ब्रह्म पुराण

88 - धर्म यमलोकमें सुखपूर्वक गति तथा भगवभ्दक्तिके प्रभाव का वर्णन

मुनियों ने कहा - अहो! यमलोक के मार्ग में तो बड़ा भयंकर दु:ख होता है। साधुश्रेष्ठ! आपने उन दु:खों के साथ ही घोर नरकों तथा दक्षिणद्वारा का भी वर्णन किया। ब्रह्मन्! उस भयानक मार्ग में कष्टों से बचनेका कोई उपाय है या नहीं? यदि है तो बताइये, किस उपाय से मनुष्य यमलोक में सुखपूर्वक जा सकते हैं?

व्यासजी ने कहा - मुनिवरो! जो लोग इस लोक में धर्मपरायण हो अहिंसाका पालन करते, गुरुजनों की सेवा में संलग्न रहते और देवता तथा ब्राह्मणों की पूजा करते हैं, वे स्त्री और पुत्रोंसहित जिस प्रकार उस मार्ग से यात्रा करते हैं, वह बतलाता हूँ। उपर्युक्त पुण्यात्मा पुरुष सुवर्णमय ध्वजाओंसे सुशोभित भाँति-भाँति के दिव्य विमानों पर आरुढ़ हो धर्मराज नगर में जाते अहिं। जो ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक न्काना प्रकार की वस्तुएँ दान में देते हैं, वे उस महान् पथपर सुखसे यात्रा करते हैं। जो ब्राह्मणोंको, ब्राह्मणों में भी विशेषत:  श्रोत्रियोंको अत्यन्त भक्तिपूर्वक उत्तम रीतिसे तैयार किया हुआ अन्न देते हैं, वे सुसज्जित विमानों द्वारा धर्मराज के नगरमें जाते हैं। जो सदा सत्य बोलते और बाहर-भीतरसे शुद्ध रहते हैं, वे भी देवताओं के समान कान्तिमान् शरीर धारणकर विमानों द्वारा यमराज के भवन में जाते हैं। जो धर्मज्ञ पुरुष जीविकारहित दीन-दुर्लब साधुओं को भगवान् विष्णुके उद्देश्य से पवित्र गोदान करते हैं, वे मणिजटित दिव्य विमानों द्वारा धर्मराज के लोक में जाते हैं। जो जूता, चाता, शय्या, आसन, वस्त्र और आभूषण दान करते हैं, वे दिव्य आभुशों से अलंकृत हो हाथी, रथ और घोड़ों की सवारी से वहाँ की यात्रा करते हैं। उनके ऊपर सोने-चाँदी का छत्र लगा रहता है। जो श्रेह्स्थ ब्राह्मणों को विशुद्ध हृदय से भक्तिपूर्वक गुद्का रस और भात देते हैं, वे सुवर्णमय वाहनों द्वारा यमलोक में जाते अहिं। जो ब्राह्मणों को यत्नपूर्वक शुद्ध एवं सुसंस्कृत दूध, दही, घी और गुड़ दान करते हैं, वे चक्रवाक पक्षियों से जुड़े हुए सुवर्णमय विमानों द्वारा यात्रा करते हैं। 76 समय गन्धर्वगण वाद्यों द्वारा उनकी सेवा करते हैं। जो सुगन्धित पुष्प दान करते हैं, वे हंसयुक्त विमानों से धर्मराज के नगरको जाते हैं। जो श्रोत्रिय ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक तिल, तिलमयी धेनु अथवा घृतमयी धेनु दान करते हैं, वे चंद्रमण्डलके समान उज्जवल विमानों द्वारा यमराज के भवन में प्रवेश करते हैं। उस समय गन्धर्वगण उनका सुयश गाते रहते हैं। इस लोक में जिनके बनवाये हुए कुएँ, बाबड़ी, तालाब, सरोवर, दीर्घिका, पुष्परिणी तथा शीतल जलाशय शोभा पाते हैं, वे दिव्य घण्टानादसे मुखरित, सुवर्ण और चद्रमा के समान कान्तिमान् विमानों द्वारा यात्रा करते हैं। मार्ग में उन्हें सुख देने के लिए दिव्य पंखे डुलाये जाते हैं। जो लोग समस्त प्राणियों के जीवनभूत जल का दान करते हैं, वे पिपासासे रहित हो दिव्य विमानों पर बैठकर सुखपूर्वक उस महान् पथकी यात्रा करते हैं! जिन्होंने ब्राह्मणों को लकड़ीकी बनी खडाऊँ, सवारी, पीढ़ा और आसन  दान किये हैं , वे उस मार्ग में सुख से जाते हैं। वे विमानों पर बैठकर सोने और मणियों के बने हुए उत्तम पीढोंपर पैर रखकर यात्राकरते हैं।

