ऋषियोंने कहा - ब्राह्मन्! वैवस्वत मन्वन्तर में प्रचेताओं के पुत्र प्रजापति दक्षका अश्वमेध-यज्ञ कैसे नष्ट हुआ?
ब्रह्माजी बोले - ब्राहमणो! महादेवजी ने सती-देवीका प्रिय करने की इच्छा से जिस प्रकार दक्ष के यग्य का विध्वंस किया था, उसका वर्णन करता हूँ। पूर्वकाल की बात है, महादेवजी मेरुगिरि के ज्योति:स्थल नामक शिखरपर, जो सब प्रकार के रत्नों से विभूषित और पलंग की भाँति फैला हुआ था, विराजमान थे। गिरिराजकुमारी पार्वती सदा उनके पार्श्वभाग में बैठी रहती थीं। आदित्य, वासु, अश्विनीकुमार, गुह्यकोंसहित कुबेर, महामुनि शुक्राचार्य तथा सनत्कुमार आदि महर्षि उनकी सेवा में उपस्थित रहते थे। अत्यन्त भयंकर राक्षस एवं महाबली पिशाच, जो अनेक रूप धारण करनेवाले तथा नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थे, भगवान् शिवके समीप रहा करते थे। भगवान् क्र पार्षद भी वहाँ मौजूद थे। वे सब अग्नि के समान तेजस्वी जान पड़ते थे। महादेवजी की इच्छा से भगवान् नन्दीश्वर भी वहाँ खड़े रहते थे। नदियों में श्रेष्ठ गङ्गाजी मूर्तिमती होकर उनकी सेवा में संलग्न रहती थीं। इस प्रकार परम सौभाग्यशाली देवर्षियों और देवताओं से पूजित होकर भगवान् शङ्कर वहाँ सदा निवास करने लगे। कुछ काल के बाद प्रजापति दक्ष ने शास्त्रोक्त विधि के अनुसार यज्ञ करने की तैयारी की। उनके उस यज्ञ में इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता स्वर्ग से आकर एकत्रित होने लगे। वे अग्नि के समान तेजस्वी देवता दक्षके अनुरोध से प्रकाशमान विमानों पर बैठकर गङ्गाद्वार को गये। पृथ्वी, आकाश तथा स्वर्गलोक में रहनेवाले सभी देवता प्रजापति के पास हाथ जोड़कर उपस्थित हुए। आदित्य, वासु, रूद्र, साध्य तथा मरूद्रण- ये सब यज्ञमें भाग लेने के लिये भगवान् विष्णु के साथ वहाँ पधारे थे। ऊष्मप, धूपम, आज्यप तथा सोमप नामवाले देवता भी अश्विनीकुमारों के साथ वहाँ उपस्थित थे। ये तथा और भी अनेक भूत-प्राणियों का समुदाय वहाँ एकत्रित हुआ था। जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उभ्दिज्ज भी उस यज्ञ में सम्मिलित थे। देवता लोग स्त्रियों तथा महर्षियों के साथ वहाँ पधारे थे।
देवताओं को वहाँ जाते देख गिरिराजकुमारी पार्वतीने भगवान् शङ्कर से पूछा- 'भगवन्! ये इन्द्र आदि देवता कहाँ जाते हैं?'
महादेवजी बोले - महाभागे! प्रजापति दक्ष अश्वमेध-यज्ञ करते हैं। उसी में सब देवता जा रहे हैं।
देवीने पूछा - महाभाग! आप इस यज्ञ में क्यों नहीं जाते? ऐसी कौन-सी रूकावट है, जिससे आपका वहाँ जाना नहीं होता?
