ब्रह्म पुराण

18 - श्रीसूर्यदेवकी स्तुति तथा उनके अष्टोत्तरशत नामोंका वर्णन

मुनियों ने कहा - भगवन्! आप पुन: हमें सूर्यदेव से सम्बन्ध रखनेवाली कथा सुनाइये।

ब्रह्माजी बोले - स्थावर-जङ्गम समस्त प्राणियों के नष्ट हो जाने पर जब समस्त लोक अन्धकार में विलीन हो गये थे, उस समय सबसे पहले प्रकृति से गुणों की हेतुभूत समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व)- का आविर्भाव हुआ। उस बुद्धि से पञ्चमहाभूतों का प्रवर्तक अहंकार प्रकट हुआ। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- ये पाँच महाभूत हुए। तदनन्तर एक अण्ड उत्पन्न हुआ। उसमें ये सातों लोक प्रतिष्ठित थे। सातों द्वीपों और समुद्रों सहित पृथ्वी भी उसमें थी। उसी में मैं, विष्णु और महादेवजी भी थे। वहाँ सब लोग तमोगुण से अभिभूत एवं विमूढ़ थे और परमेश्वर का ध्यान करते थे। तदनन्तर अन्धकार को दूर करनेवाले एक महातेजस्वी देवता प्रकट हुए। उस समय हम लोगों ने ध्यान के द्वारा जाना कि ये भगवान् सूर्य हैं। उन परमात्माको जानकार हमने दिव्य स्तुतियों के द्वारा उनका स्तवन आरम्भ किया- 'भगवन्! तुम आदिदेव हो। ऐश्वर्यसे सम्पन्न होने के कारण तुम देवताओं के ईश्वर हो। सम्पूर्णभूतों के आदिकर्ता भी तुम्हीं हो। तुम्हीं देवाधिदेव दिवाकर हो। सम्पूर्ण भूतों, देवताओं, गन्धर्वों, राक्षसों, मुनियों, किन्नरों, सिद्धों, नागों तथा पक्षियों का जीवन तुमसे ही चलता है। तुम्हीं ब्रह्मा, तुम्हीं महादेव, तुम्हीं विष्णु, तुम्हीं प्रजापति तथा तुम्हीं वायु, इन्द्र, सोम, विवस्वान् एवं वरुण हो। तुम्हीं काल हो। सृष्टि के कर्ता, धर्ता, संहर्ता और प्रभु भी तुम्हीं हो। नदी, समुद्र, पर्वत, बिजली, इन्द्र-धनुष, प्रलय, सृष्टि, व्यक्त, अव्यक्त एवं सनातन पुरुष भी तुम्हीं हो। साक्षात् परमेश्वर तुम्हीं हो। तुम्हारे हाथ और पैर सब ओर हैं। तुम्हारे सहस्त्रों किरणें, सहस्त्रों मुख, सहस्त्रों चरण और सहस्त्रों नेत्र हैं। तुम सम्पूर्ण भूतों के आदिकारण हो। भू:, भुव:, स्व:, मह:, जन:, तप: और सत्य- ये सब तुम्हारे ही स्वरुप हैं। तुम्हारा जो स्वरुप अत्यन्त तेजस्वी, सबका प्रकाशक, दिव्य, सम्पूर्ण लोकों में प्रकाश बिखेरनेवाला और देवेश्वरों के द्वारा भी कठिनता से देखे जाने योग्य है, उसको हमारा नमस्कार है। देवता और सिद्धि जिसका सेवन करते हैं, भृगु, अत्रि और पुलह आदि महर्षि जिसकी स्तुति में संलग्न रहते हैं तथा जो अत्यन्त अव्यक्त है, तुम्हारे उस स्वरुप को हमारा प्रणाम है। सम्पूर्ण देवताओं में उत्कृष्ट तुम्हारा जो रूप वेदवेत्ता पुरुषों के द्वारा जानने योग्य, नित्य और सर्वज्ञान सम्पन्न हिया, उसको हमारा नमस्कार है। तुम्हारा जो स्वरुप इस विश्व की सृष्टि करनेवाला, विश्वमय, अग्नि एवं देवताओं द्वारा पूजित, सम्पूर्ण विश्व में व्यापक और अचिन्त्य है, उसे हमारा प्रणाम है। तुम्हारा जो रूप यज्ञ, वेद, लोक तथा द्युलोकसे भी परे परमात्मा नाम से विख्यात है, उसको हमारा नमस्कार है। जो अविज्ञेय, अलक्ष्य, अचिन्त्य, अव्यय, अनादि और अनन्त है, आपके उस स्वरुप को हमारा प्रणाम है। प्रभो! तुम कारण के भी कारण हो, तुमको बारम्बार नमस्कार है। पापों से मुक्त करनेवाले तुम्हें प्रणाम है, प्रणाम है। तुम दैत्यों को पीड़ा देनेवाले और रोगों से छुटकारा दिलवानेवाले हो। तुम्हें अनेकानेक नमस्कार हैं। तुम सबको वर, सुख, धन और उत्तम बुद्धि प्रदान करनेवाले हो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है।*

इस प्रकार स्तुति करनेपर तेजोमय रूप धारण करनेवाले भगवान् भास्कर ने कल्याणमयी वाणी में कहा- 'आप लोगों को कौन-सा वर प्रदान किया जाय?'

