ब्रह्माजी कहते हैं - भगवान् सूर्य सबके आत्मा, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वर, देवताओं के भी देवता और प्रजापति हैं। वे ही तीनों लोकों की जड़ हैं, परम देवता हैं। अग्नि में विधिपूर्वक डाली हुई आहुति सूर्य के पास ही पहुँचती है। सूर्य से वृष्टि होती, वृष्टि से अन्न पैदा होता और अन्न से प्रजा जीवन-निर्वाह करती है। क्षण, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, संवत्सर, ऋतु और युग- इनकी काल-संख्या सूर्य के बिना नहीं हो सकती। कालका ज्ञान हुए बिना न कोई नियम चल सकता है और न अग्निहोत्र आदि ही हो सकते हैं। सूर्य के बिना ऋतुओं का विभाग भी नहीं होगा और उसके बिना वृक्षों में फल और फूल कैसे लग सकते हैं? खेती कैसे पक सकती है और नाना प्रकार के अन्न कैसे उत्पन्न हो सकते हैं? उस दशा में स्वर्गलोक तथा भूलोक में जीवों के व्यवहार का भी लोप हो जायगा। आदित्य, सविता, सूर्य, मिहिर, अर्क, प्रभाकर, मार्तण्ड, भास्कर, भानु, चित्रभानु, दिवाकर तथा रवि- इन बारह सामान्य नामों के द्वारा भगवान् सूर्य का ही बोध होता है। विष्णु, धाता, भग, पूषा, मित्र, इन्द्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, अंशुमान्, त्वष्टा तथा पर्जन्य- ये बारह सूर्य पृथक्-पृथक् माने गये हैं। चैत्रमास में विष्णु, वैशाख में अर्यमा, ज्येष्ठ में विवस्वान्, आषाढ़ में अंशुमान्, श्रावण में पर्जन्य, भादों में वरुण, आश्विन में इन्द्र, कार्तिक में धाता, अगनमें मित्र, पौष में पूषा, माघ में भग और फाल्गुन में त्वष्टा नामक सूर्य तपते। हैं। इस प्रकार यहाँ एक ही सूर्य के चौबीस नाम बताये गये हैं। इनके अतिरिक्त और भी हजारों नाम विस्तारपूर्वक कहे गये हैं।
मुनियों ने पूछा - प्रजापते! जो एक हजार नामों के द्वारा भगवान् सूर्य की स्तुति करते हैं, उन्हें क्या पुण्य होता है? तथा उनकी कैसी गति होती है?
ब्रह्माजी बोले - मुनिवरो! मैं भगवान् सूर्य का कल्याणमय सनातन स्तोत्र कहता हूँ, जो सब स्तुतियों का सारभूत है। इसका पाठ करनेवाले को सहस्त्रनामों की आवश्यकता नहीं रह जाती। भगवान् भास्कर के जो पवित्र, शुभ एवं गोपनीय नाम हैं, उन्हीं का वर्णन करता हूँ; सुनो। विकर्तन, विवस्वान्, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, श्रीमान्, लोकचक्षु, महेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश, करता, हरता, तमिस्त्रहा, तपन, तापन, शुचि, सप्तश्ववाहन, गभस्तिहस्त, ब्रह्मा और सर्वदेवनमस्कृत- इस प्रकार इक्कीस नामों का यह स्तोत्र भगवान् सूर्य को सदा प्रिय है।* यह शरीर को नीरोग बनानेवाला, धनकी वृद्धि करनेवाला और यश फैलानेवाला स्तोत्रराज है। इसकी तीनों लोकों में प्रसिद्धि है। द्विजवरो! जो सूर्य के उदय और अस्तकाल में- दोनों संध्याओं के समय इस स्तोत्र के द्वारा भगवान् सूर्य की स्तुति करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। भगवान् सूर्य के समीप एक बार भी इसका जप करने से मानसिक, वाचिक, शारीरिक तथा कर्मजनित सब पाप नष्ट हो जाते हैं। अत: ब्राह्मणो! आप लोग यत्नपूर्वक सम्पूर्ण अभिलक्षित फलों के देने वाले भगवान् सूर्य का इस स्तोत्र के द्वारा स्तवन करें।
मुनियों ने पूछा - भगवन्! आपने भगवान् सूर्य को निर्गुण एवं सनातन देवता बतलाया है; फिर आपके ही मुँह से हमने यह भी सुना है कि वे बारह स्वरूपों में प्रकट हुए। वे तेजकी राशि और महान् तेजस्वी होकर किसी स्त्री के गर्भ में कैसे प्रकट हुए। वे तेजकी राशि और महान् तेजस्वी होकर किसी स्त्री के गर्भ में कैसे प्रकट हुए, इस विषय में हमें बड़ा संदेह है।