जो मनुष्य दूसरों के उपकार के लिये फल और पुष्पों से सुशोभित विचित्र उद्यान लगते हैं,  वे वृक्षों की रमणीय एवं शीतल छाया में सुखपूर्वक यात्रा करते हैं । जो लोग सोना, चाँदी, मूँगा तथा मोटी दान करते हैं, वे सुवर्णनिर्मित उज्जवल विमानोंपर बैठकर यमलोक में जाते हैं। भूमिदान करनेवाले पुरुष सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओं से तृप्त हो उदयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी विमानों पर बैठकर देदीप्यमान शरीर से धर्मराज के नगरको जाते हैं। जो ब्राह्मणों के लिये भक्तिपूर्वक उत्तम, गन्ध, अगर, कपूर, पुष्प और धूपका दान करते हैं, वे मनोहर गन्ध, सुन्दर वेष, उत्तम कान्ति और श्रेष्ठआभूषणोंसे विभूषित हो विचित्र विमानों द्वारा शर्म्नगर की यात्रा करते हैं। दीप-दन करनेवाले मनुष्य अग्निके तुल्य प्रकाशमान होकर सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंद्वारा दासों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए चलते हैं। जो गृह अथवा रहने के लिये स्थान देते हैं, वे अरुणोदय की- सी कान्तिवाले सुवर्णमण्डित  गृहों के साथ धर्मराज के नगर में जाते हैं। जलपात्र, कुण्डी और कामण्डलु दान करनेवाले मानव अप्सराओं से पूजित हो महान् गजराजों पर बैठकर यात्रा करते हैं। जो ब्राह्मणों को सर और पैरों में मलने के लिये तेल तथा नहाने और पीने के लिये जल देते हैं, वे घोड़ों पर सवार होकर यमलोक में जाते हैं। जो रास्ते के थके-माँदे दुर्लब ब्राह्मणों को अपने यहाँ ठहरते हैं, वे चक्वों से जुड़े हुए दिव्य विमानों पर बैठकर सुखसे यात्रा करते हैं। जो स्वागतपूर्वक आसन देकर ब्राह्मण की पूजा करता है, वह अत्यन्त प्रसन्न होकर सुख से उस मार्ग पर जाता है।

जो 'पापहरे!' इत्यादि का उच्चारण करके गौको मस्तक झुकाते हैं, वह सुखसे यमलोक के मार्गकपर आगे बढ़ता है। जो शठता और दम्भका परित्याग करके एक समय भोजन करते हैं, वे हंसयुक्त विमानों द्वारा सुखपूर्वक यमलोक की यात्राकरते हैं। जो जितेन्द्रिय पुरुष एक दिन उपवास करके दूसरे दिन एक समय भोजन करते हैं, वे मोरों से जुड़े हुए विमानों द्वारा धर्मराज के नगर में जाते हैं। जो नियमपूर्वक व्रतका पालन करते हुए तीसरे दिन एक समय भोजन करते हैं, वे हाथियों से जुड़े हुए दिव्य रथोंपर आसीन हो यमराज के लोक में जाते हैं। जो नित्य पवित्र रहकर इन्द्रियों को वशमें रखते हुए छटे दिन आहार ग्रहण करते हैं, वेसाक्षात् शचीपति इन्द्र के समान ऐरावतकी पीठपर बैठकर यात्रा करते हैं। जो एक पक्षपात उपवास करके अन्न ग्रहण करते हैं, वे बाघों से जुड़े हुए विमानों द्वारा धर्मराज केनगर में जाते हैं। उसस अमे देवता और असुर उनकी सेवा में उपस्थित रहते हैं। जो जितेन्द्रिय रहकर एक मासतक उपवास करते हैं, वे सूर्य के समान देदीप्यमान रथों पर बैठकर यमलोककी यात्रा करते हैं। जो स्त्री अथवा गौकी रक्षा के लिये युद्ध में प्राणत्याग करता है, वह सूर्य के समान कान्तिमान् शरीर धारण करके देवकन्याओं द्वारा सेवित हो धर्मनगर की यात्रा करता है।  

