ब्रह्म पुराण

91 - गृहस्थोचित सदाचार तथा कर्तव्याकर्तव्यका वर्णन

व्यासजी कहते हैं – ब्राह्मणो ! इस प्रकार गृहस्थ पुरुष हव्य , कव्य और अन्नसे देवता, पितर तथा अतिथियोंका पूजन करे। सम्पूर्ण भूत, भरण- पोषणके योग्य कुटुम्बीजन, पशु , पक्षी , चींटियाँ संन्यासी , भिक्षुक , पथिक तथा सदाचारी ब्राह्मण आदि जो भी उपस्थित हों , गृहस्थ पुरुष अपने घरमें सबको संतुष्ट करे। जो नित्य और नैमित्तिक क्रियाओंका उल्लङ्घन करता है, वह पापभोजी है।

 मुनि बोले- महर्षे ! आपने पुरुषोंके नित्य नैमित्तिक और काम्य- त्रिविध कर्मोंका वर्णन किया; अब हम सदाचारका वर्णन सुनना चाहते है ,जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य इस लोक और परलोकमें भी सुखका भागी हो।

 व्यासजीने कहा- ब्राह्मणो ! गृहस्थ पुरुषको सदा ही सदाचारकी रक्षा करनी चाहिये। आचारहीन मनुष्यको न इस लोकमें सुख मिलता है न परलोकमें। जो सदाचारका उल्लङ्घन करके मनमाना बर्ताव करता है, उस पुरुषका कल्याण यज्ञ, दान और तपस्यासे भी नहीं होता। दुराचारी पुरुषको इस लोकमें बड़ी आयु नहीं मिलती, अतः उत्तम आचाररूप धर्मका सदा पालन करना चाहिये सदाचार बुरे लक्षणोंका नाश करता है। ब्राह्मणो अब मैं सदाचारका स्वरूप बतलाता हूँ, एकाग्रचित् होकर उसका पालन करना चाहिये । गृहस्थको धर्म , अर्थ और काम- तीनोंके साधनका यत्न करना चाहिये । उनके सिद्ध होनेपर उसे इस लोक और परलोकमें सिद्धि प्राप्त होती है । मनको वशमें करके अपनी आयका एक चौथाई भाग पारलौकिक कल्याणके लिये संगृहीत करे । आधे भागसे नित्य - नैमित्तिक कार्योंका निर्वाह करते हुए अपना भरण - पोषण करे तथा एक चौथाई भाग अपने लिये मूल पूँजीके रूपमें रखकर उसे बढ़ाये । ब्राह्मणो ! ऐसा करनेसे धन सफल होता । इसी प्रकार पापकी निवृत्ति तथा पारलौकिक उन्नतिके लिये विद्वान् पुरुष धर्मका अनुष्ठान करे । वह इस लोकमें भी फल देनेवाला होता है ब्राह्ममुहूर्तमें जागे I जागकर धर्म और अर्थका चिन्त करे । इसके बाद शय्या त्याग कर नित्यकर्मसे निवृत्त हो , स्नान आदिसे पवित्र होकर मनको संयममें रखते हुए पूर्वाभिमुख बैठे और आचमन करके संध्योपासन करे । प्रातः कालकी संध्या उस समय आरम्भ करे ,जब तारे दिखायी देते हों इसी प्रकार सायंकालकी संध्योपासना सूर्यास्तसे पहले ही विधिपूर्वक आरम्भ करे । आपत्तिका सिवा और किसी समय उसका त्याग न करे । द्विजो ! बुरी बुरी बातें बकना , झूठ बोलना , कठोर वचन मुँहसे निकालना, असत् शास्त्र  पढ़ना नास्तिकवादको अपनाना तथा दुष्ट पुरुषोंकी सेवा करना अवश्य छोड़ देना चाहिये।* मनको वशमें रखते हुए प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल हवन करे । उदय और अस्तके समय सूर्यमण्डलका दर्शन न करे। बाल सँवारना, दर्पण देखना, दाँतन करना, आँजन लगाना और देवताओंका तर्पण करना - यह सब कार्य पूर्वाह्नकालमें ही करना चाहिये। ग्राम , निवासस्थान , तीर्थ और क्षेत्रोंके मार्गमें, जोते हुए खेतमें तथा गोशालामें मल - मूत्र न करे I परायी स्त्रीको नंगी अवस्थामें न देखे। अपनी विष्ठापर दृष्टिपात न करे। रजस्वला स्त्रीका दर्शन, स्पर्श तथा उसके साथ भाषण भी वर्जित पानीमें मल मूत्रका त्याग अथवा मैथुन न करे बुद्धिमान् पुरुष मल मूत्र , केश, राख , खोपड़ी भूसी , कोयले , सड़ी - गली वस्तुएँ, रस्सी तथा केवल पृथ्वीपर और मार्गमें कभी न बैठे। गृहस्थ मनुष्य अपने वैभवके अनुसार देवता, पितर, मनुष्य तथा अन्यान्य प्राणियोंका पूजन करके पीछे भोजन करे। भलीभाँति आचमन करके हाथ - पैर धोकर पवित्र हो पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके भोजनके लिये आसनपर बैठे और हाथोंको घुटनोंके भीतर करके मौनभावसे भोजन करे । भोजनके समय मनको अन्यत्र न ले जाय। यदि अन्न किसी प्रकारकी हानि करनेवाला हो तो उस हानिको ही बताये, उसके सिवा अन्नके और किसी दोषकी चर्चा न करे । भोजनके साथ पृथक् नमक लेकर न खाय। जूठा अन्न खाना वर्जित है। मनुष्यको चाहिये कि मनको वशमें रखे और खड़े होकर चलते- चलते मल- मूत्रका त्याग, आचमन तथा किसी वस्तुका भक्षण न करे । जूठे मुँह वार्तालाप न करे तथा उस अवस्थामें स्वाध्याय भी वर्जित है । जूठी अवस्थामें सूर्य ,चन्द्रमा और तारोंकी ओर जानबूझकर न देखे । दूसरेके आसन , शय्या और बर्तनका भी स्पर्श न करे ।

