ब्रह्माजी कहते हैं - भद्रतीर्थ सब प्रकार के अनिष्टोंका निवारण करनेवाला है। वह समस्त पापोंका नाशक तथा परम शान्तिदायक है। विश्वकर्माकी पुत्री उषा भगवान् सूर्यकी पतिव्रता एवं प्रिय भार्या हैं। छाया भी उनकी ही भार्या हैं। छाया के पुत्र शनैश्चर हैं। शनैश्चरकी बहिन विष्टि हुई। उसकी आकृति भयानक थी। वह पापमयी थी। भगवान् सूर्यने सोचा- 'यह कन्या किसको दूँ?' वे जिस-जिसको कन्या देना चाहते, वही-वही उसकी भयंकरताका समाचार सुनकर उसे लेना अस्वीकार कर देता और कहता- 'ऐसी भार्या लेकर हम क्या करेंगे।'
ऐसी अवस्था में विष्टिने दु:खी होकर अपने पिता से कहा- 'पिताजी! धनवान्, विद्वान्, तरुण, कुलीन, यशस्वी, उदार और सनाथ वरको कन्या देनी चाहिये।१ जो पिता इसके विपरीत आचरण करता है, वह नरकमें पड़ता है। सूर्यदेव! कन्या विद्वानोंके लिए भी धर्म का साधन है। एक ओर पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वी और दूसरी ओर वस्त्राभूषणों से अलंकृत नीरोग कन्या- दोनों एक समान हैं। उस कन्याके दान से पृथ्वीदान का फल होता है। जो कन्या, अश्व, गौ और तिलकी बिक्री करता है, उसका रौरव आदि नरकोंसे कभी छुटकारा नहीं होता। कन्या के विवाह में कभी विलम्ब नहीं करना चाहिये। उसमें विलम्ब करनेपर पिता को जो पाप होता है, उसका वर्णन कौन करता है।२ कन्याके पिता जो उसके लिए दान-पूजन आदि करते हैं, वही सफल समझना चाहिये। कन्याओंको जो कुछ दिया जाता है, उसका पुण्य अक्षय होता है।'*
कन्या के यों कहनेपर भगवान् सूर्य बोले- 'बेटी! में क्या करूँ। तुम्हारी आकृति भयंकर है, इसलिये कोई तुम्हें ग्रहण नहीं करता। स्त्री और पुरुषके विवाह-सम्बन्ध में लोग एक-दूसरे के कुल, रूप, वय, धन, विद्या, सदाचार और सुशीलता आदि देखा करते हैं। मेरे यहाँ सब कुछ है, केवल तुममें गुणोंका अभाव है। क्या करूँ, कहाँ तुम्हारा विवाह करूँ? यदि तुम्हारा ऐसा विचार हो कि जिस किसी के सतह विवाह कर दिया जाय तो तुम अपनी स्वीकृति दो। मैं आज ही तुम्हारा विवाह किये देता हूँ।' यह सुनकर विष्टिने अपने पिता से कहा- 'पति, पुत्र, धन, सुख, आयु, रूप और परस्पर प्रेम- ये पूर्वजन्म में किये हुए कर्मोंके अनुसार प्रपात होते हैं। जीव पहले जन्म में जो बुरा-भला कर्म किये रहता है, उसके अनुकूल ही दूसरे जन्म में उसे फल मिलता है; अत: पिताको तो उचित है कि वह अपने दोष से मुक्त हो जाय- कन्याका कहीं योग्य वर के साथ विवाह कर दे। फल तो उसे पूर्वजन्म के कर्मोंके अनुसार ही मिलेगा।पिता अपने वंशकी मर्यादा के अनुसार कन्याका दान और विवाह सम्बन्ध करता है। शेष बातें जो प्रारब्ध में होती हैं, वे मिल जाती हैं।'
कन्या का यह कथन सुनकर भगवान् सूर्य ने अपनी लोकन्भायंकरी भीषण कन्या विष्टिका विवाह विश्वकर्मा के पुत्र विश्वरूप से कर दिया। विश्वरूप भी वैसे ही भयंकर आकारवाले थे। उन दोनोंके शील और रूप में समानता थी, अत: सदा आपसमें प्रेम बना रहता था। उस दंपत्ति से गण्ड, अतिगण्ड, रक्ताक्ष, क्रोधन, व्यय और दुमुर्ख नामक पुत्र उत्पन्न हुए। इन सबसे छोटा एक पुत्र और हुआ, जिसका नाम हर्षण था। वह पुण्यात्मा, सुशील, सुंदर, शान्त, शुद्धचित्त तथा बाहर-भीतरसे पवित्र था। एक दिन वह अपने मामको देखने के लिए यमराज के घर आया। वहाँ उसने बहुत-से ऐसे जीव देखे, जो स्वर्ग की ही भाँति सुखी थे और बहुतेरे दु:खी भी दिखायी दिए। हर्षणने सनातन धर्मस्वरूप अपने मामा को प्रणाम करके पूछा- 'तट! ये कौन सुखी हैं और कौन नरक में कष्ट भोगते हैं?'
