ब्रह्म पुराण

46 - सुपर्णा-संगम, पुरूरवस्तीर्थ, पञ्चतीर्थ, शमीतीर्थ, सोम आदि तीर्थ तथा वृद्धा-संगम-तीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं - इसके बाद सुपर्णा-संगम तथा काद्रवा-संगम नामक तीर्थ हैं, जहाँ भगवान् महेश्वर गङ्गाके तटपर स्थित हैं।  वहीं अग्निकुण्ड, रूद्रकुण्ड, विष्णुकुण्ड, सूर्यकुण्ड, सोमकुण्ड, ब्रह्मकुण्ड, कुमारकुण्ड तथा वरुणकुण्ड भी हैं। उस स्थान पर अप्सरा नामकी नदी गौतमी गङ्गामें मिली है। उस तीर्थके स्मरणमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। वह सब पापों का निवारण करनेवाला है।

उससे आगे पुरूरवस् नामक तीर्थ है। उसके दर्शन तो बात ही क्या, स्मरणमात्र से ही पापोंका नाश हो जाता है। एक समय राजा पुरूरवा ब्रह्माजीकी सभामें गये। वहाँ देवनदी सरस्वती ब्रह्माजीके पास बैठी हँस रही थीं। उस रूपवती देवीको देखकर राजा ने उर्वशीसे पूछा- 'ब्रह्माजीके पास यह रूपवती साध्वी स्त्री कौन है? यह तो सबसे सुन्दरी युवती है और अपने सौन्दर्य के प्रकाश से इस सभाको उद्दीप्त कर रही है।' उर्वशीने कहा- 'ये कल्याणमयी ब्रह्मकुमारी देवनदी सरस्वती हैं। ये प्रतिदिन आती-जाती रहती हैं।' यह सुनकर राजा को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने उर्वशीसे कहा- 'इसको मेरे पास बुला लाओ।' उर्वशी ने जाकर राजा को संदेश सुना दिया। सरस्वतीने स्वीकार कर लिया तथा अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार वह पुरूरवाके पास आयी। राजा ने सरस्वती नदीके तटपर उसके साथ अनेक वर्षोंतक विहार किया। यह देख मैंने सरस्वतीको शाप दे दिया। मेरे शापके कारण वह मृत्युलोकमें कहीं लुप्त हो गयी है और कहीं दिखायी देती है। जहाँ सरस्वती नदी गङ्गामें मिली है, वहाँ पहुँचकर राजा पुरूरवाने तपस्या की और महादेवजी की आराधना करके गङ्गाजी के प्रसाद से सम्पूर्ण अभीष्ट प्राप्त कर लिया। तबसे उस स्थानका नाम पुरूवस्तीर्थ, सरस्वती-संगम और ब्रह्मतीर्थ पड़ गया। वहाँ सिद्धेश्वर नामसे प्रसिद्ध महादेवजी रहते हैं। वह तीर्थ समस्त कामनाओं को देनेवाला है।

 उसके सिवा सावित्री, गायत्री, श्रद्धा, मेधा और सरस्वती- ये पाँच पुण्य तीर्थ हैं। वहाँ स्नान और जलपान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। ये पाँचों मेरी कन्याएँ हैं, जो नदीरूपमें परिणत हो गयी हैं। जहाँ वे भगवती गङ्गासे मिली हैं, वहीं पाँच तीर्थ है। वे पाँच नदियाँ और सरस्वती पवित्र  तीर्थ हैं। मनुष्य उनमें स्नान, दान आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अभिलषित वस्तुओंको देनेवाला तथा निष्कमर्यसे भी बढ़कर मोक्षका साधक माना गया है।