ब्रह्माजी बोले - प्रजापति दक्ष के साठ कन्याएँ हुईं, जो श्रेष्ठ और सुन्दरी थीं। उनके नाम अदिति, दिति, दनु और विनता आदि थे। उनमें से तेरह कन्याओं का विवाह साक्ष ने कश्यपजी से किया था। अदिति ने तीनों लोकों के स्वामी देवताओं को जन्म दिया। दिति से दैत्य और दनु से बलाभिमानी भयंकर दानव उत्पन्न हुए। विनता आदि अन्य स्त्रियों ने भी स्थावर-जङ्गम भूतों को जन्म दिया। इन दक्षसुताओं के पुत्र, पौत्र और दौहित्र आदि के द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया। कश्यप के पुत्रों में देवता प्रधान हैं, वे सात्त्विक हैं; इनके अतिरिक्त दैत्य आदि राजस और तामस हैं। देवताओं को यज्ञ का भागी बनाया गया है। परन्तु दैत्य और दानव उनसे शत्रुता रखते थे, अत: वे मिलकर उन्हेंकष्ट पहुँचाने लगे। माता अदिति ने देखा, दैत्यों और दानवों ने मेरे पुत्रों को अपने स्थान से हटा दिया और सारी त्रिलोकी नष्टप्राय कर दी। तब उन्होंने भगवान् सूर्य की आराधना के लिये महान् प्रयत्न किया। वे नियमित आहार करके कठोर नियम का पालन करती हुई एकाग्रचित्त हो आकाश में स्थित तेजोराशि भगवान् भास्करका स्तवन करने लगीं।
अदिति बोलीं - भगवन्! आप अत्यन्त सूक्ष्म, परम पवित्र और अनुपम तेज धारण करते हैं। तेजस्वियों के ईश्वर, तेज के आधार तथा सनातन देवता हैं। आपको नमस्कार है। गोपते! जगत् का उपकार करने के लिये में आपकी स्तुति- आप से प्रार्थना करती हूँ। प्रचण्ड रूप धारण करते समय आपकी जैसी आकृति होती है, उसको मैं प्रणाम करती हूँ। क्रमशः आठ मासतक पृथ्वी के जलरूप रस को ग्रहण करने के लिये आप जिस अत्यन्त तीव्र रूप को धारण करते हैं, उसे में प्रणाम करती हूँ। आपका वह स्वरुप अग्नि और सोम से संयुक्त होता है। आप गुणात्मा को नमस्कार है। विभावसो! आपका जो रूप ऋक्, यजुष् और संकी एकता से त्रयीसंज्ञक इस विश्व के रूप में तपता है उसको नमस्कार है। सनातन! उससे भी परे जो 'ॐ' नाम से प्रतिपादित स्थूल एवं सूक्ष्मरूप निर्मल स्वरुप है, उसको मेरा प्रणाम है।*
ब्रह्माजी कहते हैं - इस प्रकार बहुत दिनों तक आराधना करने पर भगवान् सूर्य ने दक्षकन्या अदिति को अपने तेजोमय स्वरुप का प्रत्यक्ष दर्शन कराया।
अदिति बोलीं - जगत् के आदि कारण भगवान् सूर्य! आप मुझपर प्रसन्न हों। गोपते! में आपको भली-भाँति देख नहीं पाती। दिवाकर! आप ऐसी कृपा करें, जिससे मुझे आपके रूप का भली-भाँति दर्शन हो सके। भक्तों पर दया करनेवाले प्रभो! मेरे पुत्र आपके भक्त हैं। आप उनपर कृपा करें।
तब भगवान् भास्कर ने अपने सामने पड़ी हुई देवीको स्पष्ट दर्शन देकर कहा- 'देवि! आपकी जो इच्छा हो, उसके अनुसार मुझसे कोई एक बार माँग लें।'
अदिति बोलीं - देव! आप प्रसन्न हों। अधिक बलवान् दैत्यों और दानवों ने मेरे पुत्रों के हाथ से त्रिलोकी का राज्य और यज्ञ भाग छीन लिये हैं। गोपते! उन्हीं के लिए आप मेरे ऊपर कृपा करें। अपने अंश से मेरे पुत्रों के भाई होकर आप उनके शत्रुओं का नाश करें।
भगवान् सूर्य ने कहा - देवि! में अपने हजारवें अंश से तुम्हारे गर्भ का बालक होकर प्रकट होऊँगा और तुम्हारे पुत्र के शत्रुओं का नाश करूँगा।