महादेवजी बोले - महाभागे! देवताओंने ही यह सब किया है। उन्होंने किसी भी यज्ञ में मेरा भाग नहीं रखा है। पहले से जो मार्ग चला आता है, उसी से अपने को भी चलना चाहिये।
उमाने कहा - भगवन्! आप सब देवताओं में श्रेष्ठ हैं। आपके गुण और प्रभाव सबसे अधिक हैं। आप अपने तेज, यश और श्रीके द्वारा अजेय एवं अधृष्य हैं। महाभाग! यज्ञ में आपके भागका जो यह निषेध है, इससे मुझे बड़ा दु:ख हुआ है। मेरे शरीर मियन कम्प छा गया है।
महादेवजी बोले - देवि! क्या तुम मुझे नहीं जानतीं! आज तुम्हें जो मोह हुआ है, उससे इन्द्र आदि देवताओं सहित सम्पूर्ण त्रिलोकी नष्ट हो सकती है। मैं ही यज्ञका स्वामी हूँ। मेरी ही सब लोग निरन्तर स्तुति करते हैं। मेरे ही संतोषके लिये सब लोग रथन्तर सामका गान करते हैं। ब्राह्मण वेदमन्त्रोंसे मेरा ही यजन करते हैं तथा अध्वर्यु लोग यज्ञ में मेरे ही लिये भागों की कल्पना करते हैं।
प्राणों के समान प्रियतमा पत्नी से यों कहकर भगवान् शङ्करने अपने मुखसे क्रोधाग्निजनित एक महाभूतकी सृष्टि की। फिर उससे कहा- 'तुम मेरी आज्ञा से दक्ष के यज्ञ में जाओ और उसका शीघ्र विनाश करो।' तब उसने रुद्रकी आज्ञा से सिंहका वेष धारण करके दक्ष के यज्ञ का विनाश कर डाला। उसने अपने कर्मका साक्षी बनाने के लिये अत्यन्त भयंकर भद्रकाली को भी साथ ले लिया था। भगवान्का वह क्रोध वीरभद्र के नाम से विख्यात हुआ, जो श्मशानभूमि में निवास करता है। उसने पार्वतीदेवी के खेदका निवारण किया था। वीरभद्र अपने रोमकूपोंसे अनेक रुद्रगण उत्पन्न किये, जो रुद्रके समान ही वीर्यवान् और पराक्रमी थे। वे सब सैकड़ों और हजारों की संख्या में झुंड बनाकर उस यज्ञमण्डपमें गये। उनकी किलकिलाहट से समस्त आकाश गूँज उठा। अग्नि और सूर्यका प्रकाश मन्द पड़ गया। चारों ओर अन्धकार छा गया। उस समय वे समस्त रुद्रगण यज्ञमण्डपमें आग लगाने लगे; किसी ने यूपोंको तोड़ डाल, किसी ने उन्हें उखाड़ दिया, कोई सिंहनाद करता और कोई वहाँ की सब वस्तुओं को तहस-नहस कर डालता था। कितने ही वायु के समान वेग से इधर-उधर दौड़ लगाने लगे। यज्ञपात्र चूर-चूर हो गये। वहाँ के मण्डप ढह गये। ऐसा जान पड़ता था, आकाश से तारे टूटकर गिर रहे हैं। कोई यज्ञ में रखे हुए भोज्य पदार्थों को खाते और सब ओर लोगों को डराते फिरते थे। कितने ही पर्वताकार भूत देवाङ्गनाओं को उठाकर फेंक देते थे। ऐसे गणों के साथ प्रतापी वीरभद्र ने पहुँचकर देवताओं द्वारा सुरक्षित यज्ञ को भद्रकाली के सामने ही भस्म कर डाला। अन्य रुद्रगण सबको भय उपजानेवाली गर्जना करने लगे। कुछ लोगों ने यज्ञ का मस्तक काटकर भयंकर नाद किया। तब इन्द्र आदि देवताओं और प्रजापति दक्षने हाथ जोड़कर पूछा- 'बताइये, आप कौन हैं?'
वीरभद्रने कहा - मैं न देवता हूँ, न दैत्य हूँ। न इस यज्ञ में भोजन करने आया हूँ और न कौतूहलवश इसे देखनेको ही मेरा आना हुआ है। मैं इस यज्ञ का विध्वंस करने के लिये आया हूँ। मेरा नाम वीरभद्र है। मैं रूद्रके कोपसे प्रकट हुआ हूँ। ये भद्रकाली हैं। इनका प्रादुर्भाव पार्वतीदेवी के क्रोध से हुआ है। ये देवाधिदेव महादेवजी के भेजने से यग्य के समीप आयी हैं। राजेन्द्र! तुम देवदेव भगवान् उमापतिकी शरण में जाओ। उनका क्रोध भी वरदान के ही तुल्य है। तब प्रजापति दक्ष मन-ही-मन भगवान् शङ्कर की शरण में गये। उन्होंने प्राण और अपानको हृदय में रोककर यत्नपूर्वक उनका ध्यान किया। तब भगवान् शिव प्रकट हुए और उन्होंने मुस्कराकर पूछा- 'कहो, तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ?' तब दक्ष ने हाथ जोड़कर कहा- 'भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं अथवा यदि मैं आपका प्रिय एवं कृपापात्र हूँ तो मुझे यह वरदान दबं- 'जो भी भोजन-सामग्री यहाँ खा-पी ली गयी, नष्ट कर दी गयी, यज्ञ जो सामान चूर-चूर करके फेंक दिया गया, वह सब बहुत दिनों से यत्न करके संचित किया गया था। महेश्वर! आपकी कृपा से यह व्यर्थ न जाय।'
ब्रह्माजीने कहा - भगवान् शङ्कर 'तथास्तु' कहकर दाक्षकी कामना पूर्ण की। प्रजापति दक्षने भगवान्से वरदान पाकर पृथ्वीपर घुटने टेक दिये और भगवान् शिवका स्तवन आरम्भ किया।
Summary of chapter 21 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The seven upper cosmic planes — Bhūloka, Bhuvarloka, Svarloka, Maharloka, Janaloka, Tapoloka, and Satyaloka — are described. The nature of each loka, its inhabitants, and the duration of residence there are presented. Brahmaloka at the apex is described as the abode of liberated beings, establishing the vertical cosmological architecture of the purāṇic universe.