ब्रह्माजी कहते हैं - मुनियो! भगवान् श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा- ये रथपर विराजमा ओकर जब गुण्डिचा*- मण्डपकी यात्रा करते हैं, उस समय जिन्हें उका दर्शन प्राप्त होता है तथा जो लोग एक सप्ताहतक उक्त मण्डपमें विराजमान श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राकी झाँकी करते हैं, वे विष्णुलोक में जाते हैं।
मुनियों ने पूछा - जगत्पते! इस यात्राका आरम्भ किसने किया? तथा उसमें सम्मिलित होनेवाले मनुष्यों को क्या फल मिलता है?
ब्रह्माजी बोले - ब्राह्मणो! पूर्वकाल में रजा इन्द्रद्युम्न भगवान् से प्रार्थना की कि 'मेरे सरोवर के तटपर एक सप्ताह के लिए आपकी यात्रा हो।'
श्रीभगवान् बोले - राजन्! तुम्हारे सरोवर के तटपर सात दिनोंके लिए मेरी यात्रा होगी, वह यात्रा गुण्डिचा नामसे विख्यात और समस्त अभिलकषित फलों को देनेवाली होगी। जो लोग वहाँ मण्डप में स्थित होनेपर मेरी, बलरामजी की और सुभाद्रकी एकाग्रचित्तसे श्रद्धापूर्वक पूजा करेंगे तथा जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री और शूद्र, पुष्प, गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य, भाँति-भाँति के उपहार, नमस्कार, परिक्रमा, जय०जय्कार, स्तोत्र-गीत तथा मनोहर वाद्योंके द्वारा आराधना करेंगे, उन्हें मेरी कृपासे कोई भी मनोरथ दुर्लभ नहीं रहेगा।
यों कहकर भगवान्वहीँ अन्तर्धान हो गये और वे महाराज इन्द्रदयुम्न कृतकृत्य हो गये। अत: सब प्रकार से प्रयत्न करके गुण्डिचा-मण्डपमें समस्त अभिलषित वस्तुओं को देनेवाले भगवान् पुरुषोत्तम दर्शन करा चाहिये। वहाँ पुरुषोत्तमका दर्शन करके स्त्री या पुरुष जिन-जिन भोगों को चाहें, उन्हें प्राप्त कर सकते हैं।
मुनियों ने पूछा - भगवन्! गुण्डिचाकी एक-एक यात्राका पृथक्-पृथक् क्या फल है? उसे करने से नरया नारीको कौन-सा फल मिलता है?
ब्रह्माजी बोले - ब्राह्मणो! सुनो। मैं प्रत्येक यात्राका फल बताता हूँ। गुण्डिचामें प्रबोधिनी एकादशीके दिन, फाल्गुन की पूर्णिमाको तथा विषुवयोगमें विधिपूर्वक यात्रा करके श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राका दर्शन करनेसे मनुष्य वैकुण्ठ-धाममें जाता है। क्षेत्रोंमें श्रेष्ठ पुरुषोत्तमतीर्थ बड़ा ही पवित्र, रमणीय, मनुष्यों को भोग और मोक्षका दाता तथा सब जीवोंको सुख पहुँचानेवाला है। जो जितेन्द्रिय स्त्री या पुरुष जयेष्ठमास में वहाँ शास्त्रोक्त विधिके अनुसार बारह यात्राएँ करके एकाग्रचित्तसे उनकी प्रतिष्ठा करता है और उस समय धन खर्च करने में कृपणता नहीं करता, वह भाँति-भाँति के भोगोंका उपभोग करके अन्त में मोक्ष-पदको प्राप्त होता है।
मुनियों ने कहा - देव! जगत्पते! हम आपकेमुँहसे द्वादश यात्रा I प्रतिष्ठाकी विधि, पूजन, दान और फल सुनना चाहते हैं।
