ब्रह्माजी कहते हैं - गौतमी-तटपर जो विख्यात पुत्रतीर्थ है, वह पुण्यतीर्थ कहलाता है। उसकी महिमाके श्रवणमात्र से मनुष्य सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है। नारद! मैं उसके स्वरुपका वर्णन करता हूँ, सावधान होकर सुनो। जब दिति एवं दनुके पुत्र दैत्य और दंवोंका देवताओं द्वारा क्षय होने लगा, तब दिति पुत्र-वियोगके दु:ख से मन में स्पर्धा लेकर अपनी बहन दनुके पास आयी और इस प्रकार कहने लगी- 'भद्रे! हम दोनोंके ही पुत्र क्षीण होते हा रहे हैं। हम संसारमें कौन ऐसा गुरुतर कार्य करें, जिससे हमारा यह संकट दूर हो। देखो, अदितिका वंश कितना संगठित और उत्तम है। उसका कभी क्षय नहीं होता। वह उत्तम राज्य, सुयश और विजय-लक्ष्मीसे सुशोभित है। अदिति की संतानों का वैभव और अभ्युदय देखकर में दुबली होती जा रही हूँ। सम्भव है, जीवित न रह सकूँ। अदितिके महान् ऐश्वर्यपर दृष्टि डालते ही मैं अवर्णनीय दुरवस्थाका अनुभव करने लगती हूँ। दावानलमें प्रवेश कर जाना भी सुखद है, किन्तु स्वप्नमें भी सौतकी समृद्धि नहीं देखी जाती।
दनु बोली - भद्रे! तुम अपने गुणोंसे पतिदेव कश्यपजी को संतुष्ट करो। यदि स्वामी संतुष्ट हो गये तो तुम सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लोगी।
'बहुत अच्छा' कहकर दितिने सब प्रकारसे कश्यपको संतुष्ट किया। तब प्रजापति भगवान् कश्यपने दितिसे कहा- 'सुव्रते! तुम्हें क्या दूँ? तुम कोई अभीष्ट वर माँगो।' यह सुनकर दिति ने स्वामीसे कहा- 'नाथ! मुझे ऐसा पुत्र दीजिये, जो अनेक गुणोंसे सम्पन्न, विश्वविजयी और जगद्वान्द्य हो तथा जिसके जन्म लेने से मैं संसारमें वीरजननी कहला सकूँ।' कश्यपजी ने कहा- 'देवि! में तुम्हें एक श्रेष्ठ व्रतका उपदेश केता हूँ, जो बारह वर्षों तक पालन करनेके बाद फल देता है। उसके बाद आकर तुम्हारे अनुकूल गर्भ का आधान करूँगा, क्योंकि व्रत आदिके द्वारा निष्पाप आधान करूँगा, क्योंकि व्रत आदिके द्वारा निष्पाप हो जानेपर ही सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होते हैं।'
पति का यह वचन सुनकर दितिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने कश्यपजीको नमस्कार करके उनके बताये हुए व्रत का विधिपूर्वक पालन किया। जो लोग तीर्थोंकी सेवा, सुपात्रों का दान तथा व्रतका पालन आदि नहीं करते, वे अपनी अभीष्ट वस्तुओंको कैसे प्राप्त कर सकते हैं। दिति का व्रत पूरा होनेपर कश्यपजी ने गर्भादान किया और एकान्तमें अपनी प्रिय पत्नी दितिसे कहा- 'शुचिस्मिते! तपस्वी मुनि भी विहित करमकी अवहेलना करनेसे मनोवाञ्चित पदार्थ नहीं पा सकते। अत: तुम्हें कोई निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये। दोनों संध्याओंके समय सोना, कहीं जाना अथवा बाल खोले रहना अनिषिद्ध है। संध्याकाल भूतोंसे व्याप्त रहता है। अत: उस समय छींकना, जँभाई लेना तथा भोजन करना भी मना है। ये सब कार्य सदा ओटमें ही करने चाहिये। विशेषत: हँसना तो दूसरोंके सामने हो ही नहीं। संध्याकाल में कभी कमरे के भीतर न रहे। प्रिय! मूसल, ऊखल, सूप, पीढ़ा और ढक्कन आदिको दिन या रात में कभी न लाँघना। उत्तरकी