19 - पार्वतीदेवीकी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा उनके द्वारा ग्राहके मुख से ब्राह्मण-बालकका उद्धार

मुनियों ने पूछा - प्रभो! दक्षकन्या सती ने क्रोधवश पूर्वशरीर का परित्याग करके फिर गिरिराज हिमालय के घर में कैसे जन्म लिया? महादेवजी के साथ उनका संयोग कैसे हुआ? तथा उस दम्पति में वार्तालाप किस प्रकार हुआ?

ब्रह्माजी बोले - मुनिवरो! पार्वती और महादेव जी की पवित्र कथा पापों का नाश करने वाली और सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली है; उसे कहता हूँ, सुनो। एक समय की बात हिया, महर्षि कश्यप हिमवान् के घर पर पधारे। उस समय हिमवान् ने पूछा- 'मुने! किस उपाए से मुझे अक्षय लोक प्राप्त होंगे, मेरी अधिक प्रसिद्धि होगी और सत्पुरुषों मैं पूजनीय समझा जाऊँगा?'

कश्यप ने कहा - महाबाहो! उत्तम संतान होने से यह सब कुछ प्राप्त हो जाता है। ब्रह्मा औरऋषियों सहित मेरी प्रसिद्धि तो केवल संतान के ही कारण है। अत: गिरिराज! तुम घोर तपस्या करके गुणवान् संतान- श्रेष्ठ कन्या उत्पन्न करो।

ब्रह्माजी कहते हैं - कश्यपजी के यों कहने पर गिरिराज हिमालय ने नियम में स्थित होकर ऐसी तपस्या की, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। उस तपस्या से मुझे बड़ा संतोष हुआ। तब मैंने उनके पास जाकर कहा- 'उत्तम व्रत के पालन करनेवाले गिरिराज! अब मैं तुम्हारी इस तपस्या से संतुष्ट हूँ। तुम इच्छानुसार वर माँगो।'

हिमालयने कहा - भगवन्! मैं सब गुणों से सुशोभित संतान चाहता हूँ। यदि आप मुझपर संतुष्ट हैं तो ऐसा ही वार दीजिये।

गिरिराज की यह बात सुनकर मैंने उन्हें मनोवाञ्छित वर देते हुए कहा- 'शैलेन्द्र! इस तपस्या के प्रभाव से तुम्हारे कन्या उत्पन्न होगी, जिससे तुम सर्वत्र उत्तम कीर्ति प्राप्त करोगे। तुम्हारे यहाँ कोटि-कोटि तीर्थ वास करेंगे। तुम सम्पूर्ण देवताओं से पूजित होगे तथा अपने पुण्य से देवताओं को भी पावन बनाओगे। तदनन्तर गिरिराजने समयानुसार अपनी पत्नी मैनाके गर्भ से अपर्णा नाम की एक कन्या उत्पन्न की। अपर्णा बहुत समय तक निराहार रही, उसे उपवास से रोकते हुए माता ने कहा- 'बेटी! 'उमा' (ऐसा मात करो)।' उस समय वे मातृस्नेह से दु:खित हो रही थीं। माता के यों कहने पर कठोर तपस्या करनेवाली पार्वतीदेवी उमा नाम से ही संसार में प्रसिद्ध हुईं। पार्वती की तपस्या से तीनों लोक संतप्त हो उठे। तब मैंने उससे कहा- 'देवि! क्यों इस कठोर तपस्या से तुम सम्पूर्ण लोकों को संताप दे रही हो? कल्याणी! तुम्हीं ने इस सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि की है। स्वयं ही इसे रचकर अब इसका विनाश न करो। जगन्माता! तुम अपने तेज से सम्पूर्ण लोकों को धारण करती हो; फिर कौन ऐसी वस्तु है, जिसे तुम इस समय तपस्याद्वारा प्राप्त करना चाहती हो? वह हमें बतलाओ।'

देवीने कहा - पितामह! मैं जिसके लिये यह तपस्या करती हूँ, उसे आप भली-भाँति जानते हैं। फिर मुझसे क्यों पूछते हैं?

तब मैंने पार्वती से कहा- 'शुभे! तुम जिनके लिये तप करती हो, वे स्वयं ही तुम्हारा वरण करेंगे। भगवान् शङ्कर ही सर्वश्रेष्ठ पति हैं। वे सम्पूर्ण लोकेश्वरों के भी ईश्वर हैं। हम सदा ही उनके अधीन रहनेवाले किङ्कर हैं। देवि! वे देवताओं के भी देवता, परमेश्वर और स्वयम्भू हैं। उनका स्वरुप बहुत ही उदार है। उनकी समानता करनेवाला कहीं कोई नहीं है।'