ब्रह्माजी बोले - ब्राह्मणो! जब बारह यात्राएँ पूरी हो जाएँ, तब विधिपूर्वक उकी प्रतिष्ठा करे। वह सब पापों का नाश करनेवाली है। ज्येष्ठमास के शुक्लपक्षमें एकादशी तिथिको एकाग्रचित्तसे किसी पवित्र जलाशयपर जाकर आचमन करे और इन्द्रियसंयमपूर्वक पवित्र भाव से सब तीर्थोंका आवाहन करके भगवान् नारायणका ध्या करते हुए विधिवत् स्नान करे। ऋषियोंए स्नान-कर्म में जिसके लिए जैसी विधि बतलायी है, उसको उसी विधिसे स्नान करना चाहिये। स्नान के पश्चात् नाम, गोत्र और विधि का ज्ञाता पुरुष शास्त्रोक्त विधिसे देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा अन्य जीवों का तर्पण करे। फिर जल से निकलकर दो स्वच्छ वस्त्र पीने और विधिपूर्वक आचमन करके एक सौ आठ बार गायत्रीका मानसिक जप करे। गायत्री सब वेदोंकी माता, सम्पूर्ण पापोंको दूर करनेवाली तथा परम पवित्र है। इसके सिवा अन्यान्य सूर्यसम्बन्धी मन्त्रोंका भी श्रद्धापूर्वक जप करना चाहिये। तत्पश्चात् तीन बार परिक्रमा करके सूर्यदेवको प्रणाम करे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- इन तीन वर्णों का स्नान और जप वैदिक विधिके अनुसार बताया गया है; किन्तु स्त्री और शूद्रोंके स्नान और जप में वैदिक विधिका निषेध है।
इसके बाद मौन होकर घरमें जाय और हाथ-पैर धोकर विधिवत् आचमन करके श्रीपुरुषोत्तमकी पूजा करे। पहले भगवान् को घीसे स्नान कराये। फिर दूधसे; उसके बाद मधु, गन्ध और जलसे; फिर तीर्थ के चन्दन और जलसे स्नान कराये। तदनन्तर भक्तिपूर्वक दो उत्तम वस्त्र पहनाये; फिर चन्दन, अगर, कपूर और केसर भगवान् के अङ्गों में लगाये। पुन: पराभक्तिके साथ कमलसे तथा विष्णुदेवतासम्बन्धी मल्लिका आदि अन्य पुष्पोंसे श्रीपुरुषोत्तमकी पूजा करे। भोग और मोक्षके दाता जगदीश्वर श्रीहरिकी इस प्रकार पूजा करके उनके समक्ष अगर, गूगुल तथा अन्य सुगन्धित पदार्थोंके साथ धूप जलाये। अपनी शक्तिके अनुसार घीसे दीपक जलाकर रखे, घी अथवा तिलके तेलसे अन्यबारह दीपक जलाकर रखे। नैवेद्य रूप में खीर पूआ, पूड़ी, बड़ा, लड्डू, खांड और फल निवेदन करे। इस प्रकार पञ्चोपचार से श्री पुरुषोत्तमका पूजा करके 'ॐ नम: पुरुषोत्तमाय' इस मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे। इसके बाद भक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमसे इस प्रकार प्रार्थना करे-
नमस्ते सर्वलोकेश भक्तानामभयप्रद ।
संसारसागरे मग्नं त्राहि मां पुरुषोत्तम ॥
यास्ते मया कृता यात्रा द्वादशैव जगत्पते ।
प्रसदात्त्व गोविन्द सम्पूर्णास्ता भवन्तु मे ॥
'भक्तोंक्त अभय प्रदान करनेवालेसर्वलोकेश्वर पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। मैं I संसार-सागरमें डूबा हुआ हूँ। मेरा उद्धार कीजिये। जगत्पते! गोविन्द! आपके दर्शनके लिये मैंने जो बारहों यात्राएँ की हैं, वे सब आपके प्रसादसे मेरे लिये परिपूर्ण हों।'