शमीतीर्थके नामसे जिसकी प्रसिद्धि है, वह भी सब पापों की शान्ति करनेवाला है। नारद! उस तीर्थकी कथा सुनाता हूँ, सावधान होकर सुनो। पूर्वकाल में प्रियव्रत नामसे प्रसिद्ध क्षत्रिय राजा हो गये हैं। उन्होंने गोदावरीके दक्षिण-तटपर अश्वमेध-यज्ञकी दीक्षा ली। उस यज्ञ के पुरोहित हुए वसिष्ठ जी। एक दिन उस यज्ञमें हिरण्यक नामका दानव आया। महर्षि वसिष्ठने अपने ब्रह्मदण्डसे सब दैत्योंको मार भगाया। तदनन्तर पुन: यज्ञ आरम्भ हुआ। दैत्य अपनी सेनाके साथ भाग खड़ा हुआ। वहाँ निम्नाङ्कित तीर्थोंने अश्वमेध-यज्ञ के फल दिए- शमीतीर्थ, विष्णुतीर्थ, अर्कतीर्थ, शिवतीर्थ, सोमतीर्थ और वसिष्ठतीर्थ। यज्ञ समाप्त होनेपर देवताओं और ऋषियोंने वसिष्ठ और प्रियव्रतसे कहा- इन तीर्थोंने अश्वमेध-यज्ञयका फल दिया है; अत: इनमें स्नानदान करनेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञ का पुण्य-फल प्राप्त करेगा- इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है

मुने! गौतमीमें एक स्थानपर अनेक नद-नदियाँ मिनी हैं। उन सबके नामपर पृथक्-पृथक् तीर्थ हैं। उन तीर्थोंके नाम ये हैं- सोमतीर्थ, गन्धर्वतीर्थ, देवतीर्थ, पूर्णातीर्थ, शालतीर्थ, श्रीपर्णा-संगम, स्वागता-संगम, कुसुमा-संगम, पुष्टि-संगम, कर्णिका-संगम, वैणवी-संगम, कृशरा-संगम, वासवी-संगम, शिवशर्मा, शिखी, कुसुम्भिका, उपारथ्या, शान्तिजा, देवजा, अज, वृद्ध, सुर और भद्र आदि। ये तथा और भी बहुत-से नद-नदीगण गौतमीमें मिले हैं। पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सभी देवगिरिपर गये थे। फिर वे ही क्रमशः गङ्गामें आ मिले। कोई नदिरूप में था और कोई नदिरूप में। किसीका रूप सरोवरके आकारमें था और किसीका स्त्रोतके आकार में। वे ही सब तीर्थ पृथक्-पृथक् विख्यात हुए। उन सब में किया हुआ स्नान, जप, होम, पितृ-तर्पण आदि कर्म समस्त कामनाओं की पूर्ति करनेवाला और मुक्तिदायक माना गया है। जो इनके नामोंका पाठ अथवा स्मरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धाम में जाता है।

वृध्द-संगम नामक एक प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ वृद्धेश्वर नमक शिवका निवास है। उस तीर्थकी कथा सब पापोंका नाश करनेवाली है। पूर्वकालमें एक महातपस्वी मुनि थे। उनका नाम वृद्धगौतम तह। वे जब बालक थे, तब किसी तरह पिता ने उनका यज्ञोपवीतमात्र कर दिया। इसके बाद वे बाहर भ्रमण करनेको चले गये। उन्हें केवल गायत्री-मन्त्र याद था। वे वेदोंका अध्ययन और शास्त्रोंका अभ्यास नहीं कर सके। केवल गायत्रीका जप और अग्निहोत्र नियमपूर्वक कर लेते थे। इतनेसे ही उनका ब्रह्मणत्व सुरक्षित था। विधिपूर्वक अग्निकी उपासना और गायत्री-जप करनेसे उनकी आयु बहुत बढ़ गयी। यों भी उनकी अवस्था अधिक हो चुकी थी। किन्तु विवाह न हो सका, कोई उन्हें कन्या देनेवाला नहीं मिला।

गौतम भिन्न-भिन्न तीर्थों, वनों और पवित्र आश्रमोंमें ब्रह्मण करते रहे। घूमते-घूमते शीत-गिरिपर चले गये और वहीं रहने लगे। वहाँ उन्होंने एक रमणीय गुफ़ा देखी, जो लताओं और वृक्षोंसे घिरी हुई थी। उसमें एक अत्यन्त दुर्बल वृद्धा तपस्विनी रहती थी, उसके सब अङ्ग शिथिल हो गये थे। वह वीतरागा ब्रह्मचारिणी थी और एकांत में रहा करती थी। उसे देख मुनिश्रेष्ठ गौतम नमस्कार के लिए खड़े हो गये।

