लोमहर्षणजी कहते हैं- द्विजवरो! इस प्रकार पूर्वकालमें महर्षि व्यासने सारभूत निर्दोष वचनोंद्वारा मधुरवाणीमें मुनियोंको यह पुराण सुनाया था। इसमें अनेक शास्त्रोंके शुद्ध एवं निर्मल सिद्धान्तोंका समावेश है। यह सहज शुद्ध है और अच्छे शब्दोंके प्रयोगसे सुशोभित होता ह। इसमें यथास्थान पूर्वपक्ष और सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया है। पुराणको न्यायानुकूल रीतिसे सुनाकर परम बुद्धिमान् वेदव्यासजी मौन हो गये। वे श्रेष्ठ मुनि भी सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाले तथा वेदोंके तुल्य माननीय इस आदि ब्रह्मपुराणको सुनकर बहुत प्रसन्न और विस्मित हुए। उन्होंने मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासकी बारंबार प्रशंसा की।
मुनि बोले- मुनिश्रेष्ठ! आपने हमें वेदोंके तुल्य प्रामाणिक तथा सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाला सर्वपापहारी श्रेष्ठ पुराण सुनाया है। यह कितने हर्षकी बात है। हमने भी इस विचित्र पदोंवाले पुराणका अक्षर अक्षर सुना है। प्रभो! तीनों लोकोंमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो आपको विदित न हो। महाभाग! आप देवताओं में बृहस्पतिकी भाँति सर्वज्ञ हैं, महाप्राज्ञ और ब्रह्मनिष्ठ हैं। महामते! हम आपको नमस्कार करते हैं। आपने महाभारतमें सम्पूर्ण वेदोंके अर्थ प्रकट किये हैं। महामुने! आपके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन करनेमें कौन समर्थ है । जिन्होंने छहों अङ्गसहित चारों वेदों तथा सम्पूर्ण व्याकरणोंको पढ़कर महाभारत शास्त्रकी रचना की, उन ज्ञानात्मा भगवान् वेदव्यासको नमस्कार है। प्रफुल्ल कमलदलके समान बड़े - बड़े नेत्रों तथा विशाल बुद्धिवाले व्यासजी! आपको नमस्कार है। आपने (जगत्को प्रकाश देनेके लिये) महाभारतरूपी तेलसे भरे हुए ज्ञानरूपी दीपकको जलाया है।१ यों कहकर उन महर्षियोंने व्यासजीका पूजन किया। फिर व्यासजीने भी उन सबका सम्मान किया। तत्पश्चात् वे कृतार्थ होकर जैसे आये थे, उसी प्रकार अपने आश्रमको लौट गये। मुनिवरो! आपने हमसे जिस प्रकार प्रश्न किया था, उसके अनुसार हमने भी सब पापोंका नाश करनेवाले परम पुण्यमय इस सनातन पुराणका वर्णन किया! श्रीव्यासजीकी कृपासे ही मैंने यह सब कुछ आपलोगोंको सुनाया है। गृहस्थ , संन्यासी और ब्रह्मचारी- सबको ही इस पुराणका श्रवण करना चाहिये। यह मनुष्योंको धन और सुख देनेवाल, परम पवित्र एवं पापोंको दूर करनेवाला है। परम कल्याणकी अभिलाषा रखनेवाले ब्रह्मपरायण ब्राह्मण आदिको संयम और प्रयत्नपूर्वक यह - पुराण सुनना चाहिये। इसको सुननेसे ब्राह्मण विद्या , क्षत्रिय संग्राममें विजय , वैश्य अक्षय धन और शूद्र सुख पाता है । पुरुष पवित्र होकर जिस जिस काम्य वस्तुका चिन्तन करते हुए इस पुराणका श्रवण करता है , उस उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है । यह ब्रह्मपुराण भगवान् विष्णुसे सम्बन्ध रखनेवाला है। इससे सब पापोंका नाश हो जाता है। यह सब शास्त्रों से विशिष्ट और समस्त पुरुषार्थीका साधक है। यह जो मैंने आपलोगोंको वेदतुल्य पुराणका श्रवण कराया है , इसको सुननेसे सब प्रकार के दोषोंसे प्राप्त होनेवाली पापराशिका नाश हो जाता है। प्रयाग , पुष्कर , कुरुक्षेत्र तथा अर्बुदारण्य ( आबू ) - में उपवास करनेसे जो फल मिलता है , वह इसके श्रवणमात्र से मिल जाता है । एक वर्षतक अग्निमें हवन करनेसे पुरुषको जो महापुण्यमय फल प्राप्त होता है , वह इसे एक बार सुननेसे ही मिल जाता है । ज्येष्ठमासके शुक्लपक्षकी द्वादशीको यमुनामें स्नान करके मथुरापुरीमें श्रीहरिके दर्शनसे मनुष्य जिस फलका भागी होता है , वह एकाग्रचित्त होकर इस ब्रह्मपुराणकी कथा कहनेसे ही प्राप्त हो जाता है । जो इसका पाठ अथवा श्रवण करता है , वह भी उसी फलको प्राप्त करता है । जो मनुष्य प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक इस वेदसम्मित पुराणका पाठ या श्रवण करता है , वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है और जो ब्राह्मण मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर पर्वोंके दिन तथा एकादशी और द्वादशी तिथिको ब्रह्मपुराण बाँचकर दूसरोंको सुनाता है , वह वैकुण्ठ धाममें जाता है।