गुरुजनोंके आनेपर उन्हें बैठनेको आसन दे उठकर प्रणाम आदिके द्वारा उनका आदर - सत्कार करे । उनके अनुकूल वार्तालाप करे I जाते समय उनके पीछे - पीछे कुछ दूर जाकर पहुँचाये । उनके प्रतिकूल कोई बर्ताव न करे। एक वस्त्र धारण करके भोजन और देवपूजन न करे। बुद्धिमान् पुरुष ब्राह्मणोंसे बोझ न ढुलाये । आगमें मूत्र त्याग न करे I नग्न होकर कभी स्नान और शयन न करे । दोनों हाथोंसे सिर न खुजलाये। बिना कारण बार - बार सिरके ऊपरसे स्नान न करे। सिरसे स्नान कर लेनेपर किसी भी अङ्गमें तेल न लगाये। सब अनध्यायोंके दिन स्वाध्याय बंद रखे । ब्राह्मण , अग्नि , गौ तथा सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब न करे। दिनमें उत्तरकी ओर और रातमें दक्षिणकी ओर मुँह करके मल मूत्रका त्याग करे। जहाँ ऐसा करनेमें कोई बाधा हो, वहाँ इच्छानुसार करे। गुरुके दुष्कर्मकी चर्चा न करे। यदि वे क्रुद्ध हों तो उन्हें विनयपूर्वक प्रसन्न करे । दूसरे लोग भी यदि गुरुकी निन्दा करते हों तो उसे न सुने। ब्राह्मण , राजा , दुःखसे आतुर मनुष्य, विद्यावृद्ध पुरुष, और गुरु -  इनको दाहिने करके चले । दूसरोंके धारण किये हुए जूते, वस्त्र और माला आदि स्वयं न पहने I चतुर्दशी , अष्टमी , पूर्णिमा तथा पर्वके दिन तैलाभ्यङ्ग एवं स्त्री - सहवास न करे। बुद्धिमान् मनुष्य बाँहों और पिंडलियोंको ऊपर उठाकर न खड़ा हो तथा पैरोंको भी न हिलाये । पैरसे पैरको न दबाये I किसीको चुभती हुई बात न कहे । निन्दा और चुगली छोड़ दे। दम्भ ,अभिमान और तीखे व्यवहारका त्याग करे। मूर्ख , उन्मत्त , व्यसनी कुरूप , हीनाङ्ग और निर्धन मनुष्योंकी खिल्ली उड़ाये। दूसरेको दण्ड न दे , केवल पुत्र और शिष्यको शिक्षा देनेके उद्देश्यसे दण्ड दिया जा सकता है । आसनको पैरसे खींचकर न बैठे सायंकाल और प्रातः काल पहले अतिथिका सत्कार करके पीछे स्वयं भोजन करे।

पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके ही दाँतन करे । दाँतन करते समय मौन रहे । दाँतनके लिये निषिद्ध वृक्ष एवं लताओंका परित्याग करे । उत्तर और पश्चिमकी ओर सिर करके कभी न सोये दक्षिण या पूर्व दिशाकी ओर ही मस्तक करके सोना चाहिये । जहाँसे दुर्गन्ध आती हो , ऐसे जलमें तथा रात्रिकालमें स्नान न करे । ग्रहणके समय रात्रिमें भी स्नान करना बहुत उत्तम है इसके सिवा अन्य समयमें दिनमें ही स्नानका विधान है । वस्त्रके छोरसे अथवा वस्त्र हाथमें लेकर उससे शरीरको न मले बालों और वस्त्रोंको न झटकारे विद्वान् पुरुष स्नान किये बिना कभी चन्दन न लगाये । एक - दूसरेके वस्त्र और आभूषणोंको अदल - बदलकर न पहने । जिसमें कोर न हो और जो बहुत फट गया हो ऐसा वस्त्र न पहने । जिसमें कीड़े अथवा बाल  पड़े हों , जिसे कुत्तेने देखा अथवा चाट लिया अथवा जो सारभाग निकाल लेनेके कारण दूषित हो गया हो , ऐसे अन्नको कभी न खाय । भोजनके साथ अलग नमक रखकर न खाय। बहुत देरके  बने हुए सूखे और बासी अन्नको त्याग दे। पिट्ठी साग , ईखके रस और दूधकी बनी हुई वस्तुएँ भी यदि बहुत दिनोंकी हों तो उन्हें न खाय। सूर्यके उदय और अस्तके समय शयन न करे । बिना नहाये , बिना बैठे , अन्यमनस्क होकर , शय्यापर बैठकर या सोकर , केवल पृथ्वीपर बैठकर बोलते हुए तथा भृत्यवर्गको दिये बिना कदापि भोजन न करे। मनुष्य स्नान करके सबेरे और शाम दो समय विधिपूर्वक भोजन करे।

 विद्वान् पुरुषको कभी परायी स्त्रीके साथ समागम नहीं करना चाहिये । परस्त्रीसंगम मनुष्योंके इष्ट , पूर्त और आयुका नाश करनेवाला है । इस संसारमें परस्त्री - गमनके समान पुरुषकी आयुका विघातक कार्य दूसरा कोई नहीं है।*  देवपूजा, अग्निहोत्र , पितरोंका श्राद्ध , गुरुजनोंको प्रणाम तथा भोजन भलीभाँति आचमन करके करना चाहिये स्वच्छ , फेनरहित , दुर्गन्धशून्य और पवित्र जल लेकर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके आचमन करना चाहिये। जलके भीतरकी , घरकी , बाँबीकी , चूहेके बिलकी और शौचसे बची हुई— ये पाँच प्रकारकी मिट्टियाँ त्याग देने योग्य हैं। हाथ - पैर धोकर एकाग्रचित्तसे मार्जन करके घुटनोंको समेटकर या चार बार आचमन करे ; फिर दो बार ओठ पोंछकर आँख , कान, मुख , नासिका तथा मस्तकका स्पर्श करे । इस प्रकार जलसे भलीभाँति आचमन करके पवित्र हो देवपूजन तथा श्राद्ध आदिकी क्रिया करनी चाहिये । छींकने , चाटने ,वमन करने , थूकने तथा अस्पृश्यका स्पर्श करनेपर आचमन , सूर्यका दर्शन अथवा दाहिने कानका स्पर्श करना चाहिये । इनमें पहलेके अभावमें दूसरा उपाय करना चाहिये । पहले उपायके सम्भव होनेपर उपायान्तरका अवलम्बन अभीष्ट नहीं।