ओर सिरहाना करके तथा संध्याकाल में कभी न सोना। झूठ न बोलना। दूसरों के घर न जान। पतिके सिवा और किसी पुरुष पर कहींभी दृष्टि न डालना। यदि निरंतर इन नियमोंका पालन करती रहोगी तो तुम्हारा पुत्र त्रिभुवन के ऐश्वर्यका भागी होगा।' दितिने स्वामीके समक्ष प्रतिज्ञा की- 'मैं इन नियमोंका ठीक-ठीक पालन करूँगी।' फिर कश्यपजी देवताओंके यहाँ चले गये। इधर दितिका पुण्यजनित बलवान् गर्भ दिनोंदिन बढ़ने लगा। इन सब बातों को मय नामक दैत्य अपनी माया के बलसे जानता था। उसकी इन्द्रसे मित्रता थी। दोनोंमें बड़ा प्रेम था। उसने इन्द्रके पास एकान्तमें जाकर विनयपूर्वक कहा- 'दिति और दनुने विशेष अभिप्रायसे कश्यप जी को संतुष्ट किया है। दितिका गर्भ दिनों दिन बढ़ता है, उसमें नाना प्रकार की शक्तियाँ हैं।'
नारदजी ने पूछा - देवेश्वर! महाबली मय नामक दैत्य तो नमुचिका प्रिय भ्राता है और नमुचि इन्द्रके हाथ से मारा गया। फिर उसकी अपने भाई के शत्रु से मित्रता कैसे हुई?
ब्रह्माजी बोले - पूर्वकाल में नमुचि दैत्यों का राजा था, उसका इन्द्रके साथ बड़ा भयंकर वैर हुआ। एक समय की बात है- इन्द्र युद्ध छोड़कर कहीं जा रहे थे। यह देखकर दैत्यराज नमुचि भी उनके पीछे लग गया। उसे आगे देख इन्द्र भयसे व्याकुल हो गये और ऐरावत हाथी को छोड़कर समुद्रके फेनमें घुस गये। फिर व्रजमें फेन लपेटकर उस फेनसे ही इन्द्रने अपने शत्रुका संहार कर डाला। जब नमुचि की मृत्यु हो गयी तब उसके छोटे भाई मयने अपने बड़े भाई के घातकका विनाश करनेके लिए बड़ी भारी तपस्या की। उसने अनेक प्रकारकी माया प्राप्त की, जो देवताओं के लिए अत्यन्त भयंकर थे। उसने सम्पूर्ण लोकों को शरण देनेवाले भगवान् विष्णुसे भी वर प्राप्त किया। मय दानी और प्रियभाषी था। उसने इन्द्रको जीतने के लिए अग्नि और ब्राह्मणोंका पूजन आरम्भ किया। वह याचकों को मुँहमाँगी वस्तुएँ देने लगा। वन्दीजन सदा उसकी स्तुति करते थे। इन्द्र ने वायु से पाने मायावी शत्रु मयकी गति-विधि जान ली। तब वे ब्राह्मण का वेष बनाकर उसके पास गये और बोले- 'दैत्यराज! में याचक हूँ, मुझे मनोवाञ्छित वर दीजिये मैंने सुना है- आप दाताओं के सिरसौर हैं। अत: आपके पास आया हूँ।' मयने उन्हें ब्राह्मण जानकार कहा- 'दिया हुआ ही समझो। सामने याचकको पाकर दाता यह विचार नहीं करते कि थोडा दूँ या अधिक।' उसके यों कहने पर इन्द्र बोले- 'मैं तुम्हारे साथ मित्रता चाहता हूँ।' यह सुनकर मय दैत्य ने कहा- 'विप्रवर! ऐसे वरसे क्या लाभव आपके साथ मेरा वैर तो है नहीं।' तब इन्द्रने अपने वास्तविक रूप को प्रकट किया। इन्द्रको पहचानकर मयके मन में बड़ा विस्मय हुआ। 'सखे! यह क्या बात है? तुम तो वज्रधारी हो। तुम्हारे योग्य यह कार्य नहीं है।' इन्द्र ने हँसकर मय को हृदयसे लगाया और कहा- 'विद्वान पुरुष किसी भी उपायसे अपने अभीष्ट कार्य की सिद्धि करते हैं।' तबसे मय के साथ इन्द्रकी गहरी मैत्री हो गयी। मय सदाके लिए इन्द्रका हितैषी हो गया। उसने इन्द्रभवनमें जाकर सब बातें बतायीं, साथ ही इन्द्रको माया भी प्रदान की। इन्द्र ने प्रसन्न होकर पूछा- 'मय! बताओ, अब मुझे क्या करना चाहिये?'
