयममें रखते हुए वहाँ स्नान आदि जो भी कर्म करता है, वह सब अक्षय तथा शिव और विष्णुको प्रिय लगनेवाला होता है।
उसके आगे सब पापोंका नाश करनेवाला गोवर्धनतीर्थ है। वह पितरोंके लिए पुण्यजनक तथा स्मरणमात्रसे पाप दूर करनेवाला है। नारद! मैंने उसका प्रभाव प्रत्यक्ष देखा है। पूर्वकाल में जाबालि नामसे प्रसिद्ध एक किसान ब्राह्मण रहता था। वह दोपहर हो जानेपर भी हलसे बैलोंको खोलता नहीं था। उनके दोनों बगलमें और पीठपर चाबुक मरता रहता था। उसके दोनों बैल सदा आँखों से आँसू बहाते रहते थे। एक दिन कामधेनु गौ जगन्माता सुरभिने नन्दीसे सब हाल कहा। नन्दी भी खिन्न होकर भगवान् शंकरको सब बातें बतायीं। तब शंकरजी ने नन्दीसे कहा- 'तुम्हारी प्रत्येक बात सिद्ध हो।'
महादेवजीकी यह आज्ञा पाकर नन्दीने समस्त गोजातिको अपनेमें समेत लिया। स्वर्गलोक और मर्त्यलोककी समस्त गौएँ अदृश्य हो गयीं। तब देवताओंने मेरे पास आकार कहा- 'भगवन्! गौओंके बिना जीवन नहीं रह सकता।' उस समय मैंने देवताओंसे कहा- 'जाओ, भगवान् शंकरसे याचना करो।' तदनन्तर उन्होंने भगवान् शंकरकी स्तुति करके उनसे सब हाल कहा। महादेवजी ने भी देवताओंको उत्तर दिया- 'इस विषयमें नन्दी जानते हैं।' तब सब देवता नन्दिकेश्वरके पास जाकर बोले- 'हमें जगत् का उपकार करनेवाली गौएँ दीजिए।' नन्दी बोले- 'आपलोग गो-यज्ञ कीजिये, तभी' दिव्य और मानस गौएँ प्राप्त होंगी।' तत्पश्चात् गौतमी गङ्गाके तटपर देवताओंने गोयज्ञका आयोजन किया। फिर वहाँसे गौएँ बढ़ने लगीं। तभी से वह तीर्थ'गोवर्धन' नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह देवताओंकी प्रीति बढ़ानेवाला है। मुनिश्रेष्ठ! वहाँ किया हुआ केवल स्नान भी सहस्त्र गो-दानोंका फल देनेवाला है।
Summary of chapter 42 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
Indradyumna and his retinue, guided by divine grace, journey to the eastern coast and first sight the sacred kṣetra of Puruṣottama (Nīlāgiri, the Blue Mountain). The moment of sighting is itself declared supremely meritorious. The king beholds the ocean, the sacred hill, and the divine environment, and his heart overflows with devotion as he arrives at the threshold of the Lord's abode.