दाँत न कटकटाये । अपने शरीरपर ताल न दे । दोनों संध्याओंके समय अध्ययन , भोजन और शयनका त्याग करे । सन्ध्याकालमें मैथुन और रास्ता चलना भी मना है । पूर्वाह्नमें देवताओंका , मध्याह्नमें मनुष्योंका तथा अपराह्नकालमें पितरोंका भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये । देवकार्य या पितृकार्यमें सिरसे स्नान करके प्रवृत्त होना उचित है । पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके क्षौर कराये । उत्तम कुलमें उत्पन्न होनेपर भी जो कन्या किसी अङ्गसे हीन या रोगिणी हो, उसके साथ विवाह न करे । ईर्ष्याका परित्याग करे । दिनमें शयन अथवा मैथुन न करे । दूसरोंको कष्ट देनेवाला कार्य न करे । कभी किसी भी जीवको पीड़ा न दे । रजस्वला स्त्री चार रातोंतक सभी वर्णके पुरुषोंके लिये त्याज्य है । यदि कन्याका जन्म अभीष्ट न हो तो उसे रोकनेके लिये पाँचवीं रातमें भी स्त्रीसहवास न करे । छठी रात आनेपर स्त्रीके पास जाय , क्योंकि युग्म रात्रियाँ ही इसके लिये श्रेष्ठ हैं । युग्म रात्रियों में स्त्रीसहवास करनेसे पुत्र होता है और अयुग्म रात्रियोंमें गर्भाधान करनेसे कन्या उत्पन्न होती है । पर्व आदिके अवसरपर मैथुन करनेसे विधर्मी संतान होती है और संध्याकालमें गर्भाधान करनेसे नपुंसक उत्पन्न होते हैं । विद्वान् पुरुष क्षौरकर्ममें रिक्ता ( चतुर्थी , नवमी और चतुर्दशी तिथियोंका परित्याग करे । विनयरहित उद्दण्ड पुरुषोंकी बात कभी न सुने । जो अपनेसे नीचा हो , उसे आदरपूर्वक ऊँचा आसन न दे । हजामत बनवाने , वमन होने , स्त्री प्रसङ्ग करने तथा श्मशानभूमिमें जानेपर वस्त्रसहित स्नान करे । देवता , वेद , द्विज , साधु , सच्चे महात्मा , गुरु , पतिव्रता , वेद , यज्ञ तथा तपस्वीकी निन्दा और परिहास न करे । सदा माङ्गलिक वेष धारण किये रहे । कभी भी अमङ्गलमय वेष न धारण करे । स्वच्छ वस्त्र पहने और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करे उद्धत , उन्मत्त , मूढ़ , अविनीत , शीलहीन , अवस्था और जातिसे दूषित , अधिक अपव्ययी , वैरी , कार्यमें असमर्थ , निन्दित , धूर्तीका संग करनेवाले , निर्धन , विवाद करनेवाले तथा अन्य अधम पुरुषोंके साथ कभी मित्रता न करे । सुहृद् , यज्ञदीक्षित , राजा , स्नातक तथा श्वशुर — इनके साथ मैत्रीका भाव रखे और जब ये घरपर पधारें तो उठकर खड़ा हो जाय ; साथ ही अपने वैभवके अनुसार इनका पूजन करे । प्रतिवर्ष अपने घर आये हुए ब्राह्मणोंका वैभवके अनुसार स्वागत सत्कार करे । अपने घरमें यथास्थान देवताओंका भलीभाँति पूजन करके क्रमशः अग्निमें आहुति दे । पहली आहुति ब्रह्माको , दूसरी प्रजापतिको , तीसरी गृह्याओंको , चौथी कश्यपको तथा पाँचवीं अनुमतिको दे । तत्पश्चात् बलिवैश्वदेव करे । देवताओंके लिये पृथक् - पृथक् स्थानका विभाग करके उनके लिये बलि अर्पण करे । उसका क्रम इस प्रकार है । एक पात्रमें पहले पर्जन्य , जल और पृथ्वीको तीन बलियाँ दे ; फिर पूर्व आदि प्रत्येक दिशामें वायुको बलि देकर क्रमशः उन - उन दिशाओंके नामसे भी बलि समर्पित करे । तत्पश्चात् मध्यमें क्रमशः ब्रह्मा , अन्तरिक्ष और सूर्यको बलि दे । उनके उत्तरभागमें विश्वेदेवों और विश्वभूतोंको बलि दे । फिर उनके भी उत्तरभागमें उषा और भूतपतिको बलि समर्पित करे । तदनन्तर ' पितृभ्यः स्वधा नमः ' यों कहकर दक्षिण दिशामें अपसव्य होकर पितरोंके लिये बलि दे और वायव्य दिशामें अन्नका शेष भाग तथा जल लेकर