जो भगवान् विष्णु में भक्ति रखते हुए जितेन्द्रियभाव से तीर्थों की यात्रा करते हैं, वे सुखदायक विमानों से सुशोभित हो उस भयंकर पथकी यात्रा करते हैं। जो श्रेष्ठ द्विज प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा भगवान् यजन करते हैं, वे तपाये हुए सुवर्णसदृश्य विमानों द्वारा सुखपूर्वक यमलोक में जाते हैं। जो दूसरों को पीड़ा नहीं देते और भृत्यों का भरण-पोषण करते हैं, वे सुवर्णनिर्मित उज्जवल विमानों पर बैठकर सुख से यात्रा करते हैं। जो समस्त प्राणियों के प्रति क्षमाभाव रखते, सबको अभय देते, क्रोध, मोह और मदसे मुखत रहते तथा इन्द्रियों को वश में रखते हैं, वे महान्तेज से सम्पन्न हो पूर्ण चद्रमा के समान प्रकाशमान विमानपर बैठकर यमराज की पुरी में जाते हैं।उस समय देवता और गन्धर्व उनकी सेवा में खड़े रहते हैं। जो सत्य और पवित्रता से युक्त रहकर कभी भी मांसाहार नहीं करते, वे भी धर्मराज के नगर में सुखसे ही यात्रा करते हैं। जो एक हजार गौओं का दान करता है और जो कभी मांस भक्षण नहीं  करता, वे दोनों समान हैं- यह बात पूर्वकाल में वेद्वेत्ताओं में श्रेह्स्थ साक्षात् ब्रह्माजी ने कही थी।ब्राह्मणों! सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान करनेसे जो पुण्य होता है और समस्त यज्ञों के अनुष्ठान से जिस फल की प्राप्ति होती है, वही या उसके समान फल मानस न खाने से भी प्राप्त होता है।*

इस प्रकार दान और व्रतमें तटपर रहनेवाले धर्मात्मा पुरुष विमानों द्वारा सुखपूर्वक यमलोक में जाते हैं, जहाँ सुर्यनंदन यम विराजमान रहते हैं। धार्मिक पुरुषों को देखकर यमराज स्वयं ही स्वागत[पूर्वक उन्हें आसन देते और पाद्य, अर्घ्य तथा प्रिय वचनों द्वारा उनका सम्मान करते हैं।वे कहते हैं- 'पुण्यात्मा पुरुषो! आप लोग धन्य है। आप अपने आत्मा का कल्याण करनेवाले महात्मा हैं, क्योंकि आपने दिव्य सुख के लिये शुभकर्मो का अनुष्ठान किया है। अब इस विमानपर बैठकर उस अनुपम स्वर्गलोक को जाइये, जहाँ समस्त कामनाएँ पूर्ण होती हैं। वहाँ महान् भोगोंका उपभोग करके अन्त में पुण्य क्षीण होनेपर जो थोडा अशुभ कर्म शेष रहेगा, उसका फल यहाँ आकार भोगियेगा।'

धर्मात्मा पुरुष अपने पुण्यों के प्रभावसे धर्मराज को कोमल हृद्यवाले अपने पिता के तुल्य देखते हैं, इसलिये धर्मका सदा सेवन करना चाहिये। धर्म मोक्षरूप फल का देनेवाला है। धर्मसे ही अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि बतायी गयी है। धर्म ही माता-पिता और भ्राता है, धर्म ही अपना रक्षक और सुहृदय है। स्वामी, सखा, पालक तथा धारण-पोषण करनेवाला धर्म ही है।१ धर्म से अर्थ, अर्थ से काम और काम से भोग एवं सुख उपलब्ध होते हैं। धर्म से ही ऐश्वर्य, एकाग्रता और उत्तम स्वर्गीय गति प्राप्त होती है। विप्रवरो! धर्मका यदि सेवन किया जाय तो वह मनुष्य की महान् भय से रक्षा करता है।इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि धर्मकी देवत्व और ब्राह्मणत्व भी प्राप्त हो सकते हैं। जब मनुष्यों के पूर्वसंचित पाप नष्ट हो जाते हैं, तब उनकी बुद्धि इस लोक में धर्म की ओर लगती है। हजारों जन्मों के पश्चात् दुर्लभ मनुष्य-जीवन को पाकर जो धर्मका आचरण नहीं करता, वह निश्चय ही सौभाग्यसे वञ्चित है। जो लोग कुत्सित, दरिद्र, कुरूप, रोगी, दूसरों के सेवक और मुर्ख हैं, उन्होंने पूर्वजन्म में धर्म नहीं किया है- ऐसा जानना चाहिये। जो दीर्घायु, शूरवीर, पण्डित, भोगसाधन से सम्पन्न, धनवान्, नीरोग तथा रूपवान् हैं, उन्होंने पूर्वजन्म में अवश्य ही धर्म का अनुष्ठान किया है।ब्राह्मणों! इस प्रकार धर्मपरायण मनुष्य उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं और अधर्म का सेवन करनेवाले लोग पशु-पक्षियों की योनि में जाते हैं।