इस प्रकार भगवान् को प्रसन्न करके साष्टाङ्ग दण्डवत् करे। तत्पश्चात् पुष्प, वस्त्र और चन्दन आदि से भक्तिपूर्वक गुरूकी पूजा करे। क्योंकि गुरु और भगवान् में कोई अन्तर नहीं है। तदनन्तर भाँति-भाँति के पुष्पोंसे भगवान् के ऊपर एक सुंदर पुष्प-मण्डप बनाये, फिर श्रद्धा और एकाग्रतापूर्वक रात्रिमें जागरण करे। भगवान् वासुदेवकी कथा और गीत की व्यवस्था रखे। इस प्रकार विद्वान पुरुष ध्यान, पाठ और स्तुति करते हुए रात्रि व्यतीत करे। तत्पश्चात् निर्मल प्रभात होनेपर द्वादशीको बारह ब्राह्मणों को निमन्त्रित करे। वे ब्राह्मण स्नातक, वेदों में पारंगत, इतिहास-पुराण के ज्ञाता, श्रोत्रिय और जितेन्द्रिय होने चाहिये। इसके बाद स्वयं भी विधिपूर्वक स्नान करके धुला उया वस्त्र पहने और इन्द्रियसंयमपूर्वक पहले भगवान् को स्नान कराकर उनकी पूजा करे। भगवान् की पूजा के बाद ब्राह्मणोंकी भी पूजा करे। उनके लिये बारह गौएँ दान करके श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सुवर्ण, छत्री और जूते, धन और वस्त्र आदि समर्पित करे। सभ्दावसे पूजित होनेपर भगवान् गोविन्द संतुष्ट होते हैं। आचार्य को भी भक्तिपूर्वक गौ, वस्त्र, सुवर्ण, छतरी, जूते तथा काँसेका पात्र अर्पित करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको खीर, पकवान, गुड़ और घीमें बने हुए पदार्थ भोजन कराये। जब वे भोजन करके तृप्त हो जाएँ, तब उनके लिए बारह जलसे भरे हुए घट दान करे। उन घड़ों के साथ लड्डू और यथाशक्ति दक्षिणा भी होनी चाहिये। आचार्यको भी कलश और दक्षिणा निवेदन करे। इस तरह ब्राह्मणोंकी पूजा करके विष्णुतुल्यज्ञानदाता गुरुकी भी पूर्ण भक्तिके साथ पूजा करे। पूजनके पश्चात् नमस्कार करके यह मन्त्र पढ़े-
सर्वव्यापी जगन्नाथ: शङ्खचक्रगदाधर: ।
अनादिनिधनो देव: प्रीयतां पुरुषोत्तम: ॥
'शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले, सर्वव्यापी,जगन्नाथ एवं आदि-अंतसे रहित भगवान् पुरुषोत्तम मुझपर प्रसन्न हों।'
यों कहकर ब्राह्मणोंकी तीन बार प्रदक्षिणा करे। इसके बाद मस्तक झुकाकर आचार्यको भक्तिपूर्वक प्रणाम करे। प्रणाम के पश्चात् उन्हें विदा करे। फिर अन्य ब्राह्मणों को भी गाँव की सीमातक पहुँचा दे। अन्त मई सबको नमस्कार करके लौट आये। फिर स्वजनों, बान्धवों, अन्य उपासको, दीनों, भिखमंगों और अन्न चाहनेवाले अन्य लोगोंको भोजन कराकर फिर मौन होकर भोजन करे। ऐसा करके समस्त नर-नारी एक हजार अश्वमेध तथा सौ राजसूय-यज्ञोंका फल पाते हैं और ऐसा करनेवाला बुद्धिमान् पुरुष सूर्य के समान तेजस्वीऔर इच्छानुसार चलनेवाला विमान के द्वारा भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है।
* गुण्डिचा नामक उद्यान-मंदिर, जो पुरीमें इन्द्रद्युम्नसरोवरके तटपर स्थित है। इसके गुण्डिचा, गुडिवा आदि नाम भी मिलते हैं।
Summary of chapter 34 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The sacred marriage of Śiva and Pārvatī is narrated in full splendor. Himavat gives Pārvatī's hand to Śiva, and the entire assembly of Devas, Gandharvas, Apsaras, Siddhas, and Ṛṣis gathers on the Himālaya for the divine wedding. Brahmā officiates. The sacred union of Śiva and Śakti is celebrated as the supreme event that ensures the continued well-being of all the three worlds.