मय ने कहा - अगस्त्यके आश्रम पर जाओ। वहीँ गर्भवती दिति रहती है। उसकी सेवा करते हुए आश्रम में कुछ दिन निवास करो; फिर अवसर देखकर वज्र हाथ में लिए दिति के गर्भ में प्रवेश कर जाओ और वज्रसे उस बढ़ते हुए गर्भके टुकड़े-टुकड़े कर डालो। इससे तुम्हारे उस शत्रुका अस्तित्व ही मिट जाएगा।
इन्द्र ने 'बहुत अच्छा' कहकर म्य्की प्रशंसा की और विनीतकी भाँति माता दितिके पास गये। वहाँ जाकर दैत्यमाता की सेवा- शुश्रूषा में लग गये। उनके मन में क्या है, इस बात को दिति नहीं जनती थीं। उनके गर्भमें जो मुनिका अमोघ तेज थे, वह किसी के लिए भी दुर्धर्ष था। इन्द्र गर्भके भीतर प्रवेश करनेकी इच्छा से अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए बहुत समयतक वहाँ रहे। एक दिन दिति संध्याकाल में उत्तरकी ओर सिरहाना करके सो रही। इन्द्रने मन में कहा- 'यही अच्छा अवसर है।' यों कहकर वे वज्र हाथ में ले दितिके उदरमें प्रवेश कर गये। गर्भ में जो बालक था, वह आयुध लिए मारनेकी इच्छा से आये हुए इन्द्रको देखकर भी भयभीत न हुआ और बोला- 'वज्रधारी इन्द्र! मैं तुम्हारा भाई हूँ। तुम मेरी रक्षा क्यों नहीं करते? क्या मुझे मारना चाहते हो? युद्धके बिना अन्य अवसर पर किसी को मारने से बढ़कर दूसरा कोई पातक नहीं है। मैं गर्भ से निकलूँ, तब मुझसे युद्ध कर लेना। यहाँ आकार इस प्रकार मारना तुम्हारे लिए उचित नहीं होगा। बड़े लोग विपत्तिमें पड़ने पर भी कुमार्गपर पैर नहीं रखते। मैंने न तो अभी विद्या पढ़ी है, न शस्त्र चलाना सीखा है और न आयुधों का ही संग्रह किया है। तुम विद्वान हो। तुम्हारे हाथ में वज्र शोभा पा रहा है। क्या मुझे मारते समय तुम्हें लज्जा नहीं आती? कुलीन पुरुष कभी भी कुत्सित कर्म नहीं करते। मुझे मारने से य्तुम्हें क्या मिलेगा, यश अथवा पुण्य? गर्भमें आये हुए प्राणी इच्छानुसार मारे जा सकते हैं, किन्तु इसमें कौन-सा पुरुषार्थ है। भाई! यदि तुम्हें युद्ध से प्रेम है और मुझसे ही भिड़ना काह्हते हो तो नि:संदेह चले आओ।' यों कहकर वह बालक भी इन्द्रकी ओर मुक्का तानकर खड़ा हो गया और बोले- 'इन्द्र! मुझे मारने से तुम बालघाती, ब्रह्मघाटी तथा विश्वासघाती कहलाओगे। यही तुम्हें फल मिलेगा। फिर किसलिए मुझे मारनेको उद्यत हुए हो। सम्पूर्ण चराचर जगत् जिसकी आज्ञाके अधीन चल रहा हो, वह मुझ-जैसे बालककी हत्या करे- इसमें कौन-सा यश और क्या पुरुषार्थ है?'