' यक्ष्मैतत्ते निर्णेजनम् ' यह मन्त्र पढ़कर उसे विधिपूर्वक छोड़ दे । फिर देवताओं और ब्राह्मणोंको नमस्कार करे । दाहिने हाथमें अँगूठेके उत्तर ओर जो एक रेखा होती है , वह ब्राह्मतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है ; उसीसे आचमन किया जाता है। तर्जनी और अँगूठेके बीचका भाग पितृतीर्थ कहलाता है । नान्दीमुख पितरोंको छोड़कर अन्य सब पितरोंको उसी तीर्थसे जल आदि देना चाहिये । अँगुलियोंके अग्रभागमें देवतीर्थ है। उसीसे देवकार्य करनेका विधान है। कनिष्ठिकाके मूलभागमें कायतीर्थ ( प्रजापति तीर्थ ) है । उससे प्रजापतिका कार्य किया जाता है । इस प्रकार इन तीर्थोंसे सदा देवताओं और पितरोंके कार्य करने चाहिये , अन्य तीर्थोंसे कदापि नहीं । ब्राह्मतीर्थसे आचमन उत्तम माना गया है । पितरोंका श्राद्ध और तर्पण पितृतीर्थसे , देवताओंका यज्ञ- यागादि देवतीर्थसे और प्रजापतिका कार्य कायतीर्थसे करना श्रेष्ठ बताया गया है । नान्दीमुख नामवाले पितरोंके लिये पिण्डदान और तर्पण आदि कार्य प्राजापत्यतीर्थसे करने चाहिये। विद्वान् पुरुष एक साथ जल और अग्नि न ले गुरु , देवता , पिता तथा ब्राह्मणोंकी ओर पैर न फैलाये । बछड़ेको दूध पिलाती हुई गायको न छेड़े। अञ्जलिसे पानी न पिये । शौचके समय विलम्ब न करे । मुखसे आग न फूँके । ब्राह्मणो ! जहाँ ऋण देनेवाला धनी , चिकित्सा करनेवाला वैद्य , श्रोत्रिय ब्राह्मण तथा जलपूर्ण नदी- ये चार न हों , वहाँ निवास नहीं करना चाहिये । जहाँ शत्रुविजयी बलवान् और धर्मपरायण राजा हो , वहीं विद्वान् पुरुषको सदा निवास करना चाहिये।दुष्ट राजाके राज्यमें कहाँ सुख है।*  जहाँ पुरवासी परस्पर संगठित और न्यायानुकूल बर्ताव करनेवाले हों तथा सब लोग शान्त एवं ईर्ष्यारहित हों , वहाँका निवास भविष्यमें सुख देनेवाला होता है । जिस राष्ट्रमें किसान बहुत हों , परंतु वे बहुत घमंडी न हों तथा जहाँ सब तरहके अन्न पैदा होते हों , वहीं बुद्धिमान् पुरुषको निवास करना चाहिये । ब्राह्मणो ! जहाँ अपनेको जीतनेकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य , पहले शत्रु और सदा उत्सवमें ही मग्न रहनेवाले लोग - तीन सदा मौजूद हों , वहाँ कभी निवास नहीं करना चाहिये । जिस स्थानपर अच्छे स्वभाववाले पड़ोसी हों , दुर्धर्ष राजा हो और सदा खेती उपजानेवाली भूमि हो , वहीं विद्वान् पुरुषको रहना उचित है विप्रवरो ! इस प्रकार मैंने तुमलोगोंके हितके लिये सब बातें बतायी हैं ।

अब मैं भक्ष्य और भोज्यकी विधिसे सम्बन्ध रखनेवाली बातें बतलाऊँगा । घी अथवा तेलमें पका हुआ अन्न बहुत देरका बना हुआ अथवा बासी भी हो तो वह भोजन करने योग्य होता है गेहूँ , जौ तथा गोरसकी बनी हुई वस्तुएँ तेल , घीमें बनी हों , तब भी वे पूर्ववत् ग्रहण करने योग्य । शङ्ख , पत्थर , सोना , चाँदी , रस्सी , कपड़ा , साग मूल , फल , मणि , हीरा , मूँगा , मोती , पात्र और चमस इन सबकी शुद्धि जलसे होती है । लोहेके पात्रों एवं हथियारोंकी शुद्धि पानीसे धोने तथा पत्थर यानी शानपर रगड़नेसे होती है । जिस पात्रमें तेल या घी रखा गया हो , उसकी सफाई गर्म जलसे होती है । सूप , मृगचर्म , मूसल , ओखली तथा कपड़ोंके ढेरकी शुद्धि जल छिड़कनेमात्र जाती है । वल्कल वस्त्रकी शुद्धि जल और मिट्टीसे होती है , मिट्टी के बर्तन दुबारा पकानेसे शुद्ध होते हैं । भिक्षामें प्राप्त अन्न, कारीगरका हाथ बाजारमें बिकनेके लिये आयी हुई शाक आदि वस्तुएँ , जिसके गुण - दोषका ज्ञान न हो , ऐसी वस्तु और सेवकोंद्वारा बनायी हुई वस्तु सदा शुद्ध मानी जाती है । जो बहता हो तथा जिससे दुर्गन्ध न आती हो , ऐसा जल शुद्ध माना गया है समयानुसार अग्निसे तपाने , बुहारने , गायोंके चलने- फिरने , लीपने , जोतने और जल छिड़कनेसे भूमिकी शुद्धि होती है । बुहारने आदिसे घर शुद्ध होता है । जिसमें बाल या कीड़े पड़ें हो , जिसे गायने सूँघ लिया हो तथा जिसमें मक्खियाँ पड़ी हों , ऐसे पात्रकी शुद्धिके लिये राख , मिट्टी और जलका उपयोग करना चाहिये । ताँबेका बर्तन खटाईसे राँगा और शीशा जलसे और काँसेके बर्तन राख और जलसे शुद्ध होते हैं । जिस पात्रमें कोई अपवित्र वस्तु पड़ गयी हो , उसे मिट्टी और जलसे तबतक धोये , जबतक कि उसकी दुर्गन्ध दूर न हो जाय इससे वह शुद्ध होता है । धूल , अग्नि , घोड़ा , गौ छाया , किरणें , वायु , भूमि , जलके छींटे और मक्खी आदि — ये सब अशुद्ध वस्तुके संसर्गमें आनेपर भी दूषित नहीं होते । बकरे और घोड़ेका मुख शुद्ध माना गया है , किंतु गायका नहीं बछड़ेका मुँह तथा माताका स्तन भी पवित्र बताया गया है । पेड़से फल गिराते समय पक्षीकी चोंच भी शुद्ध मानी गयी है । आसन , शय्या , सवारी नदीका तट और तृण– ये सब बाजारमें बिकनेवाली वस्तुओंकी भाँति सूर्य और चन्द्रमाकी किरणों तथा वायुके स्पर्शसे शुद्ध होते हैं । सड़कों और गलियों में घूमने - फिरने , स्नान करने , छींक आने हवा खुलने तथा वस्त्र बदलनेपर विधिपूर्वक आचमन करना चाहिये । पक्की ईंटके बने हुए चबूतरे आदिमें यदि कोई अस्पृश्य वस्तु , गलियोंकी कीचड़ या जल आदि लग जाय तो उसकी शुद्धि केवल वायुके स्पर्शसे हो जाती है ।

