मुनियों ने कहा - भगवान् श्रीकृष्ण ने मानव-शरीर धारण करके बहुत बड़ा पराक्रम किया, जो उन्होंने लीलापूर्वक ही इन्द्र, महादेवजी तथा सम्पूर्ण देवताओं को जीत लिया। मुनिश्रेष्ठ! देवताओं की चेष्टा काविघात करनेवाले भगवान् ने और भी जो कर्म किये थे, वे सब हमसे कहिये। हमें उन्हें सुनने के लिये बड़ा कौतूहल हो रहा है।
व्यासजी बोले - मुनिवरो! बतलाता हूँ; मनुष्यावतार में श्रीहरि ने जो लीलाएँ की थी, उन्हें आदरपूर्वक सुनो। पुण्ड्रकवंशी वासुदेव नामक एक राजा था। वह 'भगवान् वासुदेव' बन बैठा था। कुछ अज्ञानमोहित मनुष्यों ने उससे यह कहा था कि 'आप ही इस पृथ्वीपर वासुदेव के रूप में अवतीर्ण हुए हैं।' उनकी बातों में आकर वह स्वयं भी अपने को अवतार मानने लगा था।वासुदेव बननेकी धुन में वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया और भगवान् विष्णुके जितने चिह्न हैं, उन सबको धारण करने लगा। इतना ही नहीं, उसने भगवान् श्रीकृष्ण के पास अपना दूत भी भेजा और उसके मुखसे कहलाया- 'ओ मूढ़! तूने जो चक्र आदि मेरे चिह्न और मेरा वसुदेव नाम धारण किया है, वह सब शीघ्र ही त्याग से और अपने जीवन को रक्षा के लिए मेरी शरण में आ जा।' यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण हँस पड़े और दूतसे बोले- 'तुम जाकर राजा पौण्ड्रक से मेरी यह बात कहना- 'राजन्! मैंने तुम्हारे वचनोंका तात्पर्य भलीभाँति समझ लिया है। अब तुम्हें जो कुछ करना हो, वह करो। मैं अपने चिह्नको साथ लेकर ही तुम्हारे नगर में आऊँगा और उस चिह्नस्वरूप चक्रको तुम्हारे ऊपर ही छोड़ूँगा, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। रमने जी आग्यापुर्वक आनेका संदेश दिया है, उसका मैं अविलम्ब पालन करूँगा। कल सबेरे ही तुम्हारी पुरी में पहुँच जाऊँगा। तुम्हारे वहाँ आकार मैं वह कार्य करूँगा, जिससे फिर तुमसे कोई भय नहीं रह जाएगा।'
श्रीकृष्ण के यों कहनेपर दूत चला गया, तब भगवान् ने गरूड़ का स्मरण किया। गरुड़ तुरंत आ पहुँचे। भगवान् उनकी पीठपर सवार हुए और पौण्ड्रक के नगर में गये। श्रीकृष्ण के आक्रमणकी बात सुनकर काशिराज अपनी समस्त सेनाओं के साथ पौण्ड्रक की सहायता में आ गया। तब अपनी और काशिराज की विशाल सेना लेकर पौण्ड्रक वासुदेव श्रीकृष्णका सामना करनेके लिए गया। भगवान् ने दूरसे ही देखा पौण्ड्रक एक विशाल रथपर बैठा है। उसने अपने हाथों में कृत्रिम शङ्ख, चक्र और गदा ले रखे हैं। एक हाथ में कमल भी है। गले में वनमाला के स्थानपर एक बहुत बड़ा हार लटक रहा है। शार्ङखधनुष की तरह का एक धनुष भी है। रथपर गरुड़चिह्नसे अङ्कित एक ध्वजा फ़हरा रही है और उसकी छाती में श्रीवत्सका कृत्रिम चिचं भी बना हुआ है। उसने मस्तकपर किरीट, कानों में कुण्डल और शरिर पर पीताम्बर धारण कर रखा है। उसे देखकर भगवान् श्रीकृष्ण गम्भीरभावसे हँसे और उसकी सेना के साथ युद्ध करने लगे। शार्ङ्गधनुष से छुटे हुए बाणों से, गदा से और चक्र की मार से उन्होंने काशिराज की सेना का संहार कर डाला और अपने समान चिह्न धारण करनेवाले अज्ञानी पौण्ड्रकसे कहा- 'पौण्ड्रक! तुमने जो दूत के मुखसे मुझे कहला भेजा था कि तुम अपने चिह्न छोड़ दो, सो अब मैं तुम्हारे आदेश का पालन करता हूँ। लो, यह चक्र छोड़ा; यह गदा छोड़ दी और इस गरुड़को भी छोड़ा। यह तुम्हारी भुजा