गर्भका बालक यों ही कहता रहा, किन्तु इन्द्रने अपने वज्रसे उस बालकके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। सच है, क्रोधान्ध और लोभी मनुष्योंको किसीपर भी दया नहीं आती। इतनेपर भी गर्भस्थ बालक की मृत्यु नहीं हुई। सभी टुकड़े जीवित बालकोंके रूप में परिणत हो गये और दु:ख से रुते हुए बोले- 'क्यों मारते हो, हम तुम्हारे भाई हैं।' किन्तु इन्द्रने एक न सुनी, उन खण्डोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले। वे भी जीवित होकर बोले- 'इन्द्र! हमें न मारो। हम तुमपर विश्वास करते हैं, माता के गर्भ में पड़े हैं और तुम्हारे ही भाई हैं।' परंतु कौन सुनता था। जिनकी बुद्धि द्वेषसे नष्ट हो गयी है, उनके चित्त में करुणा का एक कण भी नहीं रह जाता। गर्भके सभी टुकड़े हाथ-पैर तथा नूतन जीव से युक्त हो गये! उनमें किसी प्रकार का विकार नहीं रह गया। उनकी संख्या एक से बढ़कर उनचास हो गयी। यह देखकर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। वे सब-केसब रो रहे थे। इन्द्रने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- 'मा रुत' (मत रोओ) । इनके ऐसा कहनेसे उनका नाम मरुत् हो गया। वे गर्भ में ही अत्यन्त बलवान् और महापराक्रमी हो गये थे। उन्होंने गर्भ के भीतरसे ही मुनिवर अगस्त्यको, जिनके आश्रम में माता टिकी हुई थी, पुकारकर कहा- 'मुने! हमारे पिता आपके भाई हैं। वे आपकी मैत्रीका बहुत आदर करते हैं। हम यह भी जानते हैं कि आपके मन में हम लोगोंके प्रति बड़ा स्नेह है; तथापि आपके रहते हुए यह वज्रधारी इन्द्र ऐसे कार्य में प्रवृत्त हुआ है, जिसे कोई चाण्डाल भी नहीं करता।' गर्भ के बालकोंकी वह पुकार सुनकर अगस्त्य मुनि दौड़े हुए आये। उन्होंने दिति को जगाया। वे गर्भकी वेदनासे पीड़ित थीं। उस समय अगस्त्यने अत्यन्त कुपित होकर शचीपति इन्द्र को शाप दिया- 'इन्द्र! संग्राममें शत्रु तुम्हारी पीठ देखेंगे।' दिति ने भी गर्भ में समाये हुए इन्द्रको रोषपूर्वक शाप दिया- 'तूने बच्चोंको मारकर कोई पुरुषार्थ नहीं किया है; अत: मैं शाप देती हूँ कि तु राज्य से भ्रष्ट हो जाएगा।' इसी समय वहाँ प्रजापति कश्यपजी भी आ पहुँचे। अगस्त्यके मुखसे उंदरकी यह कुत्सित चेष्टा सुनकर उन्हें बड़ा दु:ख हुआ।
कश्यपजी ने कहा - बेटा! गर्भके बाहर निकलो। तुमने यह क्या पाप कर डाला। उत्तम कुल में उत्पन्न पुरुष कभी पापमें मन नहीं लगाते।