२ यह पुराण मनुष्योंको यश , आयु , सुख , कीर्ति , बल , पुष्टि तथा धन देनेवाला और अशुभ स्वप्नोंका नाश करनेवाला है । जो प्रतिदिन तीनों संध्याओंके समय एकाग्रचित्त हो श्रद्धापूर्वक इस श्रेष्ठ उपाख्यानका पाठ करता है , वह सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है । इसको पढ़ने और सुननेसे रोगातुर मनुष्य रोगसे , बन्धनमें पड़ा हुआ पुरुष बन्धनसे , भयसे डरा हुआ मानव भयसे तथा आपत्तिग्रस्त पुरुष आपत्तिसे छूट जाता है । इतना ही नहीं ; इसके पाठ और श्रवणसे पूर्वजन्मोंके स्मरणकी शक्ति , विद्या , पुत्र , धारणावती बुद्धि , पशु , धैर्य , धर्म , अर्थ , काम और मोक्षको भी मनुष्य प्राप्त कर लेता है । जिन - जिन कामनाओंको मनमें लेकर मनुष्य संयतचित्तसे इस पुराणका पाठ करता है , उन सबकी उसे प्राप्ति हो जाती है— इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।१ जो मनुष्य एकमात्र भगवान्की भक्तिमें चित्त लगाकर पवित्र हो अभीष्ट वर देनेवाले लोकगुरु भगवान् विष्णुको प्रणाम करके स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाले इस पुराणका निरन्तर श्रवण करता है , उसके सारे पाप छूट जाते हैं । वह इस लोकमें उत्तम सुख भोगकर स्वर्गमें भी दिव्य सुखका अनुभव करता है । तत्पश्चात् प्राकृत गुणोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके निर्मल पदको प्राप्त होता है । इसलिये एकमात्र मुक्तिमार्गकी इच्छा रखनेवाले स्वधर्मपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको , मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले कल्याणकामी उत्तम क्षत्रियोंको ,विशुद्ध कुलमें उत्पन्न वैश्योंको तथा धर्मनिष्ठ शूद्रोंको भी प्रतिदिन इस पुराणका श्रवण करना चाहिये । यह बहुत ही उत्तम , अनेक फलोंसे युक्त तथा धर्म , अर्थ एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है । आप सब लोग श्रेष्ठ पुरुष हैं , अतः आपकी बुद्धि निरन्तर धर्ममें लगी रहे । एकमात्र धर्म ही परलोकमें गये हुए प्राणीके लिये बन्धुकी भाँति सहायक है । धन और स्त्री आदि भोगोंका चतुर - से - चतुर मनुष्य भी क्यों न सेवन करे , उनपर न तो कभी भरोसा किया जा सकता है और न वे सदा स्थिर ही रहते हैं । मनुष्य धर्मसे ही राज्य प्राप्त करता है , धर्मसे ही वह स्वर्गमें जाता है तथा धर्मसे ही मानव आयु , कीर्ति , तपस्या एवं धर्मका उपार्जन करता है और धर्मसे ही उसे मोक्षकी प्राप्ति होती है । इस लोकमें तथा परलोकमें भी धर्म ही मनुष्यके लिये माता - पिता और सखा है । इस लोकमें भी धर्म ही रक्षक है और वही मोक्षकी भी प्राप्ति करानेवाला है । धर्मके सिवा कुछ भी काम नहीं आता । यह श्रेष्ठ पुराण परम गोपनीय तथा वेदके तुल्य प्रामाणिक है । खोटी बुद्धिवाले और विशेषतः नास्तिक पुरुषको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये । यह श्रेष्ठ पुराण पापोंका नाश तथा धर्मकी वृद्धि करनेवाला है । साथ ही इसे अत्यन्त गोपनीय माना गया है । मुनियो ! मैंने आपलोगोंके सामने इसका कथन किया और आपने भी इसे भलीभाँति सुन लिया । अब आज्ञा दीजिये, मैं जाता हूँ।२
श्रीब्रह्मपुराण सम्पूर्ण
Summary of chapter 104 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The various forms and manifestations (vyūhas and vibhūtis) of Bhagavān Viṣṇu are systematically glorified. Vāsudeva, Saṃkarṣaṇa, Pradyumna, and Aniruddha — the four vyūha forms — and the many specific divine qualities and powers associated with each are expounded. The chapter establishes the theological framework of the Pañcarātra tradition's understanding of the supreme Puruṣa in his multiple manifestations for creation, sustenance, and grace.