यों कहकर भगवान् भास्कर अन्तर्धान हो गये और देवी अदिति भी अपना समस्त मनोरथ सिद्ध हो जाने के कारण तपस्या से निवृत्त हो गयीं। तत्पश्चात् वर्ष के अन्त में देवमाता अदिति की इच्छा पूर्ण करने के लिए भगवान् सविता ने उनके गर्भ में निवास किया। उस समय देवी अदिति यह सोचकर कि में पवित्रतापूर्वक ही इस दिव्य गर्भ को धारण करुँगी, एकाग्रचित्त होकर कृच्छ और चान्द्रायण आदि व्रतों का पालन करने लगीं। उनका यह कठोर नियम देखकर कश्यपजी ने कुछ कुपित होकर कहा- 'तू नित्य उपवास करके गर्भ के बच्चे को क्यों मारे डालती है।' तब वे भी रुष्ट होकर बोलीं- 'देखिये, यह रहा गर्भ का बच्चा। मैंने इसे नहीं मारा है, यही अपने शत्रुओंका मारनेवाला होगा।' यों कहकर देवमाता ने उसी समय उस गर्भ का प्रसव किया। वह उदयकालीन सूर्य के समान तेजस्वी अण्डाकार गर्भ सहसा प्रकाशित हो उठा। उसे देखकर कश्यपजी ने वैदिक वाणी के द्वारा आदरपूर्वक उसका स्तवन किया। स्तुति करनेपर उस गर्भ से बालक प्रकट हो गया। उसके श्रीअङ्गों की आभा पद्यपत्र के सामान श्याम थी। उसका तेज सम्पूर्ण दिशाओं में व्याप्त हो गया। इसी समय अंतरिक्ष से कश्यपमुनि को सम्बोधित करके सजल मेघ के समान गम्भीर स्वर में आकाशवाणी हुई- 'मुने! तुमने अदिति से कहा था- 'त्वया मारितम् अण्डम्' (तूने गर्भ के बच्चे को मार डाला), इसलिये तुम्हारा यह पुत्र मार्तण्ड के नाम से विख्यात होगा और यज्ञ भाग का अपहरण करने वाले अपने शत्रुभूत असुरों का संहार करेगा।' यह आकाशवाणी सुनकर देवताओं को बड़ा हर्ष हुआ और दानव हतित्साह हो गये। तत्पश्चात् देवताओं सहित इन्द्र ने दैत्यों को युद्ध के लिये ललकारा। दानवों ने भी आकर उनका सामना किया। उस समय देवताओं और असुरों में बड़ा भयानक युद्ध हुआ। उस युद्ध में भगवान् मार्तण्ड ने दैत्यों की ओर देखा, अत: वे सभी महान् असुर उनके तेजसे जलकर भस्म हो गये। फिर तो देवताओं के हर्ष की सीमा नहीं रही। उन्होंने अदिति और मार्तण्ड का स्तवन किया। तदनन्तर देवताओं को पूर्ववत् अपने-अपने अधिकार और यज्ञ भाग प्राप्त हो गये। भगवान् मार्तण्ड भी अपने अधिकार का पालन करने लगे। ऊपर और नीचे सब ओर किरणें फैली होने से भगवान् सूर्य कदम्बपुष्प की भाँति शोभा पाते थे। वे आग में तपाये हुए गोले के सदृश दिखायी देते थे। उनका विग्रह अधिक स्पष्ट नहीं जान पड़ता था।
* विकर्तनो विवस्वांश्व मार्तण्डो भास्करो रवि:। लोकप्रकाशक: श्रीमाँल्लोकचक्षुर्महेश्वर: ॥
लोकसाक्षी त्रिलोकेश: कर्ता हर्ता तमिस्त्रहा। तपनस्तापनश्चैव शुचि: सप्ताश्ववाहन: ॥
गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनामस्कृत:। एकविंशतिरित्येष स्तव इष्ट: सदा रवे: ॥
(३१। ३१-३३)
* नमस्तुभ्यं परं सूक्ष्मं सुपुण्यं बिभ्रतेऽतुलम्। धाम धामवतामीशं धामाधारं च शाश्वतम् ॥
जगतामुपकाराय त्वामहं सतौमि गोपते। आददाननस्य यद्रूपं तीव्रं तस्मै नमाम्यहम् ॥
ग्रहीतुमष्टमासेन कालेनाम्बुमयं रसम्। बिभ्रतस्तव यद्रूपमतितीव्रं नतास्मि तत् ॥
समेतमग्निसोमाभ्यां मंस्तस्मै गुणात्मने। यद्रूपमृग्यजु: साम्नामैक्येन तपते तव ॥
विश्वमेतत्त्रयीसंज्ञं नमस्तस्मै विभावसो। यत्तु तस्मात्परं रूपमोमित्युक्त्वाभिसंहितम् ।
अस्थूलं स्थूलममलं नमस्तस्मै सनातन ॥
Summary of chapter 17 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
A detailed account of Jambūdvīpa, the central continent containing Bhāratavarṣa, is presented. The nine varṣas (regions) of Jambūdvīpa and its great mountains — Meru, Himavat, Hemakūṭa, Niṣadha, Nīla, Śveta, and Śṛṅgī — are described. The rivers, sacred centres, and cosmological significance of Mount Meru at the centre of the world are expounded.