उसके इस प्रकार पूछनेपर धर्मराजने सब बातें ठीक-ठीक बटा दिन। उन्होंने कर्मोंकी सम्पूर्ण गतियोंका पूर्णरूप से निरूपण किया। वे बोले- 'जो मनुष्य विहित कर्म का कभी उल्लङ्घन नहीं करते, उन्हें नरक नहीं देखना पड़ता। जो शास्त्र और शास्त्रीय सदाचारको नहीं मानते, बहुश्रुत विद्वानोंका आदर नहीं करते और विहित कर्मों का उल्लङ्घन करते हैं, वे मनुष्य नरकगामी होते हैं।'* धर्मराज यह वचन सुनकर हर्षणने पू:न कहा- 'सुरश्रेष्ठ! मेरे पिता विश्वरूप बड़े भयंकर हैं। मेरी माता विष्टि भी भयानक ही हैं। मेरे महाबली भ्राता भी वैसे ही हैं। जिस उपाय से उन लोगों की बुद्धि शान्त हो, वे सुरूप, निर्दोष और मङ्गलदायक हो जाएँ, वह मुझे बताइये। मैं उसे करूँगा, अन्यथा मैं उनके पास लौटकर नहीं जाऊँगा।' हर्षण के यों कह्नेपर धरमराज ने उस शुद्ध बुद्धिवाले बालक से कहा- 'हर्षण! तुम वास्तव में हर्षण ही हो। पुत्र तो बहुत-से होते हैं, किन्तु वे सभी कुल का विस्तार करनेवाले नहीं होते। एक ही कोई ऐसा पुत्र होता है, जो समूचे कुलको धारण करता है। जो कुल का आधारभूत, पिता-माता का प्रियकारक और पूर्वजोंका उद्धार करनेवाला है, वही वास्तवमें पुत्र हैं; अन्य जितने हैं, वे रोग हैं। हर्षण! तुमने मेरे मनके अनुकूल बात कही है। यह तुम्हारे नाना भगवान् सूर्य को भी पसंद आयेगी। अत: तुम गौतमी-तटपर जाओ और वहाँ स्नान करके मनको वश में रखते हुए प्रसन्नचित्त से जगत्योनि शान्तस्वरुप भगवान् विष्णुकी स्तुति करो। वे यदि प्रसन्न हो जाएँ तो तुम्हारे समस्त मनोरथों को पूर्ण कर देंगे।'
यह सुनकर हर्षण गौतमी-तटपर गया और स्नान आदि से पवित्र हो देवेश्वर भगवान् विष्णुकी स्तुति करने लगा। इससे प्रसन्न होकर श्रीहरि ने हर्षण को वरदान दिया- 'तुम्हारे कुल का कल्याण हो। समस्त अभद्रों (अमङ्गलों) - की शान्ति होकर भद्र (मङ्गल)- का विस्तार हो।' 'भद्रम् अस्तु' कहने से हर्षणके पिता भद्र कहलाये और माता विष्टि का नाम भद्रा हुआ। तबसेवह स्थान भद्रतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह सब प्रकार से मङ्गलदायक तथा तीर्थ सेवी पुरुषों को सब प्रकार की सिद्धि देनेवाला है। वहाँ भद्रपति के नाम से प्रसिद्ध होकर साक्षात् देवाधिदेव भगवान् जनार्दन श्रीहरि निवास करते हैं, जो मङ्गलके एकमात्र भण्डार हैं।
पतत्रितीर्थ रोगों तथा पापों का नाश करनेवाला है। उसके स्मरणमात्र से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। कश्यप के दो पुत्र हुए- अरुण और गरुड़। उनके कुल में पक्षियों में श्रेष्ठ सम्पाति उत्पन्न हुए। सम्पाति के छोटे भाई का नाम जटायु था। वे दोनों अपने बल से उन्मत्त और एक-दूसरे से लाग-डाँट रखनेवाले थे। एक दिन वे दोनों भगवान् सूर्य को नमस्कार करनेके लिये आकाश में गये। ज्यों ही सूर्यके समीप पहुँचे, दोनों के पंख जल गये और दोनों थककर पर्वत के शिखरपर गिर पड़े। दोनों भाईयों को निश्चेष्ट एवं अचेत होकर गिरा देख अरुण उनके दु:ख से दु:खी हो गये और भगवान् सूर्य से बोले- 'भगवन्! ये दोनों पक्षी पृथ्वीपर गिर पड़े हैं। इन्हें आश्वासन दें, जिससे इनकी मृत्यु न हो।' 