जो मनुष्य नरकासुरका निवाश करनेवाले भगवान् वासुदेव भक्त हैं, वे सवप्न में भी यमराज और नरकों को नहीं देखते। जो दैत्यों और दानवों का संहार करनेवाले आदि-अन्तरहित भगवान् नारायण को प्रतिदिन नमस्कार करते हैं, वे भी यमराज को नहीं देखते। जो मन, वाणी और क्रिया के द्वारा भगवान् अच्युत की शरण में चले गये हैं, उनपर यमराज का वश नहीं चलता। वे मोक्षरूप फलके भागी होते हैं।  ब्राह्मणों! जो मनुष्य प्रतिदिन जगन्नाथ श्रीनारायण को नमस्कार करते हैं, वे वैकुंठधाम के सिवा अन्यत्र नहीं जाते। श्रीविष्णु कोनमस्कार करके मनुष्य यमदूतों को, यमलोक के मार्गको, यमपुरी को तथा वहाँ के नरकों को किसी प्रकार नहीं देख पाते। मोह में पड़कर अनेकों बार पाप कर लेनेपर भी यदि मानव सर्वपापहारी श्रीहरिको नमस्कार करते हैं तो वे नरक में नहीं पड़ते।जो लोग शठता से भी भगवान् जनार्दन का स्मरण करते हैं, वे भी देहत्याग के पश्चात रोग-शोक से रहित श्रीविष्णुधाम को प्राप्त होते हैं। अत्यन्त क्रोध में आसक्त होकर भी जो श्रीहरि के नामों का कीर्तन करता है, वह भी चेदिराज शिशुपाल की भाँति सम्पूर्ण दोषों का क्षय हो जानेसे मोक्ष को प्राप्त करता है।२

* ये च मांसं न खादन्ति सत्यशौचसमन्विता:। तेऽपि यान्ति सुखेनैव धर्मराजपुरं नरा: ॥

गोसहस्त्रं तु यो दद्याद्यास्तु मांसं न भक्षयेत्। समावेतौ पूरा प्राह ब्रह्मा वेदविदां वर: ॥

सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वयज्ञेषु यत्फलम्। अमांसभक्षणे विप्रास्तच्च तच्च च तत्समम् ॥

(२१६ ।६३,६५-६६ )

१. तस्याद्धर्म: सेवितव्य: सदामुक्तिफलप्रद:। धर्मादर्थस्त्तथा कामो मोक्षश्च परिकीर्त्यते ॥

धर्मो माता-पिता भ्राता धर्मो नाथ: सुह्रित्त्था। धर्म: स्वामी सखा गोप्ता तथा धाता च पोषक: ॥

(२१६ ।७३-७४ )

२. ये ब्रानरकध्वंसिवासुदेवमनुव्रता:। ते स्वप्नेऽपि न पश्यन्ति यमं वा नरकाणि वा ॥

आनादिनिधनं देवं दैत्यदानवदरनण्। ये नमन्ति नर नित्यं न हि पश्यन्ति ते यमम् ॥

कर्मणा मनसा वाचा येऽच्युतं शरणं गता:। न समर्थो यम्स्तेषां ते मुक्तिफलभागिन: ॥

ये जना जगतां नाथं नित्यं नारायणं द्विजा:। नमन्ति न हि ते विष्णो: स्थानादन्यत्र गामिन: ॥

न ते दुतान्न तन्मार्ग न यमं न च तां पुरीम्। प्रणमय विष्णुं पश्यन्ति नारकाणि कथंचन ॥

कृत्वापि बहुश: पापं नर मोहसमन्विता:। न यान्ति नरकं नत्वा सर्वपापहरं हरिम् ॥

शाठ्येनापि नर नित्यं ये समर्न्ति जनार्दनम्। तेऽपि यान्ति तनुं त्यक्त्वा विष्णुलोकनामयम् ॥

अत्यन्तक्रोधसक्तोऽपि कदाचित्कीर्टयेद्धरिम्। सोऽपि दोषक्षयान्मुक्तिं लभेच्चेदिपतिर्यथा ॥

(२१६ । ८२-८९ )