देवताओं ने कहा - प्रभो! आपका रूप अत्यन्त तेजोमय है, इसका ताप कोई सह नहीं सकता। अत: जगत् के हित के लिए यह सबके सहने योग्य हो जाय।

तब 'एवमस्तु' कहकर आदिकर्ता भगवान् सूर्य सम्पूर्ण लोकों के कार्य सिद्ध करने के लिये समय-समयपर गर्मी, सर्दी और वर्षा करने लगे। तदनन्तर ज्ञानी, योगी, ध्यानी तथा अन्यान्य मोक्षभिलाषी पुरुष अपने हृदय-मन्दिर में स्थित भगवान् सूर्य का ध्यान करने लगे। समस्त शुभ लक्षणों से हीन अथवा सम्पूर्ण पातकों से युक्त ही क्यों न हो, भगवान् सूर्य की शरण लेने से मनुष्य सब पापों से तर जाता है। अग्निहोत्र, वेद तथा अधिक दक्षिणवाले यज्ञ भगवान् सूर्य की भक्ति एवं नमस्कार की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हो सकते। भगवान सूर्य तीर्थों में सर्वोत्तम तीर्थ, मङ्गलों परम मङ्गमय और पवित्रों में परम पवित्र हैं। अत: विद्वान् पुरुष उनकी शरण लेते हैं। जो इन्द्र आदि के द्वारा प्रशंसित सूर्यदेव को नमस्कार करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो सूर्यलोक में जाते हैं।

मुनियों ने कहा - ब्रह्मन्! हमारे मन में चिरकाल से यह इच्छा हो रही है कि भगवान् सूर्यके एक सौ आठ नामों का वर्णन सुनें। आप उन्हें बताने की कृपा करें।

ब्रह्माजी बोले - ब्रह्मणो! भगवान् भास्कर के परम गोपनीय एक सौ आठ नाम, जो स्वर्ग और मोक्ष देनेवाले हैं, बतलाता हूँ; सुनो। ॐ सूर्य, अर्यमा, भग, त्वष्टा, पूषा (पोषक), अर्क, सविता, रवि, गभस्तिमान् (किरणोंवाले), अज (अजन्मा), काल, मृत्यु, धाता (धारण करनेवाले), प्रभाकर (प्रकाश का खजाना), पृथ्वी, आप (जल), तेज, ख (आकाश), वायु, परायण (शरण देनेवाले), सोम, बृहस्पति, शुक्र, बुध, अङ्गारक (मङ्गल), इन्द्र, विवस्वान्, दीप्तांशु प्रज्वलित किरणोंवाले), शुचि (पवित्र), सौरि (सूर्यपुत्र मनु), शनैश्चर, ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, स्कन्द (कार्तिकेय), वैश्रवण (कुबेर), यम, वैद्युत (बिजली में रहनेवाली) अग्नि, जाठराग्नि, ऐन्धन (ईंधन में रहनेवाली) अग्नि, तेज:पति, धर्मध्वज, वेदकर्ता, वेदाङ्ग, वेदवाहन, कृत (सत्ययुग), त्रेता, द्वापर, कलि, सर्वामराश्रय, कला, काष्ठा, मुहूर्त, क्षपा (रात्रि), याम (पहर), क्षण, संवत्सरकर, अश्वत्थ, कालचक्र, विभावसु (अग्नि), पुरुष, शाश्वत, योगी, व्यक्ताव्यक्त, सनातन, कालाध्यक्ष, प्रजाध्यक्ष, विश्वकर्मा, तमोनुद (अन्धकार को भगानेवाले), वरुण, सागर, अंश, जीमूत (मेघ), जीवन, अरिहा (शत्रुओं का नाश करनेवाले), भुताश्रय, भूतपति, सर्वलोकनामस्कृत, स्त्रष्टा, संवर्तक (प्रलयकालीन) अग्नि, सर्वादि, अलोलुप (निर्लोभ), अनन्त, कपिल, भानु, कामद (कामनाओं को पूर्ण करनेवाले), सर्वतोमुख (सब ओर मुखवाले), जय, विशाल, वरद, सर्वभुतनिषेवित, मन, सुपूर्ण (गरुड़), भूतादि, शिघ्रग (शीघ्र चलनेवाले), प्राणधारण, धन्वन्तरि, धूमकेतु, आदिदेव, अदितिपुत्र, द्वादशात्मा (बारह स्वरूपों वाले), रवि, दक्ष, पिता, माता, पितामह, स्वर्गद्वार, प्रजाद्वार, मोक्षद्वार, त्रिविष्टप (स्वर्ग), देहकर्ता, प्रशान्तात्मा, विश्वात्मा, विश्वतोमुख, चराचरात्मा, सूक्ष्मात्मा, मैत्रेय तथा करुणावन्ति (दयालु)*- ये अमित तेजस्वी एवं कीर्तन करने योग्य भगवान् सूर्य के एक सौ आठ सुन्दर नाम मैंने बताये हैं। जो मनुष्य देवश्रेष्ठ भगवान् सूर्य के इस स्तोत्र का शुद्ध एवं एकाग्र चित्त से कीर्तन करता है, वह शोकरुपी दावानलके समुद्र से मुक्त हो जाता और मनोवाञ्छित भोगों को प्राप्त कर लेता है।