अनजानमें यदि दूषित अन्न भोजन कर ले तो तीन रात उपवास करनेसे शुद्धि होती है ; और यदि जान - बूझकर किया हो तो उसके दोषकी शान्तिके लिये प्रायश्चित्त करनेसे शुद्धि होती है । रजस्वला स्त्री , नवप्रसूता स्त्री , चाण्डाल तथा मुर्दा ढोनेवाले मनुष्योंसे छू जानेपर शुद्धिके लिये स्नान करना चाहिये । मनुष्यकी गीली हड्डीका स्पर्श कर लेनेपर ब्राह्मण स्नान करनेसे शुद्ध होता है और सूखी हड्डीका स्पर्श करनेपर केवल आचमन करके गायका स्पर्श या सूर्यका दर्शन करनेसे वह शुद्ध सकता है । थूक और उबटनको न लाँघे । जूठन मल - मूत्र और पैरोंकी धोवनको घरसे बाहर फेंके दूसरोंके खुदाये हुए पोखरे आदिमें पाँच लोंदे मिट्टी निकाले बिना स्नान न करे । देवतासम्बन्धी सरोवरों और गङ्गा आदि नदियोंमें सदा ही स्नान करे । असमयमें उद्यान आदिके भीतर कभी न ठहरे । लोकनिन्दित पुरुषों तथा विधवा स्त्रियोंसे कभी वार्तालाप न करे । रजस्वला स्त्री , पतित , मुर्दा , विधर्मी , प्रसूता स्त्री , नपुंसक , वस्त्रहीन , चाण्डाल , मुर्दा ढोनेवाले तथा परस्त्रीगामी पुरुषोंको देखकर विद्वान् पुरुष अपनी शुद्धिके लिये सूर्यका दर्शन करे । अभक्ष्य पदार्थ , भिक्षुक , पाखण्डी , बिल्ली , गदहा , मुर्गा , पतित , जातिबहिष्कृत , चाण्डाल , ग्रामीण सुअर तथा अशौचदूषित मनुष्योंका स्पर्श कर लेनेपर स्नान करनेसे शुद्धि होती है । जिसके घरमें प्रतिदिन नित्यकर्मकी अवहेलना होती है तथा जिसे ब्राह्मणोंने त्याग दिया है , वह नराधम पापभोगी है । नित्यकर्मका त्याग कभी नहीं करना चाहिये । उसे न करनेका विधान तो केवल मरणाशौच और जननाशौचमें ही है । अशौच प्राप्त होनेपर ब्राह्मण दस दिन , क्षत्रिय बारह दिन तथा वैश्य पंद्रह दिनोंतक दान - होम आदि कर्मोंसे अलग रहे । शूद्र एक मासतक अपना कर्म बंद रखे । फिर अशौच निवृत्त होनेपर सब लोग अपने शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करें । मृतकका दाह-संस्कार करनेके बाद उसके गोत्रवाले लोगोंको चाहिये कि बाहर जलाशय आदिमें जाकर पहले , चौथे , सातवें और नवें दिन उस प्रेतके लिये जलाञ्जलि । दाह संस्कारके चौथे दिन समान गोत्रवाले