पर आरुढ़ हो जय।' यों कहकर भगवान् ने अपने छोड़ हुए चक्र से पौण्ड्रक को विदीर्ण कर डाला गदा के आघात से उसे पृथ्वीपर गिरा दिया और गरुड़ ने उसके कृत्रिम गरुड़ को भी तोड़-फोड़ डाला पौण्ड्रक के मारे जानेपर वहाँ लोगों में हाहाकार मच गया। तब काशिराज अपने मित्रका बदला चुकाने के लिये श्रीकृष्ण के साथ युद्ध करने लगे। श्रीकृष्ण ने शार्ङ्गधनुष द्वारा छोड़े हुए बाणों से काशिराज मस्तक काटकर उसे काशीपुरी में फेंक दिया। यह लोगों के लिये बड़े विस्मयका कार्य था। इस प्रकार पौण्ड्रक और काशिराज को सेवकोंसहित मारकर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका में चले आये और वहाँ स्वर्गलोक में स्थित देवताकी भाँति विहार करने लगे।
मुनियों ने कहा - मुने! अब हम परम बुद्धिमान बलरामजी के शौर्य और पराक्रम का वृतान्त सुनना चाहते हैं। आप उसीका वर्णन कीजिये।
व्यासजी बोले - मुनियो! बलराम जी इस पृथ्वीको धारण करनेवाले साक्षात् भगवान् शेष हैं। उनकी महिमा अनन्त है। वे अप्रेमय हैं। उन्होंने जो कार्य किया, उसका वर्णन करता हूँ; सुनो। दुर्योधनकी पुत्री कुमारी लक्ष्मणा स्वयंवर में जा रही थी। उस समय जाम्बवती के पुत्र वीरवर साम्बने उसे बलपूर्वक हर लिया। यह देख महापराक्रमी कर्ण, दुर्योधन, भीष्म और द्रोण आदि बहुत कुपित हुए। उन्होंने साम्बको युद्ध में जीतकर कैद कर लिया। यह सुनकर सम्पूर्ण यादवों ने दुर्योधन आदिपर बड़ा क्रोध किया और उनका विनाश कर डालनेके लिये भारी तैयारी की।तब बलरामजी ने यादवों को रोककर कहा- 'मैं अकेला ही कौरवों के यहाँ जाता हूँ। वे मेरे कहनेसे साम्ब को छोड़कर देंगे।' तदनन्तर बलरामजी हस्तिनापुर में जाकर बाहर के उद्यान में ठहर गये, नगर में नहीं गये। बलरामजी को आया जान दुर्योधन आदि कौरवों ने उन्हें गौ, अघ्र्य और जल भेंट किये। वह सब विधिपूर्वक स्वीकार करके बलराम जी ने कौरवों से कहा- 'राजा उग्रसेनकी आज्ञा है कि तुम सब लोग साम्ब को शीघ्र छोड़कर दो।'
बलदेवजी की यह बात सुनकर भीष्म, ड्रोन, कर्ण और दुर्योधन आदि के क्रोध की सीमा न रही। राजा बाह्लिक आदि भी कुपित हो उठे। उन्होंने यदुकुल को राज्य के अधिकार से वञ्चित जान बलरामजी से कहा- 'बलदेव! तुमने यह कैसी बात कह डाली। कौन ऐसा यदुवंशी है, जो कौरवों को आज्ञा देगा। यदि उग्रसेन भी कौरवोंको आज्ञा दें, तब तो हमें राजाओं के योग्य श्वेत-छत्र धारण करनेसे क्या लाभ होगा। अत: तुम लौट जाओ। साम्बने अन्यायपूर्ण कार्य किया है, अत: तुम्हारे या उग्रसेन के कहने से हम उसे छोड़ नहीं सकते। हमलोग यदुवंशियों के माननीय हैं। कुकुर और अन्धक-वंशों के लोग सदा हमको प्रणाम किया करते थे। अब वे ऐसा नहीं करते तो न सही; किन्तु स्वामीको सेवक की ओर से यह आज्ञा देनेकी बात कैसी। हमने तुमलोगों को अपने समान आसन और भोजन देकर जो सम्मानित किया, उससे तुम्हारा अहंकार बहुत बढ़ गया है।इसमें तुम्हारा क्या दोष है। हमने ही प्रेमवश नीति नहीं देखि। वलराम! हमने तुम्हारे लिये जो यह अघर्य निवेदित किया है, इसमें केवल प्रेम ही कारण है। हमारे कुलकी ओरसे तुम्हारे कुल को अघर्य देना कदापि उचित नहीं है।'