'तथास्तु' कहकर सूर्य ने उनको जीवित कर दिया। गरुड़ भी उनकी अवस्था सुनकर भगवान् विष्णुके साथ वहाँ आये और उन्हें सान्त्वना देकर सुख पहुँचाया। तदनन्तर सब लोग अपने संतापका निवारण करनेके लिए गङ्गातटपर गये। जटायु, अरुण, सम्पाति, गरुड़, सूर्य तथा भगवान् विष्णु-सबने उस प्रचुर पुण्यदायक तीर्थ में प्रवेश किया तबसे वह तीर्थ पतत्रितीर्थ के नामसे विख्यात हुआ। वह विष का नाशक तथा सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। साक्षात् सूर्य तथा विष्णु गरुड़ और अरुण के साथ वहाँ गौतमी-तटपर रहते हैं।भगवान् शिवका भी उस तीर्थ में निवास है। इन तीनों देवताओं की उपस्थिति से वह तीर्थ बहुत उत्तम हो गया है। जो वहाँ स्नान करके पवित्र हो उन देवताओं को नमस्कार करता है, वह आधि-व्याधि से मुक्त हो परम सौख्यका भागी होता है।
गौतमी के तटपर विप्रतीर्थ भी बहुत विख्यात है। उसे नारायणतीर्थ भी कहते हैं। उसका उपाख्यान आश्चर्यमें डालनेवाला हैं। अंतर्वेदी (गङ्गा-यमुना के बीच के भूभाग)- में एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेदों के पारंगत विद्वान् थे। उनके कई पुत्र हुए, जो बड़े विद्वान्, गुणवान्, रूपवान् और दयालु थे। उनमें जो सबसे छोटे भाई थे, वे अनेक गुणों से सम्पन्न, शान्त, सर्वज्ञ और परम बुद्धिमान् थे। उनका नाम आसन्दिव था। आसन्विद के पिता उनका विवाह करने के लिए प्रयत्नशील थे। इसी बीच में एक दिन रात को ब्राह्मण-कुमार आसन्विद सोये हुए थे। उस दिन उन्होंने भगवान् विष्णुका स्मरण नहीं किया था। वे उत्तर ओर सिरहाना करके सोये थे और उनका चित्त एकाग्र नहीं था; इसलिये इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली एक क्रूर राक्षसी वहाँ आयी और आसन्विदको उठाकर तुरंत गौतमीके दक्षिण-तटपर चली गयी। वह उस ब्राहमण के साथ इच्छानुसार रूप धारण करके गोदावरी के दक्षिण किनारे की भूमिपर विचरती रहती थे। उसके शरीर में बुढ़ापा आ गया था। एक दिन उस भयंकर राक्षसी ने ब्राह्मण से कहा- 'विप्रवर! ये गङ्गाजी हैं। तुम अन्य ब्राह्मणों के साथ मिलकर यहाँ संध्योपासन करो। जो ब्राह्मण समय पर यत्नपूर्वक संध्योपासन नहीं करते, वे ही देवेश्वरों द्वारा नीच बताये गये हैं। वे चाण्डालों से भी बढ़कर हैं। तुम यहाँ सब लोगों से मुझको अपनी जन्मदायिनी माता बतलाना, नहीं तो अभी तुम्हारा नाश हो जाएगा। द्विजश्रेष्ठ! यदि मेरी बात मानते रहोगे तो मैं तुम्हें सुख दूँगी और तुम्हारा जो प्रिय कार्य होगा, उसे भी पूर्ण करुँगी। कुछ काल के बाद फिर में तुम्हें तुम्हारे देश में, तुम्हारे घर में और तुम्हारे गुरुजनों के पास पहुँचा दूँगी। यह मैं सत्य करती हूँ।' ब्राह्मण ने पूछा- 'तुम कौन हो?' कामरूपिणी राक्षसीन ने कहा- 'मेरा नाम कङ्कालिनी है। मैं संसार में प्रसिद्ध हूँ।' परिचय पाकर मुनिकुमार आसन्दिवका चित्त भयसे व्याकुल हो उठा, परंतु राक्षसी ने अनेक प्रकार की शपथ खाकर उन्हें अपना विश्वास दिलाया। तब ब्राह्मणने कहा- 'तुमने जो कुछ कहा है, मैं वैसा ही करूँगा। तुम्हें जो प्रिय लगेगा, वाही बात बोलूँगा और वही कार्य करूँगा।'
ब्राह्मण की बात सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी ने बुडढी होनेपर भी मनोहर रूप धारण किया और दिव्य वस्त्राभूषणों से विभूषित हो ब्राह्मण को अपने साथ ले इधर-उधर घूमने लगी। वह सर्वत्र यही कहती कि 'यह मेरा पुत्र गुणाकर है।' ब्राह्मणकुमार रूप, सौभाग्य, वय और विद्या से विभूषित थे और यह वृद्धा भी गुणवती दिखायी देती थी; अत: सब लोग उसे ब्राह्मण की माता ही समझते थे। वहाँ किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण ने वस्त्राभूषणों से विभूषित अपनी सुन्दरी कन्या उस राक्षसी को आगे करके आसन्दिवको ब्याह दी। ऐसे सुयोग्य पतिको पाकर कन्या ने अपने को कृतार्थ माना। किन्तु वे ब्राह्मण अपनी गुणवती पत्नी को देखकर बहुत दु:खी हुए। उन्होंने मन-ही-मन सोचा - 'यह पापिनी राक्षसी एक दिन मुझे कहा ही जाएगी। क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? अथवा किससे यह बात कहूँ? मैं भारी संकट में पड़ा हूँ। कौन यहाँ मेरी रक्षा करेगा? मेरी यह कल्याणमयी पत्नी गुणवती, रूपवती और नई अवस्था की है। इसे भी वह राक्षसी अकस्मात् अपना आहार बना लेगी।'
इसी बीच में वह बुढ़िया कहीं चली गयी। उस समय अपने पति को दु:खित जानकर ब्रह्माण की पतिव्रता पत्नी ने एकान्त में विनीत भाव से पूछा- 'नाथ! आप क्यों कष्ट में पड़े हैं? ठीक-ठीक बताइये।' 'ब्राह्मण ने सब बातें विस्तार के साथ बता दीं। प्रिय मित्र और कुलीन पत्नी से कौन-सी बात अकथनीय है। पति की बात सुनकर स्त्री ने कहा- 'प्राणनाथ! जिसका मन ओने वश में नहीं है, उसको तो सब ओर भय है। वह घर में भी निर्भय नहीं है। परंतु जिन्होंने अपने आत्मापर अधिकार प्राप्त कर लिया है, उन्हें किससे भय है? वह भी गौतमी-तटपर, जहाँ कितने ही वैष्णव, विरक्त और विवेक की पुरुष निवास करते हैं। यहाँ स्नान करके पवित्र हो भगवान् नारायणकी स्तुति कीजिये।' यह सुनकर ब्राह्मण ने गङ्गामें स्नान किया और गौतमी के तटपर भगवान् नारायणका स्तवन आरम्भ किया- 'नाथ! आप इस जगत् के अन्तरात्मा हैं। मुकुन्द! आप ही इसकी सृष्टि और संहार करनेवाले हैं। अनाथबन्धु नृसिंह! आप ही सबके पालक हैं। मुझ दीन की रक्षा क्यों नहीं करते?' यह प्रार्थना सुनकर संसारका शोक सूर करनेवाले भगवान् नारायणने सहस्त्र अरोंवाले तेजोमय सुदर्शनचक्रसे उस पापिनि राक्षसी को मार डाला और उस ब्राह्मण को अभीष्ट वरदान से उसे माता-पिता के पास पहुँचा दिया। तबसे वह स्थान विप्रतीर्थ और नारायणतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वहाँ स्नान, दान और औउज आदि करनेसे मनोवाञ्छित फल की सिद्धि होती है।
१ श्रीमते विदुषे यूने कुलीनाय यशस्विने। उदाराय सनाथाय कन्या देया वराय वै ॥
(१६५। ८)
२ एकत: पृथिवी कृत्स्ना सशैलवनकानना।
स्व स्वलंकृतोपाधिहीना सुकन्या चैकत: स्मृता। विक्रीणीते यश्च कन्यामश्वं वा गां तिलान्यपि ॥
न तस्य रौरवादिभ्य: कदाचिन्निष्कृतिर्भवेत्। विवाहातिक्रम: कार्यों न कन्याया: कदाचन ॥
तस्मिन् कृते यत्पितु: स्यात्पापं तत्केन कथ्यते ॥
(१६५। १०-१३)
* यत्कन्याया: पिता कुर्याद् दानं पूजनमीक्षणम् ॥
यत्कृतं तत्कृतं विद्यात्तासु दत्तं तदक्षयम्।
(१६५। १५-१६)
* न मानयन्ति ये शास्त्रं नाचारं न बहुश्रुतान् । विहितातिक्रमं कुर्युर्ये ते नरकगामिन: ॥
(१६५। ३६)
Summary of chapter 63 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The sacred Guṇḍicā Yātrā — the annual chariot procession of Puruṣottama from his main temple to the Guṇḍicā temple — is described. The divine origin of this procession, its annual timing, the extraordinary crowds of devotees who attend, and the supreme merit of witnessing and participating in the Yātrā are expounded. Even a glimpse of the divine chariot is declared equivalent to liberation from many births of sin.