पिता का आदेश सुनकर वज्रधारी इन्द्र गर्भसे बाहर निकले। उस समय लज्जाके मारे उनका मूँह नीचा हो रहा था। वे बोले- 'पिताजी! जिस साधनसे मेरा कल्याण हो, वह बताइये। मैं उसे अवश्य करूँगा।' तब कश्यपजी लोकपालोंके साथ मेरे पास आये और सब बातें बताकर पूछने लगे- 'दितिके गर्भकी शान्ति, गर्भस्थ बालकोंकी इन्द्रके साथ मित्रता, उन बालकोंकी नीरोगता, इन्द्रकी निर्दोषता तथा अगस्त्यके दिए हुए शापका क्रमशः उद्धार कैसे हो?' तब मैंने कश्यपसे कहा- 'प्रजापते! तुम वस्तुओं, लोकपालों तथा इन्द्रको साथ लेकर शीघ्र ही गौतमी नदीके तटपर जाओ और वहाँ स्नान करके सबके साथ महादेवजी की स्तुति करो। फिर शिवकी कृपासे सब कल्याण ही होगा।' 'अच्छा, ऐसा ही करूँगा' यों कहकर कश्यप मुनि गौतमी नदी के तटपर गये और देवेश्वर भगवान् शिवकी स्तुति करनेलगे। समस्त सु:खोंको दूर करनेके लिए दो ही देवता समर्थ बताये गये हैं- एक तो परम पवित्र गौतमी नदी और दूसरे करुणानिधि शिव।
कश्यप बोले - देवेश्वर शंकर! मेरी रक्षा कीजिये। लोकवन्दित परमेश्वर! मेरी रक्षा कीजिये। सबको पवित्र करनेवाले वागीश! रक्षा कीजिये। सर्पोंका आभूषण पहननेवाले शिव! रक्षा कीजिये। धर्मस्वरूप वृषभपर सवारी करनेवाले देवता! रक्षा कीजिये। तीनों वेद जिनके नेत्र हैं, ऐसे भगवान् त्रिलोचन! रक्षा कीजिये। गोधर* लक्ष्मीश! रक्षा कीजिये। गजचर्मका वस्त्र धारण करनेवाले शर्व! रक्षा कीजिये। त्रिपुरहर! रक्षा कीजिये। अर्द्धचन्द्रसे विभूषित नाथ! रक्षा कीजिये। यज्ञेश्वर सोमनाथ! रक्षा कीजिये। मनोवाञ्छित फलोंके दाता! रक्षा कीजिये। करुणाधाम! रक्षा कीजिये। मङ्गलदाता! रक्षा कीजिये। सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत परमात्मन्! रक्षा कीजिये। पालन करनेवाले वासव! रक्षा कीजिये। भास्कर! वित्तेश! रक्षा कीजिये। ब्रह्मवन्दित शिव! रक्षा कीजिये। विश्वेश्वर! रक्षा कीजिये। सिद्धेश्वर! रक्षा कीजिये। पूर्ण परमेश्वर! आपको नमस्कार है। करुणासागर शिव! भयंकर संसाररुपी दुर्गम प्रदेशमें विचारनेके कारण जिनका चित्त उद्विग्न हो रहा है, ऐसे जीवों के लिए आप ही शरण हैं।
इस प्रकार स्तुति करनेवाले कश्यपजी के समक्ष भगवान् शंकर प्रकट हुए और उनसे वर माँगनेके लिए कहा। कश्यपजी ने विनीत होकर भगवान् शिव से इन्द्रकी समस्त चेष्टाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया। साथ ही यहभी बताया कि मेरे पुत्रोंका जो नाश हो रहा है, उनमें परस्पर शत्रुता बढ़ रही है, इन्द्रको पाप और शापकी प्राप्ति हुई है, यह सब शान्त हो जाय। यह सुनकर भगवान् शंकर ने कहा- 'आपके जो उनचास पुत्र मरूद्रण हैं, वे सब सौभाग्यशाली और इन्द्रके साथ सदा याज्ञ्के भागी होंगे। जिस-जिस यज्ञ में इन्द्रका भाग होगा, उसमें उनसे भी पहले मरुद्रनॉन का भाग होगा- इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। मरुद्र्णोंके साथ रहनेपर कभी कोई इन्द्रको जीत नहीं सकता। फिर तो वे ही सदा विजयी रहेंगे।' इतना कहकर शंकरजी ने मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यसे कहा- 'मुने! तुम शचीपति इन्द्रपर क्रोध न करो। महामते! शान्त हो जाओ। मरुद्रण अमर हो गये।' फिर दितिसे भी शिवजी ने कहा- 'देवी! मेरे एक ऐडा पुत्र हो, जो तीनों लोकों के ऐश्वर्य से सुशोभित रहे- इस बातका चिन्तन करती हुई तुम तपस्यामें प्रवृत्त हुई थी। तुम्हारा वह मनोरथ अब सफल हो गया। तुम्हारे ये पुत्र अधिक गुणशाली, बलवान् और शूरवीर हैं। अत: अब तुम अपनी मानसिक चिंता छोड़ दो। सुन्दरी! तुम संशयरहित होकर अन्य वर भी माँगो।'
दिति बोलीं - भगवन्! लोक में यही बड़ी बात समझी जाति है कि माता-पिता को पुत्रका दर्शन हो। विशेषत: माता के लिए यह बहुत ही प्रिय बात है। इसमें भी रूप, सम्पत्ति, शौर्य और पराक्रम से सम्पन्न एक भी पुत्र हो तो बड़े भाग्यकी बात है। फिर यदि बहुत-से उत्तम और गुणवान् पुत्र प्राप्त हों तो क्या कहना। मेरे पुत्र आपके प्रभाव से विजयी और बलि हुए। वे वास्तव में इन्द्रके भाई और प्रजापति के पुत्र हैं। देव! जहाँ अगस्त्य और गौतमी गङ्गाके प्रसादके साथ-साथ आपका भी प्रसाद प्राप्ति हो, वहाँ शुभ होनेमें क्या संदेह अहि। यद्यपि मैं कृतार्थ हो गयी, तथापि भक्तिपूर्वक आपसे कुछ निवेदन करती हूँ। देव! मेरी बात सुनें और संसार का कल्याण करें।
देववन्द्य! संतानकी प्राप्ति संसारमें दुर्लभ है। विशेषत: माता के लिए पुत्रका होना और भी प्रिय है। पुत्र भी यदि गुणवान्, धनवान् और आयुष्मान् हुआ, तब तो कहना ही क्या है। इहलोक और परलोकमें उत्तम फलकी इच्छा रखनेवाले सभी प्राणियोंको गुणवान् पुत्रकी प्राप्ति सदा ही अभीष्ट है। अत:यहाँ स्नान करनेसे इस दुर्लभ फलकी प्राप्ति हो सके- ऐसा अनुग्रह कीजिये।
भगवान् शंकर बोले - नि:संतान होना बहुत बड़े पापका फल है। स्त्री या पुरुष- कोई भी यदि नि:संतान हो तो यहाँ स्नान क्र्नेमात्र से उसके इस दोष का नाश हो जाता है। जो इस स्रोतका पाठ करेगा, उसे यहाँ स्नान करनेका फल प्राप्त होगा। जो तीन मासतक यहाँ स्नान और दान करता है, उसे पुत्रकी प्राप्ति होती है। पुत्रहीन स्त्री यहाँ स्नान करके पुत्र पा सकती है। ऋतुस्नानता स्त्री यदि यहाँ आकर स्नान करे तो उसे अनेकों पुत्र प्राप्त होते हैं। वह तीन महीने के भीतर ही गर्भवती हो जाति है। जो पितृदोषसे तथा धन अपहरण करनेसे शोधसे पुत्र-लाभसे वञ्चित हैं, उनके लिए यह गौतमी नदी परम उद्धारका कारण है। यहाँ पितरोंको पिंडदान देने, तर्पण करने तथा कुछ सुवर्ण-दान करनेसे निश्चय ही पुत्र होता है। जो धरोहर हड़प लेते, रत्नों की चोरी करते तथा पितरोंका श्राद्ध-कर्म छोड़ देते हैं, उनके वन्श्की वृद्धि नहीं होती।