यों कहकर कौरव चुप हो गये। उन्होंने श्रीकृष्ण के पुत्रको बन्धन से मुक्त नहीं किया। इस विषय में उन सबने एक राय कर ली थी। वे सब-के-सब बलराम जी को वहीं छोड़ हस्तिनापुर में चले गये। कौरवों द्वारा किये हुए आक्षेपसे बलरामजी को बड़ा क्रोध हुआ। वे घूरते हुए उठकर खड़े हो गये और पैर की एड़ी से उन्होंने पृथ्वीपर प्रहार किया। महात्मा बलरामजी की एड़ीके आघात से पृथ्वी विदीर्ण हो गयी। वे अपनी गर्जनासे सम्पूर्ण दिशाओं को गुँजाकर कम्पित करने लगे। वे आँखें लाल-लाल और भौहें टेढ़ी करके बोले- 'अहो! इन सराहीन दुरात्मा कौरवों को अपने रजा होनेका इतना मद, इतना अभिमान है! क्या कौरव ही सम्राट्-पदके अधिकारी हैं? हम लोगों का प्रभुत्व कुछ की काल के लिये है? क्या बात है, जो ये महाराज उग्रसेनकी अलङ्घनीय आज्ञा को भी नहीं मानते। देवताओं और धर्म के साथ शचीपति इन्द्र भी उनकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करते हैं। इन्द्रकी सुधर्मा सभा में इस समय सदा महाराज उग्रसेन ही विराजमान होते हैं। इन कौरवों का राजसिंहासन तो सैकड़ों मनुष्यों की जूठन है; उसी पर इनको संतोष है! धिक्कार है इन्हें! आज से उग्रसेन ही समस्त राजाओं के भी राजा बनकर रहें। अब मैं इस पृथ्वी को कौरवोंसे हीं करके ही द्वारपुरीको लौटूँगा। कर्ण, दुर्योधन, द्रोण, भीष्म, बाह्लीक, दु:शासन, भूरी, भूरिश्रवा, सोमदत्त, शल तथा अन्यान्य कौरवोंको उनके हाथी, घोड़े और रथों के सहित मार डालूँगा और वीरवर साम्बको उनकी पत्नीके साथ द्वारकापुरीमें ले जाकर उग्रसेन आदि बन्धु-बान्धवोंका दर्शन करूँगा। अथवा देवराज इन्द्रकी प्रेरणा से हमें शीर्घ ही पृथ्वीका भार उतारना है, इसलिये समस्त कौरवों के साथ उनके हस्तिनापुर नगरको अभी गङ्गामें डाले देता हूँ।'
यों कहकर क्रोध से लाल आँखें किये बलभद्रजी ने अपने हल्का मुख नीचेकी ओर किया और चारदीवारी की जड़में धँसाकर खींचा। इससे सम्पूर्ण हस्तिनापुर सहसा डगमगाता-सा जान पड़ा। यह देख समस्त कौरव व्याकुलचित्त होकर हाहाकार करनेलगे और बलरामजी के पास आकर बोले- 'महाबाहु राम! बलराम!! क्षमा कीजिये, क्षमा कीजिये; मुसलायुध! अपना क्रोध शान्त कीजिये और हमपर प्रसन्न होइये। बलराम! ये पत्नीसहित साम्ब आपकी सेवा में समर्पित हैं। हम आपका प्रभाव नहीं जानते; इसी से हमलोगों के द्वारा आपका अपराध हुआ है। अब कृपया उसे क्षमा करें।' यों कहकर कौरवों ने पत्नी सहित साम्बको बलभद्रजी के सामने उपस्थित कर दिया। भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदि बलरामजी को प्रणाम करके प्रिय वचन कहने लगे। तब बलवानों में श्रेष्ठ बलराम ने कहा- 'अच्छा, मैंने क्षमा कर दिया।' इस समय भी हस्तिनापुर गङ्गाकी ओर कुछ झुका-सा दिखायी देता है। यह बलवान् और शूरवीर बलराम ही प्रभाव है। तदनन्तर कौरवों ने बलरामजी के सहित साम्बका पूजन करके बहुत०से दहेज़ और नववधू के साथ उन्हें द्वारकापुरी भेज दिया।
Summary of chapter 81 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The bull-demon Ariṣṭāsura terrorizes Vṛndāvana; his massive form shakes the earth. The gopīs and gopas flee in terror. Kṛṣṇa fearlessly confronts the demon, wrestles him by the horns, and kills him. The victory over Ariṣṭa is celebrated by the cowherds and celestial beings alike, further establishing Kṛṣṇa's identity as the supreme protector of all who take refuge in him.