वृद्धा ने कहा- आप मेरे गुरु होंगे, अत: मुझे प्रणाम न करें। जिसे गुरु नमस्कार करता है, उसकी आयु, विद्या, धन, कीर्ति, धर्म और स्वर्ग आदि सब नष्ट हो जाते हैं।

यह सुनकर गौतम बड़े आश्चर्य में पड़े। वे हाथ जोड़कर बोले- 'तुम वृद्धा तपस्विनी हो, गुणोंमें भी मुझसे बढ़ी-चढ़ी हो। मैं बहुत कम पढ़ा-लिखा और अवस्थामें भी छोटा हूँ, फिर तुम्हारा गुरु कैसे हो सकता हूँ।'

वृद्धा ने कहा - आर्ष्टिषेणके प्रिय पुत्र ऋतध्वज थे; वे बड़े गुणवान्, बुद्धिमान्, शूरवीर तथा क्षत्रिय-धर्म में तटपर रहनेवाले थे। एक दिन वे शिकार खेलने के लिए वन में आये और इसी गुफ़ा में आकर विश्राम करने लगे। यहाँ उनपर एक सुन्दरी अप्सरा की दृष्टि पड़ी, उसका नाम सुश्यामा था। वह गन्धर्वराज की कन्या थी। राजा ने भी उसे देखा। दोनों के मन में एक-दूसरे से मिलने की इच्छा हुई। ऋतध्वजने सुश्यामाके साथ विहार किया। भोगेच्छा निवृत्त होनेपर राजा उसकी अनुमति ले अपने घर चले गये। तदनन्तर सुश्यामा गर्भसे मेरा जन्म हुआ। जब माता यहाँसे जाने लगी, तब बोली- 'कल्याणी! जो पुरुष इस गुफ़ा में पहले आ जाय, वाही तुम्हारा पति होगा।' तबसे आजतक तुम्हें यहाँ आये हो। दूसरा कोई पुरुष कभी यहाँ नहीं आया। ब्रह्मन्! और किसीने मेरा वरण नहीं किया है। न मेरी माता है, न पिता। मैं आप ही अपनी मालिक हूँ। अबतक ब्रह्मचर्य-व्रतमें रही। अब पुरुषकी इच्छा रखती हूँ, आप मुझे स्वीकार करें।

गौतम बोले - भद्रे! मेरी अवस्था तो अभि एक हजार वर्षकी ही है और तुम नब्बे हजार वर्षकी हो गयी हो। मैं बालक और तुम वृद्धा; यह सम्बन्ध योग्य नहीं जान पड़ता।

वृद्धाने बोले - पूर्वकाल में ही आप मेरे पति नियत कर दिए गये हैं। अब दूसरा कोई मेरा पति नहीं हो सकता, विधाताने आपको मुझे दिया है; अत: अब आप मुझे अस्वीकार न करें। मुझमें कोई दोष नहीं है। मैं आप में भक्ति रखती हूँ; तब भी यदि आप मुझे ग्रहण करना नहीं चाहते तो आपके देखते-देखते अभी अपने प्राण त्याग दूँगी। यदि अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति न हो तो प्राणियों के लिए मर जाना ही अच्छा है। प्रेमजनके परित्याग से जो पातक लगता है, उसका अन्त नहीं है।

वृद्धा की बात सुनकर गौतमने कहा- 'मुझमें न तपस्या है न विद्या। मैं कुरूप और निर्धन हूँ, अत: तुम्हारे लिये योग्य वर नहीं हो सकता। पहले सुंदर रूप और उत्तम विद्याकी प्राप्ति करके मुझे तुम्हारी बात माननी चाहिये।'

वृद्धाने कहा - ब्रह्मन्! मैंने अपनी तपस्यासे सरस्वती देवीको संतुष्ट किया है, साथ ही रूप देनेवाले अग्नि भी मुझपर प्रसन्न हैं; अत:वागीश्वरी देवी आपको विद्या देगी और रूपवान् अग्निदेव रूप प्रदान करेंगे।