भाई- बन्धुओंको प्रेतकी चितासे उसकी अस्थियोंका संचय करना चाहिये । अस्थिसंचयके बाद उनके अङ्गोंका स्पर्श किया जा सकता है । फिर समानोदक पुरुष अपने सब कर्म कर सकते हैं । जिस दिन मृत्यु हुई हो , उस दिन समानोदक और सपिण्ड दोनोंका स्पर्श किया जा सकता है । धनके लिये चेष्टा करते समय या स्वेच्छासे अथवा शस्त्र , रस्सी , बन्धन , अग्नि , विष , पर्वतसे गिरने तथा उपवास आदिके द्वारा मृत्यु होनेपर और बालक , परदेशी एवं परिव्राजककी मृत्यु होनेपर तत्काल अशौच निवृत्त हो जाता है । कुछ लोगोंके मतमें तीन दिनोंतक अशौच बना रहता है । यदि सपिण्डोंमेंसे एककी मृत्यु होनेके बाद थोड़े ही दिनोंमें दूसरेकी भी मृत्यु हो जाय तो पहलेके अशौचके साथ ही दूसरेका अशौच भी निवृत्त हो जाता है। अतः पहलेके अशौचमें जितने दिन शेष हों , उतने दिनोंके भीतर दूसरेका भी श्राद्ध आदि कर्म कर देना चाहिये । जननाशौचमें भी यही विधि देखी गयी है । सपिण्ड तथा समानोदक व्यक्तियोंमें एकके बाद दूसरेका जन्म हो तो इसी प्रकार पहलेके साथ दूसरेका अशौच भी निवृत्त हो जाता है पुत्रका जन्म होनेपर पिताको वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये । उसमें भी यदि एकके जन्मके बाद दूसरेका जन्म हो जाय तो पहले जन्मे हुए बालकके दिनपर ही दूसरेकी भी शुद्धि बतायी गयी है । अशौचके बाद क्रमशः दस , बारह , पंद्रह और तीस दिन बीतनेपर ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र अपने - अपने शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करें । अशौच निवृत्त होनेपर प्रेतके लिये एकोद्दिष्ट करना चाहिये और ब्राह्मणोंको दान देना चाहिये लोकमें जो - जो वस्तु अधिक प्रिय हो और घरमें भी जो वस्तु अत्यन्त प्रिय जान पड़े , उसको अक्षय बनानेकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको उचित है कि वह उसे गुणवान् पुरुषको दान दे । अशौचके दिन हो जानेपर जल , वाहन और आयुधका स्पर्श करके पवित्र हो सब वर्णोंके लोग प्रेतके लिये जलदान और पिण्डदान आदिका कार्य करें ; तदनन्तर अपने अपने वर्ण - धर्मका पालन करें । इससे इस लोक और परलोकमें भी कल्याण होता है । तीनों वेदोंका प्रतिदिन स्वाध्याय करे , विद्वान् बने , धर्मानुसार धनका उपार्जन करे और उसे यत्नपूर्वक यज्ञमें लगाये । जिस कर्मको करते समय आत्मा घृणा न हो और जिसे महापुरुषोंके सामने प्रकट करनेमें कोई संकोच न हो , ऐसा कर्म निःशङ्क होकर करना चाहिये । ब्राह्मणो ! ऐसे आचरणवाले गृहस्थ पुरुषको धर्म , अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है तथा इस लोक और परलोकमें भी उसका कल्याण होता है । यह विषय अत्यन्त गोपनीय तथा आयु , धन और बुद्धिको बढ़ानेवाला है । यह सब पापोंका नाशक , पवित्र तथा श्री , पुष्टि एवं आरोग्य देनेवाला है । इतना ही नहीं , यह कल्याणमय प्रसङ्ग मनुष्योंको यश और कीर्ति देनेवाला तथा उनके तेज और बलकी वृद्धि करनेवाला है । मनुष्योंको सदा इसका अनुष्ठान करना चाहिये । यह स्वर्गका सर्वोत्तम साधन है । सम्यक् श्रेयकी इच्छा रखनेवाले ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्रोंको यत्नपूर्वक इन सब बातोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । जो इस विषयको भलीभाँति जानकर नित्य निरन्तर इसका अनुष्ठान करता है , वह सब पापोंसे मुक्त हो स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। द्विजवरो ! यह मैंने सारसे भी अत्यन्त सारभूत तत्त्वका वर्णन किया है । यह श्रुतियों तथा स्मृतियोंद्वारा प्रतिपादित धर्म है । हर एकको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये । जो नास्तिक हो , जिसकी बुद्धि खोटी हो , जो दम्भी , मूर्ख और कुतर्कपूर्ण वार्तालाप करनेवाला हो , ऐसे मनुष्यको कदापि इसका उपदेश नहीं देना चाहिये ।                                                                                                           

* पितुः पिण्डं प्रदद्याच्च भोजयेच्च पितामहम् । प्रपितामहस्य पिण्डं वै ह्ययं शास्त्रेषु निर्णयः॥

   मृतेषु पिण्डं दातव्यं जीवन्तं चापि भोजयेत् । सपिण्डीकरणं नास्ति न च पार्वणमिष्यते ॥

                                                                                                      ( २२०।२०८-२०९ )

  * पूर्वां संध्यां सनक्षत्रां पश्चिमां सदिवाकराम् । उपासीत यथान्यायं नैनां जह्यादनापदि ॥

     असत्प्रलापमनृतं   वाक्पारुष्यं  च  वर्जयेत् । असच्छास्त्रमसद्वादमसत्सेवां च वै द्विजाः॥

                                                                                                                 ( २२१।१८-१९ )

         * परदारा न गन्तव्याः पुरुषेण विपश्चिता ।

         इष्टापूर्तायुषां    हन्त्री  परदारगतिर्नृणाम् ।न हीदृशमनायुष्यं लोके किंचन विद्यते ॥

         यादृशं पुरुषस्येह परदाराभिमर्शनम् ॥  

 ( १२१ । ६०-६२ )

* तत्र विप्रा न वस्तव्यं यत्र नास्ति  चतुष्टयम् ।   ऋणप्रदाता वैद्यश्च श्रोत्रियः सजला नदी ॥

   जितामित्रो   नृपो   यत्र  बलवान्धर्मतत्परः ।  तत्र नित्यं वसेत्प्राज्ञः कुतः कुनृपतौ सुखम् ॥

                                                                                                                (२२१।१०३ १०४ )