* आदिदेवोऽसि देवानामैश्वर्याच्च त्वमीश्वर:। आदिकरतासि भूतानां देवदेवो दिवाकर: ॥

जीवन: सर्वभूतानां देवगन्धर्वरक्षसाम्। मुनिकिन्नरसिध्दानां तथैवोरगपक्षिणाम् ॥

त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापति:। वायुरिन्द्रश्च सोमश्व विवस्वान् वरुणास्तथा ॥

त्वं काल: सृष्टिकर्ता च हर्ता भर्ता तथा प्रभु:। सरित: सागरा: शैला विद्युदिन्द्रधनूंषि च ॥

 प्रलय: प्रभवश्चैव व्यक्ताव्यक्त: सनातन:। ईश्वरात्परतो विद्या विद्याया: परत: शिव: ॥

शिवात्परतरो देवस्त्वमेव पमेश्वर:। सर्वत: पाणिपादान्त: सर्वतोऽक्षिशिरोमुख: ॥

सहस्त्रांशु सहस्त्रास्य: सहस्त्रचरणेक्षण:। भूतादिर्भूर्भुव: स्वश्च मह: सत्यं तपो जन: ॥

प्रदीप्तं दीपनं दिव्यं सर्वलोकप्रकाशकम्। दुर्निरीक्षं सुरेन्द्राणां यद्रूपं तस्य ते नम: ॥

सुरसिद्धगणैर्जुष्टं भृग्वत्रिपुलहादिभि:। स्तुतं परममव्यक्तं यद्रूपं तस्य ते नम: ॥

वेद्यं वेदविदां नित्यं सर्वज्ञानसमन्वितम्। सर्वदेवादिदेवस्य याद्रूपं तस्य ते नम: ॥

विश्वकृद्विश्वभूतं च वैश्वानरसुरार्चितम्। विश्वस्थितमचिन्त्यं च यद्रूपं तस्य ते नम: ॥

परं यज्ञात्परं वेदात्परं लोकत्परं दिव:। परमात्मेत्यभिख्यातं यद्रूपं तस्य ते नम: ॥

अविज्ञेयमनालक्ष्यमध्यानगतमव्ययम्। अनादिनिधनं चैव यद्रूपं तस्य ते नम: ॥

नमो नम: कारणकारणाय नमो नम: पापविमोचनाय। नमो नमस्ते दितिजार्दनाय नमो नमो रोगविमोचनाय ॥

नमो नम: सर्ववरप्रदाय नमो नम: सर्वसुखप्रदाय। नमोनम: सर्वधनप्रदाय नमो नम: सर्वमतिप्रदाय॥

(३३ । १-२३)

* ॐ सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पुषार्क: सविता रवि:। गभस्तिमानज: कालो मृत्युर्धाता प्रभाकर: ॥

पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्। सोमो बृहस्पति: शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च ॥

इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशु: शुचि: सौरि: शनैश्चर:। ब्रह्मा विष्णुश्च रूद्रश्च स्कन्दो वैश्रवाणो यम: ॥

वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पति:। धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहन: ॥

कृतं त्रेता द्वापश्च कलि: सर्वमराश्रय:। कलाकाष्ठामुहूर्ताश्च क्षपा यामास्तथा क्षणा: ॥

संवत्सरकरोऽश्वत्थ: कालचक्रो विभावसु:। पुरुष: शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्त: सनातन: ॥