* जो पाप करके उसका प्रायश्चित किये बिना ही मर जाते हैं, उन सबकी यही गति होती है। जो तीर्थोंका सेवन करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं, उन्हें श्रेह्स्थ संतान की प्राप्ति होती है। जो दिति और गङ्गाके संगम में स्नान करके अनादि, अपार, अजय, सच्चिदानन्दमय. लिङ्गस्वरुप, ज्योतिर्मय तथा अनामय महादेव भगवान् सिद्धेश्वरका अनेक उपचारोंसे भक्तिपूर्वक पूजन करता है, चतुर्दशी और अष्टमीको इस स्त्रोतद्वारा स्तुति करता हैं तथा यहाँ गङ्गाके तटपर ब्राह्मणों को पानी शक्तिके अनुसार सुवर्ण देता और भोजनकरता है, उसे अनेक पुत्र प्राप्त होते हैं। वह सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त करके अन्त में भगवान् शिवके धाम में जाता है। जो इस स्त्रोत के द्वारा कहीं भी मेरी छ: महीने स्तुति करता है, उसे पुत्र प्राप्त होता हैं। यदि उसकी स्त्री वन्ध्या हो तो भी वह नि:संदेह पुत्रवती होती है।
तबसे उस तीर्थका नाम पुत्रतीर्थ हो गया। वहाँ स्नान-दान आदि करनेसे समस्त कामनाओंकी पूर्ति होती है। मरूद्रणों के साथ मैत्री होनेके कारण उसे मित्रतीर्थ भी कहते हैं। यहाँ स्नान करनेसे इन्द्र निष्पाप हुए थे, इसलिये वह इन्द्रतीर्थ या शक्रतीर्थ भी कहलाता है। जहाँ इन्द्रको पानी खोयी हुई लक्ष्मी प्राप्त हुई, वह कमलतीर्थ कहलाया। ये सब तीर्थ समस्त अभीष्ट पदार्थोंको देनेवाले अहिं। भगवान् शिव यह कहकर कि 'यहाँ सब कामनाएँ पूर्ण होंगी।' अन्तर्धान हो गये और कश्यप आदि सब लोग कृतकृत्य होकर जैसे आये थे, वैसे लौट गये।
* गौ अर्थात् वृषभ (नन्दी)-को धारण करनेसे 'गोधर' और लक्ष्मीस्वरूपा पार्वतीके स्वामी होनेसे 'लक्ष्मीश' हैं। अथवा गूधरका अर्थ भूधर (गिरिराज हिमालय) है, उनकी लक्ष्मीस्वरूप कन्याके स्वामी होनेके कारण शिव 'गोधर लक्ष्मीश' हैं।
* ये न्यासाद्यपहर्तारो रत्नापह्नवकारका:। श्राद्धकर्मविहीनाश्च तेषां वंशो न वर्द्धते ॥
Summary of chapter 53 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The Lord appears before Mārkaṇḍeya in his divine four-armed form bearing conch, discus, club, and lotus, adorned with the Śrīvatsa mark and Kaustubha jewel, attended by Śrī (Lakṣmī). He blesses Mārkaṇḍeya, explains the nature of his cosmic Māyā, and grants the sage the boon of immortality and unimpaired memory through all ages. Mārkaṇḍeya's vision becomes the paradigmatic experience of divine grace in this Purāṇa.