तत्पश्चात् देवताओं ने आकार परम सुन्दरी पार्वती से कहा- 'देवि! भगवान् शङ्कर थोड़े ही दिनों में आपके स्वामी होंगे। अब इसके लिए तपस्या न कीजिये।' यों कहकर देवताओं ने गिरिराजकुमारी की प्रदक्षिणा की और वहाँ से अन्तर्धान हो गये। पार्वती भी तपस्या से निवृत्त हो गयीं, किन्तु अपने आश्रम में ही रहने लगीं। एक दिन जब वे अपने आश्रम पर उगे हुए अशोक-वृक्षका सहारा लेकर खड़ी थीं, देवताओं की पीड़ा दूर करनेवाले भगवान् शङ्कर पधारे। उनके ललाट में चन्द्राकार तिलक लगा था, वे बाँहके बराबर नाटा एवं विकृत रूप धारण करके आये थे। उनकी नाक कटी हुई थी, कूबड़ निकला हुआ था और केशों का अन्तिम भाग पीला पड़ गया था। उनके मुख की आकृति भी बिगड़ी हुई थी। उन्होंने पार्वती से कहा- 'देवि! मैं तुम्हारा वरण करता हूँ।' उमा योगसिद्ध हो गयी थीं। आंतरिक भाव की शुद्धि से उनका अन्त:करण शुद्ध हो गया था। वे समझ गयीं कि साक्षात् भगवान् शङ्कर पधारे हैं। तब उनकी कृपा प्राप्त करने की इच्छा से पार्वती ने अर्घ्य, पाद्य और मधुपर्क के द्वारा उनका पूजन करके कहा- 'भगवन्! मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। घर में मेरे पिता मालिक हैं। वे ही मुझे देने में समर्थ हैं। में तो उनकी कन्या हूँ।' यह सुनकर देवाधिदेव भगवान् शङ्कर ने उस विकृत रूप में ही गिरिराज हिमालय के पास जाकर कहा- 'शैलन्द्र! मुझे अपनी कन्या दीजिये।' उस विकृत वेष में अविनाशी रूद्र को ही आया जान गिरिराज को शाप से भय हुआ। उन्होंने उदास होकर कहा- 'भगवन्! ब्राह्मण इस पृथ्वी के देवता हैं, मैं उनका अनादर नहीं करता; किन्तु मेरे मन में पहले से जो कामना है, उसे सुनिये। मेरी पुत्री का स्वयंवर होगा। उसमें वह जिसको वरण करेगी, वही उसका पति होगा।' हिमालय की यह बात सुनकर भगवान् शङ्कर ने देवी के पास आकार कहा- 'तुम्हारे पिता ने स्वयंवर होने की बात कही है। उसमें तुम जिसका वरण करोगी, वही तुम्हारा पति होगा। उस समय किसी रूपवान् को छोड़कर तुम मुझ- जैसे अयोग्य का वरण कैसे करोगी?'

उनके यों कहनेपर पार्वती ने उनकी बातों पर विचार करते हुए कहा- 'महाभाग! आपको अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मैं आपका ही वरण करुँगी। इसमें कोई अनोखी बात नहीं है। अथवा यदि आपको मुझपर संदेह है तो में यहीं आपका वरण करती हूँ।' यों कहकर पार्वती ने अपने हाथों से अशोक का गुच्छा लेकर भगवान् शङ्कर के कंधेपर रखा और कहा- 'देव! मैंने आपका वरण कर लिया।' भगवती पार्वती के इस प्रकार वरण करने पर भगवान् शङ्कर ने उस अशोक-वृक्षको अपनी वाणी से सजीव करते हुए-से कहा- 'अशोक! तुम्हारे परम पवित्र गुच्छे से मेरा वरण हुआ है, इसलिये तुम जरावस्था से रहित एवं अमर रहोगे। तुम जैसा चाहोगे, वैसा रूप धारण कर सकोगे। तुममें इच्छानुसार फूल लगेंगे। तुम सब कामनाओं को देनेवाले, सब प्रकार के आभूषण रूप फूल और फलों से सम्पन्न एवं मेरे अत्यन्त प्रिय होगे। तुममें सब प्रकार की सुगन्ध होगी तथा तुम देवताओं के अधिक प्रिय बने रहोगे।'

यों कहकर जगत् की सृष्ट और सम्पूर्ण भूतों का पालन करनेवाले भगवान् शङ्कर हिमालयकुमारी उमा से विदा ले वहीँ अन्तर्धान हो गये। उनके चले जाने पर पार्वतीदेवी भी उन्हीं की ओर मैन लगाये एक शिलापर बैठ गयीं, इसी समय देवाधिदेव शिव स्वयं लीला करने के लिए ब्राह्मण-बालक का रूप धारण कर निकटवर्ती सरोवर में प्रकट हुए। उस समय उन्हें ग्राहने पकड़ रखा था। वे बोले- 'हाय! ग्राह से पकड़े जाने के कारण मैं अचेत हो रहा हूँ। कोई हो तो मुझे आकार बचाये।' पीड़ित ब्राह्मण की वह पुकार सुनकर कल्याणमयी देवी पार्वती सहसा उठ खड़ी हुईं और उस स्थान पर गयीं, जहाँ वह ब्राह्मण-बालक खड़ा था। वहाँ पहुँचकर चन्द्रमुखी देवी ने देखा, एक बहुत सुन्दर बालक ग्राह के खींचने पर वह तेजस्वी बालक बड़ा आर्तनाद करता था। उस ग्राहग्रस्त बालक को देखकर देवी उमा दु:ख से आतुर हो उठीं और बोलीं- 'ग्राहराज! यह अपने पिता-माता का एक ही बालक है, इसे शीघ्र छोड़ दो।'