 यों कहकर वृद्धा ने सरस्वती और अग्निकी प्रार्थना करके गौतमको विद्वान् और सुरूपवान् बना दिया। तब उन्होंने बड़ी प्रसन्नता के साथ वृद्धा को अपनी पत्नी बनाया और कितने ही वर्षोंतक उसके साथ विहार किया। एक दिन वसिष्ठ और वामदेव आदि महर्षि पुण्यतीर्थोंमें भ्रमण करते हुए उस गुफ़ा में आये। गौतम और उनकी पत्नी ने वहाँ ऋषि-मुनियोंका विधिवत् स्वागत-सत्कार किया। उनमेंसे कुछ लोगोंने गौतमका उपहास करते हुए पूछा- 'बूढ़ी माँ! यह तो बताओ, ये गौतम तुम्हारे ओउत्र लगते हैं या पोते? कल्याणी! सच-सच बताना। वृद्ध पुरुषके लिए युवती स्त्री विषके समानहै और वृद्धा स्त्री के लिए युवा पुरुष अमृतके समान प्रिय और अप्रियका संयोग हमने दीर्घकालके पश्चात् यहीं देखा है।' गौतम और उनकी पत्नी दोनों इस परिहास को सुनकर चुप रह गये। आतिथ्य ग्रहण करके सब महर्षि चले गये। उनकी बातोंको याद करके ये दोनों दम्पति बहुत दु:खी हुए। एक दिन स्त्रीसहित गौतमने मुनिवर अगस्त्यजी से पूछा- 'महर्षे! कौन-सा देश या तीर्थ ऐसा है, जहाँ जानेसे कल्याणकी प्राप्ति होती है?'

अगस्त्यने कहा - ब्रह्मन्! मैंने मुनियोंके मुखसे सुना है, गोदावरी नदी में स्नान करने से सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं।

अगस्त्यकी यह बात सुनकर गौतम उस वृद्धा जके सतह गौतमी-तटपर गये और कठोर तपस्या करने लगे। उन्होंने भगवान् शंकर और विष्णुका स्तवन किया तथा पत्नी के लिए गङ्गाजी को भी संतुष्ट किया।

गौतम बोले - शिव! जिनका हृदय व्यथित है, ऐसे पुरुषोंके लीयते संसार में पार्वतीसहित आप ही शरण हैं- ठीक वैसे ही, जिस प्रकार मरुभूमिके पथिकोंके लिए वृक्ष ही आश्रय होता है। भगवान् श्रीकृष्ण! आप ही छोटे-बड़े सब भूतोंके पापोंका सर्वथा निवारण करनेवाले हैं, जैसे सूखती हुई खेतीको मेघ ही सींचकर हरा-भरा करता है। सुधामयी तरङ्गोंसे सुशोभित गौतमी! तुम वैकुण्ठरूपी दुर्गमें पहुँचनेके लिए सीढी हो। हम अधोगति में पड़कर संतप्त हो रहे हैं, माता! तुम हमारे लिए शरण हो जाओ।

सबको शरण देनेवाली गौतमी गङ्गा गौतम के स्तोत्रसे प्रसन्न होकर बोलीं- 'ब्रह्मन्! तुम मन्त्र पढ़ते हुए मेरे जलसे अपनी पत्नीका अभिषेक करो। इससे यह रूपवती हो जाएगी। इसके सभी अङ्ग मनोहर होंगे। नेत्रोंमें भी सुंदरता आ जाएगी तथा यह सब प्रकारके शुभ लक्षणोंसे शोभापाने लगेगी।'

गङ्गाजी के आदेश्से दोनोंने ऐसा ही किया, अत: उनकी कृपासे दोनों पति-पत्नी सुन्दर रूपवाले हो गये। उनके अभिषेक जो जल था, वह नदीरूपमें परिणत हो गया। वृद्धा नाम से ही उस नदीकी ख्याति हुई। गौतमने जो शिवलिङ्गकी स्थापना की, वह भी वृद्धा के ही नामपर 'वृद्धेश्वर' कहलाया। वहीँ मुनिश्रेष्ठ गौतमने वृद्धाके साथ पूर्ण आनन्द प्राप्त किया। तबसे उस तीर्थका नाम 'वृद्धा-संगम' हो गया। वहाँ किया हुआ स्नान और दान सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है।