ग्राहने कहा - देवि! छठे दिनपर जो सबसे पहले मेरे पास आ जाता है, उसी को विधाता ने मेरा आहार निश्चित किया है। महाभागे! यह बालक आज छठे दिन ब्रह्माजी से प्रेरित होकर ही मेरे पास आया है, अत: मैं इसे किसी प्रकार न छोडूँगा।

देवी बोलीं - ग्राहराज! मैंने हिमालय के शिखरपर जो उत्तम तपस्या की है, उसका पुण्य लेकर इस बालक को छोड़ दो। मैं तुम्हें नमस्कार करती हूँ।

ग्राहने कहा - देवि! आपने थोड़ी या उत्तम जो कुछ भी तपस्या की है, वह सब मुझे दे दें तो शीघ्र ही यह छुटकारा पा जायगा।

देवी बोलीं - महाग्राह! मैंने जन्म से लेकर अबतक जो पुण्य किया है, वह सब तुम्हें समर्पित है। इस बालक को छोड़ दो।

देवी के इतना कहते ही उनकी तपस्या से विभूषित हो वह ग्राह दोपहर के सूर्यकी भाँति तेजसे प्रज्वलित हो उठा। उस समय उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था। ग्राह ने संतुष्ट होकर विश्व को धारण करनेवाली देवी से कहा- 'महाव्रते! तुमने यह क्या किया? भली-भाँति सोचकर देखो तो सही। तपस्या का उपार्जन बड़े कष्ट से होता है, अत: उसका परित्याग अच्छा नहीं माना गया है। तुम अपनी तपस्या ले लो। साथ ही इस बालक को भी मैं छोड़ देता हूँ।'

देवीने कहा - ग्राह! मुझे अपना शरीर देकर भी यत्नपूर्वक ब्राह्मण की रक्षा करनी चाहिये। तपस्या तो मैं फिर भी कर सकती हूँ; किन्तु यह ब्राह्मण पुन:नहीं मिल सकता। महाग्राह! मैंने भली-भाँति सोचकर तपस्या के द्वारा बालक को छुड़ाया है। तपस्या ब्राह्मणों से श्रेष्ठ नहीं है। मैं ब्राह्मणों को ही श्रेष्ठ मानती हूँ। ग्राहराज! मैं तपस्या देकर फिर नहीं लूँगी। कोई मनुष्य भी अपनी दी हुई वस्तु को वापस नहीं लेता। अत: यह तपस्या तुममें ही सुशोभित हो। इस बालक को छोड़ दो।

पार्वती के यों कहनेपर सूर्य के समान प्रकाशित होनेवाले ग्राहने उनकी प्रशंसा की, उस बालक को छोड़ दिया और देवीको नमस्कार करके वहीँ अन्तर्धान हो गया। अपनी तपस्या की हानि समझकर पार्वती ने पुन: नियमपूर्वक तपका आरम्भ किया। उन्हें पुन: तपस्या करने के लिए उत्सुक जान साक्षात् भगवान् शङ्कर ने प्रकट होकर कहा- 'देवि! अब तपस्या न करो। तुमने अपना तप मुझे ही समर्पित किया है। अत: वाही सहस्त्रगुना होकर तुम्हारे लिये अक्षय हो जायगा।'

इस प्रकार तपस्या के अक्षय होनेका उत्तम वरदान पाकर उमादेवी को बड़ी प्रसन्नता हुई और वे' स्वयंवर की प्रतीक्षा करने लगीं।

कालाध्यक्ष: प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुद:। वरुण: सागरोंऽशश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा ॥

भूताश्रयो भूतपति: सर्वलोकनमस्कृत:। स्त्रष्टा संवर्तको वह्रि: सर्वस्यादिरलोलुप: ॥

अनन्त: कपिलो भानु: कामद: सर्वतोमुख:। जयो विशालो वरद: सर्वभूतनिषेवित्: ॥

मन: सुपर्णो भूतादि: शीघ्रग: प्राणधारण:। धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदिते: सतु: ॥

द्वादशात्मा रविर्दक्ष: पिता माता पितामह:। स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् ॥

देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुख:। चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेय: करुणान्वित: ॥

   (३३ । ३४-४५)